चित्र: चुम्बन में लिप्त दो समलैंगिक पुरुष
समाज में सिर्फ एक अति-न्यून संख्या समलैंगिक स्वभाव दिखाता है, अत: इनके बारे में काफी अज्ञान है, और बहुसंख्यक लोग अकसर पूछते हैं कि ये लोग यौनिक अभिव्यक्ति के लिये “करते” क्या हैं. शरीर की स्वाभाविक रचना स्त्रीपुरुष मैथुन के लिये हुई है अत: प्रश्न यह है कि स्त्रीपुरुष के पूरक यौनांगों के बिना मैथुन कैसे हो सकता है.
प्रश्न स्वाभाविक है. नटबोल्ट को एक दूसरे के साथ कसा जा सकता है क्योंकि वे एक दूसरे के पूरक हैं, लेकिन दो नट या दो बोल्ट को आपस में कैसे कसा जा सकता है? शंका-समाधान के लिये यदि समलैंगिकों द्वारा छापा गया साहित्य पढें तो यह स्पष्ट हो जायगा कि इनका यौन-जीवन किस तरह का होता है. उदाहरण के लिये, इनके यौनजीवन में निम्न बातें होती हैं:
1. चुम्बन (हर प्रकार के समलैंगिक यह करते हैं)
2. गुदा मैथुन (सामान्यतया पुरुष समलैंगिकों द्वारा. स्त्रियां कृत्रिम लिंग लगा कर यदाकदा यह करती हैं)
3. परस्पर हस्तमैथुन (स्त्रीपुरुष दोनों प्रकार के समलैंगिक यह करते हैं)
4. मुख मैथुन (लिंग या योनि को चूमनाचाटना, चूसना आदि. समलैंगिकों में एक न्यूनपक्ष एक दूसरे के गुदा को भी चूमतेचाटते हैं)
5. कृत्रिम मैथुन (एक पुरुष दूसरे पुरुष की जांघों को योनि के रूप में प्रयुक्त करता है. लेस्बियनों में एक स्त्री कृत्रिम लिंग को शरीर से बांध कर अपनी साथिन से रति में रत होती है
6. कुचमर्दन (लेस्बियनों के बीच)
चित्र: चुम्बन में लिप्त दो लेस्बियन
सामान्य व्यक्ति के लिये यह समझना मुश्किल है कि इस प्रकार के कार्यों से किस तरह की यौन संतुष्टि मिलती है, खास कर समलिंगियों के साथ. उनको यह समझ लेना चाहिये कि किसी भी प्रकार के व्यवहार को कोई व्यक्ति लगातार अपनी भावनाओं में यौनिक नजर से देखता रहे तो कुछ समय के बाद उस कार्य से यौनिक उत्तेजना होने लगती है. अत: किसी भी प्रकार के कार्य द्वारा यौनिक उत्तेजना प्राप्त करने के लिये मनुष्य अपने आप को कंडीशन कर सकता है.
एक त्यागी जो जीवन के हर सुख को छोड कर त्याग में रमा रहता है, एक व्यक्ति जो सारा जीवन किसी के विरह में क्रियात्मक कार्य करता रहता है, एक लेखक जो सारे दिन अपनी लाईब्रेरी में धूल से अटी किताबें चाटता रहता है, या एक शल्यचिकित्सक जो सारा जीवन काटपीट करता रहता है: इन्होंने अपने आप को एक खास प्रकार के जीवन के लिये कंडीशन किया होता है जो आम व्यक्ति के लिए असंभव है. इसी प्रकार समलैंगिक लोग भी समलिंगी लोगों के साथ सहवास के लिये अपने आप कंडीशन कर चुके होते हैं एवं इसमें उनको रतिसुख की प्राप्ति होती है.
