<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
		>
<channel>
	<title>Comments on: विद्यालय दिमांग को कुंद कर रहे हैं!!</title>
	<atom:link href="http://sarathi.info/archives/2527/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://sarathi.info/archives/2527</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
	<lastBuildDate>Wed, 18 Jan 2012 18:10:14 +0000</lastBuildDate>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.2.1</generator>
	<item>
		<title>By: Sanjiv</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7944</link>
		<dc:creator>Sanjiv</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 20 Oct 2009 19:41:15 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7944</guid>
		<description>Kya hum yahan blogs he bhartay rahengay ya kuch thos kadam bhi uthayengay iss shiksha ko badalnay kay liye?????</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Kya hum yahan blogs he bhartay rahengay ya kuch thos kadam bhi uthayengay iss shiksha ko badalnay kay liye?????</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: नोबेल प्राईज क्यों नहीं !! &#124; सारथी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7877</link>
		<dc:creator>नोबेल प्राईज क्यों नहीं !! &#124; सारथी</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 14 Oct 2009 13:09:19 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7877</guid>
		<description>[...] विद्यालय दिमांग को कुंद कर रहे हैं!!  [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] विद्यालय दिमांग को कुंद कर रहे हैं!!  [...]</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: काजल कुमार</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7857</link>
		<dc:creator>काजल कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 11 Oct 2009 13:04:18 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7857</guid>
		<description>शिक्षा चुटकुला हो गई है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शिक्षा चुटकुला हो गई है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: जब तबलची भौतिकी पढाये!! &#124; सारथी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7852</link>
		<dc:creator>जब तबलची भौतिकी पढाये!! &#124; सारथी</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 11 Oct 2009 08:05:03 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7852</guid>
		<description>[...] विद्यालय दिमांग को कुंद कर रहे हैं!!  [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] विद्यालय दिमांग को कुंद कर रहे हैं!!  [...]</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: परमजीत बाली</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7851</link>
		<dc:creator>परमजीत बाली</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 20:12:25 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7851</guid>
		<description>जहाँ एक ओर सरकारी स्कूलों का स्तर गिरता जा रहा है वही ऐसे अग्रेजी स्कूलों की लूटने की प्रवृति में बढोतरी होती जा रही है।आप ने सही लिखा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जहाँ एक ओर सरकारी स्कूलों का स्तर गिरता जा रहा है वही ऐसे अग्रेजी स्कूलों की लूटने की प्रवृति में बढोतरी होती जा रही है।आप ने सही लिखा है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: पुनीत ओमर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7850</link>
		<dc:creator>पुनीत ओमर</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 19:27:14 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7850</guid>
		<description>बेहद बेबाक पर फिर भी तटस्थ विचार..
शास्त्री जी, मुझे लगता है एक एक बात अंग्रेजी और हिंदी माध्यम दोनों के विद्यालयों में आजकल सामान है.. और वो है बच्चों का ध्यान दीर्घकालिक लक्ष्यों जैसे की तार्किक सोच, सूझबूझ, वैचारिक चिंतन, पाठ की सही समझ, नैतिक विकास, देश भक्ति, भाषा साहित्य और लोक विधाओं की सम्यक समझ आदि से हटाकर अल्पकालिक लक्ष्यों जैसे रोज का रोज १० नोटबुक भर के होमवर्क करके लाना, हर हफ्ते होने वाली परीक्षाओं में कैसे भी कर के नंबर लाना, ८ घंटे के स्कूल के बाद ४ घंटे कोचिंग में जाना ही जाना, विषयों के उत्तर जैसे के तैसे कॉपियों में अध्यापक  द्वारा लिखवाना और फिर वैसा के वैसा उत्तर परीक्षा में उम्मीद करना आदि की और लगा दिया जाता है.
बच्चे इतना ज्यादा व्यस्त बना दिए जाते हैं की उनको रोज मर्रा का काम करना और उससे पार पा जाना ही अपने पूरे शैक्षिक जीवन का लक्ष्य प्रतीत होने लगता है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बेहद बेबाक पर फिर भी तटस्थ विचार..<br />
शास्त्री जी, मुझे लगता है एक एक बात अंग्रेजी और हिंदी माध्यम दोनों के विद्यालयों में आजकल सामान है.. और वो है बच्चों का ध्यान दीर्घकालिक लक्ष्यों जैसे की तार्किक सोच, सूझबूझ, वैचारिक चिंतन, पाठ की सही समझ, नैतिक विकास, देश भक्ति, भाषा साहित्य और लोक विधाओं की सम्यक समझ आदि से हटाकर अल्पकालिक लक्ष्यों जैसे रोज का रोज १० नोटबुक भर के होमवर्क करके लाना, हर हफ्ते होने वाली परीक्षाओं में कैसे भी कर के नंबर लाना, ८ घंटे के स्कूल के बाद ४ घंटे कोचिंग में जाना ही जाना, विषयों के उत्तर जैसे के तैसे कॉपियों में अध्यापक  द्वारा लिखवाना और फिर वैसा के वैसा उत्तर परीक्षा में उम्मीद करना आदि की और लगा दिया जाता है.<br />
बच्चे इतना ज्यादा व्यस्त बना दिए जाते हैं की उनको रोज मर्रा का काम करना और उससे पार पा जाना ही अपने पूरे शैक्षिक जीवन का लक्ष्य प्रतीत होने लगता है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: पुनीत ओमर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7849</link>
		<dc:creator>पुनीत ओमर</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 19:26:46 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7849</guid>
		<description>बेहद बेबाक पर फिर भी तटस्थ विचार..
