<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
		>
<channel>
	<title>Comments on: अन्तर सोहिल का प्रश्न!!</title>
	<atom:link href="http://sarathi.info/archives/2508/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://sarathi.info/archives/2508</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
	<lastBuildDate>Thu, 17 May 2012 12:34:30 +0000</lastBuildDate>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.3.2</generator>
	<item>
		<title>By: योगेन्द्र सिंह शेखावत</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2508/comment-page-1#comment-7826</link>
		<dc:creator>योगेन्द्र सिंह शेखावत</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 05 Oct 2009 12:57:26 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2508#comment-7826</guid>
		<description>कोई भी सिस्टम 100% सही हो पाना बड़ा मुश्किल होता है, इसलिए कुछ न कुछ तो कमिया रहेंगी ही &#124; अब गुबरेले कीट को कितने ही सुन्दर बगीचे में छोड़ दो वो तो गन्दगी निकाल कर ले ही आएगा, तो उसके लिए एक पुरे सुन्दर बाग़ में अना जाना बंद करना या नफरत करना तो ठीक नहीं &#124; मेरी दृष्टि में Utopia जैसी कोई चीज़ कभी नहीं होगी &#124; असल जिंदगी में आदर्श तंत्र जैसी कोई चीज़ नहीं होती &#124;

बस कमियों की तरफ ध्यान रहे तो देर-सवेर सुधार आ ही जायेगा &#124; किसी व्यक्ति के अधिकारों और सुखों का आकार बढ़ने पर उसके कर्तव्यों का आकार भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है &#124; परिवर्तन जिंदगी में जरूरी है, रुके पानी में सडांध हो जाती है &#124;

ना तो सदा चीनी खा सकते हो ना मिर्ची &#124; दोनों की ही आदमी को जरूरत है &#124; जिंदगी का स्वाद यही तो है &#124; कोई हमेशा सुखी क्यों रहना चाहता है, भाई शाब जल्दी बोर हो जाओगे &#124; बीच-बीच में आदमी की जिंदगी में Challenge आना जरूरी है तभी मज़ा आता है जीने में &#124; इसलिए कमियां रहना प्राकृतिक है और स्वाभाविक है &#124;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कोई भी सिस्टम 100% सही हो पाना बड़ा मुश्किल होता है, इसलिए कुछ न कुछ तो कमिया रहेंगी ही | अब गुबरेले कीट को कितने ही सुन्दर बगीचे में छोड़ दो वो तो गन्दगी निकाल कर ले ही आएगा, तो उसके लिए एक पुरे सुन्दर बाग़ में अना जाना बंद करना या नफरत करना तो ठीक नहीं | मेरी दृष्टि में Utopia जैसी कोई चीज़ कभी नहीं होगी | असल जिंदगी में आदर्श तंत्र जैसी कोई चीज़ नहीं होती |</p>
<p>बस कमियों की तरफ ध्यान रहे तो देर-सवेर सुधार आ ही जायेगा | किसी व्यक्ति के अधिकारों और सुखों का आकार बढ़ने पर उसके कर्तव्यों का आकार भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है | परिवर्तन जिंदगी में जरूरी है, रुके पानी में सडांध हो जाती है |</p>
<p>ना तो सदा चीनी खा सकते हो ना मिर्ची | दोनों की ही आदमी को जरूरत है | जिंदगी का स्वाद यही तो है | कोई हमेशा सुखी क्यों रहना चाहता है, भाई शाब जल्दी बोर हो जाओगे | बीच-बीच में आदमी की जिंदगी में Challenge आना जरूरी है तभी मज़ा आता है जीने में | इसलिए कमियां रहना प्राकृतिक है और स्वाभाविक है |</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2508/comment-page-1#comment-7765</link>
		<dc:creator>सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2009 14:34:31 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2508#comment-7765</guid>
		<description>मनुष्य के भीतर प्रकृति ने काम, क्रोध, मद और लोभ नामक चार दुष्प्रवृत्तियाँ डाल रखी हैं। इनकी न्यूनाधिक मात्रा सबमें होती है। कदाचित्‌ इस सांसारिक जीवन को चलाने में इनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। प्रकृति ने ही इनपर नियन्त्रण के लिए बुद्धि और विवेक का निर्माण किया है जो हमारे आचार और व्यवहार को दिशा देते हैं। धर्म हमें उन मार्गदर्शक सिद्धान्तों को बताता है जो हमें इन बुराइयों के दुष्प्रभाव से दूर रखे और सद्‌कर्म के लिए प्रेरित रखे। इन्द्रियों को स्वतन्त्र छोड़ देने पर उनका विपथगामी होना अवश्यम्भावी हो जाता है। इसलिए वर्जनाएं जरूरी हो जाती हैं।

