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	<title>Comments on: पाबला जी से हुआ अपराध बहुत बडा?</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: munish</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8215</link>
		<dc:creator>munish</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 17:04:29 +0000</pubDate>
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		<description>it is very re-assuring to have balanced thinking individuals like you in Hindi blogosphere. I agree with you and i thank you for enlightening me.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>it is very re-assuring to have balanced thinking individuals like you in Hindi blogosphere. I agree with you and i thank you for enlightening me.</p>
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		<title>By: Ghost Buster</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8202</link>
		<dc:creator>Ghost Buster</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 12:55:30 +0000</pubDate>
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		<description>मैं बता नहीं सकता की आपकी इस पोस्ट ने कितना निराश किया है. ऐसी गोल मोल बातें सुनने की कम से कम आपके यहां तो अपेक्षा नहीं रखता था. अब तक आपके तर्क कौशल का लोहा मानता आया हूँ, इसीलिए इस पोस्ट में सायबर स्क्वैटिंग की ऐसी गलत व्याख्या (और सच कहने से बचने का ऐसा भीरु प्रयास) देखकर मन क्षुब्ध है.

और क्या कहूँ, आगामी पोस्ट की प्रतीक्षा करता हूँ. फिलहाल तो मसिजीवी का स्वर लेहड़ों की बस्ती में शेर की आवाज सा लगा रहा है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं बता नहीं सकता की आपकी इस पोस्ट ने कितना निराश किया है. ऐसी गोल मोल बातें सुनने की कम से कम आपके यहां तो अपेक्षा नहीं रखता था. अब तक आपके तर्क कौशल का लोहा मानता आया हूँ, इसीलिए इस पोस्ट में सायबर स्क्वैटिंग की ऐसी गलत व्याख्या (और सच कहने से बचने का ऐसा भीरु प्रयास) देखकर मन क्षुब्ध है.</p>
<p>और क्या कहूँ, आगामी पोस्ट की प्रतीक्षा करता हूँ. फिलहाल तो मसिजीवी का स्वर लेहड़ों की बस्ती में शेर की आवाज सा लगा रहा है.</p>
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		<title>By: ज्ञानदत्त पाण्डेय</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8200</link>
		<dc:creator>ज्ञानदत्त पाण्डेय</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 10:27:46 +0000</pubDate>
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		<description>अच्छा है - पुनर्वापसी ऐसे मुद्दे से होना! :-)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्छा है &#8211; पुनर्वापसी ऐसे मुद्दे से होना! <img src='http://sarathi.info/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':-)' class='wp-smiley' /> </p>
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		<title>By: परमजीत बाली</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8199</link>
		<dc:creator>परमजीत बाली</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 08:59:58 +0000</pubDate>
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		<description>आपका पुन:स्वागत है।आपने बढिया पोस्ट लिखी।अगली पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका पुन:स्वागत है।आपने बढिया पोस्ट लिखी।अगली पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी।</p>
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		<title>By: Sanjeet Tripathi</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8198</link>
		<dc:creator>Sanjeet Tripathi</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 07:47:01 +0000</pubDate>
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		<description>welcome back.

agle aalekh ki pratikshaa me</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>welcome back.</p>
<p>agle aalekh ki pratikshaa me</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8197</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 07:40:26 +0000</pubDate>
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		<description>मेरे मित्र मसिजीवी ने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे हैं. उनका उत्तर अगले आलेख में देख लें.

सस्नेह  -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.IndianCoins.Org</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरे मित्र मसिजीवी ने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे हैं. उनका उत्तर अगले आलेख में देख लें.</p>
<p>सस्नेह  &#8212; शास्त्री</p>
<p>हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है<br />
<a href="http://www.IndianCoins.Org" rel="nofollow">http://www.IndianCoins.Org</a></p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Shastri JC Philip</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8196</link>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 07:37:55 +0000</pubDate>
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		<description>मसिजीवी ने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे हैं. इन का उत्तर अगले आलेख में देखें.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मसिजीवी ने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे हैं. इन का उत्तर अगले आलेख में देखें.</p>
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	<item>
		<title>By: ताऊ रामपुरिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8195</link>
		<dc:creator>ताऊ रामपुरिया</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 05:22:12 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2605#comment-8195</guid>
		<description>शाश्त्रीजी रामराम. आप बडे दिनों बाद दिखे हैं. और आते ही आपने दुध का दूध और पानी का पानी कर दिया है. बहुत ही सीधे शब्दों मे आपने “साईबर-स्क्वेटिंग” को समझा दिया है. 

आपकी बात का मतलब समझ आगया है. जबरन लोगों को गुमराह किया जारहा है. बहुत धन्यवाद.

