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	<title>Comments on: मौलिक चिंतन जाये भाड में!!</title>
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	<link>http://sarathi.info/archives/2547</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: अमित भटनागर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2547/comment-page-1#comment-8059</link>
		<dc:creator>अमित भटनागर</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Nov 2009 04:03:09 +0000</pubDate>
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		<description>प्रिय फिलिप,

दुरुस्त फरमाया। यह बात कोई आज की नहीं वरन सदियो से यही होता चला आ रहा है कि मूल अवधारणा को समझने के बजाय, उसके निकाले हुए मतलब को ही पकड लिया जाता है। मजे की बात यह है कि इस निकाले हुए मतलब का मूल अवधारणा से कोई लेना देना नहीं होता है और यह मतलब निकालने वाले के बोद्धिक स्तर पर निर्भर करता है कि वह अर्थ का अनर्थ करेगा या नहीं।

महात्मा गाँन्धी की मृत्यु हुए बरसो बीत चुके है परन्तु गाँन्धीवादी आपको आज भी मिल जायेगे, यह अलग बात है की वे नाम के गाँन्धीवादी होगे और असलियत में उनका गाँन्धी होने के अर्थ से दुर दुर तक कोई नाता नही होगा।

यह सिर्फ भारत की ही समस्या नही है बल्की पुरे विश्व मे यही होता आ रहा है। चाहे राम हो या गौतम बुद्ध हो या महावीर स्वामी हो या मोहम्म्द साहब हो या जिसस क्राइस्ट हो, हमने उनके नाम को पकड कर समुदाय बना लिया और वे असलियत मे क्या थे और उनसे क्या सिखा जा सकता था, उसे भुला दिया।

धन्यवाद,

अमित भटनागर</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रिय फिलिप,</p>
<p>दुरुस्त फरमाया। यह बात कोई आज की नहीं वरन सदियो से यही होता चला आ रहा है कि मूल अवधारणा को समझने के बजाय, उसके निकाले हुए मतलब को ही पकड लिया जाता है। मजे की बात यह है कि इस निकाले हुए मतलब का मूल अवधारणा से कोई लेना देना नहीं होता है और यह मतलब निकालने वाले के बोद्धिक स्तर पर निर्भर करता है कि वह अर्थ का अनर्थ करेगा या नहीं।</p>
<p>महात्मा गाँन्धी की मृत्यु हुए बरसो बीत चुके है परन्तु गाँन्धीवादी आपको आज भी मिल जायेगे, यह अलग बात है की वे नाम के गाँन्धीवादी होगे और असलियत में उनका गाँन्धी होने के अर्थ से दुर दुर तक कोई नाता नही होगा।</p>
<p>यह सिर्फ भारत की ही समस्या नही है बल्की पुरे विश्व मे यही होता आ रहा है। चाहे राम हो या गौतम बुद्ध हो या महावीर स्वामी हो या मोहम्म्द साहब हो या जिसस क्राइस्ट हो, हमने उनके नाम को पकड कर समुदाय बना लिया और वे असलियत मे क्या थे और उनसे क्या सिखा जा सकता था, उसे भुला दिया।</p>
<p>धन्यवाद,</p>
<p>अमित भटनागर</p>
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		<title>By: अंकुर गुप्ता</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2547/comment-page-1#comment-7954</link>
		<dc:creator>अंकुर गुप्ता</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 22 Oct 2009 07:09:21 +0000</pubDate>
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		<description>अरे! बच्चे तो बच्चे, कालेज में भी प्रोजेक्ट ऐसे ही बनते हैं. उदाहरण के लिये BCA आदि के प्रोजेक्ट विद्यार्थी खुद ना बनाकर शहर के किसी प्रोग्रामर से खरीद लेते हैं. और उसे पैसे दे देते हैं</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरे! बच्चे तो बच्चे, कालेज में भी प्रोजेक्ट ऐसे ही बनते हैं. उदाहरण के लिये BCA आदि के प्रोजेक्ट विद्यार्थी खुद ना बनाकर शहर के किसी प्रोग्रामर से खरीद लेते हैं. और उसे पैसे दे देते हैं</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Rakesh Singh</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2547/comment-page-1#comment-7890</link>
		<dc:creator>Rakesh Singh</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 20:42:11 +0000</pubDate>
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		<description>अपने देश मैं इम्पोर्टेड वस्तुओं के साथ साथ इम्पोर्टेड विचारों, हाव भाव, पहनावा, पर्व आदि का ही बोलबाला है &#124; 

