अनुवाद से भाषा नहीं बचती

(यह कोई सैद्धांतिक विश्लेषण नहीं है.) कुछ दिनों पहले शास्त्री जे सी फिलिप को एक पत्र का जवाब दिया तो उन्होंने कहा कि मैं इसे लेख बनाकर छाप रहा हूं. वह लेख हिन्दी पर था. मैं हिन्दी भाषा और उसके विकास पर लिखने की क्षमता नहीं रखता लेकिन आपसे कुछ बातों पर राय-मशविरा तो किया ही जा सकता है.

आजकल मौलिकता का अभाव तो चहुंओर है. भाषा में भी मौलिकता घटती जा रही है. हिन्दी पर जिस एक भाषा का सबसे अधिक प्रभाव है वह है अंग्रेजी. जाहिर सी बात है अनुवाद का खतरा और शब्दों की मिलावट भी सबसे ज्यादा अंग्रेजी से ही आ रहा है. तो क्या इसे खतरा कहें या फिर भाषा की उदारता कह उन शब्दों को समेट लें? मेरे लिहाज से सवाल बहुत बहुत बड़ा है. अभी मैं जवाब देने की स्थिति में नहीं हूं. हां एक बात मुझे जरूर लगती है कि एकदम से शब्दानुवाद करने की बजाय हम उन शब्दों को देवनागरी लिपी दे दें तो समस्या काफी हद तक समाप्त हो जाती है. एक उदाहरण बताता हूं. कुछ दिनों पहले डिमोज पर पंजीकरण करने गया. तो सारा फार्म तो ठीक से भर दिया एक जगह लिखा हुआ था अपना परिपत्र भरें. बहुत दिमाग लगाने के बाद भी मुझे परिपत्र का मतलब समझ में नहीं आया. लंबा-चौड़ा फार्म भरा और दो बार भरा. लेकिन परिपत्र का मतलब समझ में नहीं आने के कारण मैं खीझकर खाली हाथ लौट आया.

अब हम परिपत्र का मतलब दस्तावेज से समझते हैं. यहां क्या मतलब है पता नहीं. यह अनुवाद किस काम का है जो समझ में ही न आये. तकनीकि ने बहुत सारे नये शब्दों का आविष्कार किया है जरूरी नहीं कि उनका हिन्दी अनुवाद हो ही. दूसरी ओर हमारे बोलचाल और लेखन में ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जिसका कोई न कोई देशी विकल्प हमारे सामने होता है. क्योंकि हम जमीन से मुक्त होते हैं इसलिए हमें देशज शब्दों के होने पता ही नहीं चल पाता. लोकभाषा में ऐसे बहुत से शब्द हैं जो केवल बोलियों में ही समान नहीं है बल्कि भाषाओं में भी एक ही अर्थ लिए मौजूद है.

हमारे यहां अवधी में एक शब्द है सिधा. पंडित जी पूजा-पाठ करते हैं तो जो अन्न उन्हें दान किया जाता है वह होता है सिधा. मैं जब बंबई में था तो देखा कि वहां राशन की दुकानों को सिधा वाटप दुकान कहा जाता है. यानी सिधा से मतलब अन्न का वितरण या दान है यह अवधी नहीं मराठी में भी है. खालिस अनुवाद से भाषा को चकरघिन्नी बनाने के पक्ष में मैं नहीं हूं. जहां जरूरी हो अंग्रेजी के शब्दों को जस का तस भी लिया जा सकता है लेकिन प्रयास हो कि गंवई-देहाती शब्द भरपूर प्रयोग हों. एक दिन शिवदत्त मिश्र ने एक शब्द प्रयोग किया था- शून्य बटा सन्नाटा. अब यह शब्द खालिस गंवई है लेकिन पूरी बात कहता है. हम यह क्यों भूलें कि शब्द गढ़ने की प्रक्रिया केवल तकनीकि या अंग्रेजी में नहीं बल्कि हमारे यहां भी निरंतर चलनेवाली एक प्रक्रिया है. संजीत ने जिस मितान शब्द का प्रयोग किया था मुझे उसकी बराबरी का अंग्रेजी में एक भी शब्द नहीं दिखाई देता….कम से कम मुझे.

