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	<title>Comments on: स्तरीय हिन्दी पुस्तकें कुबेर ही पढ सकता है</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: vivek</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4674</link>
		<dc:creator>vivek</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 27 Nov 2008 07:46:04 +0000</pubDate>
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		<description>जो खर्च कर सकते हैं वह भी नहीं पढ़ते</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जो खर्च कर सकते हैं वह भी नहीं पढ़ते</p>
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	<item>
		<title>By: mahaveer B. semlani</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4664</link>
		<dc:creator>mahaveer B. semlani</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 26 Nov 2008 14:34:43 +0000</pubDate>
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		<description>मै हिन्दी हु॑॥॥॥
भारत माता कि बिन्दी हु॑।

शास्त्रीजी,यह मत पुछो कि,     
हाल मेरा कैसा है।

अपनो के बीच ही,
पराये जैसा है।

मिया मिट्टू भला,
कोई अपने मु॑ह बनता है।

अपनी दही को कोई,
खट्टी नही कहता है।

अपना सा मु॑ह लेकर,
रह रही हु।

बीती अपनी 
खुद कह रह हु।

मुझे मलाल बडा भारी है।
मेरा शोषण बददस्तुर जारी है।

कहने को मै हु किमत मे भारी 
शास्त्रीजी को लगती हु बडी प्यारी

फटी हुई चिन्दी हु।
हॉ!!! मै हिन्दी हु।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मै हिन्दी हु॑॥॥॥<br />
भारत माता कि बिन्दी हु॑।</p>
<p>शास्त्रीजी,यह मत पुछो कि,<br />
हाल मेरा कैसा है।</p>
<p>अपनो के बीच ही,<br />
पराये जैसा है।</p>
<p>मिया मिट्टू भला,<br />
कोई अपने मु॑ह बनता है।</p>
<p>अपनी दही को कोई,<br />
खट्टी नही कहता है।</p>
<p>अपना सा मु॑ह लेकर,<br />
रह रही हु।</p>
<p>बीती अपनी<br />
खुद कह रह हु।</p>
<p>मुझे मलाल बडा भारी है।<br />
मेरा शोषण बददस्तुर जारी है।</p>
<p>कहने को मै हु किमत मे भारी<br />
शास्त्रीजी को लगती हु बडी प्यारी</p>
<p>फटी हुई चिन्दी हु।<br />
हॉ!!! मै हिन्दी हु।</p>
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	<item>
		<title>By: सिद्धार्थ शंकरत्रिपाठी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4643</link>
		<dc:creator>सिद्धार्थ शंकरत्रिपाठी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 18:45:09 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/334#comment-4643</guid>
		<description>आदरणीय शास्त्री जी, 
पुस्तक प्रकाशन कैसे होता है ये तो मुझे मालूम ही नहीं है। इधर कुछ दिनों से सत्यार्थमित्र की कुछ चुनिन्दा रचनाओं का संकलन पुस्तक रूप में प्रकाशित कराने का विचार बन रहा है। क्या यह सम्भव है? सफलता की क्या सम्भावना है? कृपया मार्गदर्शन दें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आदरणीय शास्त्री जी,<br />
पुस्तक प्रकाशन कैसे होता है ये तो मुझे मालूम ही नहीं है। इधर कुछ दिनों से सत्यार्थमित्र की कुछ चुनिन्दा रचनाओं का संकलन पुस्तक रूप में प्रकाशित कराने का विचार बन रहा है। क्या यह सम्भव है? सफलता की क्या सम्भावना है? कृपया मार्गदर्शन दें।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: G Vishwanath</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4642</link>
		<dc:creator>G Vishwanath</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 17:15:44 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/334#comment-4642</guid>
		<description>किसान मेहनत करता है पर लाभ थोक व्यापारी को होता है।
लेखक मेहनत करता है पर लाभ प्रकाशक को होता है।

