मिलिये मेरे परिवार से — शास्त्री फिलिप

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सजीव सारथी के कोच्चि यात्रा के दौरान मुझ से मुलाकात के बारें में कोचिन ब्लॉगर मीट ?? में मैं ने जो लिखा था उसे पढ कर कई ब्लॉगर मित्रों ने लिखा कि परिवार के अन्य अंगों ( डॉ आनंद, सौ. शांता, एवं कुमारी आशा) के बारे में सुना लेकिन एकाध चित्र दिया जाये. पेश है एक छायाचित्र.

हम लोग ईसाई समूह के एक ऐसे संप्रदाय के अंग हैं जो धार्मिक जीवन को बहुत गंभीरता से लेता है. इस संप्रदाय के धार्मिक एवं सामाजिक नियम काफी कडे हैं. स्त्रियों को किसी भी तरह का आभूषण पहनने की अनुमति नहीं है. रंगबिरंगे कपडे भी कुछ साल पहले तक मना थे, लेकिन अब चलने लगे हैं. प्रेमविवाह एवं तलाक आदि का बहुत विरोध होता है एवं इन बातों मे संलग्न लोगों क समाज में बुरी नजर से देखा जाता है. सिगरेट या शराब के सेवन का इतना विरोध है कि कोई व्यक्ति इनका सेवन करता पकडा जाये तो उसका समाजिक बहिष्कार हो जाता है एवं उस व्यक्ति के बच्चों के विवाह एवं अन्य धार्मिक कार्यों तक में बहुत अडचन आती है. शादीयोग्य व्यक्तियों मे यदि धूम्रपान या नशे की आदत दिख भी जाये तो फिर किसी हालत में किसी अच्छे परिवार से संबंध नहीं मिल पाता है.  स्त्रियों के लिये मेकप पर कई तरह की पाबन्दियां है. ताश, जुआ, एवं पिक्चर आदि पर भी कडाई से पाबन्दी है. यहां तक कि बहुत से लोग टेलिविजन का उपयोग भी नहीं करते हैं.

इस ईसाई संप्रदाय के पुजारी (पादरी) लोग किसी भी प्रकार का विशेष परिधान नहीं पहनते एवं हमारे गिर्जाघर बहुत ही सादे प्रार्थना समाज होते हैं जहां किसी भी प्रकार का चित्र, मूर्ति, या सूली का चिन्ह भी नहीं होता है. निराकार एवं निर्गुण परब्रहम की आराधना पर जोर दिया जाता है, एवं हर तरह के प्रतीक एवं मूर्ति की अनुपस्थिति का कारण यह है. हमारे आराधनालय सब धर्म के अनुयायियों के लिये खुले होते हैं. कर्मकांड न के बराबर होते हैं, एवं धार्मिक कर्मकांडों के लिये किसी भी तरह के पुजारी (पादरी) की जरूरत नहीं है. अधिकतर युवा पुजारी विज्ञान या मानविकी में स्नातकोत्तर पठन के बाद ईसाई धर्म में भी स्नातकोत्तर पठन प्राप्त लोग होते है. ऐसे भी कई पुजारी हैं जो एक से अधिक विषयों में पीएचडी प्राप्त कर चुके हैं. उनकी पत्नियों के लिये भी इसी तरह की पृष्ठभूमि उचित मानी जाती है. धार्मिक कार्यों के लिये दान दक्षिणा मांगने पर पूरी रोकटोक है एवं इन लोगों को सिर्फ यदा कदा ही कुछ दान मिलता है. अकसर कुछ भी नहीं मिलता है. धार्मिक कार्यों के लिये दानदक्षिणा मांगने वाले पुजारी को तुरंत समाज से बहिष्कार मिल जाता है. कई लोग अपनी नौकरी के साथ ही पुजारी का काम करते हैं एवं किसी भी प्रकार की दान दक्षिणा नहीं स्वीकारते हैं. पुजारी के लिये शादीशुदा होना एवं एक आदर्श गृहस्थ होना आवश्यक माना जाता है. इतवार की आराधना स्थानीय भाषा में होती है, प्रवचन भी स्थानीय भाषा में दिया जाता है, एवं धार्मिक कार्यों में अंग्रेजी के प्रयोग का कडा विरोध होता है एवं धार्मिक कार्यों में एवं आरधनालयों (गिर्जाघरों) में अंग्रेजी का प्रयोग बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है.

कई मामलों में यह ईसाई संप्रदाय आर्य समाज से बहुत कुछ मिलताजुलता है. धर्म का स्वरूप बहुत सरल है, पुजारियोंपादरियों का दखल न के बराबर है. मुझे खुशी है कि प्रभु ने मुझे ऐसे एक संप्रदाय में जन्म का सौभाग्य दिया जहां आज भी घरपरिवार, विवाह, आत्मिक जीवन आदि के मामले में इतनी कठोरता बरती जाती है. इस कारण तलाक एवं पारिवारिक समस्याओं से कम ही जूझना पडता है. धूम्रपान, नशा, जुआ एवं इस तरह की सामाजिक बुराईयां न के बराबर हैं.