कल के मेरे आलेख पर बालसुब्रमण्यम जी ने पूछा था:
समलैंगिक अभिरुचि कुछ लोगों में कैसे विकसित होती है? क्या वह जन्म-जात है? या अर्जित है? क्या यह अभिरुचि एक बार लग जाने पर ताउम्र बनी रहती है, अथवा उसका इलाज करके समलैंगिकों को इस अभिरुचि से मुक्त किया जा सकता है? क्या यह आनुवांशिक है?
इन में से हरेक विषय को आने वाले आलेखों में स्पर्श करूंगा. वर्तमान लेखमाला का उद्धेश्य ही समलैंगिकता के हर पहलू पर रोशनी डालना है क्योंकि इस विषय पर अनुसंधान-आधारित लेखों की कमी है. [क्रमश:]
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इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




August 2nd, 2009 at 5:42 am
एक कठिन और विवादित बिषय का अच्छा बिश्लेषण और अच्छी पड़ताल का सिलसिला चलाया है आपने शास्त्री जी।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
http://www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
August 2nd, 2009 at 6:08 am
आप समलैंगिकता के पक्ष में हैं या विपक्ष में -अब आपके लेखन में यह गौण होता जा रहा है और विषय में आप रम गए हैं -यह तो अच्छी बात है !
August 2nd, 2009 at 6:23 am
निश्चित ही आपका लेख इस विषय पर प्रकाश डालता है और इसकी भाषा भी मर्यादित है, लेकिन सत्य को इस प्रकार उधेड़ कर रख देना असहज लगता है. न केवल विशिष्टताओं युक्त हिंदी समाज बल्कि तथाकथित खुली व्यवस्थाओं में भी लैंगिक सुख और उसे पाने के तरीकों एवं विकल्पों पर पर प्रायः खुली चर्चा नहीं की जाती.
August 2nd, 2009 at 8:04 am
@Dr.Arvind Mishra
डॉ अरविंद, आप और मैं वैज्ञानिक हैं और यह जानते हैं कि विषय का निष्पक्ष विश्लेषण पहल कर लिया जाये तो वस्तुनिष्ठ निर्णय पर आना आसान होता है. यही इस लेखनमाला में मेरा लक्ष्य है.
August 2nd, 2009 at 8:07 am
@Nishant
प्रिय निशांत, जब हर ओर (टीवी पर, पिक्चर में, सच्ची कहानियों में) नंगा नाच हो रहा है, तो फिर मर्यादित भाषा में एक वैज्ञानिक प्रस्तुति असहज नहीं है. हां असामान्य जरूर है क्योंकि इन विषयों पर इस तरह के वैज्ञानिक आलेख लोग कम लिखते हैं
सस्नेह — शास्त्री
August 2nd, 2009 at 9:50 am
This article analysis the homosexuality. Commendable.
August 2nd, 2009 at 2:45 pm
आप ने एक बड़े काम का बड़ा भाग पूरा कर दिया था। अब स्पष्ट होता जा रहा है कि यह किसी पैदाइशी कमी के कारण या उस के बाद के सामाजिक वातावरण के कारण या समाज में और किसी कारण से उत्पन्न एक शारीरिक मानसिक विकृति है। वैसे ही जैसे कोई ड्रगएडिक्ट हो जाता है। इस तरह के लोगों का पता लग जाए तो उन का इलाज किया जा सकता है और एक हद तक इस प्रवृत्ति को समाज में कम किया जा सकता है। पर इस के लिए पहले समाज की समझ यह होनी चाहिए कि यह विकृति है, अपराध नहीं। यह समाज में एक अभियान के माध्यम से ही किया जाना संभव है। संभवतः कुछ संगठन इस दिशा में काम भी कर रहे हैं। इस काम को करने का पहला कदम तो यही हो सकता है कि समलैंगिकों का की जानकारी समाज को हो और फिर उन्हें यह समझने में मदद की जाए कि वे बीमार हैं जिस से वे अपनी शारीरिक व मानसिक चिकित्सा की ओर प्रवृत्त हों। शायद दिल्ली उच्चन्यायालय का ताजा निर्णय इसी की ओर एक कदम है।
