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	<title>Comments on: एक झूठ जिसे हर कोई सच मानता है!!</title>
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	<link>http://sarathi.info/archives/2589</link>
	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: jay borana</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-9768</link>
		<dc:creator>jay borana</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 12 Aug 2011 10:22:14 +0000</pubDate>
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		<description>M/S. jayanti borana bhinmal
यह कह कर नहीं टाला जा सकता कि विषमता इतनी अधिक नहीं थी। समाज में जब से संपत्ति का संचय आरंभ हुआ है तब से विषमता है। एक समय वह था जब दास हुआ करते थे। यह विषमता का उच्चतम शिखर था। दासों की उपस्थिति मोर्यकाल में भी दिखाई देती है और उस के बाद भी। दासों के उपरांत सामंत वाद आया। तो सामंतों की भूमि पर काम करने वाले बंधक किसान और सामंत दोनों में दास-स्वामी विषमता से अधिक थी लेकिन बंधक किसान की जीवन परिस्थितियाँ दास से बेहतर थीं। हालांकि दास की अपेक्षा किसान चार गुना अधिक सुविधा प्राप्त था तो स्वामी की अपेक्षा सामंत चालीस गुना अधिक सुविधा प्राप्त हो गया था। आज उजरती मंजदूर जिस में खेत मजदूर से ले कर कंस्ट्रक्शन के लिए बोझा ढोने वाला मजदूर और विज्ञानी तक शामिल हैं दास और किसान से दस गुना बेहतर जीवन जीता है लेकिन आज का पूंजीपति सामंतो की अपेक्षा सौ गुना नहीं हजार गुना अधिक संपत्तिवान है। इस तरह विषमता में वृद्धि हुई है। देश की संपत्ति भी उस के मुकाबले बहुत अधिक बढ़ी है। लेकिन यदि साम्राज्यवादी ताकतों ने भारत को न लूटा होता और अब भी नहीं लूट रही होतीं तो भारत आज न जाने कहाँ होता। साम्राज्यी लूट को खत्म करने और विषमता को न्यूनतम करने की आवश्यकता है उस के लिए तंत्र विकसित करना होगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>M/S. jayanti borana bhinmal<br />
यह कह कर नहीं टाला जा सकता कि विषमता इतनी अधिक नहीं थी। समाज में जब से संपत्ति का संचय आरंभ हुआ है तब से विषमता है। एक समय वह था जब दास हुआ करते थे। यह विषमता का उच्चतम शिखर था। दासों की उपस्थिति मोर्यकाल में भी दिखाई देती है और उस के बाद भी। दासों के उपरांत सामंत वाद आया। तो सामंतों की भूमि पर काम करने वाले बंधक किसान और सामंत दोनों में दास-स्वामी विषमता से अधिक थी लेकिन बंधक किसान की जीवन परिस्थितियाँ दास से बेहतर थीं। हालांकि दास की अपेक्षा किसान चार गुना अधिक सुविधा प्राप्त था तो स्वामी की अपेक्षा सामंत चालीस गुना अधिक सुविधा प्राप्त हो गया था। आज उजरती मंजदूर जिस में खेत मजदूर से ले कर कंस्ट्रक्शन के लिए बोझा ढोने वाला मजदूर और विज्ञानी तक शामिल हैं दास और किसान से दस गुना बेहतर जीवन जीता है लेकिन आज का पूंजीपति सामंतो की अपेक्षा सौ गुना नहीं हजार गुना अधिक संपत्तिवान है। इस तरह विषमता में वृद्धि हुई है। देश की संपत्ति भी उस के मुकाबले बहुत अधिक बढ़ी है। लेकिन यदि साम्राज्यवादी ताकतों ने भारत को न लूटा होता और अब भी नहीं लूट रही होतीं तो भारत आज न जाने कहाँ होता। साम्राज्यी लूट को खत्म करने और विषमता को न्यूनतम करने की आवश्यकता है उस के लिए तंत्र विकसित करना होगा।</p>
