मेरे के आलेख स्वास्थ्य: मिट्टी के मोल और मिट्टी का स्नान? का आप लोगों ने जो स्वागत किया उसके लिये मैं आभारी हूँ. पहले लेख को पढ कर पुनीत ओमर ने टिपियाया:
शास्त्री जी, अगले अंक में गंगा के किनारे के क्षेत्रों विशेषकर हरिद्वार में मिलने वाले मिट्टी के चन्दन के बारे में अवश्य बताइयेगा. मैंने इसे गुजरात के तटीय इलाकों में भी बिकता देखा है.
चूँकि मेरे लिये यह एकदम नई खबर थी अत: मैं ने पुनीत से अनुरोध किया कि वे ही इस विषय पर जानकारी प्रदान करें. प्रस्तुत है उनका उत्तर:
शास्त्री जी, जिस मिटटी के चन्दन के बारे में मैंने जिक्र किया था उसके बारे मैं आज विस्तार से बता रहा हूँ.
उत्तर भारत के गंगा तटीय स्थानों पर बिकने वाला यह चन्दन वास्तव में मिटटी ही होता है जिसे स्थानीय लोग गंगा के छिछले तटों पर काफी समय तक जमा रही मिटटी को साफ़ करके बनाते हैं. इसका रंग बसन्ती पीला होता है तथा इसमें स्वयं की एक भीनी खुशबु रहती है. मिटटी को साफ़ करके इसमें केवडा, गुलाब आदि इत्र की खुशबू मिलाकर पिंडियों के रूप में रोल करके सुखा दिया जाता है और पैकेट बनाकर पर्यटक स्थलों में खूब बेचा जाता है.
कामाक्षा देवी की स्तुति और सभा मोहन मन्त्र जाप में इस मिटटी के चन्दन का विशेष महत्व है. कहा जाता है की इसे ललाट पर लगाने से मन शांत रहता है, बुद्धि प्रखर होती है और इससे निकलने वाला ओज किसी को भी सम्मोहित कर सकने का सामर्थ्य रखता है. ग्रीष्म ऋतु में होने वाले हवन आदि में अनिवार्य रूप से इसका प्रयोग होता है. माना जाता है कि इसमें चिरोंजी, तालपर्नी, शिलारस और तम्बाकू मिलकर हवन करने से वायुमंडल में मौजूद विषाक्त तत्व नष्ट होते हैं.
त्वचा में यदि फोडे फुंसी आदि हो जाए तो भी इसे घिस कर लगाने से लाभ होता है. शरीर के जो भाग खुले रहने की वजह से झुलस जाते हैं उन पर इसका नियमित लेप त्वचा की कांति वापस लाता है और मोल भी इसका माटी तुल्य ही है.
इसके बारे में एक कहावत भी है- "गंगा किनार की पीली-पीली माटी। चन्दन के रुप में बिके हाटी-हाटी"
इस रोचक एवं जानकारीपरक आलेख के लिये आभार पुनीत. कल के मिट्टीस्नान आलेख पर काफी काम की जानकारियां टिप्पणी द्वारा मिलीं जो निम्न हैं:
हमारी दादी तो साबुन इस्तेमाल ही बहुत मज़बूरी में करती थी ,वह अधिकतर मुल्तानी मिटटी से ही बाल धोती थी ..सही उपयोगिता बतायी आपने इसकी ..[ranju]
बहुत सही लेख लिखा. इस तरह के आलेखों की आज आवश्यकता है. अन्य देशी फ़ार्मुले भी बीच बीच मे लिखते रहें. [ताऊ रामपुरिया]
हम तो भैय्या आदिवासी संस्कृति में पले बढे. वहां एक सफ़ेद मिटटी होती थी जिसे छुई कहते थे. इस से गाँव वाले अपने घरों की दीवारों को पोतते थे. इसी छुई से स्लेट पट्टी में भर्रू का प्रयोग कर लिखते भी थे. एक पीली मिटटी भी आती है. उसे भी दीवारों को रंगने में लगाते थे. हो सकता है की इस पीली मिटटी को ही मुल्तानी कहा जा रहा हो. यह भी चिकनी होती है. हमने इनके खदानों को भी देखा है.अब हम से रहा नहीं जा रहा है. इस मिटटी की तारीफ़ सुनकर. आज ही हम मुल्तानी मिटटी लेकर आते हैं. [PN Subramanian]
