जैसा मैं बार बार कहता आया हूं, अंग्रेज चले गये परंतु मानसिक गुलामी छोड गये. लेकिन इस स्थिति को बदलने के लिये हम में से हर व्यक्ति छोटाबडा योगदान जरूर कर सकता है. बूंद बूंद से घट जरूर भरेगा
हस्ताक्षर एक ऐसी जरूरी चीज है जो हमारे साथ आजीवन रहती है. यह हमारी पहचान का, अधिकार का, बहुत सारी और बातों का भी प्रतीक है. इस प्रतीक का आजीवन उपयोग हिन्दी में ही करें तो न केवल हिन्दी के प्रति हमारा प्रेम प्रदर्शित होगा, बल्कि बहुत से लोगों को हिन्दी प्रेम के बारे में सोचने के लिये प्रेरित भी करेगा.
मैं विद्यालयीन जीवन में क्रान्तिकारियों की जीवनी से बहुत अधिक प्रभावित हुआ था. मेरे गुरुदेव डॉ. कमल वशिष्ठ की वाणी का प्रभाव था यह. उस समय मैं ने हिन्दी में हस्ताक्षर करना शुरू कर दिया. अपने आप में यह कोई बडी बात नहीं है, लेकिन घट को भरने के लिये जिन बूंदों की जरूरत है यह उन में से एक है. पढाई के लिये, भाषण देने के लिये, पढाने के लिये आदि मैं ने लगभग दो दर्जन देशों की यात्रा की है. इन में से कहीं भी हिन्दी नहीं बोली जाती है लेकिन हर जगह लोगों ने मेरे हिन्दी हस्ताक्षर को स्वीकार किया. कई जगह तो यह हिन्दी के बारे में चर्चा का एक कारण भी बना, खास कर जब लोगों ने पूछा कि “क्या यह आपकी भाषा है”.
मैं आजीवन भारत भृमण करता रहा हूं. हर जगह हिन्दी हस्ताक्षर ने नये नये गुल खिलाये. अब इस हिन्दी चिट्ठाकारिता को ही ले लीजिये. मेरे हिन्दी हस्ताक्षर को देख कर पंजाब नेशनल बैंक, कोच्चि के हिन्दी अफसर ने मुझे से परिचय लिया, मेरे घर आये, कई घंटे मेरे साथ बिताये एवं चिट्ठा प्रारंभ करने के लिये आवश्यक निर्देशन देकर गये.
हिन्दी हस्ताक्षर के कारण कई विचित्र अनुभव भी हुए, लेकिन मैं उन सब का उपयोग भी हिन्दी के प्रचारप्रसार के लिये कर सका. सबसे विचित्र अनुभव, जो बीसियों बार हो चुका है, वह है एक आम प्रश्न: “क्या आप अंग्रेजी नहीं जानते”. मैं ने हमेशा इस प्रश्न को हिन्दी के प्रचार के लिय प्रयुक्त किया है. आप भी जरूर कीजिये. हां कई ऐसे अवसर भी आये हैं जब हिन्दी हस्ताक्षर को स्वीकार करने से लोगों ने मना कर दिया. ICICI Prudential तृशूर में अपने बेटे के लिये पैसा जमा करने की बात आई तो उन्होंने हिन्दी हस्ताक्षर को मानने से मना कर दिया. मैं ने उनके एजेंट लात मार के घर के बाहर निकाल दिया. बाद में दुम हिलाते हुए वापस आये. आईंदा उस शाखा के लोग हिन्दी का अपमान करने से पहले दो बार सोचेंगे.
दोस्तों मैं ने जो भी किया वे इस विशाल देश में सिर्फ बूंदें हैं. लेकिन यदि 60 से 70 करोड हिन्दी समझने वालों में से सिर्फ एक से पांच करोड मध्यवर्गीय लोग अपने हिन्दी प्रेम को सामूहिक रुप से प्रगट करेंगे तो ये करोडों बूदें मिलकर एक बडी नदी बन जायगी. फिर हिन्दी के सशक्त प्रवाह को कोई रोक नहीं सकेगा. हमें आजादी ऐसे ही करोडों बून्दों के कारण ही मिली थी. लुटेरे एवं कुटिल फिरंगियों को भगाना आसान नहीं था लेकिन जब करोडों बूदें मिलीं तो वे लुटेरे उस बाढ को झेल न पाये. आईये अब हिन्दी की सेवा के लिये भी बूंद बूंद से घट भरने के लिये हम में से हरेक कुछ न कुछ करें.
