जैसा मैं ने अपने पिछले लेख में कहा था: सैकडों सालों की गुलामी का हम लोगों पर इतना गहरा असर हो गया है कि हिन्दुस्तान जो किसी जमाने में सारी दुनियां को रास्ता दिखाता था, आज उसी देश की बहुसंख्यक जनता हर तरह की भ्रष्ट विदेशी आयात के पीछे लार टपकाती भागती है … कहीं ऐसा न हो कि अमरीका का अंधानुकरण हमारी युवा पीढी को व्यभिचारियों एवं वेश्याओं का एक समूह बना दे. वहां यह हो रहा है, लेकिन यहां उसकी क्या जरूरत है? पिछले पच्चीस सालों में अमरीका में (जहां आधुनिक यौन शिक्षा की शुरुआत हुई थी) तीस से पचास लाख परिवारों ने अपने बच्चों को घर बैठा कर पढाना शुरू कर दिया है. पश्चिमी अवधारणा के बदले (जहां सुरक्षित यांत्रिक मैथुन यौन शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य रह गया है) उन लोगों ने पूर्वी अवधारणा के आधार पर घर पर ही हर तरह की शिक्षा देना आरंभ कर दिया है. इन परिवारों में यौन शिक्षा के लिये इस समग्र अवधारणा (कर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के आधार पर पुस्तकें बच्चों को उनके उमर के हिसाब से दी जाती है. पच्चीस सालों के इस प्रयोग से निम्न बातें सामने आई हैं: 1. इस तरह से घर में समग्र पठन पाये हुए जवानों में (जिन में से अधिकतर आज अपने तीसादि की उमर में हैं) में पतिव्रता युवतियों की एवं पत्नीव्रता युवकों की संख्या सामान्य अमेरिकन समाज की तुलना में सौ गुना है. 2. विवाहपूर्व यौनसंबंध न के बराबर है. 3. यौन अपराध न के बराबर है. 4. विवाहेतर यौन संबंध न के बराबर है. 5. गर्भपात, स्त्री भ्रूण न के बराबर है. 6. विवाह विच्छेद न के बराबर है. 7. यौन रोग न के बराबर है. 8. विवाह परिवार की सम्मति से होता है. 9. वैवाहिक जीवन में संतृप्ति का स्तर बहुत अधिक है. 10. इन घरपढे विद्यार्थीयों का औसत बौद्दिक स्तर अमरीका के विद्यालयों से पढे विद्यार्थीयों से 10% से 40% अधिक है. अत: यह स्पष्ट है कि पश्चिम ने जब पश्चिमी अवधारणा पर आधारित शालेय यौन शिक्षा प्रदान की तो पश्चिम एक व्यभिचारियों का समाज बन गया. लेकिन उसी स्वतंत्र पश्चिम में जब तीस से पचास लाख परिवारों ने पूर्वी अवधारणा पर आधारित समग्र शिक्षा अपने बच्चों को दी, तो उसी हर तरह से आजाद पश्चिम के इन परिवारों में यौन समस्याये, अपराध, गर्भपात, एवं रोग कम हुए. परिवारों की स्थिरता बढी. पतिव्रता स्त्रीयों एवं पत्नीवृता पुरुषों की संख्या बढी. मेरे हिन्दुस्तानी मित्र जो यौन शिक्षा के नाम पर पश्चिम का आयात हिन्दुस्तान में करना चाहते हैं वे जाने अनजाने तीन द्शाब्दियों में हिन्दुस्तान के नैतिक ढांचे को तहस नहस कर देंगे. नहीं चाहिये हम को यह पश्चिमी यौन शिक्षा. हिन्दुस्तान को जरूरत है हिन्दुस्तानी नैतिकता एवं संस्कृति पर आधारित यौनशिक्षा के अवधारणा की !! चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: विश्लेषण, आलोचना, सहीगलत, निरीक्षण, परीक्षण, सत्य-असत्य, विमर्श, हिन्दी, हिन्दुस्तान, भारत, शास्त्री, शास्त्री-फिलिप, सारथी, वीडियो, मुफ्त-वीडियो, ऑडियो, मुफ्त-आडियो, हिन्दी-पॉडकास्ट, पाडकास्ट, analysis, critique, assessment, evaluation, morality, right-wrong, ethics, hindi, india, free, hindi-video, hindi-audio, hindi-podcast, podcast, Shastri, Shastri-Philip, JC-Philip,
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August 17th, 2007 at 6:47 am
बहुत बढिया लिखा
August 17th, 2007 at 7:01 am
अच्छा आलेख. अभी कुछ और गहराई का इंतजार है.
August 17th, 2007 at 7:37 am
बहुत तर्कपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी आपने।
August 17th, 2007 at 7:41 am
शास्त्रीजी,
क्या आप अपने इन आँकडों के स्रोत को सार्वजनिक करेंगे, क्योंकि मैं आपके आँकडों से जरा भी सहमत नहीं हूँ ? कहीं ये आँकडे आपको अमेरिका के किसी बजरंग दल सरीखी वेबसाईट से तो नहीं मिले हैं ?
मेरा दूसरा प्रश्न है कि आखिर क्या है “हिन्दुस्तानी नैतिकता एवं संस्कृति पर आधारित यौनशिक्षा की अवधारणा” ????
साभार,
August 17th, 2007 at 8:09 am
Shastirji,
Aaapki baat to kaafi sahi lagi, lekin kya aap kuch links bata sakte hai jaha is baare mein jyada jankari li ja sake.
August 17th, 2007 at 11:25 am
अपने दोनों लेख का लिंक मुझे मेल कर सकते हैं?
और सवाल यह कि धर्म अर्थ काम मोक्ष है. आपने कर्म अर्थ काम मोक्ष क्यों लिखा कोई विशेष कारण? अर्थ से आशय कर्म ही है.
August 17th, 2007 at 11:35 am
शास्त्री जी,आपकी सोच सही है …मै आप से पूरी तरह सहमत हूँ..हमे अपने परिवेश के अनुसार अपना रास्ता तलाशना चाहिए।
August 17th, 2007 at 5:13 pm
बंधुओं की टिप्पणियों से लगता है- कुछ को पश्चिमी सभ्यता आकर्षित कर रही है, कुछ को भारतीय सभ्यता। महर्षि वास्त्सायन ने इस तीसरे पुरुषार्थ की जितनी विशद शिक्षा दी है, शायद ही कोई उसका एक प्रतिशत भी व्यवहार में ला पाता है। स्पष्ट होता है कि एक ओर लोग पतन की ओर अग्रसर हैं तो दूसरी ओर आत्मिक पुनरुत्थान की ओर!
August 17th, 2007 at 8:43 pm
आपका विचार बहुत ही सहरणिय है.
August 17th, 2007 at 9:37 pm
एक सांस में इस आलेख को पढ़ना मुश्किल हो रहा है मगर छोड़ना उससे ज्यादा मुश्किल।क्या आप ए सब चाप ने के लिए quillpad.in/hindi उपयोग किया
August 20th, 2007 at 9:57 am
शास्त्रीजी,
काफी गहरा अध्ययन लग रहा है। आपके अगले लेख में मैं भारत और अमेरिका के सेक्स एजुकेशन का पूरा सिलेबस जानना चाहूंगा। मैं भी सेक्स एजुकेशन का विरोधी हूं। लेकिन, कोई तो तरीका निकालना होगा ना जिससे बड़े होते बच्चों को शारीरिक विकास और गलत-सही का अंदाजा लग सके।