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		<title>By: प्राचीन भारत में आर्थिक विषमता नहीं थी! &#124; हिन्दीलैंड.कॉम &#124; Hindi Land</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8276</link>
		<dc:creator>प्राचीन भारत में आर्थिक विषमता नहीं थी! &#124; हिन्दीलैंड.कॉम &#124; Hindi Land</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 27 Feb 2010 19:59:00 +0000</pubDate>
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		<description>[...] कल के आलेख&#160; एक झूठ जिसे हर कोई सच मानता है!! पर दिनेश जी ने टिपियाया: यह कह कर नहीं [...]</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>[...] कल के आलेख&#160; एक झूठ जिसे हर कोई सच मानता है!! पर दिनेश जी ने टिपियाया: यह कह कर नहीं [...]</p>
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		<title>By: SHAILENDRA BHADAURIA</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8253</link>
		<dc:creator>SHAILENDRA BHADAURIA</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 11 Feb 2010 18:15:16 +0000</pubDate>
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		<description>BHARaT AAJ BHI GAREEB RASTRAO ME NAHI HAI VISHW KI SABASE BADI CHAUTHI ECONOMY AAJ BHI BHARAT KI PAAS HAI. TO AAJ BHI VISHW ME CHAUTHE NO. PAR HAM HI HAI. YAHI KARAN HAI KI SABASE JAYAADA BAHURASTRIY COMPANY BHARAT ME NIVESH KAR RAHI HAI. AUR MAIN PAWER ME BHI DUSARE STHAN PAR HAI. YAANI KI MILITRY POWER BHI VISHW ME DUSARE NO PAR HAI. ISLIYE BHARAT AAJ BHI SONE KI CHIDIYA HAI DUSARE DESO KE LIYE. ISLIYE KAHA HAI KI &quot;KUCHH BAAT HAI KI AESI HASTI MITATI NAHI HAMARI SADIYO RAHA HAI DUSHMAN DAUR-E-JAHAN HAMARA&quot;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>BHARaT AAJ BHI GAREEB RASTRAO ME NAHI HAI VISHW KI SABASE BADI CHAUTHI ECONOMY AAJ BHI BHARAT KI PAAS HAI. TO AAJ BHI VISHW ME CHAUTHE NO. PAR HAM HI HAI. YAHI KARAN HAI KI SABASE JAYAADA BAHURASTRIY COMPANY BHARAT ME NIVESH KAR RAHI HAI. AUR MAIN PAWER ME BHI DUSARE STHAN PAR HAI. YAANI KI MILITRY POWER BHI VISHW ME DUSARE NO PAR HAI. ISLIYE BHARAT AAJ BHI SONE KI CHIDIYA HAI DUSARE DESO KE LIYE. ISLIYE KAHA HAI KI &#8220;KUCHH BAAT HAI KI AESI HASTI MITATI NAHI HAMARI SADIYO RAHA HAI DUSHMAN DAUR-E-JAHAN HAMARA&#8221;</p>
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	<item>
		<title>By: abhishek</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8137</link>
		<dc:creator>abhishek</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 02 Jan 2010 19:09:02 +0000</pubDate>
