पिछले दिनों कई आलेखों में यह शिकायत की गई है कि हिन्दी चिट्ठाजगत मठाधीशों के नियंत्रण में है. उनको खुश रखो तो हर्र लगे न फिटकरी, चिट्ठाकारी चकाचक होती रहेगी. उनको नाराज कर दो तो आप चाहे कितना भी अच्छा लिखें कोई श्वान भी मुड कर नहीं देखेगा.
आप के इस तरह के आलेख चिट्ठा-फिलसफा और चिट्ठाजगत की वास्तविकताओं के बारे में आप के अज्ञान को दिखाते हैं. इन आलेखों को पढ जो लोग वाहवाही करते हैं वे भी इसी गलतफहमी को पाल रहे हैं.
चिट्ठों का आरंभ ही अभिव्यक्ति की आजादी के लिये हुआ है. इसमें किसी तरह का बदलाव अभी तक नहीं आया है. चिट्ठाजगत में न तो कोई चिट्ठा पुलीस है न ही कोई अपनी जबर्दस्ती चला सकता है. अश्लीलता (पोर्नोग्राफी) और अपराध के अलावा किसी भी आरोप में सामान्यतया किसी चिट्ठे को बंद नहीं करवाया जा सकता है. न ही किसी के कहने से कोई आपका चिट्ठा पढना बंद कर देगा.
हां, यदि आप चिट्ठाजगत में नये नवेले हैं, और यदि आप की नजर में कुछ ऐसे चिट्ठाकार या चिट्ठाकार समूह पड जाते हैं जिन में कुछ लोग नियमित रूप से लिखते हैं, या एक दूसरे की प्रशंसा करते हैं तो आप को बुरा लगने की जरूरत नहीं है. आप जब एक शादी या सभा में जाते हैं तो वहां लोग छोटे छोटे झुंड बना कर ही एक दूसरे से बात करते हैं. कोई भी व्यक्ति सारी सभा से एक साथ संवाद नहीं कर सकता.
जहां भी परस्पर संवाद होता है वहां पेशे, रुचि, विषय, आदि के आधार पर औपचारिक या अनौपचारिक समूह बन जाते हैं. समरुचि या समस्वभाव वाले लोगों के लिये ये समूह खुले रहते हैं. विषमरुचि वालों के लिये शायद खुले न हों क्योंकि जहां औषधिशास्त्र की बात की जा रही है वहां दार्शनिक क्या करेगा और जहां दर्शन की बात हो रही है वहां व्यापारी क्या करेगा. यह आपसी विरोध नहीं बल्कि संवाद एवं समन्वय की सुविधा के लिये किया जाता है.
चिट्ठाजगत एक आजाद लोक है. यहां हर किसी को अपनी पहचान बनाने की आजादी है. कोई भी किसी को भी रोक नहीं सकता है. सिर्फ आप ही अपने आप को सीमित कर सकते हैं. काल्पनिक प्रेतों ( तथाकथित मठाधीशों) से डर कर चिट्ठाकारी करते रहेंगे तो आप अनजाने अपने आप को सीमित कर देंगे और आप की चिट्ठाकारी सिर्फ गर्त की ओर जायगी.
Indian Coins | Guide For Income | Physics For You | Article Bank | India Tourism | All About India | Sarathi | Sarathi English |Sarathi Coins Pic by Army.mil
इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




May 23rd, 2009 at 5:37 am
उत्तम आलेख एवं उत्तम सलाह…(हम तो मठाधीशों को खोज कर थक गये, कोई मिला ही नहीं)
May 23rd, 2009 at 5:40 am
शास्त्री जी प्रणाम, मैंने आप का लेख पढ़ा और पूरी तरह से सहमत हूँ कुछ लोग इस अभिव्यक्ति के मार्ग में जब आते हैं तो हाँकू हो जाते हैं और बस *तियापे वाले बाते करते हैं और उनके समर्थक उन्हें विचारक कहने लगते हैं मुझे तो ऐसों पे ख़ूब हँसी आती है।
May 23rd, 2009 at 6:18 am
आप सही कहते हैं।
May 23rd, 2009 at 6:49 am
2005 की शुरूआत से, ब्लॉग जगत से जुड़ा रहने के बावज़ूद मैं आपके इस लेख की मूल भावना से सहमत नहीं हूँ।
शादी, सभा एक विशिष्ट आयोजन होते हैं, आमंत्रितों के लिए, कुछ विशिष्ट समयखंड के लिए। मेलजोल बढ़ाने के लिए समूह वहां बन सकते हैं, सार्वजनिक जीवन में नहीं।
ब्लॉगजगत को एक सामाजिक मंच माना जाता रहा है तथा एक सामान्य समाज में गुटबाजी समाज के लिए ही नुकसानदेह होती है।
बेशक एक दार्शनिक के लिए औषधि ‘शास्त्र’ का कोई मतलब नहीं किंतु सामान्य औषधि ‘ज्ञान’ पर हिकारत भी ठीक नहीं।
प्रेत (मठाधीश) तो मौज़ूद हैं, आप माने या ना माने। अपने अपने पूर्वाग्रह हैं। सैकड़ों उदाहरण दे सकता हूँ लेकिन होगा क्या?