अरे, मैं तो उपदेशात्मक टिप्पणी करने लगा...। आदरणीय शास्त्री जी का मुकम्मल प्रभाव पड़ गया लगता है। धन्यवाद।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मनुष्य के भीतर प्रकृति ने काम, क्रोध, मद और लोभ नामक चार दुष्प्रवृत्तियाँ डाल रखी हैं। इनकी न्यूनाधिक मात्रा सबमें होती है। कदाचित्‌ इस सांसारिक जीवन को चलाने में इनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। प्रकृति ने ही इनपर नियन्त्रण के लिए बुद्धि और विवेक का निर्माण किया है जो हमारे आचार और व्यवहार को दिशा देते हैं। धर्म हमें उन मार्गदर्शक सिद्धान्तों को बताता है जो हमें इन बुराइयों के दुष्प्रभाव से दूर रखे और सद्‌कर्म के लिए प्रेरित रखे। इन्द्रियों को स्वतन्त्र छोड़ देने पर उनका विपथगामी होना अवश्यम्भावी हो जाता है। इसलिए वर्जनाएं जरूरी हो जाती हैं।</p>
<p>अरे, मैं तो उपदेशात्मक टिप्पणी करने लगा&#8230;। आदरणीय शास्त्री जी का मुकम्मल प्रभाव पड़ गया लगता है। धन्यवाद।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: sanjay vyas</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2508/comment-page-1#comment-7764</link>
		<dc:creator>sanjay vyas</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2009 12:51:19 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2508#comment-7764</guid>
		<description>आपने पिछली पोस्ट में अपने समुदाय को 2000 साल से भी पुराना बताया था, इस तरह ये विश्व के कुछ चुनिन्दा प्राचीनतम ईसाई समुदायों में शुमार होता होगा.केथलिक्स से भी पुराना.तो क्या हम सीरियन क्रिश्चियन के बारे में पढ़ रहें हैं?सच में जानने की जिज्ञासा है.
साभार.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपने पिछली पोस्ट में अपने समुदाय को 2000 साल से भी पुराना बताया था, इस तरह ये विश्व के कुछ चुनिन्दा प्राचीनतम ईसाई समुदायों में शुमार होता होगा.केथलिक्स से भी पुराना.तो क्या हम सीरियन क्रिश्चियन के बारे में पढ़ रहें हैं?सच में जानने की जिज्ञासा है.<br />
साभार.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अन्तर सोहिल</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2508/comment-page-1#comment-7763</link>
		<dc:creator>अन्तर सोहिल</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2009 11:46:14 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2508#comment-7763</guid>
		<description>प्रणाम स्वीकार करें
आपका बहुत-बहुत धन्यवाद है जी, आपने मुझे समझा दिया
दिनेश जी वाली जिज्ञासा मेरी भी है, और भी ज्यादा जानने का इच्छुक हूं
पाण्डेय जी की चुहल अच्छी लगी
(मुझ से थोडा अलग जो संस्कृति और समाज है उसके लिये जिज्ञासु प्रवृति है मेरी)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रणाम स्वीकार करें<br />
आपका बहुत-बहुत धन्यवाद है जी, आपने मुझे समझा दिया<br />
दिनेश जी वाली जिज्ञासा मेरी भी है, और भी ज्यादा जानने का इच्छुक हूं<br />
पाण्डेय जी की चुहल अच्छी लगी<br />
(मुझ से थोडा अलग जो संस्कृति और समाज है उसके लिये जिज्ञासु प्रवृति है मेरी)</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ज्ञानदत्त पाण्डेय</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2508/comment-page-1#comment-7761</link>
		<dc:creator>ज्ञानदत्त पाण्डेय</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2009 09:30:29 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2508#comment-7761</guid>
		<description>आपके सम्भवत: ईसाई होने पर यह पूछा सोहिल जी ने। वे हमसे पूछते न! न जाने कितनी वर्जनायें लपेट रखी हैं गर्मी के मौसम में भी मफलर की तरह! :-)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपके सम्भवत: ईसाई होने पर यह पूछा सोहिल जी ने। वे हमसे पूछते न! न जाने कितनी वर्जनायें लपेट रखी हैं गर्मी के मौसम में भी मफलर की तरह! <img src='http://sarathi.info/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /> </p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ताऊ रामपुरिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2508/comment-page-1#comment-7760</link>
		<dc:creator>ताऊ रामपुरिया</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2009 04:01:35 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2508#comment-7760</guid>
		<description>आपके दृष्टिकोण से पुर्णतया सहमत.

रामराम.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपके दृष्टिकोण से पुर्णतया सहमत.</p>
<p>रामराम.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: दिनेशराय द्विवेदी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2508/comment-page-1#comment-7759</link>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2009 01:49:15 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2508#comment-7759</guid>
		<description>हम शायद इसे समाज सुधार कह सकते हैं। हम जानना चाहेंगे आप के इस खास समुदाय की व्युत्पत्ति और उस के इतिहास के बारे में। आप ने जिज्ञासा बहुत बढ़ा दी है। जो एक सफल लेखक होने की निशानी है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हम शायद इसे समाज सुधार कह सकते हैं। हम जानना चाहेंगे आप के इस खास समुदाय की व्युत्पत्ति और उस के इतिहास के बारे में। आप ने जिज्ञासा बहुत बढ़ा दी है। जो एक सफल लेखक होने की निशानी है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: समीर लाल</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2508/comment-page-1#comment-7758</link>
		<dc:creator>समीर लाल</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2009 01:39:33 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2508#comment-7758</guid>
		<description>अच्छा आलेख.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्छा आलेख.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: dr parveen chopra</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2508/comment-page-1#comment-7757</link>
		<dc:creator>dr parveen chopra</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Sep 2009 00:56:56 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2508#comment-7757</guid>
		<description>बात तो सही है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बात तो सही है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
</channel>
</rss>