यह सब पढ कर आपको शायद यह लगे कि यह तो पुरातन पंथियों का समूह लगता है जहां बुद्दिजीवियों का बडा आभाव होगा. लेकिन स्थिति इसके बिल्कुल उल्टी है. आज ईसाई समाज में सबसे अधिक बुद्धिजीवी, लेखक, चिंतक आदि इस संप्रदाय के लोग हैं.  कुरीतियों को उखाड फेंकने, धार्मिक जीवन को सरल बनाने, एवं सादा जीवन अपनाने, एवं पुजारियों के एकधिपत्य को समाप्त करने का बहुत फायदा इस संप्रदाय को मिला है. इस संप्रदाय का नाम है भ्रातृ-संप्रदाय एवं  इस संप्रदाय के आपसी भाईचारे को देख कर यह नाम  दूसरों ने इनको दिया है.

दोस्तों, आपके स्नेह के लिये मैं आभारी हूं. आज से लगभग 4 साल पहले का एक चित्र दे रहा हूं. तब से बच्चे और बडे हो गये हैं एवं इससे कुछ और परिपक्व दिखने लगे है. मै एवं धर्मपत्नी वानप्रस्थ/सन्यास की ओर तेजी से बढ रहे हैं. दोनों के बाल इस छायाचित्र की तुलना में काफी सफेद हो गये है. हमारे ऊपर ईश्वर की अशिष के लिये प्रार्थना करें.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के एक शिष्य से मैं ने विद्यालयीन जीवन में गुरुमंत्र पाया था. इसी तरह मेरे बचपन में मेरे गिर्जे के एक मुखिया नेताजी के आजाद हिन्द फौज के भूतपूर्व केप्टन थे, एवं मैं ने तालीम उन से पाई है. मेरे परदादा एवं दादा जी स्वतंत्रता सेनानी थे एवं उन दोनों से मैं ने काफी क्रांतिकारी विचार पाये हैं.  आजीवन इन लोगों से मिले लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना चाहता हूं.

23 Responses to “मिलिये मेरे परिवार से — शास्त्री फिलिप”

  1. समीर लाल Says:

    आपके परिवार से चित्र के माध्यम से मिलना बहुत अच्छा लगा. आप और आपका परिवार सदा मनोवांक्षित पाये, यही प्रार्थना है ईश्वर से. शायद कभी रुबरु मिलने का सौभाग्य मिले.

    सदा खुशियां बिखेरते रहें हमेशा की तरह. घर पर सभी को हमारा यथोचित.

  2. संजय तिवारी Says:

    सादगी साफ दिख रही है. चिट्ठाकारिता में नयी पहल.

  3. arvind mishra Says:

    स्नेह और शुभकामनायें !

  4. अभय तिवारी Says:

    ईसा मुझे हमेशा बहुत प्यारे रहे हैं; उनकी बातों के गहरे अर्थों से अभिभूत रहता हूँ लेकिन चर्च और उसके दर्शन से दुखी। आप के लिखे से ऐसा समझ आता है कि इस सम्प्रदाय में चर्च की उन सारी कमियों से तौबा कर ली गई है जो मैं उनमें देखता रहा हूँ। इस सम्प्रदाय के बारे में और लिखिए..
    आप को और आपके परिवार को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं..

  5. Shastri JC Philip Says:

    @अभय तिवारी
    प्रिय अभय, इस संप्रदाय का उद्भव ही ईसाई समाज की कुरीतियों के विरुद्ध हुआ था. अत: सामान्यता जो कुरीतियां और खामियां ईसाई समाज में दिखती है वे इस समाज में नहीं है — शास्त्री

  6. उन्मुक्त Says:

    मिल कर प्रसन्नता हुई। कुछ नियम तो बहुत कड़े लगे।

  7. Shastri JC Philip Says:

    @उन्मुक्त
    नियम सामान्य से बहुत अधिक कडे है, लेकिन इस समाज को इससे जो फायदा हुआ (वैवाहिक जीवन की खुशी एवं स्थिरता, मांबाप बच्चों में परस्पर संबंध, तलाक का अभाव, अनावश्यक कर्मकांड का अभाव,बुद्धिजीवियों की संख्या में असमान्य बढोत्तरी, आदि) उसे देखें तो लगता है कि यह ठीक ही है — शास्त्री

  8. नीरज रोहिल्ला Says:

