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हिन्दी ब्लागिंग-मार्गदर्शन 1_5
January 12, 2007 |
शास्त्री जे सी फिलिप
हिन्दी मे हर तरह का चिट्ठा लिखने के लिये बहुत लोग तय्यार है, उनके पास लिखने के लिये समय है, और पाठकों को देने के लिये उनके पास बहुत सामग्री है. इतना ही नहीं, उन मे से बहुतों के पास विविध तरह की सामग्री है जिसे वे काफी सृजनात्मक तरीके से प्रस्तुत करना भी जानते हैं. लेकिन सबसे बडी समस्या यह है कि यह कैसे करेंगे. इंटरनेट एवं संगणक का विकास अंग्रेजी के ऊपर आधारित है, और भारतीय भाषाओं (या गैर-आंग्ल भाषाओं) के लिये पर्याप्त साफ्टवेयर उपलब्ध नहीं है.जो उपलब्ध है उनमे आपसे में किसी तरह का सामंजस्य नहीं है. फलस्वरूप किसी एक फान्ट मे लेख लिखा जाए तो इस बात की गारंटी नहीं है कि दूसरे लोग उसे पढ सकेंगे.
अंग्रेजी मे किसी एक फान्ट मे लेख लिखा जाये, और पढने वाले की मशीन पर वह फान्ट न हो तो उसके बदले कोई और फान्ट आ जाता है और पढने मे रुकावट नहीं आती है. लेकिन हिन्दी के फान्टों मे इस तरह का तालमेल नहीं है. इस कारण एक के बदले दूसरा फान्ट ले लिया जाये तो पाठ्य सामग्री एकदम अपठनीय चिन्हों मे बदल जाती है. इसका एक ही हल है: हिन्दी मे यूनिकोड फान्ट विकसित किये जायें. इनकी विशेषता है आपस मे पूर्ण सामंजस्य, और हर भाषा के फांन्टों मे एक सार्वलौकिक समंजस्य स्थापित करने के लिये ही यूनिकोड ढांचे का विकास किया गया है.
हिन्दी मे चिट्ठा लिखने वाले यदि हिन्दी के यूनिकोड फान्ट का प्रयोग करे तो फायदा यह होगा कि पढने वाले के मशीन पर यदि एक भी यूनिकोड फान्ट होगा तो वह उस लेख को पढ सकेगा. इस बात को मन मे रख कर अगले लेख को पढें.
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युनिकोड की जरूरत समझने के बाद अगला प्रश्न यह है कि चिट्ठा कहां पर स्थापित किया जाये. इसके लिये दो विकल्प हैं: मुफ्त लभ्य वेबसाईटों पर या अपने खुद के वेबसाईट पर. दोनों के अपने फायदे और नुक्सान हैं.
१. मुफ्त वेबसाईट: अकसर काफी बडी कंपनियां लोगों को समान्य वेबसाईट के लिये ब्लाग (चिट्ठा) के लिये जगह मुफ्त में प्रदान करते हैं.इसका फायदा यह है कि आपकी जेब से इस कार्य के लिय फूटी कौडी भी खर्च नहीं होती है. www.Blogger.Com इस का अच्छा उदाहरण है. हिन्दी अपनाने के मामले में भी यहां काफी सहूलियत है. आप प्रोग्रामिंग का क ख ग नहीं जानते तो भी कोई परेशानी न होगी क्योंकि मोटे तौर पर एक नए चिट्ठे की जो जरूरते हैं उन सब का ख्याल पहले से कर लिया गया है और आपको अधिक कुछ नहीं करना पडेगा.
नुक्सान यह है कि इन चिट्ठों पर आपका पूर्ण नियंत्रण नहीं रहता. यदि आप सामान्य से अधिक क्रियाशील व्यक्ति हैं तो कई बार इन सीमाओं के बारे में आप को बहुत कुण्ठा हो सकती है — खासकर यदि आप प्रोग्रमिंग में कुछ दखल रखते हैं तो.
२. अपने खुद की वेबसाईट: यदि आप १००० रुपया प्रति वर्ष खर्च कर सकते हैं तो आप अपने खुद के मालिकाना हक का वेबसाईट या चिट्ठा पंजीकृत कर सकते हैं. इसके कई फायदे हैं. पहला यह है कि आप अपनी पसंद का नाम चुन सकते हैं. दूसरा यह कि इस पर आपका पूर्ण नियंत्रण रहता है. तीसरा यह है कि आप आराम से अपने प्रोग्रामिंग का शौक पूरा कर सकते हैं, ठोकपीट कर सकते हैं.