किसान के पास कोई विकल्प नहीं है।
पर आज के युग में लेखकों के लिए विकल्प है।

रवि रतलामीजी के किसी ब्लॉग पर पढ़ा था इसके बारे में।
मोबाइल फ़ोन की तरह यदि मार्केट में एक सस्ता E book reader उपलध होता है तो लेखक अपनी किताबों की एक प्रति pdf format में इच्छुक पाठकों को उपलब्ध करा सकता है। कीमत बहुत ही कम होगा. चार - पाँच सौ की पुस्तक केवल पचास रुप्ये में उपलध करा सकते हैं। कुछ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि लेखक अपने फ़ाइल का अन्धाधुंध नकल और वितरण रोक सकेगा। शायद कोई encoding system या पासवर्ड के जरिए यह हो सकता है।
केवल एक e book reader खरीदने से पाठक हमेंशा के लिए हज़ारों किताबें पढ़ सकेगा। e book reader का डिसाइण ऐसा होना चाहिए के वह आकार और वजन में एक सामान्य किताब से ज्यादा न हो. bookmarking की सुविधा और font size  बढ़ाने की सुविधा भी होनी चाहिए।

यह प्रणाली हर स्थिति में पुस्तक मुद्रण का विकल्प नहीं। केवल एक अतिरिक्त सुविधा हो सकती है।
क्या यह साध्य / संभाव्य है?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>किसान मेहनत करता है पर लाभ थोक व्यापारी को होता है।<br />
लेखक मेहनत करता है पर लाभ प्रकाशक को होता है।</p>
<p>किसान के पास कोई विकल्प नहीं है।<br />
पर आज के युग में लेखकों के लिए विकल्प है।</p>
<p>रवि रतलामीजी के किसी ब्लॉग पर पढ़ा था इसके बारे में।<br />
मोबाइल फ़ोन की तरह यदि मार्केट में एक सस्ता E book reader उपलध होता है तो लेखक अपनी किताबों की एक प्रति pdf format में इच्छुक पाठकों को उपलब्ध करा सकता है। कीमत बहुत ही कम होगा. चार &#8211; पाँच सौ की पुस्तक केवल पचास रुप्ये में उपलध करा सकते हैं। कुछ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि लेखक अपने फ़ाइल का अन्धाधुंध नकल और वितरण रोक सकेगा। शायद कोई encoding system या पासवर्ड के जरिए यह हो सकता है।<br />
केवल एक e book reader खरीदने से पाठक हमेंशा के लिए हज़ारों किताबें पढ़ सकेगा। e book reader का डिसाइण ऐसा होना चाहिए के वह आकार और वजन में एक सामान्य किताब से ज्यादा न हो. bookmarking की सुविधा और font size  बढ़ाने की सुविधा भी होनी चाहिए।</p>
<p>यह प्रणाली हर स्थिति में पुस्तक मुद्रण का विकल्प नहीं। केवल एक अतिरिक्त सुविधा हो सकती है।<br />
क्या यह साध्य / संभाव्य है?</p>
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	<item>
		<title>By: ताऊ रामपुरिया</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4641</link>
		<dc:creator>ताऊ रामपुरिया</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 15:12:39 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/334#comment-4641</guid>
		<description>आपने बिल्कुल सही कहा की प्रकाशक सिर्फ़ अपना घर भरता है ! लेखक पहले भी बेचारा था आज भी बेचारा है ! हिन्दी की किताबो की कीमत जितनी तेजी से बढी है उतनी तेजी से तो दूसरा कुछ भी नही बढ़ा ! मेरी एक आदत रही शुरू से की मांगकर या पुस्तकालय से लाकर किताब नही पढी ! उस समय में काफी सस्ती हुआ करती थी हिन्दी की किताबे ! उनमे से कुछ किताबे माँगने वालो ने गायब करदी ! अब जब कभी जरुरत महसूस होती है तो वही किताबे अब ३०० या ३५० रु.की हो गई हैं ! जो पहले २५ से ३५ रु की थी ! आज जब कभी पुस्तक प्रदर्शनी में जाते हैं तो पेमेंट हजारो में करने की तैयारी करके जाना पङता है ! अब आदत है तो खरीदने में तो आयेगी ही ! आपकी सोच बहुत प्रेरक है ! धन्यवाद !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपने बिल्कुल सही कहा की प्रकाशक सिर्फ़ अपना घर भरता है ! लेखक पहले भी बेचारा था आज भी बेचारा है ! हिन्दी की किताबो की कीमत जितनी तेजी से बढी है उतनी तेजी से तो दूसरा कुछ भी नही बढ़ा ! मेरी एक आदत रही शुरू से की मांगकर या पुस्तकालय से लाकर किताब नही पढी ! उस समय में काफी सस्ती हुआ करती थी हिन्दी की किताबे ! उनमे से कुछ किताबे माँगने वालो ने गायब करदी ! अब जब कभी जरुरत महसूस होती है तो वही किताबे अब ३०० या ३५० रु.की हो गई हैं ! जो पहले २५ से ३५ रु की थी ! आज जब कभी पुस्तक प्रदर्शनी में जाते हैं तो पेमेंट हजारो में करने की तैयारी करके जाना पङता है ! अब आदत है तो खरीदने में तो आयेगी ही ! आपकी सोच बहुत प्रेरक है ! धन्यवाद !</p>
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	<item>
		<title>By: प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4640</link>
		<dc:creator>प्रवीण त्रिवेदी-प्राइमरी का मास्टर</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 12:19:03 +0000</pubDate>
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		<description>सहीं कहा आपने!!!!!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सहीं कहा आपने!!!!!!</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: नरेश सिंह</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4639</link>
		<dc:creator>नरेश सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 11:19:13 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/334#comment-4639</guid>
		<description>G Vishwanath की बातों से मै सहमत हूं आज की युवा पिढी को पुस्तको से लगाव ही नही है । पहले मै भी गाव के पुस्तकालय को पुस्तके दान करता था । वहा हमेशा ४०-५० पाठक रहते थे, लेकिन अब वहा एक या दो ही पाठक नजर आते है
। आपका प्रयास अच्छा है</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>G Vishwanath की बातों से मै सहमत हूं आज की युवा पिढी को पुस्तको से लगाव ही नही है । पहले मै भी गाव के पुस्तकालय को पुस्तके दान करता था । वहा हमेशा ४०-५० पाठक रहते थे, लेकिन अब वहा एक या दो ही पाठक नजर आते है<br />
। आपका प्रयास अच्छा है</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: G Vishwanath</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4638</link>
		<dc:creator>G Vishwanath</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 10:42:10 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/334#comment-4638</guid>
		<description>मुझे पुस्तक की दामों की उतनी चिंता नहीं जितनी इस बात से है कि आजकल की युवा पीढी किताबें पढ़ती ही नहीं।