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		<description>the bigger reason is islamic rule.as far as last three hundred yers is concerned britishers made india country as it should be.they were actual liberators after 1947 india went on a path of single party rule which just like a dictatorship.india is again a slave nation.we are left in hands of god.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>the bigger reason is islamic rule.as far as last three hundred yers is concerned britishers made india country as it should be.they were actual liberators after 1947 india went on a path of single party rule which just like a dictatorship.india is again a slave nation.we are left in hands of god.</p>
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		<title>By: Smart Indian - अनुराग शर्मा</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8093</link>
		<dc:creator>Smart Indian - अनुराग शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 04 Dec 2009 03:42:51 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2589#comment-8093</guid>
		<description>साम्यवादी कुछ भी कहें, मुझे आपकी बात बिलकुल सही लग रही है. आज की गरीबी बहुत विषम है.  परम्परावादी लोग सबमें प्रभु को ही देखते थे, दान में विश्वास रखते थे और अन्नदान आदि तो उनके जीवन का सामान्य अंग थे.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>साम्यवादी कुछ भी कहें, मुझे आपकी बात बिलकुल सही लग रही है. आज की गरीबी बहुत विषम है.  परम्परावादी लोग सबमें प्रभु को ही देखते थे, दान में विश्वास रखते थे और अन्नदान आदि तो उनके जीवन का सामान्य अंग थे.</p>
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		<title>By: ab inconvinienti</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8078</link>
		<dc:creator>ab inconvinienti</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Dec 2009 20:24:04 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2589#comment-8078</guid>
		<description>आज का गरीब ज्यादा गरीब है, यह तो मानना पड़ेगा. पहले ज्यादा लोग भूखे नहीं रहते थे, सभी परंपरागत व्यवसायों में संलग्न थे, और अपनी स्थिति से संतुष्ट भी, वर्ग आधारित समाज का यह उजला पक्ष है की उसमे अपने रोज़गार के लिए किसी को सोचना नहीं पड़ता. सब कुछ जन्म तय कर देता था. और सभी अपनी स्थिति को ईश्वर की इच्छा और कर्मफल मान कर आज की अपेक्षा कहीं अधिक सुखी थे. आज लगभग हर कोई अपने अन्दर खालीपन लिए घूमता है. 

और यह भी सही है की अगर दुर्भाग्यवश किसी के पास खाने को अनाज नहीं है, तब भी उसके भूखे रहने की नौबत कम ही आती है. तब लोग कम आत्मकेंद्रित और स्वार्थी थे.  सामाजिक संस्कारों ने यह बात लोगों के मन में &#039;अन्नदान महादान&#039; वाली बात अच्छी तरह बिठा रखी थी. तब वनस्पति, जंगल इतने थे की फल,सब्जियां, वनस्पति, औषधियां मुफ्त ही मिला करती थीं. अन्न, गोधन और वस्त्रों के आलावा बाकी खर्चे नगण्य थे. उन्नीसवी सदी के पहले इतिहास में क्या साग या फल बेचने वालों का कोई उल्लेख है? 

हां मानव पहले की अपेक्षा सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भ्रष्ट हुआ है. तब से आज तक मनुष्य ने न सिर्फ प्रकृति को नष्ट किया है बल्कि वह निसर्ग से दूर होकर मानसिक संत्रास भुगत रहा है. इसके सामाजिक और भौतिक परिणाम भी सामने हैं. आपकी यह पोस्ट नए सिरे से विचार करने विवश करती है. 

