चिट्ठा-कुंठासुर: एक विश्लेषण

image चिट्ठा या ब्लागिंग का आरंभ पाश्चात्य जगत में अभिव्यक्ति की आजादी के लिये हुआ था, वह भी अराजकत्व की हद तक आजादी के लिये. स्वाभाविक है कि इस प्रकार के एक समूह में हर प्रकार के लोग होंगे. चिट्ठा-कुंठासुर से कैसे बचें!! में मैं ने याद दिलाया था कि जो चिट्ठाकार अनाम बन कर या छद्म नामों के उपयोग के द्वारा महज दूसरों को नीचा दिखाना चाहते हैं, उन लोगों से संवाद के चक्कर में पढने के बदले उनकी उपेक्षा करना आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिये बेहतर होगा. वे नहीं सुधरेंगे, लेकिन आप उनके चक्कर में पड गये तो आप का मन जरूर खराब हो जायगा.

चिट्ठा-कुंठासुरों की विशेषता है कि उन्हें हर बात से, हर चिट्ठे से, हर आलेख से, हर विषय से चिढ, नफरत, और खुंदक होती है. आज आप लिखेंगे “सफेद” तो वे आप की बुराई करेंगे. कल उनके तुष्टीकरण के लिये आप लिखेंगे “काला” तो भी वे आप की बुराई करेंगे. उनका धर्म ही दूसरों की बुराई, नुक्ताचीनी, करके अपने आप को आगे बढाना है. इसके लिये वे जितनी भी जरूरत हो उतना ही हीन कार्य करने में नहीं हिचकिचायेंगे.

तीन तरह के चिट्ठा-कुंठासुर पहचाने गये है, जो इस प्रकार हैं:

1. बाल-कुंठासुर: बच्चे जब छोटे होते हैं तो कई बार दूसरे के हाथ मिठाईटॉफी देख कर जलते है, छीनाझपटी करते हैं. इसी प्रकार चिट्ठाजगत में कई हैं जो उमर से बडे हैं लेकिन मानसिक तौर पर अभी भी बच्चे हैं. जब कोई चिट्ठाकार अच्छा आलेख लिखता है, उसकी प्रशंसा होती है, तो ये लोग बुरी तरह जलन के वशीभूत हो जाते हैं. इनको आप सुधार नहीं सकते. हां एकाध बार डांटडपट कर दें तो हो सकता है कि आगे आप को परेशान न करें!

2. लंपट-कुंठासुर: ये एकदम बुद्धिमान लोग होते हैं, लेकिन सीधे रास्ते चलना इनको मंजूर नहीं है. इनका सारा जीवन ईर्ष्या, चुगली, परनिंदा में बीतता है और इस व्यवहार को वे थोक में चिट्ठाजगत में ले आते हैं. टोकने के लिये बडे भाईबहन, मांबाप, मास्टर आदि का अभाव जो है इस आभासी संसार में. जिस तरह से कहावत है कि चोर चोरी से जायगा लेकिन उठाईगिरी से नहीं, उसी तरह लंपट-कुंठासुर को सुधारा नहीं जा सकता है. यह भेडिये से अधिक चालाक जीव होता है अत: इसकी उपेक्षा करके अपनी चिट्ठाकारी में व्यस्त रहना ही आप के लिये बेहतर है.

3. कुंठित-कुंठासुर: यह व्यक्ति जीवन में एक या अनेक कारणों से कुंठित होता है. खिसियानी बिल्ली खंबा नोचती है, लेकिन कुंठित मानव दूसरे का गला काटता है.  चिट्ठाजगत पर वह दूसरे की मानसिक शांति एवं चरित्र का हनन करता है. ऐसा करने पर उसे बहुत मानसिक शांति मिलती है. ऐसे व्यक्ति को संवाद द्वारा सुधारने की कोशिश न करें!

कुल मिला कर कहें तो:

1. कुंठासुर तो कुंठासुर ही रहेगा. उसकी उपेक्षा करना और उसे अपने चिट्ठे पर से बेन करना ही सबसे अच्छा है.

2. जीवन में हर अनुभव को लोहे के उस टुकडे के समान लें जिसे लुहार पीटपीट कर एक नया रूप देता है. कुंठासुर की टिप्पणी मिल गई तो उसे भी इसी नजरिये से देखिये कि विधि के विधान में आप को एक नई बात सिखाई जा रही है. नजरिया यह हो तो हर व्यक्ति से हम कुछ न कुछ सीख कर अपने आप को बदल सकते हैं.

 

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Anvil and Hammer by fauxto_digit

18 Responses to “चिट्ठा-कुंठासुर: एक विश्लेषण”

  1. Dr.Arvind Mishra Says:

    बहुत माकूल विवेचन ! मगर असुरों का ही वर्णन क्यों ? सुरसाओं का क्यों नहीं ?