मॉल में समय काटना, टीवी, विडियो, सिनेमा, ऑर्कुट/फ़ेसबुक, चैट, मोबाइल फ़ोन पर बातचीत,  इत्यादि से इन लोगों को पुस्तक पढ़ने की फ़ुर्सत कहाँ? आज Instant knowledge उपलब्ध है। बस एक मन्त्र &quot;Google&quot; से दुनिया का समस्त ज्ञान अपनी मुठ्ठी में !

परीक्षा पास करने के लिए इन पुस्तकों की &quot;nuisance&quot; को सहन करते हैं लेकिन बाद में पुस्तकों की क्या आवश्यकता? हमारे जमाने में कॉलेज की लड़कियाँ पुस्तकों को अपनी छाती से दबाए रखकर चलती थीं।
कितना प्रिय हुआ होगा उनको यह पुस्तकें! आजकल मोबाइल फ़ोन अपने कानों से चिपके रखते हैं। कितना मधुर लगता होगा मोबाइल फ़ोन से निकलती आवाज़ें!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मुझे पुस्तक की दामों की उतनी चिंता नहीं जितनी इस बात से है कि आजकल की युवा पीढी किताबें पढ़ती ही नहीं।</p>
<p>मॉल में समय काटना, टीवी, विडियो, सिनेमा, ऑर्कुट/फ़ेसबुक, चैट, मोबाइल फ़ोन पर बातचीत,  इत्यादि से इन लोगों को पुस्तक पढ़ने की फ़ुर्सत कहाँ? आज Instant knowledge उपलब्ध है। बस एक मन्त्र &#8220;Google&#8221; से दुनिया का समस्त ज्ञान अपनी मुठ्ठी में !</p>
<p>परीक्षा पास करने के लिए इन पुस्तकों की &#8220;nuisance&#8221; को सहन करते हैं लेकिन बाद में पुस्तकों की क्या आवश्यकता? हमारे जमाने में कॉलेज की लड़कियाँ पुस्तकों को अपनी छाती से दबाए रखकर चलती थीं।<br />
कितना प्रिय हुआ होगा उनको यह पुस्तकें! आजकल मोबाइल फ़ोन अपने कानों से चिपके रखते हैं। कितना मधुर लगता होगा मोबाइल फ़ोन से निकलती आवाज़ें!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: gautam rajrishi</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4637</link>
		<dc:creator>gautam rajrishi</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 10:16:25 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत सही बात छेड़ी है आपने.मैं खुद किताबें {हिन्दी  } खरिदने का शौकिन हूँ और और समझता हूँ इस दर्द को...

