चिट्ठाजगत नवोदित एवं पुराने हिन्दी कवियों एवं काव्य विधा में रचना करने वालों के लिये एक वरदान बनकर आया है. बिना किसी “खेद के साथ लौटाया जाता है” पर्ची के वे यहा अपनी रचनात्मकता को विशालजगत के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं. इसमे बहुत सी अच्छाईयां हैं, बहुत सी कमजोरियां भी है. कमजोरी का बात अगले किसी अवलोकन में करेंगे, कुछ अच्छाईयों की यहां. सबसे बडी अच्छाई यह है कि “बाजार की शक्तियां” या पाठकों की प्रतिक्रिया एक अच्छे सम्पादक का काम करेंगी, करने लगी हैं. काफी सारे ठोस रचनाकार जो किसी और तरीके से हिन्दी जगत में उभर न पाते, वे यहां जल्दी ही उभर जायेंगे. और भी कई बाते हैं जो अवलोकनों में क्रमश: प्रस्तुत किए जाएंगे. अवलोकन 8 में हम ने अपके लिये चुने हैं निम्न मोती: बाहर से सजल नयन कोरों से आ भी जाओ के ज़िंदगी कम है जइसे बोल के अंगरेजी कब तलक अपना दामन बचाते रहें,
हर बात
इक दिखावा है
कभी-कभी
कोशिश तो करता हूँ कि
मैं एक
सम्पूर्ण आदमी बन पाता| [पूरी कविता पढें ...]
अश्रु गाल ढुलकने दो ।
करुण क्रंदन से विषाद को
आज द्रवित हो जाने दो। [पूरी कविता पढें ...]
तुम नही हो तो हर खुशी क़म है| [पूरी कविता पढें ...]
फूलला आपन सीना,
वइसन कब लोग
सिखियन अपने भाषा
के संग जीना,
खुली आखँन से
देखी ला इ सपना |[पूरी कविता पढें ...]
खुद से खुद की नज़र ही चुराते रहें,
लोग रोयें तो उनको हँसाते रहें,
हँसना चाहा तो खुद को है रोना यहाँ![पूरी कविता पढें ...]
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July 4th, 2007 at 11:16 am
आपका यह प्रयास निश्चित ही काविल-ए-तारिफ है…मैं इसका स्वागत करता हूँ।
एकबार पुन: अच्छा चुनाव रहा है कविताओं का…। बधाई!!!