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	<title>Comments on: क्या व्यायाम मन में किया जा सकता है!!</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: saurabh</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2316/comment-page-1#comment-7700</link>
		<dc:creator>saurabh</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 31 Aug 2009 06:39:27 +0000</pubDate>
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		<description>Good explanation. if it will be more longer chemical description it will be more useful and benific. www.brandbihar.com</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Good explanation. if it will be more longer chemical description it will be more useful and benific. <a href="http://www.brandbihar.com" rel="nofollow">http://www.brandbihar.com</a></p>
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		<title>By: मानसिक व्यायाम: नुक्सान ही नुक्सान!! &#124; सारथी</title>
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		<dc:creator>मानसिक व्यायाम: नुक्सान ही नुक्सान!! &#124; सारथी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 Jun 2009 03:14:03 +0000</pubDate>
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		<description>[...] क्या व्यायाम मन में किया जा सकता है!!  [...]</description>
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		<title>By: राज भाटिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2316/comment-page-1#comment-7177</link>
		<dc:creator>राज भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Jun 2009 09:14:45 +0000</pubDate>
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		<description>कर के देखते है, वेसे आप की सभी बातो पर हमे यकीन होता है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कर के देखते है, वेसे आप की सभी बातो पर हमे यकीन होता है.</p>
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		<title>By: ताऊ रामपुरिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2316/comment-page-1#comment-7176</link>
		<dc:creator>ताऊ रामपुरिया</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Jun 2009 08:40:17 +0000</pubDate>
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		<description>वाह शाश्त्री जी, आज आपने हमको आपके ब्लाग के पन्ने रंगने का एक और मौका दे दिया.:) अब जब मौका दे ही दिया है तो सुनिये.

हमको कुछ लामाओं से संगति करने का सुअवसर प्राप्त हुआ. एक लामा हमको तवांग (अरुणाचल प्रदेश) की यात्रा के दौरान मिले.  मेरे कुछ खोजी स्वभाव की वजह से मैने उनसे बातचीत शुरु करदी. 

मुझे आश्चर्य जनक लगा कि वो सिर्फ़ साधू ही नही थे बल्कि उन लोगों मे जीवन को जीने का एक पूरा नजरिया था. बडे ही हंसमुख थे. मजाक तो कर ही लेते थे बीच बीच मे. अभी तीन दिन पहले ही दलाई लामा हमारे शहर मे थे. वो भी बहुत हंसमुख हैं और काफ़ी मजाक कर लेते हैं. पूछने पर उन्होने कहा कि हंसना भी एक योग है. सभी को हंसाओ. और चमत्कार देखो. खैर..

जब मेरे हृदय रोग के बारे मे उनको पता चला तो उन्होने मुझे कुछ योगिक क्रियाये इस संबंध मे बताई. और आप जिस बात का जिक्र कर रहे हैं, मुझे वैसा ही कुछ बताया था.

१. मुझे पहला अभ्यास बताया : आंखे बंद करके पालथी लगाकर बैठ जाओ. ध्यान मुद्रा में...अब कल्पना करो कि आप बचपन मे पहुंच गये हैं और जिन गलियों मे तेज दौडा करते थे ..उन्ही गलियों मे दौड रहे हैं. स्कूल मे ग्राऊंड मे फ़ुटबाल खेल रहे हैं..या खेतों की मेड पर दौड लगा रहे हैं.

परिणाम : बिल्कुल दौडने जितनी ही हृदय गति मे बढाव और आंख खोलते ही युं लगता है जैसे बस अभी दौडे चले आ रहे हैं. 

मैं अक्सर यह ध्यान अभी भी करता हूं और विशेषकर बरसात के दिनों मे जब बाहर घूमने नही जा पाता. मुझे यह उतनी ही चुस्ती फ़ुरती देता है जैसा हकीकत मे दौडना. आप भी आजमा कर देखें आपको आनंद नही आये तो फ़ीस वापस.:)

वहीं पर मुझे मालूम पडा कि तिब्ब्ती मोनेस्ट्रीज मे अंतिम परीक्षा के समय एक प्रयोग करवाया जाता है. सारे वस्त्र गीले करके लामा (परिक्षार्थी) को ध्यान करने के लिये कहा जाता है. वहां का तापमान तो युं ही मायनस मे होता है. वो परीक्षार्थी अब ध्यान मे ही कल्पना करते हैं कि अग्नि जल रही है..और आप आश्चर्य करेंगे कि ना उनके वस्त्र सूखते जाते है बल्कि उनको पसीना भी निकल आता है. 