    शास्त्रीजी,

    आपके परिवार एवं आपकी जीवन शैली के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा । यहाँ ह्यूस्टन में मेरे भी कई दोस्त ईसाई हैं और उनके साथ अक्सर इन विषयों पर चर्चा चलती रहती है ।

    ईश्वर आपको आपके लक्ष्य अर्जित करने के लिये सहायता करे । साभार,

  9. सुनीता(शानू) Says:

    वाह आज सुबह-सुबह आपके पूरे परिवार के दर्शन हो गये लगता है मै पहले मिल चुकी हूँ आपकी बेटी आप जैसी ही है लम्बी और बेटा भी खूबसूरत है मगर शांता जी की शक्ल आपसे मिलती क्यों नही…हा हा हा…वैसे खूबसूरत तो वो भी बेहद है…मै तो एसे ही मज़ाक कर रही हूँ सुबह-सुबह हँसना भी चाहिये हाँ आप सभी के चेहरे मुस्कुराते हुए ही है…तो लिजिये हम भी मुस्कुराये देते है…:)

    शानू

  10. durga Says:

    Shastri sir,

    Thanks for writing this wonderful article.

    Its great to know, that there is a “religious group” with such different thoughts and strict restrictions, which are actually being followed and that those very “restrictions”, are giving good results!!

    Always good to know of the diversity of india too – and good to know that there is so much freedom to flourish, even with different ideologies.

    Good wishes and good health for your entire family, for all the time to come!

    Please do keep on enlightening us like this!

  11. अन्नपूर्णा Says:

    बहुत अच्छा लगा आपके परिवार से मिलकर ।

    आपकी आदर्श जीवन शैली तो अनुकरणी है ।

  12. G Vishwanath Says:

    शास्त्रीजी,
    नमस्कार,
    हिन्दी जाल-जगत से हाल ही में मेरा परिचय हुआ है ।
    मेरी मातृभाषा भी हिन्दी नहीं है और मेरे पूर्वज केरळ के निवासी थे ।
    आपके लेख पढ़ने लगा हूँ और प्रोत्साहित होता हूँ ।
    इतने सालों से केवल अंग्रेज़ी में लिखते आया हूँ और आशा है कि किसी दिन मैं भी आप जैसा हिन्दी में लिख सकूँगा ।
    परिवार की इस मोहक तसवीर देखकर दिल भर आया ।
    मेरे और आप की आयू में ज्यादा अन्तर नहीं है ।
    मेरा परिवार भी आप के परिवार जैसा ही है (तीस साल की शादी-शुदा बेटी और इक्कीस साल का बेटा)
    पेशे से सन्यास अवश्य लीजिये पर चिट्टाकारी से कभी सन्यास न लें !
    शुबकामनाए!
    G विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु

  13. durga! Says:

    sir,

    विश्वनाथ जी ने बहुत अच्छा लिखा है
    “पेशे से सन्यास अवश्य लीजिये पर चिट्टाकारी से कभी सन्यास न लें !
    शुबकामनाए!”

    मैं भी यही कामना करता हूँ की आप यूँ ही(या और ज्यादा!! :-) ) चिट्टाकारी करते रहें और साथ ही अन्य चिट्टाकारों का भी मार्गदर्शन करते रहें! आपका बहुत बहुत
    शुक्रिया!
    शुबकामनाए!

  14. प्रभात टन्डन Says:

    ईसाई धर्म कॆ इस नये संप्रदाय के बारे मे सुनकर और देखकर बहुत अच्छा लगा । सच तो यही है कि हर धर्मवालंबी को ऐसे ही समाज के संरचना अपने धर्म के दायरे मे रह कर करलेना चाहिये । लेकिन शास्त्री जी मै जानना चाहता हूँ कि क्या यह ईसाई धर्म की मूल भावना से हटकर है ।

  15. mamta Says:

    आपके परिवार से मिलकर बहुत अच्छा लगा।

  16. Shastri JC Philip Says:

    @प्रभात टन्डन

    प्रभात जी, इस संप्रदाय ने ईसाई धर्म की मूल भावना की ओर वापस जाने करने की कोशिश की है. इस संप्रदाय में कर्मकांडों की कमी, पुरोहितोंपादरियों के नियंत्रण से मुक्ति, एवं धार्मिकसामाजिक अराजकत्व पर नियंत्रण, निराकार निर्गुण परब्रह्म की आराधना, आदि ईसाई धर्म की मूल अवधारणा है. आजकर ईसाई धर्म का जो कर्मकांडी स्वभाव एवं पश्चिम का प्रभाव दिखता है वह ईसाई धर्म का विकृत स्वरूप है, मूल स्वरूप नहीं