कृपया आज से सिर्फ हिन्दी में हस्ताक्षर करें – शास्त्री जे सी फिलिप
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
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इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




August 23rd, 2007 at 1:18 am
स्वागत है आपका
सारथी की कुटिया में.
दो वाक्य कम से कम
लिख जाये यहां,
कि क्या करने जा रहे हैं आप
प्रचार एवं प्रसार
हिन्दी के लिये.
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को
एक सूत्र में पिरो सकती है,
न कि फिरंगी का इंगलिस
धागा !!
August 23rd, 2007 at 7:37 am
मैं तो हमेशा से ही हिन्दी में हस्ताक्षर करता हूं।
August 23rd, 2007 at 7:51 am
शास्त्रीजी,
आपकी इस पोस्ट ने बहुत प्रभावित किया । सोचने वाली बात है कि अगर हिन्दी भाषी लोग मिलकर ये प्रयास करेंगे तो सच में एक आन्दोलन से कम नहीं होगा ।
धन्यवाद !!!
August 23rd, 2007 at 7:58 am
शास्त्री जी स्कू ल के जमाने से हम हिंदी में ही हस्तांक्षर करते हैं । अच्छा आपने हमारे चिट्ठे पर लता जी
के हस्ताक्षर देखे । वे भी हिंदी में ही हस्ताक्षर करती आई हैं ।
August 23rd, 2007 at 8:23 am
बात सही है और जरूरी भी । लेकिन इसके लिए हममें से प्रत्येक को अपने-अपने स्तर पर, लोगों के बीच जाकर वास्तव में ‘कुछ’ करना होगा ।
मेरा अनुभव है कि लोगों को केवल कहने की आवश्यकता है । अधिकांश लोग, इस बात के महत्व को अनुभव किए बिना ही अंग्रेजी में हस्ताक्षर किए जा रहे हैं ।
इसके लिए मैं नियमित रूप से समय निकाल कर लोगों से, खास कर स्कूली किशोरों से मिल कर बात करता हूं । मुझे किसी से भी दुबारा कहने की आवश्यकता नहीं हुई । जिसे भी समझाया, उसने पहली ही बार इसका महत्व और खुद की चूक अनुभव कर, तत्काल ही हिन्दी में हस्ताक्षर करने शुरू कर दिए । ऐसी सफलता का मेरा आंकड़ा हजारों में है ।
हमें ब्लाग की दुनिया से बाहर, मैदान में जाकर अपनी बात को हकीकत में बदलने के लिए निरन्तर प्रयत्नरत रहना होगा ।
August 23rd, 2007 at 9:27 am
कहने के लिये कहा जा सकता है कि हस्ताक्षर की कोई लिपि नहीं होती, किन्तु व्यवाअर में ऐसा नहीं है। सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर हस्ताक्षर में संकेत ओते हैं किसी न किसी लिपि या कभी-कभी मिश्रित लिपि के होते हैं।
मैं आपके इस विश्लेषण से सहमत हूँ कि हिन्दी में हस्ताक्षर हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने के लिये प्रेरित करने का सशक्त माध्यम हो सकती है। सभी हिन्दी-प्रेमियों को इसका ध्यान रखना चाहिये।
August 23rd, 2007 at 10:20 am
हम जरुर करेंगे क्यूंकि अभी तक तो हम इंग्लिश मे करते आये है।
August 23rd, 2007 at 10:21 am
और आपने बिल्कुल सही कहा है की बूँद-बूँद से घट भरता है।
August 23rd, 2007 at 10:31 am
यह सही बात है. अपना हस्ताक्षर अपनी मातृभाषा में ही करना चाहिए. मैंने तो बड़े पंगे झेले हैं. लेकिन सारा फार्म भले अंग्रेजी में हस्ताक्षर हिन्दी में यह स्वभाव बन गया है. अब वही हिन्दीवाला हस्ताक्षर सब जगह है. और कोई परेशानी नहीं.
August 23rd, 2007 at 10:32 am
मैं सदा से हिन्दी में ही हस्ताक्षर करता आया हूँ और आजीवन करता रहूँगा.
August 23rd, 2007 at 11:03 am
आप ने सोचने पे मजबूर कर दिया
August 23rd, 2007 at 11:50 am
लोग पहले अपना नाम, अपने बाप का नाम, अपनी जाति का नाम, अपने गाँव का नाम तो हिन्दी में लिखना सीख लें। फिर हस्ताक्षर भी कर लेंगे। क्या सभी प्रवेश-पत्रों, फार्मों में में हिन्दी में नाम भरने की अनिवार्यता की गई है अभी तक?