यह सब कैसे होता है?  यह अनुभव करने की बात है. इनको आप गप्प ना समझे. पूरे विस्तार मे तो यहां बताना संभव नही है. पर आपकी बात सौ प्रतिशत सच है.

अब आप इसमे खतरे भी बता रहे हैं सो आपका क्या तर्क है? वो भी बडी उत्सुकता रहेगी जानने की.

रामराम.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह शाश्त्री जी, आज आपने हमको आपके ब्लाग के पन्ने रंगने का एक और मौका दे दिया.:) अब जब मौका दे ही दिया है तो सुनिये.</p>
<p>हमको कुछ लामाओं से संगति करने का सुअवसर प्राप्त हुआ. एक लामा हमको तवांग (अरुणाचल प्रदेश) की यात्रा के दौरान मिले.  मेरे कुछ खोजी स्वभाव की वजह से मैने उनसे बातचीत शुरु करदी. </p>
<p>मुझे आश्चर्य जनक लगा कि वो सिर्फ़ साधू ही नही थे बल्कि उन लोगों मे जीवन को जीने का एक पूरा नजरिया था. बडे ही हंसमुख थे. मजाक तो कर ही लेते थे बीच बीच मे. अभी तीन दिन पहले ही दलाई लामा हमारे शहर मे थे. वो भी बहुत हंसमुख हैं और काफ़ी मजाक कर लेते हैं. पूछने पर उन्होने कहा कि हंसना भी एक योग है. सभी को हंसाओ. और चमत्कार देखो. खैर..</p>
<p>जब मेरे हृदय रोग के बारे मे उनको पता चला तो उन्होने मुझे कुछ योगिक क्रियाये इस संबंध मे बताई. और आप जिस बात का जिक्र कर रहे हैं, मुझे वैसा ही कुछ बताया था.</p>
<p>१. मुझे पहला अभ्यास बताया : आंखे बंद करके पालथी लगाकर बैठ जाओ. ध्यान मुद्रा में&#8230;अब कल्पना करो कि आप बचपन मे पहुंच गये हैं और जिन गलियों मे तेज दौडा करते थे ..उन्ही गलियों मे दौड रहे हैं. स्कूल मे ग्राऊंड मे फ़ुटबाल खेल रहे हैं..या खेतों की मेड पर दौड लगा रहे हैं.</p>
<p>परिणाम : बिल्कुल दौडने जितनी ही हृदय गति मे बढाव और आंख खोलते ही युं लगता है जैसे बस अभी दौडे चले आ रहे हैं. </p>
<p>मैं अक्सर यह ध्यान अभी भी करता हूं और विशेषकर बरसात के दिनों मे जब बाहर घूमने नही जा पाता. मुझे यह उतनी ही चुस्ती फ़ुरती देता है जैसा हकीकत मे दौडना. आप भी आजमा कर देखें आपको आनंद नही आये तो फ़ीस वापस.:)</p>
<p>वहीं पर मुझे मालूम पडा कि तिब्ब्ती मोनेस्ट्रीज मे अंतिम परीक्षा के समय एक प्रयोग करवाया जाता है. सारे वस्त्र गीले करके लामा (परिक्षार्थी) को ध्यान करने के लिये कहा जाता है. वहां का तापमान तो युं ही मायनस मे होता है. वो परीक्षार्थी अब ध्यान मे ही कल्पना करते हैं कि अग्नि जल रही है..और आप आश्चर्य करेंगे कि ना उनके वस्त्र सूखते जाते है बल्कि उनको पसीना भी निकल आता है. </p>
<p>यह सब कैसे होता है?  यह अनुभव करने की बात है. इनको आप गप्प ना समझे. पूरे विस्तार मे तो यहां बताना संभव नही है. पर आपकी बात सौ प्रतिशत सच है.</p>
<p>अब आप इसमे खतरे भी बता रहे हैं सो आपका क्या तर्क है? वो भी बडी उत्सुकता रहेगी जानने की.</p>
<p>रामराम.</p>
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		<title>By: दिनेशराय द्विवेदी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2316/comment-page-1#comment-7175</link>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Jun 2009 07:50:12 +0000</pubDate>
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		<description>यह तो सही है कि सोचने में ऊर्जा का व्यय होता है। लेकिन उस का असर वैसा ही होगा जैसा आप ने कहा है, इस में संदेह है। कर के देखते हैं, अनुभव हो लेगा। पर व्यायाम के बारे में लगातार घंटा या आधा घंटा सोचते रहना असंभव तो नहीं?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह तो सही है कि सोचने में ऊर्जा का व्यय होता है। लेकिन उस का असर वैसा ही होगा जैसा आप ने कहा है, इस में संदेह है। कर के देखते हैं, अनुभव हो लेगा। पर व्यायाम के बारे में लगातार घंटा या आधा घंटा सोचते रहना असंभव तो नहीं?</p>
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		<title>By: सुरेश चिपलूनकर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2316/comment-page-1#comment-7174</link>
		<dc:creator>सुरेश चिपलूनकर</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Jun 2009 06:34:09 +0000</pubDate>
