हिन्दी के चरणदास हैं,
श्रीमान समाजमित्र.
कॉन्वेन्ट पढी बीबी को है घिन,
हर चीज, हिन्दुस्तानी से.
नयनतारा देवी है नाम,
पर हरेक को बताती है नाम,
नयन टारा डेवी.
कुत्तर, नौकर, समाजमित्र को वे,
आज्ञा दे सिर्फ अंग्रेजी में.
मेम साहब को घर छोड,
श्रीमान समाजमित्र करते थे हिन्दी की,
दिल से सेवा.
आज था हिन्दी सेवा समाज में उनका,
अध्यक्षीय भाषण!
हतभाग्य! हो गया गजब!!
उनके मूह से आज फूटें सिर्फ
शब्द अंग्रेजी के, चाहे कितनी कोशिश कर लें.
पांच मिनिट का भाषण
वे रोक पाये सिर्फ पच्चीस मिनिट में.
जनता भी हैरान, समाजमित्र भी हैरान.
अंत में दांतों का सेट बाहर निकाल,
बोले चरणदास,
दयनीय सुर में:
"क्षमा करना दोस्तों,
गलती से आज
मेम साहब के दांतों का सैट
लगा कर आ गया था" !!
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इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




July 15th, 2007 at 7:34 am
हा हा, इंटरैस्टिंग वैरी गुड। (अरे मेरे दांत तो नहीं बदले गए?)
July 15th, 2007 at 8:29 am
बहुत बढ़िया, शास्त्री जी। उत्तम व्यंग्य है।
September 5th, 2007 at 12:15 pm
पता नही इस बात का सम्बन्ध यहा है के नही पर यह सच है फिल्म और विग्यापन की दुनिया मे. हिन्दी की खाते है अन्ग्रेजी की बजाते है
November 23rd, 2008 at 9:33 am
करारा जवाब है हरी से हैरी होने वालो को।सटीक व्यगं है अंग्रेजी की राजभाषा हिंदी पर बढती सत्ता पर्।
November 23rd, 2008 at 9:42 am
आज यह नया रंग दिखा आप के चिट्ठे पर।
November 23rd, 2008 at 9:54 am
हा हा हा , इस श्रेणी की मैंने आप की सभी कवितायें पढीं हैं. सबसे अच्छी थी शुन्नी वाय वाली
.
November 23rd, 2008 at 9:58 am
जोरदार कटाक्ष ! मजा आ गया !
November 23rd, 2008 at 10:14 am
बहुत बढिया।
November 23rd, 2008 at 10:31 am
अरे सर जी, ये तो आपने ‘गुगली’ मार दी। आपका यह फन तो हमें मालूम ही नहीं था। मजा आ गया। अधकचरे अंग्रेजी-दाँ ऐसा ही “ब्लण्डर-मिस्टेक” करते हैं।
November 23rd, 2008 at 10:48 am
मजो आग्यौ भाई जी..
अरे ये क्या हो रहा है हिन्दी की जगह मारवाड़ी…दाँत चैक कर लूं, कहीं श्रीमती की बत्तीसी का सैट तो नहीं लग गया।
एक बार फिर मजेदार कविता।
November 23rd, 2008 at 11:30 am
“हास्य का रचनात्मक ढंग है
कितना प्रासंगिक व्यंग है ?”
बहुत कुछ सीख रहा हूँ आपसे. धन्यवाद.
November 23rd, 2008 at 12:09 pm
बहुत बढिया व्यंग ! आनंद आया पढ़ कर ! बहुत शुभकामनाएं !
November 23rd, 2008 at 12:16 pm
हिन्दी वाले दांत बहुत कटखने होते हैं!
November 23rd, 2008 at 1:09 pm
हो! हो!! हो!!!
खूब कही भई खूब कही…
November 23rd, 2008 at 3:45 pm
शास्त्री जी। उत्तम व्यंग्य है।
November 23rd, 2008 at 3:45 pm
“क्षमा करना दोस्तों,
गलती से आज
मेम साहब के दांतों का सैट
लगा कर आ गया था” !!
November 23rd, 2008 at 7:04 pm
भाषा पर उत्तम व्यंग्य है।आनंद आया पढ़ कर आप के चिट्ठे पर इन्द्रधनुषी रंग देखने को मिल रहे है ।
November 23rd, 2008 at 7:20 pm
बहुत खूब। करारा व्यंग्य है।
November 23rd, 2008 at 8:53 pm
अरे! आप यह BPO और Call center व्यवसाय के बारे सुना नहीं?
अम्रीकी लहजे में बोलने का प्रशिक्षन दिया जाता है और उन लोगों की सेवा करने में लोगों को अपना नाम तक बदलना पढ़ता है।
यह लीजिए, कुछ नमूने पेश हैं जिनके बारे में मैं सुन चुका हूँ।
मज़े लीजिए।
चक्रवर्ति — Chuck
हरि/हरीश – Harry
स्वामी / समीर – Sammy
विश्वनाथ- Vish
मणि – Money
कृष्णा – Chris
जनन्नाथ Jug/Jack
विजय – Veejay
विक्रम – Vicky
लक्ष्मण – Lucky
रिछपाल – Ricky
निखिल – Nick
रंधावा – Randy
नटराजन – Nat
भोलाराम- Rambo
अभिषेक – Abby
तिम्मय्या – Timmy
भरत- Brett
सुनील/संजय – Sunny
पाल – Paul
सरस्वति – Sara
रेवति – Reva/ Rave
संदीप – Sandy
अन्नपूर्णा – Annie
रोजा – Rose
ज्ञान अखिलेशन – Gleeson
साइरा – Sarah
प्रियंका – Pinky
कात्यायिनी – Katie
जाह्नवी – Janet
समय की कमी है और कुछ जलदी में हूँ नहीं तो और भी नाम दे सकता हूँ।
November 23rd, 2008 at 10:13 pm
और यह रहा मेरा favourite, (कैसे भूल गया इसे?)
जयकिशन – Jackson