बहुत स्नान किया है मिट्टी से। मुलतानी मिट्टी मिलती थी बाजार में लेकिन उस से शायद ही कोई नहाता हो। पर हमारे यहाँ गर्मी में तालाब सूख जाने के बाद उस के पेंदे में जमी काली मिट्टी का उपयोग किया जाता था। गजब की चिकनी होती थी ऐसी कि प्लास्टर चढ़ाने के लिए पीओपी के स्थान पर उस का इस्तेमाल कर लोय़ पर ढेले पर पानी डाल दो और न छेड़ो तो बिलकुल बिखर जाती थी। फिर उसे बदन पर बालों में सब जगह लगाते। सूखने देते। जब सूख कर वह चमड़ी और बालों की खिंचाई करने लगती तो दौड़ कर नदी में छलांग लगाते, तैरने लगते। बाहर निकलते तो वह पानी में घुल चुकी होती। जो निर्मलता वह बदन और बालों को देती है,आज तक दूसरे किसी साधन से न मिली। मुलतानी मिट्टी से भी नहीं। [दिनेशराय द्विवेदी]
मेरे क्षेत्र में भी लगभग एक मीटर खोदने पर पीले रंग की मिट्टी निकलती है जिसे ‘पिअरी माटी’ कहते हैं। सदियों से स्त्रियाँ इसे से अपने बाल धोतीं हैं। बहुत मुलायम रहता है। प्राकृतिक चिकित्सा पर पढ़ते-पढ़ते कहींपढ़ा था कि किसी को किसी जहरीले साँप ने काट दिया तो एक वैड्य ने उसे गले तक गड़्ढा करके उसमें गाड़ दिया। कुछ ही समय में उसका विष उतर गया। इसे गांधीजी ने कहीं उद्धृत किया है। [अनुनाद सिंह]
अनुनाद जी ने जिस प्रक्रिया का उल्लेख किया है उसे विसरण यानी ओसमोसिस कहते हैं. मिटटी में दाबे जाने से त्वचा गाढी मिटटी और पतले खून के बीच में से अर्ध पारगम्य झिल्ली के तौर पर काम करने लगती है और शरीर के खून पर बाहर निकलने का दाब बनने लगता है, लेकिन खून निकल केवल उसी छिद्र से पाता है जहाँ पर सांप के काटे जाने से त्वचा में छिद्र हुआ था. इससे उस हिस्से का विषाक्त खून झट से बाहर निकल जाता है. बस शर्त इतनी सी है की मिटटी साफ़ हो और उससे से कोई इन्फेक्शन आदि न हो. वैद्य लोग मिटटी के इस गुण को खूब पहचानते हैं. [पुनीत ओमर]
I dont know you are how your honour is writting always on burning issues. Taking bath with good quality sand is beneficial for health. Soaps are the chemicals and in one way or other the soaps makes our skin rough and tough, hence using sand for bathing to be recommended. But I am sorry to write that in present era if we post an advertisement in television to have a bath with sand, with crossed finger I write that we have to sponser that advertisement., hence such blogs are commendable…Go on writting to update our knowledge. [Dr. Mukesh Raghav]
इस तरह जानकारी एकत्रित करने का मौका मिला और उसके लिये मैं आभारी हूँ. हिमांशु ने इस संग्रह के लिये टिपियाया कि “इस महत्वपूर्ण आलेख के लिये आभार। साथ ही पिछले आलेख की बहुमूल्य टिप्पणियाँ भी मिल गयीं।” लुप्त होते प्राचीन ज्ञान के बारे में Zakir Ali ‘Rajnish ने याद दिलाया कि “मिटटी वाकई अनमोल है, गुणों की खान है। पर हम समय के साथ साथ अपने पारम्परिक ज्ञान को तिलांजलि देते जा रहे हैं। यह चिन्ता का विषय है।”
आभार है दोस्तों कि आप लोगों ने मेरे दो सामान्य आलेखों को इतनी अतिरिक्त जानकारी भर कर अद्वितीय बना दिया — शास्त्री
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May 14th, 2009 at 7:10 am
आपको यह आलेख सामान्य क्यों लग रहे हैं ? जहाँ सब कुछ वायवीय और आकाशीय होकर प्रतिष्ठित हो मिट्टी को कौन याद करता है इतनी संवेदित दृष्टि से ?