रामराम.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शाश्त्रीजी रामराम. आप बडे दिनों बाद दिखे हैं. और आते ही आपने दुध का दूध और पानी का पानी कर दिया है. बहुत ही सीधे शब्दों मे आपने “साईबर-स्क्वेटिंग” को समझा दिया है. </p>
<p>आपकी बात का मतलब समझ आगया है. जबरन लोगों को गुमराह किया जारहा है. बहुत धन्यवाद.</p>
<p>रामराम.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: जी.के. अवधिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8194</link>
		<dc:creator>जी.के. अवधिया</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 04:30:38 +0000</pubDate>
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		<description>हार्दिक खुशी हुई कि आप पुनः वापस आ गये हैं!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हार्दिक खुशी हुई कि आप पुनः वापस आ गये हैं!</p>
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	<item>
		<title>By: भारतीय नागरिक</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8193</link>
		<dc:creator>भारतीय नागरिक</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 03:57:40 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2605#comment-8193</guid>
		<description>बात आपने बिल्कुल ठीक लिखी है. लेकिन यहां पर यह आदत है कि पहले नाम से ही पहचान होती है. जैसे कि आदमी सरनेम सहित पूर्ण नाम न लेकर समीर, मोहन इत्यादि कहता है. लेकिन धीरे धीरे आदत पड़ जायेगी और वैसे भी पाइरेसी में तो हमें महारत हासिल है ही :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बात आपने बिल्कुल ठीक लिखी है. लेकिन यहां पर यह आदत है कि पहले नाम से ही पहचान होती है. जैसे कि आदमी सरनेम सहित पूर्ण नाम न लेकर समीर, मोहन इत्यादि कहता है. लेकिन धीरे धीरे आदत पड़ जायेगी और वैसे भी पाइरेसी में तो हमें महारत हासिल है ही <img src='http://sarathi.info/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8192</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 03:57:15 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2605#comment-8192</guid>
		<description>पुन: वापसी पर हार्दिक स्‍वागत, आशा है पुत्र व पुत्रवधु &#039;सानंद&#039; होंगे।

अपराध कितना बड़ा है इस पर हम टिप्‍पणी कैसे करें यूँ भी द्विवेदीजी ने बता ही दिया है कि चिट्ठाचर्चा प्रकरण में इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए क्‍योंकि ये &#039;रजिस्‍टर्ड ट्रेड मार्क&#039; नहीं है...हमने अपनी पोस्‍ट में कहा ही था कि कानूनी तौर अपराध हुआ हे कि नहीं ये कानूनची ही तय कर सकते हैं तथा हमारी नजर में तो द्विवेदीजी इसके सबसे बड़े जानकार हैं। इसलिए मामला तय हो गया।
 (कानून को ये बताना बहुत ही कठिन है कि रजिस्‍टर्ड छोडि़ए चिट्ठाचर्चा ट्रेड ही नहीं है बल्कि कष्‍ट ही तो प्रयोजकों वाले ट्रेड बनने के आसन्‍न होने से है)

हमने 2004 में, जब हिन्‍दी प्रेस में इंटरनेट पर शायद ही तोई तकनीकी लेख छपता हो, जनसत्‍ता में लेख लिखा था &#039;जाल में फंसे नाम&#039; ये डोमेन स्‍कवैटिंग पर ही था तबसे ही हमारी समझ ये है कि जब पहले से मौजूद किसी की गुडविल का इस्तेमाल करने के लिए इसे लिया जाता है तो जाहिर है बैडफेथ में ही होगा इसलिए अनैतिक रहा (कोई आहत न हो इसलिए अपराध शब्‍द इस्‍तेमाल नहीं कर रहा हूँ) 
डाट ओर्ग, इन, माब आदि आदि की उपलब्‍धता का तर्क बार बार दिया जा रहा है जो इसकी सैद्धांतिक समझ का कचरा करना ही है। सवाल सीधा है नई यदि चिट्ठाचर्चा के लिए डोमेन के 199 विकल्‍प है (हमने पहले ही कहा कि साझा प्रकल्‍प होने के कारण मूल चर्चा के डोमेन पर जाने के हम खास समर्थक हें ही नहीं) पर श्री पाबला के पास तो दूसरी (या तीसरी, चौथी पांचवी..) चर्चा के लिए अनंत विकल्‍प थे फिर चिट्ठाचर्चा ही क्‍यों ? उत्‍तर मुश्किल नहीं है उनकी ओर से लोगों ने बार बार स्‍पष्‍ट किया है कि वे इस मंच से नाराज हैं हमारी छोटी सी समझ इसे ही बैडफेथ कहती है। 