    यह विकृत स्वरूप, खास कर उत्तरभारत में, अंग्रेजों के प्रभाव के कारण उत्पन्न हुआ था. दक्षिण में इस तरह का प्रभाव कम दिखता है. दक्षिण में ईसाई धर्म पिछले 2000 साल से फल फूल रहा है, एवं अंग्रेजों का असर नाम मात्र को हुआ है. मेरे परदादा एवं दादा कट्टर अंग्रेज-विरोधी एवं फिरंगी-विरोधाई थे — शास्त्री

  17. प्रतीक पाण्डे Says:

    वाह! बढ़िया तस्वीर है। लेकिन आपने अपने परिवार के बारे में तो कुछ लिखा ही नहीं।

  18. Shastri JC Philip Says:

    @प्रतीक पाण्डे
    प्रिय प्रतीक, मेरा बेटा आनंद फिलिप सी एम सी वेल्लोर में डॉक्टर है. बिटिया कु. आशा फिलिप आदिशंकर महाविद्यालय में एमबीए अंतिम वर्ष की छात्रा है एवं अभी से उसे नौकरी के लिये कई कंपनियों से निमंत्रण मिल चुका है. धर्मपत्नी सौ़ शांता फिलिप ऑफिस सेक्रेट्री थी लेकिन पतिबच्चों के लिये वह छोड कर घरपरिवार संभाल रही है. उनका सहयोग मेरी सफलता का एक राज है.

    घर पर एक अच्छीखासी लाईब्रेरी है जिस कारण हम में से किसी को घर पर टीवी का न होना खटकता नहीं है — शास्त्री

  19. अजय यादव Says:

    श्रद्धेय शाष्त्री जी!
    आपको अक्सर पढ़ता रहा हूँ और आपको पढ़कर कोई भी ऐसा होगा जो आपसे प्रभावित न हो, मैं नहीं मान सकता. आज आपके परिवार व आपके इस संप्रदाय के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा. यद्यपि आपके सुपुत्र डॉक्टर आनंद के अतिरिक्त बाकी परिवार का एक चित्र सजीव जी के चिट्ठे पर देख चुका हूँ पर आज उनसे भी मिल लिये. (चित्र से ही सही)धन्यवाद!

  20. लावण्या/ Lavanya Says:

    शास्त्री जी ,
    नमस्ते !
    आपके परिवार से इस चित्र के जरीये मिलकर प्रसन्नता हुई !
    आपने अपने धर्म के बारे मेँ जो बतलाया उसे सुनकर अचरज के साथ खुशी भी हुई.
    बँबई के माउन्ट मेरी के चर्च, बान्द्रा मेँ हम अक्सर, घर से पैदल चल कर जाते थे.
    अरब समुद्र के सामने छोटी पहाडी पे बसा ये चर्च बेहद खूबसुरत है.
    और मेरी आस्था का एक केन्द्र भी है ~~ अन्य, मम्दिरोँ के साथ !
    सादर स स्नेह,
    – लावण्या

  21. sajeev Says:

    अरे वाह शास्त्रीजी, माफ़ कीजिये ये चिटठा मे पहले नही पढ़ पाया, बहुत अछा लगा आप सब को एक बार फ़िर अपने कंप्यूटर पर देख कर, आप सब को मेरा नमस्कार, brethen समाज के बारे में आज आपने सब को बता दिया, मैंने आपकी site भी देखी आज, पर जीवन के ये नियम सचमुच बेहद मुश्किल हैं अपनाने, क्या सरल होकर जी कर भी हम पवित्र नही रह सकते, परिणाम अच्छे मिले हैं सच होंगे, लेकिन शायद मुझे अभी यह विचारधारा काफी संकीर्ण ही प्रतीत हो रही है, मेरी किसी बात को अन्यथा मत लीजियेगा, आप सब बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, ढेर साड़ी शुभकामनायें

  22. श्रीश शर्मा Says:

    शास्त्री जी एकाध अपवाद को छोड़कर (जैसे महिलाओं के रंगीन वस्त्र पहनने पर पाबंदी) आपके समाज के नियम बहुत ही प्रशंसनीय तथा अनुकरणीय हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो आपका समाज भारतीय संस्कृति का जीता-जागता उदाहरण है।

    आपके बारे में उपरोक्त बातें जानकर आपके प्रति श्रद्धा और बढ़ गई। ईश्वर आप सब पर स्नेह बनाए रखे।

  23. deepanjali Says:

    आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा.
    ऎसेही लिखेते रहिये.
    क्यों न आप अपना ब्लोग ब्लोगअड्डा में शामिल कर के अपने विचार ऒंर लोगों तक पहुंचाते.
    जो हमे अच्छा लगे.
    वो सबको पता चले.
    ऎसा छोटासा प्रयास है.
    हमारे इस प्रयास में.
    आप भी शामिल हो जाइयॆ.
    एक बार ब्लोग अड्डा में आके देखिये.

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