नुक्सान यह है कि प्रोग्रामिंग और रखरखाव/साजसज्जा पर कुछ अधिक समय देना पडेगा.
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ब्लाग स्थापित करने के तकनीकी पहलुओं पर हम अन्य एक खण्ड में प्रकाश डालेंगे. फिलहाल यह मानकर चलते हैं कि आपका ब्लाग तय्यार है एवं आप लिखना प्रारम्भ करने जा रहे हैं. आपके सामक्ष सबसे बडी समस्या यह होगी कि हिन्दी मैं कैसे टंकित करें. डी टी पी के लिये हिन्दी में बहुत से व्यापारिक साफ्टवेयर औजार उप्लब्ध हैं, लेकिन वे जाल देखते ही हाथ उठा देते है. उनमें से अधिकतर यूनिकोड में काम करने के लिये नहीं बनाये गये हैं. बनाये भी गये हों तो पांच से छः हजार रुपल्ली खर्च करना औसत व्यक्ति के वश की बात नहीं है. कुछ व्यापारिक सोफ्टवेयरों का उपयोग चोरी से सम्भव है, लेकिन यह अनैतिक है और विधि के हाथ हमें इसकी कीमत कहीं न कहीं ब्याज के साथ चुकानी पडेगी.
सौभाग्य से, जाल के प्रति समर्पित कई उदारमनस्क सज्जनों एवं संस्थाओं ने इस कार्य के लिए यूनीकोड-सक्षम औजार बनाये हैं जिनको आप आसानी से प्राप्त कर सकते हैं. इनमें से दो हर तरह से श्रेष्ट है — बाराहा एवं केफे हिन्दी. इन में से बाराहा कर्नाटका में स्थित एक संस्था ने निर्मित किया है जबकि केफे हिन्दी जानेमाने चिट्ठाकार मैथिली गुप्त (एवं उनके सुपुत्र सिरिल गुप्त) ने निर्मित किया है. बाराहा काफी पुराना औजार है अत: उसमे जो समस्यायें थीं वे सुलझा ली गई हैं. केफे सिर्फ एक शिशु है, अत: उस में कई समस्यायें हैं. लेकिन कल केफे का होगा क्योंकि उसके रचयिता काफी तेजी से उसमे परिवर्तन एवं संशोधन कर रहे हैं एवं केफे काफी आधुनिक तकनीक से निर्मित किया जा रहा है. पिछले एक सप्ताह में यह औजार इतना संशोधित हो गया है कि मैं अपने विश्वस्त औजार बाराहा के बदले यह लेख केफे की मदद से लिख रहा हूं. अभी यह औजार बीटा अवस्था में है, जिसका मतलब है कि इसमें और भी परिवर्तन होंगे. ऐसा अनुमान है कि जून में इसका संशोधित संस्करण उपलब्ध हो जायगा.
बाराहा या केफे को अपने संगणक पर स्थापित करने के बाद इनको चालू करते ही आपका संगणक एक यूनिकोड-सक्षम हिन्दी टंकण यंत्र में बदल जाता है. अब आप अपने ब्लाग के “लेखन्-स्थान्” पहुंच कर हिन्दी में टंकण प्रारम्भ कर सकते हैं. इन औजारों को आपके संगणक पर स्थापित करने और उनके उपयोग के बारें में अधिक विस्तार से अगले लेखों में देखेंगे.
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जैसा मैंने अपने पिछले लेखन में कहा था, हिन्दी टंकण के लिये उपयुक्त औजार चुनना एक महत्वपूर्ण कार्य है. उपलब्ध सारे औजारों का परिचय एक अन्य लेख में देंगे. इस लेख में मेरे प्रिय औजार का परिचय देना चाहता हूं. इसे आप http://cafehindi.com/ से मुफ्त प्राप्त कर सकते हैं. यह औजार अभी बीटा अवस्था मै है, लेकिन जून 2007 तक इसके अधिकृत संस्करण के आ जाने की सम्भावना है. वैसे यह अधिकतर काम ठीक से कर रहा है और इसे अभी से प्राप्त करके सीखना अच्छा होगा.
केफे हिन्दी ध्वन्यात्मक कीबोर्ड का उपयोग (संक्षिप्त परिचय): केफे हिन्दी, हिन्दी का सबसे सशक्त लिपि-परिवर्तक औजार है जिसकी सहायता से आप हिन्दी में ब्लागिंग या चिट्ठा-लेखन कर सकते हैं. इसे लिपि-परिवर्तक इसलिये कहा जाता है कि इनकी सहायता से संगणकों के अंग्रेजी कीबोर्ड पर टंकण करके हिंदी लिपि प्राप्त करते हैं. इसका मुख्य लक्ष्य लिप्यांतरण होने के के कारण यह औजार एक शब्द-संसाधक (word processor) नहीं है, लेकिन इसकी सहायता से लिखे गये हाशिये को आप कुछ शब्द-संसाधकों में देख सकते हैं और संसाधन भी कर सकते हैं.
