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	<title>Comments on: लाखों अमरीकी यौन शिक्षा से भाग रहे हैं 001</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: नीरज रोहिल्ला</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/502/comment-page-1#comment-801</link>
		<dc:creator>नीरज रोहिल्ला</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Aug 2007 18:27:23 +0000</pubDate>
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		<description>शास्त्रीजी,
आपके इस लेख ने तो पूरी तरह निराश किया है । सम्भवत: आपने ये लेख भावनाओं के प्रवाह में लिखा है, वरना सैकडों वर्षों की गुलामी से लेकर पूर्व और पश्चिम के भेद का इस विषय से उतना सम्बन्ध नहीं है जितना ये लेख प्रदर्शित करता है ।

&quot;शिक्षा की पश्चिमी अवधारणा अपने आप में इतनी सीमित एवं यांत्रिक है कि वह यौन संबंध एवं रेलगाडी के डिब्बों की शंटिग में कोई फरक नहीं करती. वे बच्चों को सिखाते हैं कि कोई भी डब्बा जरूरत पडने पर अपने समान (समलैंगिक) या अपने विपरीत किसी भी डब्बे के साथ जुड सकता है. न धर्म आडे आता है, न नैतिकता या समाज. न ही कभी यह पूछा जाता है कि जीवन में कितने डिब्बों से जुडे. उन के अनुसार सिर्फ एक बात का ख्याल रखना है: “सबकुछ बिना गडबड के, बिना गर्भधान के, बिना एड्स पाये, बिना मां बाप की जानकारी के, करो”.&quot;...

इस प्रकार के तर्क देकर आप मूल विषय से पूरी तरह भटक गये हैं । अन्त में एक बात और, जहाँ आपने पश्चिमी तौर तरीकों की इतनी भर्तस्ना की है, जरा ये भी बतायें कि इस विषय पर अपने पूर्वी अवधारणा क्या कहती है । या फ़िर मात्र समस्या को समस्या न मानकर कुछ भी न कहना एक समाधान हो सकता है ।

एक सार्थक बातचीत प्रारम्भ करने के लिये आप बधाई के पात्र हैं, 
आपके लेख की अगली कडी का इन्तजार रहेगा ।

साभार,</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्रीजी,<br />
आपके इस लेख ने तो पूरी तरह निराश किया है । सम्भवत: आपने ये लेख भावनाओं के प्रवाह में लिखा है, वरना सैकडों वर्षों की गुलामी से लेकर पूर्व और पश्चिम के भेद का इस विषय से उतना सम्बन्ध नहीं है जितना ये लेख प्रदर्शित करता है ।</p>
<p>&#8220;शिक्षा की पश्चिमी अवधारणा अपने आप में इतनी सीमित एवं यांत्रिक है कि वह यौन संबंध एवं रेलगाडी के डिब्बों की शंटिग में कोई फरक नहीं करती. वे बच्चों को सिखाते हैं कि कोई भी डब्बा जरूरत पडने पर अपने समान (समलैंगिक) या अपने विपरीत किसी भी डब्बे के साथ जुड सकता है. न धर्म आडे आता है, न नैतिकता या समाज. न ही कभी यह पूछा जाता है कि जीवन में कितने डिब्बों से जुडे. उन के अनुसार सिर्फ एक बात का ख्याल रखना है: “सबकुछ बिना गडबड के, बिना गर्भधान के, बिना एड्स पाये, बिना मां बाप की जानकारी के, करो”.&#8221;&#8230;</p>
<p>इस प्रकार के तर्क देकर आप मूल विषय से पूरी तरह भटक गये हैं । अन्त में एक बात और, जहाँ आपने पश्चिमी तौर तरीकों की इतनी भर्तस्ना की है, जरा ये भी बतायें कि इस विषय पर अपने पूर्वी अवधारणा क्या कहती है । या फ़िर मात्र समस्या को समस्या न मानकर कुछ भी न कहना एक समाधान हो सकता है ।</p>
<p>एक सार्थक बातचीत प्रारम्भ करने के लिये आप बधाई के पात्र हैं,<br />
आपके लेख की अगली कडी का इन्तजार रहेगा ।</p>
<p>साभार,</p>
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		<title>By: paramjitbali</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/502/comment-page-1#comment-797</link>
		<dc:creator>paramjitbali</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Aug 2007 09:58:43 +0000</pubDate>
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		<description>आप की बात से पूरी तरह सहमत हूँ,हमे पश्चिमी नही स्वदेशी रास्ता अपनाना चाहिए। आप की अगली पोस्ट का इन्तजार है..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप की बात से पूरी तरह सहमत हूँ,हमे पश्चिमी नही स्वदेशी रास्ता अपनाना चाहिए। आप की अगली पोस्ट का इन्तजार है..</p>
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		<title>By: श्रीश शर्मा</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/502/comment-page-1#comment-796</link>
		<dc:creator>श्रीश शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Aug 2007 06:22:38 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;blockquote&gt;उन के अनुसार सिर्फ एक बात का ख्याल रखना है: “सबकुछ बिना गडबड के, बिना गर्भधान के, बिना एड्स पाये, बिना मां बाप की जानकारी के, करो”.&lt;/blockquote&gt;
आपसे सहमत हूँ शास्त्री जी।  भारत के लिए पश्चिमी मॉडल को अपनाना मूर्खता है। पता नहीं लोगों को ये कब समझ आएगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<blockquote><p>उन के अनुसार सिर्फ एक बात का ख्याल रखना है: “सबकुछ बिना गडबड के, बिना गर्भधान के, बिना एड्स पाये, बिना मां बाप की जानकारी के, करो”.</p></blockquote>
<p>आपसे सहमत हूँ शास्त्री जी।  भारत के लिए पश्चिमी मॉडल को अपनाना मूर्खता है। पता नहीं लोगों को ये कब समझ आएगा।</p>
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		<title>By: हरिराम</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/502/comment-page-1#comment-794</link>
		<dc:creator>हरिराम</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Aug 2007 05:54:25 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/502#comment-794</guid>
		<description>इस तीसरे पुरुषार्थ (धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष में से एक) के बारे में वेद-उपनिषदों से लेकर जितने शिक्षा-शोध भारतवर्ष ने दिए हैं, ये विदेशी ज्ञान उसके सामने निरा-बच्चा है।