  2. Neha Raghav Says:

    I have cone across the personalities,who always want to remain KUNTHASUR , they never remain happy ,only critisizing the people is the theory. They must remember that a statue has never been created in honor of a critic. I praise your article., but this one you left LEARNING as VIDHI KA VIDHAN

  3. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    यह बात कहने की है ही नहीं समझने और काम में लेने की है।

  4. RAJNISH PARIHAR Says:

    सच कहा आपने ..ये कुंठासुर तो काफी तादाद में है..जो नए ब्लोगर को हतोत्साहित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते!लेकिन इन्हें बेन.. करना ही एकमात्र विकल्प है क्या???

  5. - लावण्या Says:

    :-)

  6. Shyamal Suman Says:

    कुंठासुर के रूप का देखा नया बखान।
    बिषयों का वैविध्य ही शास्त्री की पहचान।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

  7. रवि Says:

    बढ़िया विश्लेषण. अनदेखा करना ही श्रेष्ठ विकल्प है, क्योंकि इन्हें आप कहां कहां प्रतिबंधित करते फिरेंगे?

  8. संगीता पुरी Says:

    सहमत हूं आपसे ..

  9. हिमांशु Says:

    कुंठासुरों के वर्गीकरण में कुंठित-कुंठासुर कुछ खटक रहा है मुझे । यद्यपि विस्तार से लिखते हुए आपने उसे स्पष्ट कर दिया है । कुंठा शब्द की पुनरुक्ति से अर्थ-संप्रेषण में बाधा आ रही है ।

    एक बात और भी है । अब विचारिये कि कुंठासुर ही कुंठित हो जाय तो क्या हो ? नकारात्मकता नकारात्मक हो जाय तो ? not और but साथ हों तो भी क्या negativity बचती है ?

    अन्यथा न लें । समझ में न आने के कारण भी लिख रहा हूँ यह सब । हो सकता है किसी कुंठासुर का प्रभाव इस मति पर भी पड़ गया हो ।

    स्नेहाधीन ।

  10. मीनाक्षी Says:

    कुंठासुर की टिप्पणी मिल गई तो उसे भी इसी नजरिये से देखिये कि विधि के विधान में आप को एक नई बात सिखाई जा रही है. —– प्रभावशाली तथ्य ….
    इस नज़रिए का ज़िक्र तो लुकमान हकीम ने भी किया है….लुकमान हकीम से किसी ने पूछा, ‘आपने इतना अदब कहाँ से पाया?’ मुस्कुराते हुए उन्होने जवाब दिया,’बेअदबों से’

  11. पुनीत ओमर Says:

    काफी प्रयोगधर्मी विश्लेषण!! ज्ञान के सारे कपाट खुल गए श्रीमान जी.. ठंडी हवाए इधर से उधर बहती महसूस हो रही हैं..
    परसाई जी का “निंदा रस” सहसा स्मरण हो आया.

  12. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत सत्य विष्लेषण है.

    रामराम.

  13. सुरेश चिपलूनकर Says:

    जी हम भी एकाध बार पहले नम्बर वाले कुंठासुर को डाँटने का उपक्रम करते हैं (डाँटते नहीं हैं), बस…। बाकी के कुंठासुरों से निपटने का अपना भी वही तरीका है जो आपने लिखा है… ये टिप्स नये चिठ्ठाकारों के लिये उपयोगी हैं, जो नहीं जानते कि इस आभासी ब्लॉग जगत में कितने छिछोरे लोग भरे पड़े हैं…

  14. Kajal Kumar Says:

    अनाम लोग शीशे का बने होते है.
    The just don’t exist, I look through them.

  15. रंजना. Says:

    sateek vishleshan kiya hai aapne…

  16. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    उम्दा! और भाई अरविन्द जी, सुरसाएं भी उसी कोटि में हैं. उन्हें असुरों से अलग थोड़े माना जाएगा.

  17. अजित वडनेरकर Says:

    शास्त्रीजी,
    आप भी शरारती हैं और आपसे कम नहीं हैं श्री अरविंद मिश्र :)

    आनंदम् आनंदम्…

  18. Anurag Sharma Says:

    सही विश्लेषण किया है. अब सवाल यह उठता है हमारे अन्दर का कुंठासुर मरता क्यों नहीं है? आशा है अगले अंकों में इस पर भी बात होगी. मुझे तो एक कारण आत्मावलोकन की क्षमता का अभाव भी दिखता है. ब्लॉग जगत ही नहीं आम जीवन में भी ऐसे लोग दुनिया भर के सारे दुर्गुणों को दूसरों में ही ढूंढते रहते हैं और इसलिए स्वयं सुधार की और अग्रसर नहीं हो पाते हैं. यदि आप आत्मोद्धार के (आसान?) तरीके भी बताएं तो लाभ हो.
    मीनाक्षी जी का दृष्टिकोण भी काबिले-गौर है:
    लुकमान हकीम से किसी ने पूछा, ‘आपने इतना अदब कहाँ से पाया?’ मुस्कुराते हुए उन्होने जवाब दिया,’बेअदबों से’
    संत कबीर के शब्दों में: निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय

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