August 2nd, 2009 at 7:39 pm
एक प्रासंगिक व इस समय के महत्वपूर्ण विषय पर प्रभावी और उत्तम आलेख । जब कण्डीशनिंग ही हो जायेगी तो उपचार अत्यन्त दुष्कर हो जायेगा – जैसा कि द्विवेदी जी ने इंगिति दी है ।
August 2nd, 2009 at 7:53 pm
बहुत ही प्रभावशाली व रुचिकर आलेख
August 2nd, 2009 at 8:01 pm
‘कण्डिशनिंग’ तभी होती होगी जब प्रारम्भिक अवस्था में उस प्रकार का वातावरण मिला हो। परिवार और समाज के स्वरूप व व्यवहार का बड़ा प्रभाव होता होगा, इस असामान्य प्रवृत्ति के विकसित होने में। यह मेरा महज अनुमान है। आशा है कि शास्त्री जी का अनुसंधानपरक आलेख शायद इसपर आगे और प्रकाश डालेगा।
August 2nd, 2009 at 11:50 pm
इन अप्राकृतिक विषयों पर इतना समय बरबाद करना क्या उचित लगता है:) चित्रों को देख कर तो घिन होती है। और हां, वहां तो दो नहीं तीन लेस्बियन हैं:)
August 3rd, 2009 at 10:03 am
u r doing a yeoman’s service to Hindi -Heartland. Kudos!
August 5th, 2009 at 8:27 am
कई टिप्पणीकारों ने कंडीशनिंग शब्द का प्रयोग किया है। आपने भी इसकी ओर इशारा किया है, हालांकि ठीक यह शब्द आपने प्रयोग नहीं किया है।
कंडशनिंग, या इंप्रिंटिंग, शब्द का जीवविज्ञान में एक खास अर्थ है। मुर्गियों, बत्तखों में यह देखा जाता है, कि जब वे अंडे से सर्वप्रथम निकलते हैं, तो जिस भी चलती-फिरती वस्तु को वे पहले-पहले देखते हैं, उसे ही अपनी मां समझ लेते हैं, और उनकी यह धारणा उम्र भर बनी रहती है। चिड़ियाघरों में सारस आदि के चूजे अपने कीपर को मां समझकर उसका अनुसरण करने लगते हैं। टोम एंड जेरी कार्टून में इसे लेकर कई अच्छे कार्टून बनाए गए है, जिनमें चूजा टोम को अपनी मां समझकर उसके पीछे चलने लगता है और जेरी को उसे बचाने के लिए काफी जहमत करनी पड़ती है।
कहने का मतलब यह है कि यदि समलैंगिकता इस तरह के इंप्रिंटिंग या कंडीशनिंग जैसा कुछ है तो उससे पीछा छुड़ाना मुश्किल होगा, और यह अभिरुचि जीवन-पर्यंत बनी रहेगी। इस दृष्टि से समलैंगिंगकता सिगरेट या ड्रग की आदत से भिन्न कोटि की बीमारी मानी जाएगी। उसे पोलियो के स्तर की बीमारी मानना होगा जिसके नुकसानों को पलटा नहीं जा सकता है, और उसके द्वारा आई विकलांगता के साथ जीना सीखना होता है।
इस बारे में आपके विचार क्या हैं?
August 24th, 2009 at 3:20 pm
mere vichar se is avastha main pahunchne ka karan vyakti vishesh ke parivesh par jyada nirbhar karata hai. ek saamanya vyakti ke ghar janme bachce main vikrati shayad utni jaldi nahin aati jitni achanak sampann gharon ke bachchon main dekhi gayee hai. Ydyapi yeh koi siddhant nahin hai vikaaron ka akrman kisi par kabhi bhi ho sakta hai.