इस शिक्षा से भागने का असली कारण वहाँ इसकी अनिवार्य &quot;कठिन के कठिनतम प्रैक्टिकल&quot; पेपरों-परीक्षाओं का प्रचलन हैं, जो बच्चों को देनी चाहे-अनचाहे देनी पड़ती है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इस तीसरे पुरुषार्थ (धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष में से एक) के बारे में वेद-उपनिषदों से लेकर जितने शिक्षा-शोध भारतवर्ष ने दिए हैं, ये विदेशी ज्ञान उसके सामने निरा-बच्चा है।</p>
<p>इस शिक्षा से भागने का असली कारण वहाँ इसकी अनिवार्य &#8220;कठिन के कठिनतम प्रैक्टिकल&#8221; पेपरों-परीक्षाओं का प्रचलन हैं, जो बच्चों को देनी चाहे-अनचाहे देनी पड़ती है।</p>
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		<title>By: हरिमोहन सिंह</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/502/comment-page-1#comment-793</link>
		<dc:creator>हरिमोहन सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Aug 2007 05:52:57 +0000</pubDate>
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		<description>पश्चिम की यौन शिक्षा सिर्फ एक उन्नत किस्म के जानवरों के मैथुन की ट्रेनिंग है. पूर्वी अवधारणा मनुष्य को आत्मिक एवं शारीरिक तल पर देखता है बिल्‍‍कुल सही बात है लेकिन आज हमारे यहॉं हमें तो प्रत्‍यक्ष व अप्रत्‍यक्ष रूप से पश्चिम की यौन शिक्षा को ही दिखाया सिखाया जा पहा है</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पश्चिम की यौन शिक्षा सिर्फ एक उन्नत किस्म के जानवरों के मैथुन की ट्रेनिंग है. पूर्वी अवधारणा मनुष्य को आत्मिक एवं शारीरिक तल पर देखता है बिल्‍‍कुल सही बात है लेकिन आज हमारे यहॉं हमें तो प्रत्‍यक्ष व अप्रत्‍यक्ष रूप से पश्चिम की यौन शिक्षा को ही दिखाया सिखाया जा पहा है</p>
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		<title>By: Sanjeeva Tiwari</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/502/comment-page-1#comment-789</link>
		<dc:creator>Sanjeeva Tiwari</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Aug 2007 02:28:23 +0000</pubDate>
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		<description>शास्‍त्री जी आपने जो जानकारी दी कि अमेरिका में भी यौन शिक्षा का विरोध है या था, इसका इल्‍म नहीं था । अगले पोस्‍ट का इंतजार रहेगा 

&lt;a href=&quot;http://www.aarambha.blogspot.com&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt; “आरंभ” संजीव का हिन्‍दी चिट्ठा &lt;/a&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्‍त्री जी आपने जो जानकारी दी कि अमेरिका में भी यौन शिक्षा का विरोध है या था, इसका इल्‍म नहीं था । अगले पोस्‍ट का इंतजार रहेगा </p>
<p><a href="http://www.aarambha.blogspot.com" rel="nofollow"> “आरंभ” संजीव का हिन्‍दी चिट्ठा </a></p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सुनीता(शानू)</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/502/comment-page-1#comment-787</link>
		<dc:creator>सुनीता(शानू)</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Aug 2007 01:56:10 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/502#comment-787</guid>
		<description>शास्त्री जी,बहुत सही और कठोर बात कही है आपने ये बात आज इस आधुनिक युग में दीमक की तरह चाटे जा रही है हमारे बच्चों का भविष्य दाव पर लगा है,एसा नही हमे अपने दिये संस्कारों पर विश्वास नही परंतु आज बदलते परिवेश में बच्चो को उचित शिक्षा की नितांत आवशयकता है,आज हर बच्चो को स्कूल और घर हर जगह हिन्दुस्तानी नैतिकता एवं संस्कृति पर आधारित यौनशिक्षा देने की ही आवश्यकता है मगर एसा हो नही रहा...देश की बिगड़ती हुई स्थति इस बात की परिचायक है अंग्रेजी हवा का असर इतना अधिक क्यूँ है समझ नही आता? आशा है हम सभी मिल कर हमारे बच्चो को एक सही दिशा दे पायेंगे...

सुनीता(शानू)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्री जी,बहुत सही और कठोर बात कही है आपने ये बात आज इस आधुनिक युग में दीमक की तरह चाटे जा रही है हमारे बच्चों का भविष्य दाव पर लगा है,एसा नही हमे अपने दिये संस्कारों पर विश्वास नही परंतु आज बदलते परिवेश में बच्चो को उचित शिक्षा की नितांत आवशयकता है,आज हर बच्चो को स्कूल और घर हर जगह हिन्दुस्तानी नैतिकता एवं संस्कृति पर आधारित यौनशिक्षा देने की ही आवश्यकता है मगर एसा हो नही रहा&#8230;देश की बिगड़ती हुई स्थति इस बात की परिचायक है अंग्रेजी हवा का असर इतना अधिक क्यूँ है समझ नही आता? आशा है हम सभी मिल कर हमारे बच्चो को एक सही दिशा दे पायेंगे&#8230;</p>
<p>सुनीता(शानू)</p>
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