शास्त्री जी, मुझे लगता है एक एक बात अंग्रेजी और हिंदी माध्यम दोनों के विद्यालयों में आजकल सामान है.. और वो है बच्चों का ध्यान दीर्घकालिक लक्ष्यों जैसे की तार्किक सोच, सूझबूझ, वैचारिक चिंतन, पाठ की सही समझ, नैतिक विकास, देश भक्ति, भाषा साहित्य और लोक विधाओं की सम्यक समझ आदि से हटाकर अल्पकालिक लक्ष्यों जैसे रोज का रोज १० नोटबुक भर के होमवर्क करके लाना, हर हफ्ते होने वाली परीक्षाओं में कैसे भी कर के नंबर लाना, ८ घंटे के स्कूल के बाद ४ घंटे कोचिंग में जाना ही जाना, विषयों के उत्तर जैसे के तैसे कॉपियों में अध्याप्ल द्वारा लिखवाना और फिर वैसा के वैसा उत्तर परीक्षा में उम्मीद करना आदि की और लगा दिया जाता है.
बच्चे इतना ज्यादा व्यस्त बना दिए जाते हैं की उनको रोज मर्रा का काम करना और उससे पार पा जाना ही अपने पूरे शैक्षिक जीवन का लक्ष्य प्रतीत होने लगता है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बेहद बेबाक पर फिर भी तटस्थ विचार..<br />
शास्त्री जी, मुझे लगता है एक एक बात अंग्रेजी और हिंदी माध्यम दोनों के विद्यालयों में आजकल सामान है.. और वो है बच्चों का ध्यान दीर्घकालिक लक्ष्यों जैसे की तार्किक सोच, सूझबूझ, वैचारिक चिंतन, पाठ की सही समझ, नैतिक विकास, देश भक्ति, भाषा साहित्य और लोक विधाओं की सम्यक समझ आदि से हटाकर अल्पकालिक लक्ष्यों जैसे रोज का रोज १० नोटबुक भर के होमवर्क करके लाना, हर हफ्ते होने वाली परीक्षाओं में कैसे भी कर के नंबर लाना, ८ घंटे के स्कूल के बाद ४ घंटे कोचिंग में जाना ही जाना, विषयों के उत्तर जैसे के तैसे कॉपियों में अध्याप्ल द्वारा लिखवाना और फिर वैसा के वैसा उत्तर परीक्षा में उम्मीद करना आदि की और लगा दिया जाता है.<br />
बच्चे इतना ज्यादा व्यस्त बना दिए जाते हैं की उनको रोज मर्रा का काम करना और उससे पार पा जाना ही अपने पूरे शैक्षिक जीवन का लक्ष्य प्रतीत होने लगता है.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: PN Subramanian</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7848</link>
		<dc:creator>PN Subramanian</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 14:21:36 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7848</guid>
		<description>बिउल्कुल सही कहा है. स्कूल चलाना एक अछे आय का साधन बना हुआ है इसी लिए वहां लुटेरे पोषित हो  रहे हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिउल्कुल सही कहा है. स्कूल चलाना एक अछे आय का साधन बना हुआ है इसी लिए वहां लुटेरे पोषित हो  रहे हैं.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: भारतीय नागरिक</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7847</link>
		<dc:creator>भारतीय नागरिक</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 12:00:31 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7847</guid>
		<description>सर, जब सभी देश में से अपना हिस्सा लूट रहे हैं तो शिक्षक क्यों पीछे रह जायें. शिक्षा की ........ कर दी गयी है. जितनी सेवायें थीं सेवा करने वाले थे, सब प्रोफेशनल बनते चले गये. सब जगह वही हालत है. आप विश्वास करेंगे कि दूसरी क्लास में पढ़ने वाले बच्चे के स्कूल बैग अब पहिये वाली ट्रालियों में बदल गये हैं. मोटी तोंद वाले लाला अब डिग्री बांट रहे हैं, जो कल तक आटा-दाल की दलाली करते थे तो शिक्षा की यह हालत तो होनी ही थी. जब डिग्री कालेज के शिक्षक छात्रों के साथ जाम टकरायेंगे तो यही तो होगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सर, जब सभी देश में से अपना हिस्सा लूट रहे हैं तो शिक्षक क्यों पीछे रह जायें. शिक्षा की &#8230;&#8230;.. कर दी गयी है. जितनी सेवायें थीं सेवा करने वाले थे, सब प्रोफेशनल बनते चले गये. सब जगह वही हालत है. आप विश्वास करेंगे कि दूसरी क्लास में पढ़ने वाले बच्चे के स्कूल बैग अब पहिये वाली ट्रालियों में बदल गये हैं. मोटी तोंद वाले लाला अब डिग्री बांट रहे हैं, जो कल तक आटा-दाल की दलाली करते थे तो शिक्षा की यह हालत तो होनी ही थी. जब डिग्री कालेज के शिक्षक छात्रों के साथ जाम टकरायेंगे तो यही तो होगा.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: ज्ञानदत्त पाण्डेय</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7846</link>
