मेरी पसंद के चिट्ठे 010
चिट्ठाजगत में शायद ही कोई व्यक्ति हो जिस ने अविनाश वाचस्पति का नाम न सुना हो. मुझे अभी भी वह दिन याद है जब अविनाश के पहले चिट्ठे का प्रादुर्भाव हुआ था. उन दिनों सक्रिय चिट्ठों की संख्या सिर्फ कुछ सौ थी और लगभग हर चिट्ठे पर नजर पड जाती थी, लेकिन अविनाश का चिट्ठा कुछ खास लगा.
अविनाश की लेखनी से सामना हुआ तो मुझे एकदम से लगा कि इस व्यक्ति में काफी स्फूर्ति और ऊर्जा है. आज लगता है कि मेरी सोच सही थी.
आज अविनाश का एक चिट्ठा अनेक में बदल चुका है. सौभाग्य से ऊपर दिखाये गये चिट्ठे से आप उनके हर चिट्ठे पर जा सकते हैं. एक याद रखो, बाकी को अविनाश याद दिला देंगे. बहु-चिट्ठे के मालिकों के लिये अच्छा होगा कि वे अपने चिट्ठों को इस तरह आपस में एक “जंक्शन” के समान जोड दें जिससे पाठक-गाडी आसानी से किसी भी चिट्ठास्टेशन पर पहुंच सके.
अविनाश की उर्जा के साथ साथ जिन विषयों पर वे लिखते हैं उसकी व्यापकता तारीफे काबिल है. तो देर न करें. चित्र पर चटका लगाईये, उनके नामधारी चिट्ठे पर पहुंचिये, पहले उसे बुकमार्क कीजिये, और फिर उनकी कलम का स्वाद महसूस करें.
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August 6th, 2009 at 5:41 am
अविनाश जी तो सर्वव्यापी हो चलें चलें हैं -जित देखूं तित तूं वाली स्थिति है !
August 6th, 2009 at 6:16 am
कौन हैं ये अविनाश वाचस्पति…आपके कहने से पता करके आते हैं फिर..
August 6th, 2009 at 6:33 am
अविनाशजी वाकई स्फूर्ति व् ऊर्जा से भरपूर हैं…अभी एक पोस्ट पढ़ नहीं पाए उससे पहले दूसरी तैयार मिलती है …बहुत बहुत शुभकामनायें ..!!
August 6th, 2009 at 6:47 am
सही लिखा है आपने, वास्तव में ही अविनाश स्फूर्ति के धनी हैं
August 6th, 2009 at 7:02 am
अविनाश जी की उपस्थिति आत्यंतिक है इस चिट्ठाजगत में । सबसे इंटरकनेक्टेड रहने वाले जीव हैं यह । सबको अपनी प्रशंसा का आश्रय देते हैं । आभार इनकी चर्चा के लिये ।
August 6th, 2009 at 7:55 am
अविनाशजी तो घट घट के बासी हैं.
रामराम.
August 6th, 2009 at 7:56 am
आप उन्हीं अविनाश जी की बात कर रहे हैँ ना जो पूरे दिन ही कीबोर्ड पर ऊँगलियाँ टकटकाते रहते हैँ
August 6th, 2009 at 8:20 am
अविनाश जी में वाकई गजब की ऊर्जा है।
August 6th, 2009 at 9:34 am
जै हो बाबा अविनाश वाचस्पति की आप तो सर्वव्यापी है ।
August 6th, 2009 at 9:49 am
अविनाश जी को यदा-कदा तो पढ़ते रहे हैं। लेकिन अब बुकमार्क कर लिया है। नियमित भेंट होती रहेगी। शुक्रिया।
August 6th, 2009 at 11:59 am
सहमत हूं आपसे !!
August 6th, 2009 at 4:59 pm
आपसे पूरी तरह सहमत हूं.
August 6th, 2009 at 8:11 pm
सच है अविनाश जी हैं ही ऐसे ….उनकी पोस्ट , उनकी टिप्पणियां सब काबिले तारीफ हैं
August 6th, 2009 at 9:19 pm
शास्त्री जी ने अपने रथ में मुझे स्थान दिया इसके लिए दिल से और अपनी कीबोर्डीय ऊंगलियों से आभारी हूं। वैसे जितनी प्रशंसा मेरी की गई है, वो शास्त्री जी की जर्रानवाजी है। आप सब अपने स्नेह, आशीर्वाद, डांट, प्यार और फटकार से मुझे सदैव नवाजते रहिएगा। मुझे डांट खाने से बहुत हौसला मिलता है।
August 6th, 2009 at 9:37 pm
एक ऊर्जावान द्वारा दूसरे ऊर्जावान की तारीफ भा गई।
कीबोर्डीय ऊंगलियाँ तो हैं ही काबिले तारीफ़
August 7th, 2009 at 9:39 am
भई, नाम से ही पता चलता है कि वे अविनाशी हैं:)
August 7th, 2009 at 5:33 pm
बहुत दिनो बाद आपके ब्लाग पर आना हुआ, बहुत अच्छा लगा। चिट्ठे और चिट्ठकरो का करवां चल रहा है आगे भी चलता रहे। अविनाश जी का चिट्ठा वास्तव में खास है।
August 7th, 2009 at 8:25 pm
Bade dinon baad aapke blog pe aayee hun..! Tippanee denekee qabiliyat to nahee rakhtee, lekin Avinash ji ko aapke madhyam se badhayee zaroor de rahee hun..!