केफे के उपयोग के लिए पहले इसे चालू कर लीजिये. तुरंत ही यह संगंणक की कार्य-पटटी पर “क” अक्षर के साथ एक चिन्ह स्थापित कर देता है. इस चिन्ह पर क्लिक करके इस औजार को सक्रिय या निष्क्रिय किया जा सकता है. यह एक बहुत बडी सुविधा है क्योंकि इसकी सहायता से आप किसी भी लेखन मे अंग्रेजी एवं हिन्दी का समावेश कर सकते हैं. इतना ही नहीं, बार बार इस औजार को चालू/बंद करने में समय बर्बाद नहीं होता है.
अपने चिट्ठे के सम्पादन-स्थान में पहुच कर इस औजार को सक्रिय कर दीजिये. फिर केफे के चिन्ह पर राइट-क्लिक करके प्राप्त सूची से अपनी पसन्द का कीबोर्ड चुन लीजिये. अब टंकण चालू कर दीजिये एव आपका चिट्ठा तय्यार है.
केफे हिन्दी में कुल चार कीबोर्ड उपलब्ध हैं: इनस्क्रिप्ट, रेमिंगटन, सुषा, एवं ध्वन्यात्मक (फोनेटिक). ध्वन्यात्मक कीबोर्ड उन लोगों के लिये बहुत उपयोगी है जिन्होंने कभी भी हिन्दी टंकण यंत्र का उपयोग नहीं किया है, लेकिन जो अंग्रेजी टंकण जानते हैं. इस पर यदि वे हिन्दी शब्द के उच्चरण को अंग्रेजी में लिखें तो यह उसका लिप्यांतरण हिन्दी मे कर देता है. उदाहरण के लिये
hindi = हिन्दी
mera bhaarat mahaan = मेरा भारत महान
शीघ्र ही इसके कीबोर्ड के बारें में विस्तृत जानकारी लभ्य हो जायगी और आप इस पर हर तरह का टंकण कर सकेंगे.
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पिछले लेख में मैंने जाल पर हिन्दी-लेखन के लिये उपलब्ध सबसे आधुनिक औजार “हिन्दी केफे” का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया था. केफे के जालस्थल से उस औजार को अपने संगणक पर उतार कर उसका उपयोग प्रारंभ कर दीजिये. जब तक उसका परिवर्धित संस्करण आ जायगा तब तक उसके उपयोग के लिये आपकी तय्यारी पूरी रहेगी.
हिन्दी मे लिखना शुरू करते ही एक बडा प्रश्न हर लेखक को परेशान करता है: यूनिकोड के प्रयोग की कितनी भी कोशिश क्यों न करें, कुछ अक्षर जरूर खण्डित हो जाते हैं. यहां तक कि जाने-माने एवं अनुभवी चिट्ठाकरों के चिट्ठों पर भी उनके चिट्ठे के या लेखों के शीर्षक यदा कदा खण्डित ही दिखते हैं. मात्रायें गडबड नजर आती हैं. यह किसी भी तरह से एक सुखद अनुभव नही कहा जा सकता, एवं हर चिट्ठाकर को इसका कारण एवं हल मालूम होना चाहिये.
यूनिकोड: अंतर्जाल पर किसी भी हिन्दी फांट में लिखा जा सकता है, और पढनेवाला उसे पढ लेगा बशर्ते उसके संगणक पर वह फांट मौजूद हो, और यदि उसने अपने संगणक में हिन्दी अक्षर प्रदर्शित करने की सुविधा स्थापित कर रखी हो. यह आसान काम नही है. फांट को किसी जालस्थल से अपने संगणक पर उतार कर स्थापित करना कठिन नहीं है, पर हर व्यक्ति के लिये एक समान आसान भी नही है. इसी कारण यूनिकोड फांट के उपयोग को महत्व दिया जाता है क्योंकि उस भाषा का का कोई भी फाट पाठक के संगणक पर हो तो वह बिना किसी तय्यारी के उसे पढ सकेगा. लेकिन यह भी व्यावहारिक तल पर उतना आसान नही है.
