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यौनजीवन: भारतीय अवधारणा
September 20, 2007 |
[भारतीय यौनशिक्षा लेखन परंपरा क्रमांक 001] आज हिन्दुस्तान में यौन शिक्षा की आवश्यक्ता पर बहुत बहस हो रही है. लेकिन यौन शिक्षा के अधिकतर भारतीय पक्षधर यह नहीं जानते कि वे इस के पाश्चात्य अवधारणा का समर्थन कर रहे हैं जबकि वह अवधारणा पश्चिम में यौनसंबंधों को एवं परिवारों को बर्बाद कर चुका है. हमें जरूरत है हिन्दुस्तानी अवधारणा की जिसको भारतीय चितकों एवं मनीषियों ने सहस्त्रों सालों में सोचविचार करके, ठोकपीटक देख कर, भारतीय सामाजिक चिंतन के अनुरूप तय्यार किया है. इस लेखन परंपरा में इस विषय पर विस्तार से चर्चा होगी, अत: इस परंपरा को पूरी तरह पढ कर ही इस विषय पर अपनी धारणा बनायें.
1. यौन जीवन पर भारतीय अवधारणा सहस्त्रो साल के विचारमंथन का परिणाम है. यह विचारमंथन बहुआयामी था एवं शारीरीक भोग से लेकर समाधि तक के विषयों के आधार पर किया गया था. प्राचीन भारतीय साहित्य (भर्तृहरि शतकम, वात्स्यायन का कामसूत्र) से लेकर आधुनिक भारतीय साहित्य मे (संभोग से समाधि तक) इस चर्चा एवं विचारमंथन के विभिन्न पहलू देखे जा सकते है.
2. भारतीय अवधारणा प्रकृति के निरीक्षण के आधार पर विकसित की गई है. प्रकृति में हर ओर एक द्वयात्मकता दिखती है. जहां रात है वहा दिन भी है. सफेद/काला, गर्म/ठंडा, सत्य/असत्य, राजसी/तामसिक, आदि.
3. जहां पश्चिम इस द्वयात्मकता को प्रतियोगिता या विरोधाभास मानता है वहां भारतीय चिंतन इसको पूरण मानता है. जहां द्वयात्मकता है वहां दो चीजें एक दूसरे की प्रतियोगी नहीं है, एक दूसरे के शोषण का प्रयत्न नहीं कर रहे, बल्कि एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करने की कोशिश कर रहे है.
4. चेतन प्रकृति में यह पूरण नर एवं मादा के रूप में देखा जाता है. चूकि यह पूरण प्रकृतिदत्त है, अत: यह ईश्वरदत्त भी है.
इन निरीक्षणों के आधार पर भारतीय यौन चिंतन स्त्रीपुरुष को एक दूसरे के पूरक के रूप में देखता है. यौनसंबंध इस पूरण का एक हिस्सा मात्र है. चूकि यह एक ईश्वरदत्त कार्य है अत: इसका आधार स्वार्थ नहीं बल्कि भक्ति एवं परस्पर समर्पण होना चाहिये. यह वर्तमान पश्चिमी यौन अवधारणा से एक दम विपरीत चिंतन है. वर्तमान पश्चिमी अवधारणा सिर्फ भोग पर आधारित है.
पृष्ठभूमि:
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” yaun-shiksha kee bharteeya awadharna” rochak vishay hai.ham aapkee pooree baat jananaa chahenge.
lekin ek baat pahle saaf ho jaanee chahiye.
kathmulle dharmdhawjee khud sex- education ke hee khilaf hain, n ki iskee american awadharnaa ke.
unke hisaab se sex ko education kaa vishay banana hee paap hai.
bhartiya yaun -shikshaa kee samriddh paramparaa ko dekhate huye ,jaahir hai ,ki dharm ke SHAKHA-MRIGON kee ye soch pooree tarah gair-bhartiya hai.
we nahi jaante ki sex ko paap samajhanaa aur uske baare me vyaapak agyaan ko badhawaa denaa khud ek pashchimi vichar hai. jiske khilaaf FREUD KO EK POOREE VAICHARIK KRANTI KARNEE PADEE THEE. freud kee anek baten bahas-talab ho saktee hain, lekin usne sex ko sin samajhane ke pashchimee sanskaar ke khilaaf bagaawt kee thee.
dharmdhwajee kathmulle victorian morality ko bhartiya samajh kar kaleje se chipkaye huye hain.
we nahi jaante ki sex ko paap samjhanaa hee sabhee vikritiyon aur amaanveeutayon kaa mool srot hai.
ya shayad we jaante bhee hon. aur jaanboojh kar ye paap kar rahe hon.shayad we jaante hon ki manushya kee swatantra prgyaa ka daman karne ke liye sabse pahle uskee sexuality kaa daman karnaa jarooree hota hai.
ham pashchim kee vikritiyon se bach saken iske liye sex-education aur bhee jarooree hai.
chahe wah bhartiy awdharnaa par aadharit ho,chahe duniyaa kee sabhee sanskritiyon me jo sarvsreshth hai us sab par.
kathmulle dharmdhwjee to n KAMSUTRA ko pacha payenge ,n GEETGOVIND ko, n INTERPETATION OF DREAMS ko.
sabse pahle ye tay honaa hai ki yaun -shiksha chahiye ya nahi.wah bhartiya hogee ki american -ye baat uske baad hee tay ho saktee hai.
अगली कड़ी की प्रतीक्षा है।
गुरूजी आपका यह लेख सचमुच बहुत ही रोचक और उपयोगी है.क्यों कि यौन धारणाओं के बारे में सार्थक चर्चा बहुत ही कम देखने में आती है,.