August 23rd, 2007 at 3:25 pm
sir
it would be problemetic for people who travel abroad promote hindi but keep into mind the hindi lovers are far and wide and foriegn banks { over seas } i dont think { i am too sure } dont have this facilty
regds
August 23rd, 2007 at 6:37 pm
इस बार की टिप्पणी में आपको ब्लॉग की लिंक भी मिल गयी होगी ।
हम फिर कहना चाहते हैं कि हम हिंदी में ही हस्ताक्षर करते आए हैं ।
radiovani.blogspot.com
August 23rd, 2007 at 8:03 pm
आपने बहुत सही बात कही। इसी बात से जुड़ा एक वाक्या मुझे भी याद आ रहा है। एक बैंक का प्रतिनिधि मेरे पास आया। मैंने पूरा फार्म अंग्रेजी में भर दिया। जब हस्ताक्षर करने की बारी आई तो मैं चूंकि हिंदी में हस्ताक्षर करता हूं, तो उसने मुझसे हैरान होते हुये पूछा कि आप हिंदी में हस्ताक्षर करते हैं? इस पर मैंने उसे वो बात कही जो एक बार मुझसे किसी मित्र ने कही थी। वो यह कि हो सकता है कि किसी फार्म या पत्र को अंग्रेजी में भरना या लिखना आपकी मजबूरी हो लेकिन सबसे अंत में हस्ताक्षर एक ऐसी चीज होती है जिसे आप अपनी भाषा में कर सकते हैं। यह बात मुझे इतनी अच्छी लगी कि तबसे मैं हर किसी को हिंदी में हस्ताक्षर करने की सलाह देता हूं।
August 25th, 2007 at 11:04 pm
जोड सकती हिन्दुस्तान को
एक सूत्र में
सिर्फ हिन्दी,
न कि फिरंगी की
भाषा.
दुश्मनी की नहीं
है जरूरत,
किसी भी भाषा से,
लेकिन हो जाये
सौत हिन्दी की एक
विदेशी भाषा तो
जरूरी है मर्ज के
तुरंत इलाज की.
बस गई है अंगेजी के
प्रति आराधना
हमारे मनों में ऐसी,
कि झाडना होगा इसे
जब तक कि हिन्दी
न पा ले सही अपना स्थान.
छोटा सा एक काम जो
कर सकते है हम आप,
है वह हस्ताक्षर करना
हिन्दी में.
हस्ताक्षर हरेक की
है अपनी पहचान,
इसे रखें हिन्दी में
तो खुलेंगे बहुत सी
आंखें.
नहीं बदलेगा अधिक कुछ
एक हिन्दी हस्ताक्षर से,
पर जब मिलेंगी बहुत सारी
बूंदे हिन्दी प्रेमियों की,
तो भरेगा जरूर घट
कभी न कभी.
August 28th, 2007 at 10:12 pm
शास्त्री जी मे जब से मेडिकल कॉलेज मैं गया तब से हिंदी मैं हस्ताक्षर कर रहा हू.आज बाड़ी ख़ुशी हुई की मेरे जैसे सोचने वाले कितने लोग हैं मैने भी बहुत ताने झेले हैं पैर मेरा हिंदी प्रेम हमेशा इन चीज़ों पैर भारी पड़ा है सच्ची हिंदी ही देश को एक सूत्र मैं
बाँध सकती है आपना तंकन मैं हाथ तंग है जब ढंग से आ जाएगा तब बात करेंगे.साधुवाद
August 28th, 2007 at 10:13 pm
शास्त्री जी मे जब से मेडिकल कॉलेज मैं गया तब से हिंदी मैं हस्ताक्षर कर रहा हू.आज बाड़ी ख़ुशी हुई की मेरे जैसे सोचने वाले कितने लोग हैं मैने भी बहुत ताने झेले हैं पैर मेरा हिंदी प्रेम हमेशा इन चीज़ों पैर भारी पड़ा है सच्ची हिंदी ही देश को एक सूत्र मैं
बाँध सकती है आपना तंकन मैं हाथ तंग है जब ढंग से आ जाएगा तब बात करेंगे.साधुवाद
drdhabhai@gmail.com
June 28th, 2008 at 4:16 pm
हस्ताक्षर सिर्फ हिन्दी में
और किसी में नहीं.
जारी हैं
जारी रहेंगे.