संगणक द्वार एक यूनिकोड फांट के बदले दूसरे का अपने-आप उपयोग सिद्धांत स्तर तक तो ठीक है, लेकिन व्यावहारिक तल पर अभी भी पूरी तरह नहीं उतर पाया है. अंग्रेजी-भाषियों द्वारा अंग्रेजी में उपयोग करने के लिये विकसित संगणक उतनी आसानी से गैर-अंग्रेजी भाषाओं के प्रति अपने आप को समर्पित नहीं करता है. इस कारण अभी भी हिन्दी के भिन्न यूनिकोड फांटों में पूर्ण सामंजस्य नही है. अत: यदि कोई चिट्ठाकर “मंगल” के अलावा किसी भी हिन्दी यूनिकोड फांट का प्रयोग अपने चिट्ठे पर करेगा तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वह सब संगणकों पर अखण्डित दिखेगा. सिर्फ एक “मंगल” ही है जिसे संगणक पूर्ण रूप से स्वीकार एवं प्रदर्शित करते हैं. यह है समस्या की जड.
एक और समस्या है: चिट्ठाकार सिर्फ “मंगल” का ही प्रयोग करे तो भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वह मंगल ही रहेगा. चिट्ठे को चलाने वाला सफ्टवेयर उपभोक्ता की जानकारी के बिना कई बार उसको बदल देता है. मेरे चिट्ठे में यह अकसर होता रहता है, और मुझे उसके कारण अतिरिक्त प्रयास करना पडता है. अखण्डित चिट्ठा चाहते हैं तो आपको भी इस की जानाकारी रखनी होगी. इन विषयों के बारे में विस्तार से तकनीकी चर्चा (सरल तरीके से) अगले चिट्ठे में करेंगे.
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यूनिकोड क्या है ?
यूनिकोड प्रत्येक अक्षर के लिए एक विशेष नम्बर प्रदान करता है,
चाहे कोई भी प्लैटफॉर्म हो,
चाहे कोई भी प्रोग्राम हो,
चाहे कोई भी भाषा हो।
कम्प्यूटर, मूल रूप से, नंबरों से सम्बंध रखते हैं। ये प्रत्येक अक्षर और वर्ण के लिए एक नंबर निर्धारित करके अक्षर और वर्ण संग्रहित करते हैं। यूनिकोड का आविष्कार होने से पहले, ऐसे नंबर देने के लिए सैंकडों विभिन्न संकेत लिपि प्रणालियां थीं। किसी एक संकेत लिपि में पर्याप्त अक्षर नहीं हो सकते हैं : उदाहरण के लिए, यूरोपिय संघ को अकेले ही, अपनी सभी भाषाऒं को कवर करने के लिए अनेक विभिन्न संकेत लिपियों की आवश्यकता होती है। अंग्रेजी जैसी भाषा के लिए भी, सभी अक्षरों, विरामचिन्हों और सामान्य प्रयोग के तकनीकी प्रतीकों हेतु एक ही संकेत लिपि पर्याप्त नहीं थी।
ये संकेत लिपि प्रणालियां परस्पर विरोधी भी हैं। इसीलिए, दो संकेत लिपियां दो विभिन्न अक्षरों के लिए, एक ही नंबर प्रयोग कर सकती हैं, अथवा समान अक्षर के लिए विभिन्न नम्बरों का प्रयोग कर सकती हैं। किसी भी कम्प्यूटर (विशेष रूप से सर्वर) को विभिन्न संकेत लिपियां संभालनी पड़ती है; फिर भी जब दो विभिन्न संकेत लिपियों अथवा प्लैटफॉर्मों के बीच डाटा भेजा जाता है तो उस डाटा के हमेशा खराब होने का जोखिम रहता है।
यूनिकोड से यह सब कुछ बदल रहा है!