इस बात को आपने अपने लेख में उठाने के लिए धन्यवाद। मैं अपनी बात इसलिए यहाँ रख रहा हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप इस दिशा की ओर कुछ गंभीरतापूर्वक देखेंगे।
May 23rd, 2009 at 7:00 am
उत्तम आलेख एवं उत्तम सलाह…(हम तो मठाधीशों को खोजने गये और अनेक दिखे!)
लेकिन यह है कि इण्डीवीजुअल ब्लॉगर सर्वाइव कर सकता है। मठाधीश का कड़वा अनुभव तो मुझे अपनी पहली दस पोस्टों में ही हो गया था।
May 23rd, 2009 at 7:19 am
सही अनुभव ।
“यहां हर किसी को अपनी पहचान बनाने की आजादी है. कोई भी किसी को भी रोक नहीं सकता है. सिर्फ आप ही अपने आप को सीमित कर सकते हैं ।”
धन्यवाद ।
May 23rd, 2009 at 7:37 am
I fully agree with you. we are living in independent india, to express a feeling is my right, it is not necessary that every comment will be as per wish and will of blogger. But one thing, ” A STATUE HAS NEVER BEEN CREATED IN HONOR OF A CRITIC ” REGARDS
May 23rd, 2009 at 7:43 am
Nice presentation , I salute your throughts.
May 23rd, 2009 at 7:45 am
मैं श्री पी एस पाबला की बातों से सहमत हूँ..ब्लॉग जगत में जैसा दीखता है..वैसा सब कुछ सही नहीं है..यहाँ भी सामान्य समाज की तरह ही कुछ बुराइयाँ आ गयी है…
May 23rd, 2009 at 7:55 am
“…आप के इस तरह के आलेख चिट्ठा-फिलसफा और चिट्ठाजगत की वास्तविकताओं के बारे में आप के अज्ञान को दिखाते हैं. इन आलेखों को पढ जो लोग वाहवाही करते हैं वे भी इसी गलतफहमी को पाल रहे हैं…..”
आपने बिलकुल सही कहा. इन्हें ब्लॉग की मूल भावना का अर्थ ही नहीं पता. अभी हिन्दी चिट्टों की संख्या पांच-दस हजार है तो तमाम ऐसी अंधकारी अहंकारी किस्म की बातें होती हैं. अंग्रेज़ी ब्लॉगों की तरह लाखों में जब होंगे तो कौन किधर है क्या कर रहा है किधर के मठाधीश और किधर के चेंगड़े – लोगों को हवा ही नहीं लगेगी. लोग फिर सिर्फ खोज कर और अपने पसंदीदा विषय के चिट्ठों को सब्सक्राइब कर ही पढ़ा करेंगे – जैसे हम बीबीस्पॉट को पढ़ते हैं – तकनीकी व्यंग का अंग्रेजी में मठाधीशी चिट्ठा है वह!
इस तरह की बेहूदा बातों पर ध्यान नहीं देना ही सबसे बढ़िया काम है.