..हाँ मगर आप जो ये नेक कृत्य कर रहे हैं,हिंदी सदैव इसके लिये ऋणी रहेगी आपकी...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत सही बात छेड़ी है आपने.मैं खुद किताबें {हिन्दी  } खरिदने का शौकिन हूँ और और समझता हूँ इस दर्द को&#8230;</p>
<p>..हाँ मगर आप जो ये नेक कृत्य कर रहे हैं,हिंदी सदैव इसके लिये ऋणी रहेगी आपकी&#8230;</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: E-Guru Rajeev</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4636</link>
		<dc:creator>E-Guru Rajeev</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 08:46:06 +0000</pubDate>
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		<description>मैं तो सही से रख-रखाव ही नहीं कर पाता हूँ. एक नई रैक ही अब खरीदने वाला हूँ.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं तो सही से रख-रखाव ही नहीं कर पाता हूँ. एक नई रैक ही अब खरीदने वाला हूँ.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: ज्ञानदत्त पाण्डेय</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4635</link>
		<dc:creator>ज्ञानदत्त पाण्डेय</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 06:48:00 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/334#comment-4635</guid>
		<description>अभी तो पढ़ने के लिये इतना बैकलाग घर पर पड़ा है कि पुस्तक खरीदने का मन नहीं होता। पर मन न होते होते भी ४००-५०० रुपये महीने में निकल ही जाते हैं!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अभी तो पढ़ने के लिये इतना बैकलाग घर पर पड़ा है कि पुस्तक खरीदने का मन नहीं होता। पर मन न होते होते भी ४००-५०० रुपये महीने में निकल ही जाते हैं!</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: महामंत्री-तस्लीम</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4634</link>
		<dc:creator>महामंत्री-तस्लीम</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 05:59:56 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/334#comment-4634</guid>
		<description>सहीं कहा आपने। हिन्दी की किताबें अपनी लागत से दुगने से भी अधिक दाम पर बेची जाती हैं। प्रकाशक फुटकर बिक्री में रूचि नहीं रखते, वे सरकारी खरीद में किताबें खपा कर खुश हो लेते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सहीं कहा आपने। हिन्दी की किताबें अपनी लागत से दुगने से भी अधिक दाम पर बेची जाती हैं। प्रकाशक फुटकर बिक्री में रूचि नहीं रखते, वे सरकारी खरीद में किताबें खपा कर खुश हो लेते हैं।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: anupam agrawal</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4633</link>
		<dc:creator>anupam agrawal</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 05:02:48 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/334#comment-4633</guid>
		<description>आदरणीय शास्त्री जी 
मुझे आपकी सोच ने बहुत प्रभावित किया है .
पाठकों का बहुत भला होगा.शायद अभी भी कुछ साईट्स हैं जो मुफ्त ई -- बुक्स उपलब्ध करती हैं .अगर ऐसा है तो ,हो सके तो उनका पता ब्लॉग पर उपलब्ध करा दीजिये.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आदरणीय शास्त्री जी<br />
मुझे आपकी सोच ने बहुत प्रभावित किया है .<br />
पाठकों का बहुत भला होगा.शायद अभी भी कुछ साईट्स हैं जो मुफ्त ई &#8212; बुक्स उपलब्ध करती हैं .अगर ऐसा है तो ,हो सके तो उनका पता ब्लॉग पर उपलब्ध करा दीजिये.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: हिमांशु</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-4632</link>
		<dc:creator>हिमांशु</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 25 Nov 2008 01:50:36 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/334#comment-4632</guid>
		<description>मैंने अपनी इस छोटी-सी जिंदगी में  ऐसा चिंतन नहीं पाया है - 
&quot;ईश्वर ने मदद की तो बहुत जल्दी ही ये ईपुस्तकें हिन्दी में उपलब्ध हो जायेंगी. मुक्त कॉपीराईट होगा एवं पूर्ण रूप से नि:शुल्क होंगी. बेची नहीं जायेंगी, नहीं तो सिर्फ कुबेर ही उनको पढ पायगा. हिन्दी में स्तरीय पुस्तकों की कीमत देख कर मैं ने कई बार आंसू बहाये हैं, लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरे पाठकों को यह करना पडे&quot;
ऐसे ही किसी काम पर कहना पडा हो शायद (किसी विशेष दृष्टि से नहीं,  इस कार्य के प्रति समर्पण से उद्धृत कर रहा हूँ )-
&quot;तलाशो-जुस्तजू की सरहदें अब खत्म होती हैं 
खुदा मुझको नजर आने लगा इंसाने-कामिल में .&quot;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैंने अपनी इस छोटी-सी जिंदगी में  ऐसा चिंतन नहीं पाया है &#8211;<br />
&#8220;ईश्वर ने मदद की तो बहुत जल्दी ही ये ईपुस्तकें हिन्दी में उपलब्ध हो जायेंगी. मुक्त कॉपीराईट होगा एवं पूर्ण रूप से नि:शुल्क होंगी. बेची नहीं जायेंगी, नहीं तो सिर्फ कुबेर ही उनको पढ पायगा. हिन्दी में स्तरीय पुस्तकों की कीमत देख कर मैं ने कई बार आंसू बहाये हैं, लेकिन मैं नहीं चाहता कि मेरे पाठकों को यह करना पडे&#8221;<br />
ऐसे ही किसी काम पर कहना पडा हो शायद (किसी विशेष दृष्टि से नहीं,  इस कार्य के प्रति समर्पण से उद्धृत कर रहा हूँ )-<br />
&#8220;तलाशो-जुस्तजू की सरहदें अब खत्म होती हैं<br />
खुदा मुझको नजर आने लगा इंसाने-कामिल में .&#8221;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Shastriji</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/334/comment-page-1#comment-503</link>
		<dc:creator>Shastriji</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 08 Jul 2007 09:00:22 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/334#comment-503</guid>
		<description>@मसिजीवी