यूनिकोड, प्रत्येक अक्षर के लिए एक विशेष नंबर प्रदान करता है, चाहे कोई भी प्लैटफॉर्म हो, चाहे कोई भी प्रोग्राम हो, चाहे कोई भी भाषा हो। यूनिकोड स्टैंडर्ड को ऐपल, एच.पी., आई.बी.एम., जस्ट सिस्टम, माईक्रोसॉफ्ट, औरेकल, सैप, सन, साईबेस, यूनिसिस जैसी उद्योग की प्रमुख कम्पनियों और कई अन्य ने अपनाया है। यूनिकोड की आवश्यकता आधुनिक मानदंडों, जैसे एक्स.एम.एल., जावा, एकमा स्क्रिप्ट (जावा स्क्रिप्ट), एल.डी.ए.पी., कोर्बा 3.0, डब्ल्यू.एम.एल. के लिए होती है और यह आई.एस.ओ./आई.ई.सी. 10646 को लागू करने का अधिकारिक तरीका है। यह कई संचालन प्रणालियों, सभी आधुनिक ब्राउजरों और कई अन्य उत्पादों में होता है। यूनिकोड स्टैंडर्ड की उत्पति और इसके सहायक उपकरणों की उपलब्धता, हाल ही के अति महत्वपूर्ण विश्वव्यापी सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी रुझानों में से हैं।
यूनिकोड को ग्राहक-सर्वर अथवा बहु-आयामी उपकरणों और वेबसाइटों में शामिल करने से, परंपरागत उपकरणों के प्रयोग की अपेक्षा खर्च में अत्यधिक बचत होती है। यूनिकोड से एक ऐसा अकेला सॉफ्टवेयर उत्पाद अथवा अकेला वेबसाइट मिल जाता है, जिसे री-इंजीनियरिंग के बिना विभिन्न प्लैटफॉर्मों, भाषाओं और देशों में उपयोग किया जा सकता है। इससे डाटा को बिना किसी बाधा के विभिन्न प्रणालियों से होकर ले जाया जा सकता है।
यूनिकोड कन्सॉर्शियम के बारे में
यूनिकोड कन्सॉर्शियम, लाभ न कमाने वाला एक संगठन है जिसकी स्थापना यूनिकोड स्टैंडर्ड, जो आधुनिक सॉफ्टवेयर उत्पादों और मानकों में पाठ की प्रस्तुति को निर्दिष्ट करता है, के विकास, विस्तार और इसके प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। इस कन्सॉर्शियम के सदस्यों में, कम्प्यूटर और सूचना उद्योग में विभिन्न निगम और संगठन शामिल हैं। इस कन्सॉर्शियम का वित्तपोषण पूर्णतः सदस्यों के शुल्क से किया जाता है। यूनिकोड कन्सॉर्शियम में सदस्यता, विश्व में कहीं भी स्थित उन संगठनों और व्यक्तियों के लिए खुली है जो यूनिकोड का समर्थन करते हैं और जो इसके विस्तार और कार्यान्वयन में सहायता करना चाहते हैं।
अधिक जानकारी के लिए, शब्दावली, सैम्पल यूनिकोड-सक्षम उत्पाद, तकनीकी परिचय और उपयोगी स्रोत देखिए।
[http://unicode.org/unicode/standard/translations/h…]
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सारथी-परिचय
शास्त्री जे सी फिलिप एक समर्पित लेखक, अनुसंधानकर्ता, एवं हिन्दी-सेवी हैं. उन्होंने भौतिकी, देशीय औषधिशास्त्र, और ईसा के दर्शन शास्त्र में अलग अलग विश्व्वविद्यालयो से डाक्टरेट किया है. आजकल वे पुरातत्व के वैज्ञानिक पहलुओं पर अपने अगले डाक्टरेट के लिये गहन अनुसंधान कर रहे हैं. वे एक अमरीकी विश्वविद्यालय के मानद कुलाधिपति भी हैं.
शास्त्रीजी का बचपन मध्य प्रदेश के ग्वालियर मे बीता था, जहां उन्होंने कई स्वतंत्रता सेनानियों से शिक्षा एवं प्रेरणा पाई थी. इस कारण उन्होंने अपने जीवन में राजभाषा हिन्दी की साधना और सेवा करने का प्रण बचपन में ही कर लिया था. उनका मानना है कि यदि हम भारतीय संगठित हो जायें तो सन २०२५ से पहले हिन्दुस्तान एक विश्व-शक्ति बन जायगा. फिर से एक सोने की चिडिया भी बन जायगा. इस चिट्ठे में वे इस विषय से संबंधित लेख प्रस्तुत करेंगे.
वैज्ञानिक विषयों के अतिरिक्त उन्होंने जानेमाने अध्यापकों की देख्ररेख में दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों का भी अध्ययन किया है. अत: इस चिट्ठे में वे अपने आराध्य पुरुष प्रभु ईसा और उनके अनुयाईयों के बारे में भी लिखेंगे.
वे इन सभी विषयों पर आप के प्रश्नों का स्वागत करेंगे, और उनका जवाब इस चिट्ठे मे देंगे. प्रश्न पूछने के लिये या तो उनको ईचिट्ठी भेजें (जिसका पता मुख्य पेज पर दहिनी ओर दिया गया है), या इस चिट्ठे मे हिन्दी या अंग्रेजी में टिप्पणी के साथ अपना प्रश्न भी जोड दें.