मैं १००% सहमत हूँ की - &quot;हर मौलिक चीज़ भारत में गटर में फेंकने लायक समझी जाती है. विदेशियों की नक़ल उतार कर उनकी बुराइयाँ ज़रूर अपना लेते हैं पर उनकी अच्छी बातें पूरी तरह नज़रंदाज़ कर दी जाती हैं &#124;&quot;

दीपावली की शुभकामनाएं &#124;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अपने देश मैं इम्पोर्टेड वस्तुओं के साथ साथ इम्पोर्टेड विचारों, हाव भाव, पहनावा, पर्व आदि का ही बोलबाला है | </p>
<p>मैं १००% सहमत हूँ की &#8211; &#8220;हर मौलिक चीज़ भारत में गटर में फेंकने लायक समझी जाती है. विदेशियों की नक़ल उतार कर उनकी बुराइयाँ ज़रूर अपना लेते हैं पर उनकी अच्छी बातें पूरी तरह नज़रंदाज़ कर दी जाती हैं |&#8221;</p>
<p>दीपावली की शुभकामनाएं |</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: PN Subramanian</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2547/comment-page-1#comment-7889</link>
		<dc:creator>PN Subramanian</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 13:54:11 +0000</pubDate>
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		<description>सत्य वचन</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सत्य वचन</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Isht Deo Sankrityaayan</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2547/comment-page-1#comment-7888</link>
		<dc:creator>Isht Deo Sankrityaayan</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 09:43:03 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2547#comment-7888</guid>
		<description>बिलकुल सही मसला उठाया आपने. शिक्षा क्या, हर मामले में यही हो रहा है. हम अपनी परंपरा छोड़कर भोंड़ी नकल क्लर रहे हैं, चाहे वह किसी की भी हो.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिलकुल सही मसला उठाया आपने. शिक्षा क्या, हर मामले में यही हो रहा है. हम अपनी परंपरा छोड़कर भोंड़ी नकल क्लर रहे हैं, चाहे वह किसी की भी हो.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: ताऊ रामपुरिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2547/comment-page-1#comment-7887</link>
		<dc:creator>ताऊ रामपुरिया</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 08:42:35 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2547#comment-7887</guid>
		<description>बिल्कुल सही बात कही आपने.

आपको दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं.

रामराम.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिल्कुल सही बात कही आपने.</p>
<p>आपको दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं.</p>
<p>रामराम.</p>
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	<item>
		<title>By: dr arvind mishra</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2547/comment-page-1#comment-7886</link>
		<dc:creator>dr arvind mishra</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 07:53:31 +0000</pubDate>
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		<description>ab inconvinienti से सहमत</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>ab inconvinienti से सहमत</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: दिनेशराय द्विवेदी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2547/comment-page-1#comment-7885</link>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 05:28:42 +0000</pubDate>
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		<description>हर कोई वास्तविकता से जी चुराना चाहता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हर कोई वास्तविकता से जी चुराना चाहता है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: ab inconvinienti</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2547/comment-page-1#comment-7884</link>
		<dc:creator>ab inconvinienti</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 03:32:25 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2547#comment-7884</guid>
		<description>मुझे याद है की आठवी कक्षा के स्कूल के प्रोजेक्टवर्क में मैंने कचरे के ढेर में पड़े तीन कांच के टुकडों को त्रिकोणाकार जोड़कर कैलीडियोस्कोप बनाया था. इसमें मुझे बीस में अट्ठारह मार्क्स दिए गए थे. एक साथी ने पेंसिल सैल और पांच रुपये के छोटे स्पीकर को वायर से तख्ती में जोड़ दिया और लिख दिया &quot;Electrical energy converting into sound energy&quot;.  उसे भी अट्ठारह मार्क्स मिले. एक दिन मैं ओजोन छिद्र पर अनगढ़ सा पोस्टर बना कर ले गया, पर उसमे बच्चे की जागरूकता झलक रही थी सो उसमे भी अच्छे नंबर मिले. 

