क्षण भर में
नेता जी ने
कर दिया हल
सारी बेरोजगारी का,
यह कह कर कि
"क्यों रोते हैं
ये बेरोजगार.
अरे बेरोजगारी ही तो,
उनका है रोजगार.
अत: कैसे हुए वे बेरोजगार"
दर्शक कायल हो गये,
अपने नायक के सामर्थ की.
लेकिन मजा बिगाड दिया
एक बेरोजगार ने
जब आगे बढ कर
पूछा उसने कि,
"इतना आसान रोगगार है यह
तो क्यों नही सुझाते आप
पहले अपने बच्चों को यह हल".
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July 25th, 2007 at 10:28 am
ये क्या धोखाधड़ी है शास्त्री जी. सोचा सोचा रोजगार का कोई नुख्सा रहे हैं इसलिए सब काम छोड़कर भाग आया. यहां आने पर कविता पढ़वा दी आपने.
खैर, चलते हैं.
July 25th, 2007 at 1:28 pm
बहुत सही व्यंग्य और साथ ही सच कहने का सामर्थ्य…सही मुंह्तोड़ जवाब आज कल के मीठी छुरी वाले दोमुंहे नेताओं को…
November 30th, 2008 at 8:59 am
हाँ नेताओँ के बच्चे बेरोज़गार और भूखे रहेँगे तभी पता चलेगा उन्हें इसका दर्द .
November 30th, 2008 at 9:00 am
ये नेताजी कौन थे जी?
November 30th, 2008 at 10:37 am
neta ke paasgoli hoti hai de di. narayan narayan
December 1st, 2008 at 6:55 am
कविताये समझना अपने बस की बात नही है ,नेताजी का मकसद एक ही होता है लोगो की आंख मे धूल झोंकना ।
December 1st, 2008 at 1:57 pm
“इतना आसान रोगगार है यह
तो क्यों नही सुझाते आप
पहले अपने बच्चों को यह हल”.
नेता जी ने आगे कहा
“यह आसान रोजगार
देशवासियों के लिए है .
कठिन रोजगार हमने
अपने बच्चों के लिए रख छोड़ा है ,
आख़िर हम है जनता के सेवक
फ़िर कैसे छोड़ सकते है कोई कठिन काम
जनता के लिए .
December 1st, 2008 at 1:59 pm
कहना भूल गया, पोस्ट पढ़कर बड़ा मजा आया. हम जैसे बच्चे ऐसे ही सीख जाते है . धन्यवाद.