पिछले हफ्ते मैं युवा परिवारों के लिये आयोजित एक कांफेरेंस में गया हुआ था. वहां कई सामाजिक समस्याओं पर मैं ने लेक्चर दिये, और लोगों ने उन विषयों को बहुत पसंद किया.
आखिरी दिन चर्चा के अवसर पर एक महिला ने कहा, “शास्त्री जी, आप ने कई मामलों में निषेध का अनुमोदन किया है. लेकिन जब हम किसी भी व्यक्ति को किसी कार्य के लिये मना करते हैं तो वह और सक्रियता से उसे करता है. अत: मेरा सुझाव है कि किसी भी व्यक्ति को कभी किसी बात के लिये मना न किया जाये”.
उस महिला का कथन सुनने में एकदम अच्छा और सही लगता है, लेकिन एकदम गलत है. इसे समझाने के लिये मैं ने कुछ प्रश्न पूछे:
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मान लीजिये कि आपकी बिटिया लुच्चे किस्म के लडकों के साथ घूमतीफिरती है. क्या आप उसे ऐसा करने से मना करेंगी?
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मान लीजिये कि वह उन लौंडों के प्रति यौनाकर्षण महसूस करती है और वे उसे किसी भी दिन फुसला सकते हैं. क्या आप उसे मना करेंगी?
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यह भी मान लें कि उन में से कुछ लोग नशीली पदार्थों के आदी हैं. क्या आप उन के सेवन से अपनी पुत्री को मना करेंगी?
उस महिला का चेहरा देखने लायक था. मैं ने प्रश्न जारी रखे:
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मान लीजिये कि आप के पति किसी गैर स्त्री के साथ बडे ही आपत्तिजनक तरीके से घूमतेफिरते हैं. आप उनको टोकेंगी या नहीं?
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मान लीजिये कि वे उसके लिये काफी उपहार वगेरह खरीदने लगे हैं. आप टोकाटाकी करेंगी या नहीं?
काफी सोचने के बाद उन्होने जवाब दिया, “मेरे पतिबच्चों की बात अलग है. मैं तो अन्य लोगों की बात कर रही थी”. मामला साफ था: “जब सारी दुनियां मर रही हो तो उसे मत टोको क्योंकि अपना क्या जाता है”.
सब ने मन ही मन कहा “धन्य हैं मेडम आप” !!
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इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




August 16th, 2009 at 9:56 pm
अच्छा और उपयोगी संस्मरण।
यदि आप अभिभावक हैं तो मना ही नहीं करना होगा अपितु हाथ पकड़ कर रोकना भी पड़ सकता है वर्ना आप अपने दायित्व से चूक जाएंगे।
August 16th, 2009 at 10:29 pm
द्विवेदी जी सही कह रहे हैं. युवाओ के सम्मेलन मे जाकर आप भी काफ़ी युवा दिखाई देरहे हैं?:) संगत का असर है.
रामराम.
August 16th, 2009 at 11:00 pm
दिखाई ही नहीं दे रहे
लगता है हो गए हैं।
August 17th, 2009 at 4:24 am
लगता, ही नही है।
है भाई! है!
हमारे गुरुजी युवा है!
इसमे कोई शक!
आभार
हे प्रभू यह तेरापन्थ
मुम्बई टाईगर
August 17th, 2009 at 4:32 am
पर सर यहॉ पर मै कुछ यू कहना चाहूगा -” सैर को सवा सैर मिल ही गया।”
बैचारी मैडम! को पता नही था की कडक प्रिसिपल से टकरा रही है।
आपने अच्छी सीख दे दी मैडम को।
जीवन उपयोगी बाते
आभार
हे प्रभू यह तेरापन्थ
मुम्बई टाईगर
August 17th, 2009 at 6:19 am
यदि बड़े और अनुभवी लोग अपने से छोटों और नौसिखियों को सही गलत का भेद नहीं बताएंगे तो अच्छे संस्कारों और ज्ञान-विज्ञान की विरासत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक कैसे पहुँचेंगी?
आदरणीया का मन्तव्य शायद यह रहा हो कि दूसरों को टोकने से उन्हें बुरा लग जाता है और कुछ उद्धत प्रवृत्ति के लोग मूर्ख बन्दर और चिड़िया की कहानी चरितार्थ करने लगते हैं। इसलिए झंझट मोल लेने से बचना ही स्रेयस्कर है। लेकिन मैं ऐसी झंझट मोल लेना चाहूंगा यदि इससे कोई बुराई मिटने की तनिक भी सम्भावना हो।
August 17th, 2009 at 7:18 am
त्रिपाठी जी से शत प्रतिशत सहमत ..!!
August 23rd, 2009 at 11:25 pm
आपने तो अच्छी-खासी मैडम को ‘सच का सामना’ करवा दिया!
October 2nd, 2009 at 11:22 am
aapne bahut achchha jwab diya. aiase logon se mera bhi kaee bar pala pada hai. inko yahi bhasha samajh men aati hai. very good.
October 2nd, 2009 at 11:31 am
Aise dhongi logon ko aisa hi jawab diya jana chahiye. very good.
May 21st, 2010 at 10:08 am
aaj samaj me jayeda tar log dig bhramit hain uneh pata hi nahi ki woh kis taraf ja rahe hain aadhunik banane ke chahkar me apane sansakaron ko bhi kho rahe hain aur jab baat apne bal baccho ki hoti hai tab samaj ko doshi tharate hain madam ki toh aapne aankhein khol di…bahot badiaya jawab laga.sukrat mridul.