		<dc:creator>ज्ञानदत्त पाण्डेय</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 08:05:50 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7846</guid>
		<description>सरकारी स्कूलों में शिक्षा के साथ मजाक ज्यादा है बनिस्पत प्राइवेट स्कूलों के।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सरकारी स्कूलों में शिक्षा के साथ मजाक ज्यादा है बनिस्पत प्राइवेट स्कूलों के।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अन्तर सोहिल</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7845</link>
		<dc:creator>अन्तर सोहिल</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 05:23:06 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7845</guid>
		<description>छोटे शहरों के छोटे-छोटे स्कूलों में तो 10वीं 12वीं तक पढी हुई लडकियों को 1200-1500/- में टीचर की नौकरी दी जाती है, जिन्हें बिल्कुल भी अनुभव नही होता है। और इन स्कूलों की फीस 400-700/- तक होती है और एक कक्षा में 50-60 बच्चों को पढाया जाता है। 
अभी पिछले दिनों मेरी बच्ची का गृहकार्य तीन दिन तक नही जांचा गया था, कारण पूछने पर कहते हैं कि वक्त की कमी है, कक्षा में बच्चे ज्यादा हैं।
प्रणाम स्वीकार करें</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>छोटे शहरों के छोटे-छोटे स्कूलों में तो 10वीं 12वीं तक पढी हुई लडकियों को 1200-1500/- में टीचर की नौकरी दी जाती है, जिन्हें बिल्कुल भी अनुभव नही होता है। और इन स्कूलों की फीस 400-700/- तक होती है और एक कक्षा में 50-60 बच्चों को पढाया जाता है।<br />
अभी पिछले दिनों मेरी बच्ची का गृहकार्य तीन दिन तक नही जांचा गया था, कारण पूछने पर कहते हैं कि वक्त की कमी है, कक्षा में बच्चे ज्यादा हैं।<br />
प्रणाम स्वीकार करें</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: दिनेशराय द्विवेदी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7844</link>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 02:49:34 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7844</guid>
		<description>आज तो जिस तरीके से विद्यालय और महाविद्यालय खुल रहे हैं लगता है सारी शिक्षा व्यवस्था ही व्यापारियों के हाथों सोंप दी गई है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज तो जिस तरीके से विद्यालय और महाविद्यालय खुल रहे हैं लगता है सारी शिक्षा व्यवस्था ही व्यापारियों के हाथों सोंप दी गई है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: shyamalsuman</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2527/comment-page-1#comment-7843</link>
		<dc:creator>shyamalsuman</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 01:37:31 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2527#comment-7843</guid>
		<description>शास्त्री जी,
नमस्कार।

आपके इस आलेख को जब पढ़ रहा था तो अवकाश प्राप्त शिक्षक मेरे चाचाजी के एक मजाक की याद आयी। विद्यार्थी और विद्यालय को आज के परिवेश में वो निम्न प्रकार से परिभाषित करते हैं।

विद्यार्थी - जो विद्या की &quot;अर्थी&quot; उठाये।
विद्यालय - जहाँ विद्या का &quot;लय&quot; हो जाय।   

सादर
श्यामल सुमन
www.manoramsuman.blogspot.com</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्री जी,<br />
नमस्कार।</p>
<p>आपके इस आलेख को जब पढ़ रहा था तो अवकाश प्राप्त शिक्षक मेरे चाचाजी के एक मजाक की याद आयी। विद्यार्थी और विद्यालय को आज के परिवेश में वो निम्न प्रकार से परिभाषित करते हैं।</p>
<p>विद्यार्थी &#8211; जो विद्या की &#8220;अर्थी&#8221; उठाये।<br />
विद्यालय &#8211; जहाँ विद्या का &#8220;लय&#8221; हो जाय।   </p>
<p>सादर<br />
श्यामल सुमन<br />
<a href="http://www.manoramsuman.blogspot.com" rel="nofollow">http://www.manoramsuman.blogspot.com</a></p>
]]></content:encoded>
	</item>
</channel>
</rss>