इतिहास के अध्ययन व इन जानकारियों के लिए धन्यवाद.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज का गरीब ज्यादा गरीब है, यह तो मानना पड़ेगा. पहले ज्यादा लोग भूखे नहीं रहते थे, सभी परंपरागत व्यवसायों में संलग्न थे, और अपनी स्थिति से संतुष्ट भी, वर्ग आधारित समाज का यह उजला पक्ष है की उसमे अपने रोज़गार के लिए किसी को सोचना नहीं पड़ता. सब कुछ जन्म तय कर देता था. और सभी अपनी स्थिति को ईश्वर की इच्छा और कर्मफल मान कर आज की अपेक्षा कहीं अधिक सुखी थे. आज लगभग हर कोई अपने अन्दर खालीपन लिए घूमता है. </p>
<p>और यह भी सही है की अगर दुर्भाग्यवश किसी के पास खाने को अनाज नहीं है, तब भी उसके भूखे रहने की नौबत कम ही आती है. तब लोग कम आत्मकेंद्रित और स्वार्थी थे.  सामाजिक संस्कारों ने यह बात लोगों के मन में &#8216;अन्नदान महादान&#8217; वाली बात अच्छी तरह बिठा रखी थी. तब वनस्पति, जंगल इतने थे की फल,सब्जियां, वनस्पति, औषधियां मुफ्त ही मिला करती थीं. अन्न, गोधन और वस्त्रों के आलावा बाकी खर्चे नगण्य थे. उन्नीसवी सदी के पहले इतिहास में क्या साग या फल बेचने वालों का कोई उल्लेख है? </p>
<p>हां मानव पहले की अपेक्षा सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से भ्रष्ट हुआ है. तब से आज तक मनुष्य ने न सिर्फ प्रकृति को नष्ट किया है बल्कि वह निसर्ग से दूर होकर मानसिक संत्रास भुगत रहा है. इसके सामाजिक और भौतिक परिणाम भी सामने हैं. आपकी यह पोस्ट नए सिरे से विचार करने विवश करती है. </p>
<p>इतिहास के अध्ययन व इन जानकारियों के लिए धन्यवाद.</p>
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		<title>By: Prashant(PD)</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8077</link>
		<dc:creator>Prashant(PD)</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Dec 2009 20:20:46 +0000</pubDate>
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		<description>Dinesh ji ke baad main Shastri ji ke comment ka intjar kar raha hun..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Dinesh ji ke baad main Shastri ji ke comment ka intjar kar raha hun..</p>
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	<item>
		<title>By: उमेश</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8076</link>
		<dc:creator>उमेश</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Dec 2009 13:07:55 +0000</pubDate>
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		<description>आज भी भारत स्वतंत्र नही है । आज भी देश की सत्ता पर ऐसे लोग बैठे है जो वस्तुतः साम्राज्यवादी ताकतो (ब्रिटेन एवम अमेरिका) के हितो के लिए काम कर रहे है । सुनियोजित ष्डयंत्र के तहत भारत पर एक ऐसा संविधान लाद दिया गया है जिसमे अनेक छेद है और इन छेदो की वजह से भारतवर्ष मे सम्पुर्णॅ क्रांति के लिए उर्जा नही बन पा रही है । जब तक केशरीया, लाल और हरा एक साथ नही आएंगे उस साम्राज्यवादी ताकत परास्त नही किया जा सकता ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज भी भारत स्वतंत्र नही है । आज भी देश की सत्ता पर ऐसे लोग बैठे है जो वस्तुतः साम्राज्यवादी ताकतो (ब्रिटेन एवम अमेरिका) के हितो के लिए काम कर रहे है । सुनियोजित ष्डयंत्र के तहत भारत पर एक ऐसा संविधान लाद दिया गया है जिसमे अनेक छेद है और इन छेदो की वजह से भारतवर्ष मे सम्पुर्णॅ क्रांति के लिए उर्जा नही बन पा रही है । जब तक केशरीया, लाल और हरा एक साथ नही आएंगे उस साम्राज्यवादी ताकत परास्त नही किया जा सकता ।</p>
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		<title>By: उमेश</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8075</link>
		<dc:creator>उमेश</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Dec 2009 13:07:00 +0000</pubDate>