अचम्भित तो मैं भी हूँ कि आपके द्वारा स्पर्शित हो कर यह विषय अनायास ही कितना महत्वपूर्ण हो उठा !
और अपनी अकिंचनता का क्या कहूँ कि पढ़कर ढंग से टिप्पणी भी कर पाने का विवेक नहीं जागा ।
भला हो पुनीत ओमर जी का कि उन्होंने अपनी संदर्भित और उपयोगी टिप्पणियों से आपके आलेख लिखने का प्रतिदान दे दिया आपको ।
May 14th, 2009 at 8:13 am
किसका आभार-साधुवाद करें..आपका या पुनीत ओमर जी का..चलो, दोनों का किये देते हैं.
May 14th, 2009 at 9:29 am
बहुत आभार दोनों का ही. हमने कहीं ल्कोगों को कीचड में स्नान करते देखा है (कोई वीडियो) बिल कुल भैंसों की तरह. संभवतः वह भी लाभकारी ही होगा.
May 14th, 2009 at 2:10 pm
वतन की मिट्टी है यह, जोड़ते रहिए।
May 14th, 2009 at 4:06 pm
चर्चा की सार्थकता बनी रहे.. लोग अपना अपना ज्ञान बांटते रहें यही आशा है.
बाकी हम तो दोनों हाथों से बटोर ही रहे हैं..
May 14th, 2009 at 4:31 pm
पुनीत जी ने जो इस मिटटी की उपयोगिता बतायी वह पढ़ते ही मैं ने अपने घर के मंदिर में जा कर देखा तो यही वही चन्दन है …शायद यह मथुरा में भी बहुत मिलती है क्यों कि मेरे ससुराल में अधिकतर लोग वही जाते हैं और प्रसाद के रूप में इसको भी साथ ही देते हैं ..पर इसकी उपयोगिता न जानने के कारण यह यूँ ही डिब्बे में रख दी जाती है ..या कोई बुजुर्ग रिश्तेदार इसकी मांग करता है तो उसको दे देते हैं .. बहुत वक़्त से यूँ ही पड़ी है उस में अब कोई खुशबु तो नहीं है ..पता नहीं उसका इस्तेमाल अब इस लेख में बताये तरीके से किया जा सकता है या नहीं ..पर आगे से ध्यान रखा जाएगा .शुक्रिया इस उपयोगी जानकारी के लिए
May 14th, 2009 at 5:43 pm
जानकारीपरक सार्थक आलेख हेतु साधुवाद……सचमुच इस मिटटी के चन्दन की महिमा अपार है.मैंने स्वयं अनुभूत किया है.
May 15th, 2009 at 2:56 pm
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May 15th, 2009 at 3:45 pm
यह मिट्टी का चन्दन मिलता तो हमारे यहं ख़ूब है. पर इसकी इतनी गुणवत्ता है, यह मुझे पता नहीं था.
May 15th, 2009 at 11:08 pm
हम लोग तो इसे चन्दन बाटी कहते हैं. बहुत समय तक तो मैं इसे मुल्तानी मिटटी समझता रहा. इसे माथे पर लगाने से वाकई ठंडक मिलती है. इसका उबटन भी लगा सकते हैं. उसमें गुलाब जल मिला लें तो देखें अच्छे-अच्छे फाइव स्टार के स्पा को धुल चटा देगा.