मेरे कल के आलेख प्राचीन भारत में आर्थिक विषमता नहीं थी! पर टिपियाते समय ज्ञानदत्त जी ने एक आश्चर्यजनक बात कह दी जो इस प्रकार है:
मनुष्य समान बन नहीं सकता। पूंजी को आप समान बांट भी दें तो वह कालान्तर में पुन: वही असमान बंट जायेगी। [ज्ञानदत्त पाण्डेय]
इसे पढते ही मुझे एक गणना/परीक्षण याद आया जो आज से कुछ साल पहले किया गया था. इसे करने वालों ने सबसे पहले विश्व-समाज के हर घटक के लोगों का पैसा खर्चने एवं निवेश करने की आदतों का हिसाब तय्यार किया. इसके बाद संगणक की मदद से यह गणना की कि यदि विश्व के हर व्यक्ति से उसका सारा धन ले लिये जाये, और हरेक को (बच्चे, बढे, बूढे आदि को) यदि एक करोड रुपया प्रति व्यक्ति दे दिया जाता है तो क्या होगा. एक ऐसा समाज जहां आर्थिक विषमता नहीं है और जहां हरेक को पैसे के उपयोग के लिये पूरी आजादी दे दी जाती है.
पहले महीने हर कोई बेहद खुश दिखता है, खैरात में मिला 1 करोड रुपया उसे जीवन की हर जरूरत की आपूर्ति के लिये मददगार सिद्ध होता है. लेकिन दूसरे महीने से एक अंतर दिखने लगता है: अधिकतर लोग सिर्फ खर्च और आनंद में लिप्त रहते हैं जबकि लगभग 20% लोग खर्च के साथ साथ निवेश भी करते जाते हैं. छठे महीने के अंत तक समाज पूरी तरह आर्थिक विषमता से भर जाता है. ताज्जुब: ठीक 365 वें दिन लोगों का आर्थिक स्तर वही हो जाता है जो एक करोड रुपये मिलने के पहले था.
लगभग 20% लोग धनी रह जाते है एवं 80% पुन: कंगाल हो जाते है. जो पहले करोडपति था वह आज करोडपति रह जाता है. जो कंगाल था वह एक करोड प्रति व्यक्ति पाने के बावजूद सडक पर भीख मांगने निकल पडता है. कुल मिला कर कहा जाये तो दोष पूंजी के वितरण का नहीं है बल्कि उपलब्ध पूंजी के विनिमय का है. अपवादों को छोड दें तो किसी भी समाज में कोई भी व्यक्ति आर्थिक उन्नति कर सकता है, लेकिन उसके लिये जरूरत अतिविशाल पूँजी की नहीं, बल्कि उसकी अपनी सामान्य पूँजी के साथ साथ उसके विनिमय व निवेश के प्रति असामान्य समर्पण की जरूरत है.
अत: ऊपर उद्धरित ज्ञान जी का कथन एकदम सही है. पूंजी से अधिक उपलब्ध पूँजी का सही उपयोग महत्वपूर्ण है. ज्ञान जी का अगला कथन भी इस कारण जरा देख लें:
अगर मुझे पूंजी की इज्जत करनी नहीं आती तो मैं जितना भी जोर लगाऊं –- टाटा बिरला का क्लोन बन नहीं सकता।
Net Income | About India । Indian Coins | Physics Made Simple | India












December 3rd, 2009 at 6:19 am
पूंजी का सही उपयोग महत्वपूर्ण है-सही आलेख.पठनीय.
December 3rd, 2009 at 6:47 am
ज्ञान जी ने बहुत सही कहा था | और उनके कथन को आपने बहुत बढ़िया तरीके से व्याख्या कर समझाया है | आभार |
December 3rd, 2009 at 6:49 am
“…दोष पूंजी के वितरण का नहीं है बल्कि उपलब्ध पूंजी के विनिमय का है. अपवादों को छोड दें तो किसी भी समाज में कोई भी व्यक्ति आर्थिक उन्नति कर सकता है, लेकिन उसके लिये जरूरत अतिविशाल पूँजी की नहीं, बल्कि उसकी अपनी सामान्य पूँजी के साथ साथ उसके विनिमय व निवेश के प्रति असामान्य समर्पण की जरूरत है.”
एकदम सही!
December 3rd, 2009 at 7:22 am
ज्ञान जी ने सही कहा। लेकिन यह इंसान की फितरत नही है। यह पूँजी की फितरत है कि वह संकेंद्रित होती है। इंसान को इंन्सानियत से दूर ले जाती है। उस पर इंसानी नहीं, सामाजिक नियंत्रण चाहिए वर्ना वह इने गिने इंसानों को धनी तो बनाती है साथ ही लाखों करोड़ों को नंगा भूखा और लाचार भी बनाती है।
December 3rd, 2009 at 10:51 am
ज्ञान जी के कथनों से हमें भी सीखने का मौका मिला
आपको और ज्ञान जी को प्रणाम
December 3rd, 2009 at 1:04 pm
आदमी असभ्य से सभ्य बना। उसी तरह एक क्रान्ति चाहिये आदमी आर्थिक निरक्षरता से आर्थिक-साक्षर बने। यह बहुत बड़ी क्रान्ति होगी, अगर हुई तो।
December 15th, 2009 at 3:44 pm
You are right sir.
January 3rd, 2010 at 3:35 am
सही है ज्ञान जी की बात।
पहले आलेख में चार सौ से भी ज्यादा शब्दों की टिप्पणी वर्ड पर लिख कर यहां पेस्ट की थी, पर वह यहां पोस्ट करने के बाद पता नहीं कहां चली गई। अब हिम्मत नहीं दोबारा उस सारी तर्क-प्रक्रिया से गुजरने की। बहरहाल यह जरूर कहना चाहूंगा कि समानता कभी नहीं रही। पुराण-उपनिषदों की कई कथाएं दारुण मानवाता का उल्लेख करती हैं। भारत भूमि का मनुष्य अगर संतुष्ट था तब यहां के अतीत में भी भुखमरी की एक भी कथा नही होनी चाहिए थी।
March 7th, 2010 at 6:11 pm
ज्ञान जी का सही कथन तथा उस पर आपकी सटीक व्याख्या।