[चुनी प्रविष्ठी: सजीव सारथी] तनहाइयों की भीड़ में गुम , मौन दर्शी हर बात का , मिल जाता है अक्सर कतारों में, क्यों है अखिर , [Special Permission: http://sajeevsarathie.blogspot.com/] चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: काविता, काव्य-विधा, काव्य-अवलोकन, सारथी, शास्त्री-फिलिप, hindi-poem, hindi-poem-analysis, hind-context,
लफ्ज़ रूखे, स्वर अधूरे उसके,
सहमी सी है आवाज़ भी,
सिक्कों की झंकारें सुनता है,
सूना है दिल का साज़ भी,
दुनिया के मेलों में,
जिन्दगी का बोझ लादे ,
कभी बसों में , कभी रेलों में,
पिसता है वो, हालात की चक्कियों में,
रहता है वो, शहरों में , बस्तियों में,
घुटे तंग कमरों में आँखें खोलता,
महंगाई के बाजारों में खुद को तोलता,
थोडा सा रोता, थोडा सा हंसता,
थोडा सा जीता, थोडा सा मरता,
रोज युहीं चलता – आम आदमी ।
धूप का बरसात का,
आ जाता बहकाओं में ,
खो जाता अफवाहों में,
मिलावटी हवाओं में,
सडकों में फुटपाथों में,
राशन की दुकानों में,
दिख जाता है अक्सर,
अपनी बारी का इंतज़ार करता -
दफ्तरों -अस्पतालों के बरामदों में ,
अपनी ही सत्ता से कटा छठा ,
क्यों है यूं ,
अपने ही वतन में अजनबी –
आम आदमी ।












July 22nd, 2007 at 8:13 am
सजीव सुन्दर लिखते हे .
July 22nd, 2007 at 11:36 am
बेहतरीन पंक्तियाम…।