त्रासदी का समर है…ऐ “परमात्मा” !!!
कौन है जो अकाल मृत्यु, बाढ, आकाल, भूकंप, एवं इस तरह की प्राकृतिक विपदाओं को देख कर चुप रह सकता है. हां, इतना जरूर है कि अलग अलग लोग भिन्न तरीके से प्रभावित होते हैं. कुछ के लिये ये सिर्फ कुछ और आंकडे मात्र हैं जिन पर आज वे कुछ घडियाली आंसू बहा देंगे — हो सके तो वह भी “प्रतीकात्मक” तरीके से. शायद कुछा चंदा, किसी राहत-संस्था की झोली में डाल देंगे. लेकिन सूर्य अस्त होने एवं टीवी पर पिक्चर चालू होते ही ये घटनायें उनके लिये अस्तित्व विहीन हो जाती हैं. ऐसा लगता है कि दिन में कुछ घटा ही नहीं था. अधिकतर लोग ऐसे नहीं हैं. वे दूसरों के दु:ख में दुखी होते हैं एवं यह दु:ख उनके मन में काफी समय तक रहता है. वे इसके लिये बहुत कुछ करने की कोशिश भी करते हैं. हां एक छोटा सा समूह है जो इन बातों से बहुत अधिक दुखी होता है एवं समझ नहीं पाता कि यह सब क्या है. यह काव्य उनके हृदय की वेदना से भरा चीत्कार है.
एक छोटा समूह ऐसा भी है जो सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रेमरूप को देखता है एवं समझ नहीं पाता कि वे संसार में इस तरह की विपदाओं को क्यों होने देते हैं. यह प्रश्न कवि के मन से एक टूटे बांध के जल के समान इस कविता में बहता है. वह जवाब देने की कोशिश नहीं करता. उसकी जरूरत भी नहीं है. पहले हम प्रश्न की गंभीरता एवं गहराई को समझे तो लें. प्रस्तुत है: त्रासदी का समर है…ऐ “परमात्मा” !!!
सुंदर जगत ये सुंदर आवरण
अद्भुत प्रकृति पर दिवस का आगमन
किस ओर नहीं …हर ओर मौज है
चातुर्दिक प्रेम दिव्य संगीत की लय है…
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विपदा का एक ऐसा मंजर भी आता है
तराशी हुई दुनियाँ में भी एक ज्वाला फूट पड़ती है
नभ धू-धू करता हुआ उपवन हीं सारा जलता है,
सुंदर मानव मूर्ति इतिहास बनता जाता है…
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देख समर! गरज रहा था सागर जब
वो नभमंडल भी बरसा था
रक्त में सनी थी मेदनी
शिलाएँ छिंटों से आवृत हुईं
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शंकर तेरी आपदाओं में क्या
विपदा की अग्नि भड़केगी
मृत्यु की आगोश में क्या
तेरी यह दुनियाँ तड़पेगी
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नितांत प्यासे से लाचारों का
भूखों का और आशाओं का
फटती हुईं अबलाओं की छाती
विलखते क्रंदित उनके बच्चों की आकृति
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थकी विपन्न बूढ़ी झर-झर आँखें
झुर्रियों पर भी तनी हैं भौंएँ
समता पर विषमताओं की लहरें
भीषणता पर प्रतिकार करती दिशाऍ
रक्तों को उद्वेलित करती लीलाएँ
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उजड़ गया यह उपवन सोना
मात्र पत्थरों पर टूटी पड़ी
हुई सांसों की अस्थियाँ हैं…….
किसकी भावनाओं में स्थित
डूबी नजरे…….बह गईं… छोड़कर
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ऐसे, हर जन्मों का न्याय विखड़ता है
हर साल लाखों घर लूटता है।
तेरी चरणों में श्रृंगार यह आभूषण कैसा
अपने ही पुत्र- पुत्रियों का यह मातम कैसा
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कैसे नहीं तू तड़पता है, कैसे नहीं तू रोता है
ऐसी विनाश लीलाओं के दर्द में
कैसे नहीं तू विफड़ता है……
तीसरी आँख का यह कैसा ढंड विधान है
जो बरसते हैं तेरी अंशों पर हीं,
गिर पड़ते हैं तेरी भावनाओं की
मर्म हथेलियों पर हीं…….
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आकर देख …जरा इस सृष्टि को
और इस सुंदर मानव को,
तू भी तो एक पापी हुआ न
हजारों नयनों में आँसू भर कर
तू भी तो शापित हीं हुआ न
अब तू भी चैन कहाँ पाएगा,
शंकर क्या तू इनके दुःखों को सह पाएगा
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ये नर और नारी ……
गरिमा प्रदत्त तेरी हीं… आँखें हैं
सुंदर-सुंदर रचनाओं की यह
सर्वोत्तम प्रतीकात्मक आहें हैं
फिर, क्यों अपनी हीं तस्वीर को फाड़ना चाहते हो
अपनी हीं अंगों को बारंबार काटना चाहते हो
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छोड़ दिया है… उस रण में
जिसमें लड़ना भी है और अंततः
तुम्हारे रथ- चक्कों के बीच में
दबकर मर जाना भी है…
जीतना हीं सिर्फ तुझे है और
हारना ही हम सबका धर्म है
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गंगा की धाराओं में तैरती लाशें बनकर
गिद्ध- कौवों का आहार बनकर या
समाचार पत्रों में शब्दों की सुंदर शैलियॉ बनकर
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बिखर गया हूँ आज इन हरी वादियों में
उस ऊँची मीनार पर और
रुठती – तपती शिलाखंड पर
छूट गया अब तेरी मर्यादा का सम्मान
रुठ गया अब तेरी करुणा का गान
बस अब तेरी पूजा हीं बची है…
श्रद्धा का मोल तो बीक चुका
भक्ति का संग तो छूट चुका।
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“अब कैसे हो तेरी अराधना
अब कैसे हो तेरी भंगिमा
बता ऐ भगवान तू हीं
अब कैसे हो तेरी प्रार्थना…।”
[मुक्त प्रकाशनाधिकार: Divine India]
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July 5th, 2007 at 12:14 am
His peoms are always meaningful and in sync with today
but he writes very less and may that is why his poem have more force
may saraswati favour his pen always
July 7th, 2007 at 12:25 pm
शास्त्री जी,
आपके प्रयास का मैं कायल हूँ साथ ही मेरी रचना को आपने स्थान दिया वह मेरे लिए गौरव की बात है…क्या कहूँ आपने उपर में अच्छी समीक्षा की…।
रचना जी,
आपका शुक्रिया…तहे दिल से…।