नब्बे के दशक के अंतिम वर्षों में स्कूल छात्रावास में थे. वहां स्कूल से बच्चों को एकल या ग्रुप प्रोजेक्ट मिलता था. साथ मिलकर प्रोजेक्ट करने से व्यवस्थित काम करना तो सीखते ही थे साथ में बेहतरीन टीमवर्क की भी नींव पड़ जाती थी. स्कूल छोटे से हिल स्टेशन में था तो मुश्किल ही था की कोई प्रोजेक्ट बिकाऊ मिल जाए, और अगर मिलता होता तब भी हमारा जेबखर्च इसकी इजाज़त नहीं देता था.  

उन दिनों कोई दबाव नहीं था सिर्फ पास होना काफी था, मैं अपने डिस्लेक्सिया और अस्पर्गर सिंड्रोम के चलते बचपन को पूरा न जी सका पर वे दिन आज के तनावपूर्ण, मशीनी और व्यस्त स्कूली दिनचर्या से काफी अलग थे. 

मैं खाली समय में पढाई करने के बजाए पुस्तकें और पत्रिकाएँ पढ़ा करता था. मानसरोवर और गोदान, गाँधी साहित्य, गोपाल गोडसे, कादम्बिनी के उपलब्ध अंक, धर्मयुग, नंदन, चंदामामा इत्यदि इत्यादि जो मिले चाट जाया करता था. शिक्षा का माध्यम इंग्लिश था पर इंग्लिश पढ़ने का खास दबाव नहीं था, तो हर चीज़ अपनी मातृभाषा में ही पढता था. 

क्या आज के बच्चे इतना नैसर्गिक बौद्धिक विकास पा पाते होंगे? उनपर प्रतियोगी परीक्षा, ९५+ प्रतिशत, ट्यूशन, पियर प्रेशर, अंग्रेजी का बुरी तरह दबाव रहता है. ऐसे माहौल में पले बढे बच्चों से मैं कॉलेज में मिला, उन्होंने कभी पेपर नहीं पढ़ा था, कहने को अधिकतर दो या अधिक भाषाएँ जानते थे पर एक में भी अभिव्यक्ति और शब्द-भंडार ठीक नहीं था. क्रिटिकल थिंकिंग की तो बात ही बेकार है. न कोई कभी पुस्तक पढ़ता था न  पत्रिका. कोर्स में अगर उपन्यास भी थे तो डेढ़ सौ के बैच में तीन चार ही थे जिन्होंने सभी उपन्यास आद्योपांत पढ़े थे, बाकी सब गाइड जिंदाबाद. 