भाषा जीवन की प्रतिनिधि होती है. पहले ही सरकारी विभाग अनुवाद से हिन्दी का बहुत बेड़ा गर्क कर चुके हैं. अनुवाद करते समय शब्दानुवाद की बजाय भावानुवाद पर ध्यान दें तो बात बन जाएगी. इसलिए मौलिकता पर ध्यान देते हुए अंग्रेजी के अति आवश्यक शब्दों का लिप्यांतरण कर प्रयोग कर लें तो भाषा भी समृद्ध होगी और हम भी. नहीं तो अभी इंटरनेट पर अनुवाद का जो दौर चल रहा है उससे जो भाषा उभरकर सामने आयेगी उसका कुछ नया नामकरण करना पड़ सकता है. [साभार: संजय तिवारी]

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5 Responses to “अनुवाद से भाषा नहीं बचती”

  1. Yatish Says:

    “अनुवाद करते समय शब्दानुवाद की बजाय भावानुवाद पर ध्यान दें तो बात बन जाएगी. इसलिए मौलिकता पर ध्यान देते हुए अंग्रेजी के अति आवश्यक शब्दों का लिप्यांतरण कर प्रयोग कर लें तो भाषा भी समृद्ध होगी और हम भी”
    एकदम सही कहा आपने, मै भी किसी विगयापन के अनुवाद मे यही करता हू, आज कल कठिन शब्दो के प्रयोग से हम लोगो की बचीखुची रूचि भी खो सकते है

  2. paramjitbali Says:

    मै भी यतीश जी की बात से सहमत हूँ।

    “अनुवाद करते समय शब्दानुवाद की बजाय भावानुवाद पर ध्यान दें तो बात बन जाएगी. इसलिए मौलिकता पर ध्यान देते हुए अंग्रेजी के अति आवश्यक शब्दों का लिप्यांतरण कर प्रयोग कर लें तो भाषा भी समृद्ध होगी और हम भी”

  3. नीरज दीवान Says:

    अनुवाद से नैसर्गिकता का क्षरण होने की भी आशंका होती है. मेरा निजी मत है कि दुनिया की कुछ समृद्ध भाषाओं की सामग्री समझने के लिए उन्हें सीखा जाना अहम है। अनुवाद दुनिया के सबसे उबाऊ कामों में से एक है।

  4. Isht Deo Sankrityaayan Says:

    संजय जी
    आप की यूँ तो ज़्यादातर बातें सही लगीं, लेकिन एक बात बहुत ही कष्टकर लग रही है. वह है अन्ग्रेज़ी शब्दों के देवनागरीकरण और तकनीकी शब्दों को जस का तस् ले लेने की. यह मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि हिंदीप्रेमी हूँ. असल में यह बात ही भाषा विरोधी है. अगर ऐसा न किया जाए तो भाषा के विकास की तो प्रक्रिया ही रूक जाएगी. चाहे वह हिंदी हो या कोई और भाषा. आप नहीं जानते तो यह आपकी कमी है. कोई ग़लत अनुवाद कर रहा हो तो यह उसकी गलती है. मसलन ब्लोग का अनुवाद चिट्ठे के रूप में हुआ और आज हम-आप सभी समझ रहे हैं. साल भर पहले कोई मुझसे कहता कि चिटठा लिख रहे हैं तो शायद मैं सोचता कि यह आदमी चिट्ठी बोलने में क्यों हिचकिचा रहा है. हिंदी में कई सरे शब्द तो अखबारों के प्रचलित किए हुए हैं. मैं मानता हूँ कि शब्दों का अनुवाद सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें प्रचलित भी किया जाना चाहिए. यह काम हमें ही करना होगा.
    एक और बात जो आपने देशज शब्दों के प्रयोग की कही है, वह बिल्कुल सही है. सच तो यह है कि अगर देशज शब्दों का प्रयोग किया जाए तो हिंदी दूसरी भारतीय भाषाओं के ज्यादा क़रीब ही नहीं आएगी, उसकी सम्प्रेषण की क्षमता भी बढ़ जाएगी. अवधी और मराठी ही नहीं दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द भी आपस में ख़ूब मिलते हैं.

  5. rajashekhar Says:

    sir mera prasn : mujhe anudit katha sahity ka bhashik mulyankan karana kripiya iska javab bhejye.

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