थोड़ा पीछे चलते हैं। हममें से कई को लगने लगा था कि नारद अलोकतांत्रिक हो रहा है, हमें दिक्‍कत थी इस मंच के गलत दिशा में जाने पर आहत थे। पर जब ब्‍लॉगवाणी ओर चिट्ठाजगत आए जो वही काम करने आए थे नारद कर रहा था (और उसी तरह साझा था जैसे कि चिट्ठाचर्चा) तो ये नए एग्रीगेटर बैडफेथ में नहीं आए इन एग्रीगेटर्स ने डोमेननेम, इंटरफेस या प्रचार में नारद की गुडविल का उपयोग करने की चेष्‍टा नहीं की। चिट्ठाचर्चा अगर भटक रहा है तो उसे गाड़ा जा सकता है या खुद मिट जाएगा नारद की ही तरह किंतु इसे ही नकार देना अनुचित है इतने सालों में उसने वो गुडविल अर्जित की है (जो सहज ही &#039;उसकी&#039; गुडविल है) कि हर इस तरह का नया उपक्रम खुद को चिट्ठाचर्चा कहने पर उतारू है।
 इस गुडविल को हथियाने का प्रयास अगर हमें अनैतिक दिखा तो कैसे अदालती कार्रवाई की सावर्जनिक धमकी का बायस बना। (अरे हिन्‍दी का मास्‍टर है... इतनी हिम्‍मत कि वेब डेवेलपमेंट के बेस्‍ट ब्रेन को अनैतिक कहे... अरसे से कर रहे हैं किसी की आज तक हिम्‍मत नहीं हुई)

खेद है टिप्‍पणी लंबी हो गई। बाकी स्‍थानों पर इग्नोर किया जा सकता था पर आपके प्रति भिन्‍न भाव रहा है आपको इग्नोर नहीं कर सकता। जब हमने कहा था कि आप अकेले ये सब नहीं कर सकते जरूर कोई ओर बात है तो ये ज्‍यादा आहत करने वाली बात थी पर आपने लीगल नोटिस की धमकी नहीं भेजी थी अपनी बात रखी थी। यहॉं अभी तक कोई नहीं बता रहा हे कि ब्‍लॉगवात, ब्‍लॉगचर्चा, पाबलाचर्चा, छत्‍तीसगढचर्चा .... 199 नहीं 199 करोड़ नाम उपलब्‍ध होते हुए चिट्ठाचर्चा ही क्‍यों ?