May 23rd, 2009 at 8:04 am
मठाधीश को छोड़कर लिखते रहें जनाब।
लेखन में दम हो अगर होंगे पूरे ख्वाब।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
http://www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
May 23rd, 2009 at 8:29 am
अभी ब्लोगजगत में नया हूं, इसलिए पता नहीं कि मठाधीश हैं या नहीं। हां अभी तक किसी मठाधीश से सामना नहीं हुआ है। यह जरूर कहूंगा कि हिंदी ब्लोगों की गुणवत्ता अंग्रेजी ब्लोगों से कहीं बेहतर है क्योंकि हिंदी ब्लोगर पैसे कमाने के इरादे से ब्लोग नहीं चलाते, बल्कि इसलिए चलाते हैं क्योंकि उन्हें सचमुच इसमें रुचि है। पर ब्लोगों की पूर्ण संभावना को न अंग्रेजी में प्राप्त किया गया है न हिंदी में। यह तभी हो सकेगा जब गांव-गांव में ब्रोडबैंड आ जाएगा और झोंपड़ी-झोपड़ी में कंप्यूटर। देखते हैं, नई सरकार इस ओर क्या करती है।
May 23rd, 2009 at 8:49 am
मठाधीश हों तो बने रहें. आपने ठीक कहा. ठेट शब्दों में अंतरजाल में चिट्ठाकारी किसी की बपौती नहीं है
May 23rd, 2009 at 9:00 am
हम तो ये ही कहेगें कर्म किये जाओ.. बाकी जो होगा सो होगा…
May 23rd, 2009 at 9:11 am
आपने एकदम सही कहा है कि चिट्ठों की दुनिया में मठाधीश हो ही नहीं सकते. बात कड़वी है लेकिन कही जानी चाहिये, इसलिए कह रहा हूं कि बहुत सारे मित्र ‘आंगन टेढा’ कह कर अपनी कमज़ोरी पर पर्दा डालने की कोशिश करते हैं. आप उम्दा लिखिये, पाठक अपने आप
May 23rd, 2009 at 9:14 am
रंजना जी के साथ .. कर्म किए जा।
May 23rd, 2009 at 10:53 am
वाह्! वाह्! बडे ही प्यार से घो डाला!!! मठाधीश वाली बात हमे तो समझ आई पर समिरलालाजी अभी भी अनजान बन रहे है। कृपया दो चार मठाधीशो के नाम पत्ते छाप देते तो हमे भी सुविधा होती ढूढने मे और फिर ठण्डा ठण्डा कुल कुल वाला तेल भी……………?
आपतो जगत ज्ञाता हो गुरुदेव मेरी भावनाओ को आपने पहले ही जान लिया होगा
May 23rd, 2009 at 11:18 am
पाबला जी से सहमत, “मठाधीश” तो हैं, इसमें कोई शक नहीं और इसका अनुभव एकदम शुरुआती दौर में मुझे आ चुका है, लेकिन जैसा कि रंजन ने कहा कि “कर्म किये जाओ…” मैंने वही किया और आज स्थिति में काफ़ी सुधार है…। घटिया से चिठ्ठे की तारीफ़ किसे अच्छी नहीं लगती? कुछ “मठाधीश” यही चाहते हैं… जबकि कुछ मठाधीश ऐसे हैं कि यदि उनकी विचारधारा(?) से मिलती-जुलती टिप्पणी नहीं लिखो तो मॉडरेट कर देंगे…
May 23rd, 2009 at 3:26 pm
मठाधीश के होने या न होने से बहुत फर्क नहीं पड़ता। ब्लॉगिंग की सबसे अच्छी बात यही है कि तकनीकी रूप से प्रत्येक छोटे या बड़े ब्लॉगर को समान शक्तियाँ प्राप्त हैं। मठाधीश बनने से भी किसी के लिए रोक नहीं है। पाबला जी भी चाहें तो बन जाँय।
यहाँ तो सबकुछ स्वतन्त्र है। अपनी पसन्द का पढ़िए और अपनी क्षमता का लिखिए। इन दो कामों में कोई मठाधीश अड़ंगा डाले तो मुझे बताइए। ठीक कर दूंगा:D
May 23rd, 2009 at 4:02 pm
वाह शाश्त्री ्जी , आपने बहुत बढिया टोपिक छेड दिया, यहां कोई मानने को ही तैयार नही कि मठाधीश की शक्तियां उसे प्राप्त हैं, यानि ये तो भूत वाला किस्सा होगया?
भाई एक बार ताऊ मरने लगा तो पंडीत जी ने कहा कि ताऊ तूने जो पाप किये हों उनकी माफ़ी मांग ले भगवान से इस अंत समय मे. नही तो सीधे नर्क मे जायेगा.
ताऊ बोला – पंडित जी आपकी बात सही है कि भगवान से तो माफ़ी मांग लूंगा पर कहीं शैतान का राज्य हुआ तो? आपने देखा है कि भगवान ही फ़ुल अथारिटी है?
पंडित जी ने मना किया तो ताऊ बोला कि मैं तो दोनो से क्षमा मांग लेता हूं. फ़िर चाहे जिसका राज हो.:)
तो अपन तो मठाधीश हों तो उनका भी जयकारा लगा देते हैं और ना हों तो फ़िर कोई तकलीफ़ ही नही है, पर यहां इमानदारी से कौन कबूलेगा?