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		<description>आज भी भारत स्वतंत्र नही है । आज भी देश की सत्ता पर ऐसे लोग बैठे है जो वस्तुतः साम्राज्यवादी ताकतो (ब्रिटेन एवम अमेरिका) के हितो के लिए काम कर रहे है । सुनियोजित ष्डयंत्र के तहत भारत पर एक ऐसा संविधान लाद दिया गया है जिसमे अनेक छेद है और इन छेदो की वजह से भारतवर्ष मे सम्पुर्णॅ क्रांति के लिए उर्जा नही बन पा रही है । जब तक केशरीया, लाल और हरा एक साथ नही आएंगे उस साम्राज्यवादी ताकत ko परास्त नही किया जा सकता ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आज भी भारत स्वतंत्र नही है । आज भी देश की सत्ता पर ऐसे लोग बैठे है जो वस्तुतः साम्राज्यवादी ताकतो (ब्रिटेन एवम अमेरिका) के हितो के लिए काम कर रहे है । सुनियोजित ष्डयंत्र के तहत भारत पर एक ऐसा संविधान लाद दिया गया है जिसमे अनेक छेद है और इन छेदो की वजह से भारतवर्ष मे सम्पुर्णॅ क्रांति के लिए उर्जा नही बन पा रही है । जब तक केशरीया, लाल और हरा एक साथ नही आएंगे उस साम्राज्यवादी ताकत ko परास्त नही किया जा सकता ।</p>
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		<title>By: दिनेशराय द्विवेदी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8074</link>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Dec 2009 12:32:12 +0000</pubDate>
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		<description>यह कह कर नहीं टाला जा सकता कि विषमता इतनी अधिक नहीं थी। समाज में जब से संपत्ति का संचय आरंभ हुआ है तब से विषमता है। एक समय वह था जब दास हुआ करते थे। यह विषमता का उच्चतम शिखर था। दासों की उपस्थिति मोर्यकाल में भी दिखाई देती है और उस के बाद भी। दासों के उपरांत सामंत वाद आया। तो सामंतों की भूमि पर काम करने वाले बंधक किसान और सामंत दोनों में दास-स्वामी विषमता से अधिक थी लेकिन बंधक किसान की जीवन परिस्थितियाँ दास से बेहतर थीं। हालांकि दास की अपेक्षा किसान चार गुना अधिक सुविधा प्राप्त था तो स्वामी की अपेक्षा सामंत चालीस गुना अधिक सुविधा प्राप्त हो गया था। आज उजरती मंजदूर जिस में खेत मजदूर से ले कर कंस्ट्रक्शन के लिए बोझा ढोने वाला मजदूर और विज्ञानी तक शामिल हैं दास और किसान से दस गुना बेहतर जीवन जीता है लेकिन आज का पूंजीपति सामंतो की अपेक्षा सौ गुना नहीं हजार गुना अधिक संपत्तिवान है। इस तरह विषमता में वृद्धि हुई है। देश की संपत्ति भी उस के मुकाबले बहुत अधिक बढ़ी है। लेकिन यदि साम्राज्यवादी ताकतों ने भारत को न लूटा होता और अब भी नहीं लूट रही होतीं तो भारत आज न जाने कहाँ होता। साम्राज्यी लूट को खत्म करने और विषमता को न्यूनतम करने की आवश्यकता है उस के लिए तंत्र विकसित करना होगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह कह कर नहीं टाला जा सकता कि विषमता इतनी अधिक नहीं थी। समाज में जब से संपत्ति का संचय आरंभ हुआ है तब से विषमता है। एक समय वह था जब दास हुआ करते थे। यह विषमता का उच्चतम शिखर था। दासों की उपस्थिति मोर्यकाल में भी दिखाई देती है और उस के बाद भी। दासों के उपरांत सामंत वाद आया। तो सामंतों की भूमि पर काम करने वाले बंधक किसान और सामंत दोनों में दास-स्वामी विषमता से अधिक थी लेकिन बंधक किसान की जीवन परिस्थितियाँ दास से बेहतर थीं। हालांकि दास की अपेक्षा किसान चार गुना अधिक सुविधा प्राप्त था तो स्वामी की अपेक्षा सामंत चालीस गुना अधिक सुविधा प्राप्त हो गया था। आज उजरती मंजदूर जिस में खेत मजदूर से ले कर कंस्ट्रक्शन के लिए बोझा ढोने वाला मजदूर और विज्ञानी तक शामिल हैं दास और किसान से दस गुना बेहतर जीवन जीता है लेकिन आज का पूंजीपति सामंतो की अपेक्षा सौ गुना नहीं हजार गुना अधिक संपत्तिवान है। इस तरह विषमता में वृद्धि हुई है। देश की संपत्ति भी उस के मुकाबले बहुत अधिक बढ़ी है। लेकिन यदि साम्राज्यवादी ताकतों ने भारत को न लूटा होता और अब भी नहीं लूट रही होतीं तो भारत आज न जाने कहाँ होता। साम्राज्यी लूट को खत्म करने और विषमता को न्यूनतम करने की आवश्यकता है उस के लिए तंत्र विकसित करना होगा।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: जी.के. अवधिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8073</link>
		<dc:creator>जी.के. अवधिया</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Dec 2009 11:13:28 +0000</pubDate>
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		<description>धनी गरीब का अन्तर किस देश में नहीं होता?