खैर इस सबके बाद किसी को लगता है कि मेरी बात मालाफाईड थी तो मैं खेद व्‍यक्त करता हूँ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पुन: वापसी पर हार्दिक स्‍वागत, आशा है पुत्र व पुत्रवधु &#8216;सानंद&#8217; होंगे।</p>
<p>अपराध कितना बड़ा है इस पर हम टिप्‍पणी कैसे करें यूँ भी द्विवेदीजी ने बता ही दिया है कि चिट्ठाचर्चा प्रकरण में इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए क्‍योंकि ये &#8216;रजिस्‍टर्ड ट्रेड मार्क&#8217; नहीं है&#8230;हमने अपनी पोस्‍ट में कहा ही था कि कानूनी तौर अपराध हुआ हे कि नहीं ये कानूनची ही तय कर सकते हैं तथा हमारी नजर में तो द्विवेदीजी इसके सबसे बड़े जानकार हैं। इसलिए मामला तय हो गया।<br />
 (कानून को ये बताना बहुत ही कठिन है कि रजिस्‍टर्ड छोडि़ए चिट्ठाचर्चा ट्रेड ही नहीं है बल्कि कष्‍ट ही तो प्रयोजकों वाले ट्रेड बनने के आसन्‍न होने से है)</p>
<p>हमने 2004 में, जब हिन्‍दी प्रेस में इंटरनेट पर शायद ही तोई तकनीकी लेख छपता हो, जनसत्‍ता में लेख लिखा था &#8216;जाल में फंसे नाम&#8217; ये डोमेन स्‍कवैटिंग पर ही था तबसे ही हमारी समझ ये है कि जब पहले से मौजूद किसी की गुडविल का इस्तेमाल करने के लिए इसे लिया जाता है तो जाहिर है बैडफेथ में ही होगा इसलिए अनैतिक रहा (कोई आहत न हो इसलिए अपराध शब्‍द इस्‍तेमाल नहीं कर रहा हूँ)<br />
डाट ओर्ग, इन, माब आदि आदि की उपलब्‍धता का तर्क बार बार दिया जा रहा है जो इसकी सैद्धांतिक समझ का कचरा करना ही है। सवाल सीधा है नई यदि चिट्ठाचर्चा के लिए डोमेन के 199 विकल्‍प है (हमने पहले ही कहा कि साझा प्रकल्‍प होने के कारण मूल चर्चा के डोमेन पर जाने के हम खास समर्थक हें ही नहीं) पर श्री पाबला के पास तो दूसरी (या तीसरी, चौथी पांचवी..) चर्चा के लिए अनंत विकल्‍प थे फिर चिट्ठाचर्चा ही क्‍यों ? उत्‍तर मुश्किल नहीं है उनकी ओर से लोगों ने बार बार स्‍पष्‍ट किया है कि वे इस मंच से नाराज हैं हमारी छोटी सी समझ इसे ही बैडफेथ कहती है। </p>
<p>थोड़ा पीछे चलते हैं। हममें से कई को लगने लगा था कि नारद अलोकतांत्रिक हो रहा है, हमें दिक्‍कत थी इस मंच के गलत दिशा में जाने पर आहत थे। पर जब ब्‍लॉगवाणी ओर चिट्ठाजगत आए जो वही काम करने आए थे नारद कर रहा था (और उसी तरह साझा था जैसे कि चिट्ठाचर्चा) तो ये नए एग्रीगेटर बैडफेथ में नहीं आए इन एग्रीगेटर्स ने डोमेननेम, इंटरफेस या प्रचार में नारद की गुडविल का उपयोग करने की चेष्‍टा नहीं की। चिट्ठाचर्चा अगर भटक रहा है तो उसे गाड़ा जा सकता है या खुद मिट जाएगा नारद की ही तरह किंतु इसे ही नकार देना अनुचित है इतने सालों में उसने वो गुडविल अर्जित की है (जो सहज ही &#8216;उसकी&#8217; गुडविल है) कि हर इस तरह का नया उपक्रम खुद को चिट्ठाचर्चा कहने पर उतारू है।<br />
 इस गुडविल को हथियाने का प्रयास अगर हमें अनैतिक दिखा तो कैसे अदालती कार्रवाई की सावर्जनिक धमकी का बायस बना। (अरे हिन्‍दी का मास्‍टर है&#8230; इतनी हिम्‍मत कि वेब डेवेलपमेंट के बेस्‍ट ब्रेन को अनैतिक कहे&#8230; अरसे से कर रहे हैं किसी की आज तक हिम्‍मत नहीं हुई)</p>
<p>खेद है टिप्‍पणी लंबी हो गई। बाकी स्‍थानों पर इग्नोर किया जा सकता था पर आपके प्रति भिन्‍न भाव रहा है आपको इग्नोर नहीं कर सकता। जब हमने कहा था कि आप अकेले ये सब नहीं कर सकते जरूर कोई ओर बात है तो ये ज्‍यादा आहत करने वाली बात थी पर आपने लीगल नोटिस की धमकी नहीं भेजी थी अपनी बात रखी थी। यहॉं अभी तक कोई नहीं बता रहा हे कि ब्‍लॉगवात, ब्‍लॉगचर्चा, पाबलाचर्चा, छत्‍तीसगढचर्चा &#8230;. 199 नहीं 199 करोड़ नाम उपलब्‍ध होते हुए चिट्ठाचर्चा ही क्‍यों ?</p>
<p>खैर इस सबके बाद किसी को लगता है कि मेरी बात मालाफाईड थी तो मैं खेद व्‍यक्त करता हूँ।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: काजल कुमार</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8191</link>
		<dc:creator>काजल कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 02:39:13 +0000</pubDate>
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		<description>पु्र्नस्वागत है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पु्र्नस्वागत है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8190</link>
		<dc:creator>प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 02:27:13 +0000</pubDate>
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		<description>अब आप ने बता दिया है .... तो सही ही होगा !
कंटेंट के अलावा  डोमेन का महत्व कितना है ...इसको अभी हमारा दिमाग समझने की कोशिश कर रहा है !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अब आप ने बता दिया है &#8230;. तो सही ही होगा !<br />
कंटेंट के अलावा  डोमेन का महत्व कितना है &#8230;इसको अभी हमारा दिमाग समझने की कोशिश कर रहा है !</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: arvind mishra</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8189</link>
		<dc:creator>arvind mishra</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 01:01:21 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2605#comment-8189</guid>
		<description>इतने दिनों बाद आपको देख कर अच्छा लगा .मैं तो घबरा ही गया था की कहीं आपने ब्लागजगत से संन्यास तो नहीं ले लिया .
आपने मसले को नीर क्षीर विवेक से हल कर दिया .आभार .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इतने दिनों बाद आपको देख कर अच्छा लगा .मैं तो घबरा ही गया था की कहीं आपने ब्लागजगत से संन्यास तो नहीं ले लिया .<br />
आपने मसले को नीर क्षीर विवेक से हल कर दिया .आभार .</p>
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	<item>
		<title>By: suman</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2605/comment-page-1#comment-8188</link>
		<dc:creator>suman</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 05 Feb 2010 01:00:49 +0000</pubDate>
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		<description>nice.......................</description>
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