रामराम
May 23rd, 2009 at 5:43 pm
May 23rd, 2009 at 5:55 pm
हमारे मोहल्ले में एक शर्मा जी थे. मोहल्ले में अपराध हुआ तो शर्मा जी ने खूब हल्ला मचाया. पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने से लेकर, अखबारबाजी, कलेक्टरेट में धरना, मुख्यमंत्री का घेराव सब उन्होंने करवाया.
बहुत बाद में मालूम चला कि अपराध शर्मा जी ने ही किया था. वो तो इतना हल्ला और विरोध मचवा रहे थे कि उनकी तरफ किसी का शक जाने का प्रश्न ही नहीं था.
पता नहीं क्यूँ आज वो कथा याद आई तो लिख दी बस!!
यह कथा इस आलेख से संबंधित नहीं है.
May 23rd, 2009 at 9:55 pm
गुरुदेव देखो, समीर भाई ने फिर सिक्सर मारा। अब तो कुछ बोलो।
May 23rd, 2009 at 10:14 pm
@हे प्रभु यह तेरा-पथ”
ऐसा करते हैं: कल के आलेख में ताऊजी और समीर जी दोनों को लपेट लेंगे!!
May 23rd, 2009 at 10:32 pm
सभी महानुभावों से एक निवेदन है कि मठाधीश की बात तो बाद में कर लेंगे। अभी इतना तो बता दो, मठ किधर है? सुबह से तलाशने में लगा हूँ, मिल ही नहीं रहा है।
May 23rd, 2009 at 10:53 pm
चलो भाई आखिर मेरी मुराद पुरी हुई। थोडा कस के लपेटना। दोनो ही फिसलने वाले ताऊ है।
इन्तजार रहेगा……………….
May 24th, 2009 at 12:49 am
अभी हम इस सब से अनजान है क्या कहे
वीनस केसरी
May 24th, 2009 at 12:54 am
मठाधीश कहां नहीं हैं। अगर कोई यह कहे कि इस क्षेत्र में मठाधीशों का क्या काम तो वह या तो गलतफहमी में है या फिर उसको मठाधीशों के बारे में जानकारी ही नहीं है। जब इस दुनिया में हर क्षेत्र में मठाधीशों की घुसपेंठ है तो फिर इससे ब्लाग जगत अछूता रह जाए यह कम से कम हमको तो संभव नहीं लगता है। हर क्षेत्र में हर कोई एक-दूसरे की टांग खींचकर आगे बढ़ाने का फार्मूला तलाशता रहता है। कोई यह कह ही नहीं सकता है कि ऐसा नहीं होता है। बिना गॉडफादर के किसी क्षेत्र में सफलता नहीं मिलती ऐसा कहा जाता है तो गलत भी नहीं है। आपमें चाहे जितनी प्रतिभा हो लेकिन बिना एप्रोज कोई काम नहीं होता मेरे दोस्त।
May 24th, 2009 at 1:01 am
आप सही कहते हैं. साधारण पढने-लिखने की योग्यता रखने वाले छपास के मारे नए-नवेले ब्लौगरों के ऐसे कई समूह बन गए हैं जहाँ मौजूद ब्लौगर अपनी-अपनी भड़ास निकालते रहते हैं और ब्लॉगिंग में जम चुके लोगों के व्यक्तव्यों को पकड़कर उनकी मट्टी पलीद करने में जुट जाते हैं. इसी बहाने उनका थोड़ा नाम तो हो ही जाता है. बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो ईर्ष्या और अज्ञानवश ऐसे काम करते हैं. वास्तव में कोई मठाधीश कहीं नहीं है. जिन्हें मठाधीश कहा जा रहा है वे अपनी ब्लॉगिंग में मस्त हैं. कोई-कोई की फितरत होती है गाहे-बगाहे विवादस्पद पोस्ट या कमेन्ट करते रहना… ये तो सामान्य बात है और इसे नज़रंदाज़ करना चाहिए.
May 24th, 2009 at 1:13 am
शास्त्री जी, अपनी पोस्टों में text के alignment को कृपया justified कर दिया करें
May 24th, 2009 at 5:00 am
[...] चिट्ठाजगत के मठाधीश !! [...]
May 25th, 2009 at 10:04 am
[...] में मठाधीशी की बात अक्सर होती है। मेरी समझ में [...]