किन्तु यह सच है कि अन्य सभी देशों की तुलना में भारत बहुत अधिक खुशहाल था।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>धनी गरीब का अन्तर किस देश में नहीं होता?</p>
<p>किन्तु यह सच है कि अन्य सभी देशों की तुलना में भारत बहुत अधिक खुशहाल था।</p>
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	<item>
		<title>By: prashant</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8072</link>
		<dc:creator>prashant</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Dec 2009 10:10:29 +0000</pubDate>
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		<description>मै भी सहमत हू आप के लेख से इतना बढ़िया लेख लिखने के लिए बधाई</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मै भी सहमत हू आप के लेख से इतना बढ़िया लेख लिखने के लिए बधाई</p>
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	<item>
		<title>By: संगीता पुरी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2589/comment-page-1#comment-8069</link>
		<dc:creator>संगीता पुरी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Dec 2009 06:51:06 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2589#comment-8069</guid>
		<description>शत प्रतिशत सहमत हूं आपसे .. प्राचीन भारत में हर स्‍तर के लोगों का तथा हर प्रकार के काम का महत्‍व था .. और उसे अपने घर परिवार के पालन पोषण में कोई बाधा नहीं आती थी .. हर क्षेत्र में कला का इतना विकास हुआ था .. उसके पीछे बडे बडे राजा महाराजाओं और व्‍यपारियों का हाथ नहीं .. बिल्‍कुल सामान्‍य लोगों का हाथ था .. किसी प्रकार के दबाबपूर्ण वातावरण में मजदूरी तो संभव है .. पर कला का विकास नामुमकिन है .. आज पाश्‍चात्‍य देशों की भौतिक चकाचौंध से हमारी आंखे ही नहीं .. सोचने समझने की शक्ति भी समाप्‍त है .. हम इतना भी नहीं सोंच पाते कि .. यदि प्राचीन भारतीय मजदूरों के सम्‍मुख आज के गरीबों की तरह इतनी चुनौतियां होती .. तो क्‍या वे हर क्षेत्र में इतनी बेहतरीन कला का प्रदर्शन कर सकते थे ??</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शत प्रतिशत सहमत हूं आपसे .. प्राचीन भारत में हर स्‍तर के लोगों का तथा हर प्रकार के काम का महत्‍व था .. और उसे अपने घर परिवार के पालन पोषण में कोई बाधा नहीं आती थी .. हर क्षेत्र में कला का इतना विकास हुआ था .. उसके पीछे बडे बडे राजा महाराजाओं और व्‍यपारियों का हाथ नहीं .. बिल्‍कुल सामान्‍य लोगों का हाथ था .. किसी प्रकार के दबाबपूर्ण वातावरण में मजदूरी तो संभव है .. पर कला का विकास नामुमकिन है .. आज पाश्‍चात्‍य देशों की भौतिक चकाचौंध से हमारी आंखे ही नहीं .. सोचने समझने की शक्ति भी समाप्‍त है .. हम इतना भी नहीं सोंच पाते कि .. यदि प्राचीन भारतीय मजदूरों के सम्‍मुख आज के गरीबों की तरह इतनी चुनौतियां होती .. तो क्‍या वे हर क्षेत्र में इतनी बेहतरीन कला का प्रदर्शन कर सकते थे ??</p>
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