&quot;आपकी ब्‍लॉगिंग वाली ई-पुस्‍तकों का इस्‍तेमाल इस सत्र में हम खुलकर करने वाले हैं- सीडी बना रहे हैं- कार्यशालाओं में वितरण करेंगे- नाम आपका ही है- पैसे न विद्यार्थियों से लेंगे न आपको देंगे&quot;

अरे क्या गजब कर रहे हैं. हम तो लुट जायेंगे!! लेकिन कोई बात नहीं. हिन्दी के प्रचार के लिये यह तो एक छोटा सा योगदान है. 

आप कहें तो किसी विषय पर पूरी ईबुक आपके लिये लिख देंगे. फायदा बहुतों को होगा क्योंकि हम भी बांटेंगे.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>@मसिजीवी</p>
<p>&#8220;आपकी ब्‍लॉगिंग वाली ई-पुस्‍तकों का इस्‍तेमाल इस सत्र में हम खुलकर करने वाले हैं- सीडी बना रहे हैं- कार्यशालाओं में वितरण करेंगे- नाम आपका ही है- पैसे न विद्यार्थियों से लेंगे न आपको देंगे&#8221;</p>
<p>अरे क्या गजब कर रहे हैं. हम तो लुट जायेंगे!! लेकिन कोई बात नहीं. हिन्दी के प्रचार के लिये यह तो एक छोटा सा योगदान है. </p>
<p>आप कहें तो किसी विषय पर पूरी ईबुक आपके लिये लिख देंगे. फायदा बहुतों को होगा क्योंकि हम भी बांटेंगे.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
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