भारत का भविष्य ऐसे ही लोगों के हाथ में जा रहा है, क्योंकि वर्तमान युवाओं में पढने वाले और मौलिक सोच रखने वाले बहुत कम बचे हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मुझे याद है की आठवी कक्षा के स्कूल के प्रोजेक्टवर्क में मैंने कचरे के ढेर में पड़े तीन कांच के टुकडों को त्रिकोणाकार जोड़कर कैलीडियोस्कोप बनाया था. इसमें मुझे बीस में अट्ठारह मार्क्स दिए गए थे. एक साथी ने पेंसिल सैल और पांच रुपये के छोटे स्पीकर को वायर से तख्ती में जोड़ दिया और लिख दिया &#8220;Electrical energy converting into sound energy&#8221;.  उसे भी अट्ठारह मार्क्स मिले. एक दिन मैं ओजोन छिद्र पर अनगढ़ सा पोस्टर बना कर ले गया, पर उसमे बच्चे की जागरूकता झलक रही थी सो उसमे भी अच्छे नंबर मिले. </p>
<p>नब्बे के दशक के अंतिम वर्षों में स्कूल छात्रावास में थे. वहां स्कूल से बच्चों को एकल या ग्रुप प्रोजेक्ट मिलता था. साथ मिलकर प्रोजेक्ट करने से व्यवस्थित काम करना तो सीखते ही थे साथ में बेहतरीन टीमवर्क की भी नींव पड़ जाती थी. स्कूल छोटे से हिल स्टेशन में था तो मुश्किल ही था की कोई प्रोजेक्ट बिकाऊ मिल जाए, और अगर मिलता होता तब भी हमारा जेबखर्च इसकी इजाज़त नहीं देता था.  </p>
<p>उन दिनों कोई दबाव नहीं था सिर्फ पास होना काफी था, मैं अपने डिस्लेक्सिया और अस्पर्गर सिंड्रोम के चलते बचपन को पूरा न जी सका पर वे दिन आज के तनावपूर्ण, मशीनी और व्यस्त स्कूली दिनचर्या से काफी अलग थे. </p>
<p>मैं खाली समय में पढाई करने के बजाए पुस्तकें और पत्रिकाएँ पढ़ा करता था. मानसरोवर और गोदान, गाँधी साहित्य, गोपाल गोडसे, कादम्बिनी के उपलब्ध अंक, धर्मयुग, नंदन, चंदामामा इत्यदि इत्यादि जो मिले चाट जाया करता था. शिक्षा का माध्यम इंग्लिश था पर इंग्लिश पढ़ने का खास दबाव नहीं था, तो हर चीज़ अपनी मातृभाषा में ही पढता था. </p>
<p>क्या आज के बच्चे इतना नैसर्गिक बौद्धिक विकास पा पाते होंगे? उनपर प्रतियोगी परीक्षा, ९५+ प्रतिशत, ट्यूशन, पियर प्रेशर, अंग्रेजी का बुरी तरह दबाव रहता है. ऐसे माहौल में पले बढे बच्चों से मैं कॉलेज में मिला, उन्होंने कभी पेपर नहीं पढ़ा था, कहने को अधिकतर दो या अधिक भाषाएँ जानते थे पर एक में भी अभिव्यक्ति और शब्द-भंडार ठीक नहीं था. क्रिटिकल थिंकिंग की तो बात ही बेकार है. न कोई कभी पुस्तक पढ़ता था न  पत्रिका. कोर्स में अगर उपन्यास भी थे तो डेढ़ सौ के बैच में तीन चार ही थे जिन्होंने सभी उपन्यास आद्योपांत पढ़े थे, बाकी सब गाइड जिंदाबाद. </p>
<p>भारत का भविष्य ऐसे ही लोगों के हाथ में जा रहा है, क्योंकि वर्तमान युवाओं में पढने वाले और मौलिक सोच रखने वाले बहुत कम बचे हैं.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: sameer lal</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2547/comment-page-1#comment-7883</link>
		<dc:creator>sameer lal</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 00:56:56 +0000</pubDate>
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		<description>सही कह रहे हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सही कह रहे हैं.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Nishant</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2547/comment-page-1#comment-7882</link>
		<dc:creator>Nishant</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 00:49:09 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2547#comment-7882</guid>
		<description>बड़े शहरों में छोटे बच्चों को स्कूल वाले जो प्रोजेक्ट देते है उसे उनके माता-पिता बना के देते हैं. 

बच्चे जो कुछ भी अनगढ़ तैयार कर सकते हैं वह माता-पिता बेहतरीन तरीके से उन्हें तैयार करके देते हैं.

दिल्ली में तो दुकानें भी खुल गईं हैं जो हर तरह का प्रोजेक्ट और अस्सैन्मेंट करके देती हैं.

और इतना सब करने के बाद जिस बच्चे ने खुद मेहनत करके अपना प्रोजेक्ट तैयार किया हो उसे सबसे पुअर नंबर मिलते हैं.

ज़ाहिर है, एक आठ साल का बच्चा प्रोफेशनल की तरह प्रोजेक्ट नहीं कर सकता, फिर स्कूल वालों को यह सब क्यों नहीं दीखता?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बड़े शहरों में छोटे बच्चों को स्कूल वाले जो प्रोजेक्ट देते है उसे उनके माता-पिता बना के देते हैं. </p>
<p>बच्चे जो कुछ भी अनगढ़ तैयार कर सकते हैं वह माता-पिता बेहतरीन तरीके से उन्हें तैयार करके देते हैं.</p>
<p>दिल्ली में तो दुकानें भी खुल गईं हैं जो हर तरह का प्रोजेक्ट और अस्सैन्मेंट करके देती हैं.</p>
<p>और इतना सब करने के बाद जिस बच्चे ने खुद मेहनत करके अपना प्रोजेक्ट तैयार किया हो उसे सबसे पुअर नंबर मिलते हैं.</p>
<p>ज़ाहिर है, एक आठ साल का बच्चा प्रोफेशनल की तरह प्रोजेक्ट नहीं कर सकता, फिर स्कूल वालों को यह सब क्यों नहीं दीखता?</p>
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