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		<description>अजय कुमार झा जी, सिर्फ़ जॉगिंग ही करेंगे ना? पक्का? हम भी ऐसा ही कुछ सोचे बैठे थे… :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अजय कुमार झा जी, सिर्फ़ जॉगिंग ही करेंगे ना? पक्का? हम भी ऐसा ही कुछ सोचे बैठे थे… <img src='http://sarathi.info/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	<item>
		<title>By: mahendra mishra</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2316/comment-page-1#comment-7173</link>
		<dc:creator>mahendra mishra</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Jun 2009 06:25:40 +0000</pubDate>
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		<description>मानसिक व्यायाम करने से मानसिक बल में वृद्धि होती है .बहुत सुन्दर पोस्ट. आभार.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मानसिक व्यायाम करने से मानसिक बल में वृद्धि होती है .बहुत सुन्दर पोस्ट. आभार.</p>
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		<title>By: अजय कुमार झा</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2316/comment-page-1#comment-7172</link>
		<dc:creator>अजय कुमार झा</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Jun 2009 05:20:30 +0000</pubDate>
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		<description>अरे वाह ..तो क्या ऐसा भी हो सकता है की इस अनोखी जोग्गिंग के बाद  पसीना भी  ...और फिर हम मन ही मन नहा भी लेंगे..व्हाट एन उआईडिया शास्त्री जी..कल ही मल्लिका शेरावत के साथ जोग्गिंग शुरू कर  देता हूँ..देखता हूँ कितना फायदा होता है...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरे वाह ..तो क्या ऐसा भी हो सकता है की इस अनोखी जोग्गिंग के बाद  पसीना भी  &#8230;और फिर हम मन ही मन नहा भी लेंगे..व्हाट एन उआईडिया शास्त्री जी..कल ही मल्लिका शेरावत के साथ जोग्गिंग शुरू कर  देता हूँ..देखता हूँ कितना फायदा होता है&#8230;</p>
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		<title>By: मिहिरभोज</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2316/comment-page-1#comment-7171</link>
		<dc:creator>मिहिरभोज</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Jun 2009 05:16:14 +0000</pubDate>
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		<description>मैं भी आजकल ऐसा ही करता हुं कि मन  ही मन सोच लेता हूं कि मैंने आम खाया और सचमुच मजा आ जाता हैं..और कभी कभी तो ये भी सोच लेता हूं कि मैं देश का प्रधानमंत्री बन गया हूं तो भी बाकि कोई माने या न माने पर मैं बङा खुश हो जाता हूं</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं भी आजकल ऐसा ही करता हुं कि मन  ही मन सोच लेता हूं कि मैंने आम खाया और सचमुच मजा आ जाता हैं..और कभी कभी तो ये भी सोच लेता हूं कि मैं देश का प्रधानमंत्री बन गया हूं तो भी बाकि कोई माने या न माने पर मैं बङा खुश हो जाता हूं</p>
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		<title>By: anil pusadkar</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2316/comment-page-1#comment-7170</link>
		<dc:creator>anil pusadkar</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 13 Jun 2009 05:00:03 +0000</pubDate>
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		<description>ये क्या शास्त्री जी!हम तो खुश हो गये थे! मन ही मन प्यार तो सुना था मगर मन मे व्यायाम सुनकर खुश हो गये थे,बैठे बैठे जागिंग की कल्पना ने रोमांचित कर दिया था मगर दुष्परिणाम की चेतावनी देकर डरा दिया।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ये क्या शास्त्री जी!हम तो खुश हो गये थे! मन ही मन प्यार तो सुना था मगर मन मे व्यायाम सुनकर खुश हो गये थे,बैठे बैठे जागिंग की कल्पना ने रोमांचित कर दिया था मगर दुष्परिणाम की चेतावनी देकर डरा दिया।</p>
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