इस हफ्ते "चिट्ठालोक" (www.Chitthalok.com ) नामक एक ब्लॉग डायरेक्टरी चालू हो गई है. हिन्दी चिट्ठों की सूची के रूप में बनाई जा रही इस डायरेक्टरी को पूरी तरह से अंग्रेजी में तय्यार किया जा रहा है, एवं इसके पीछे एक बहुत अधिक सोचीसमझी रणनीति है, जो इस प्रकार है: आज अच्छे हिन्दी चिट्ठों को हिन्दीजगत से जितने पाठक मिलते हैं, उससे तिगुने या चौगुने पाठक गैरहिन्दी जगत से मिल सकते हैं. इसका कारण यह है कि जिस तरह से आज हिन्दुस्तानी शालेय एवं महाविद्यालयीन तल पर फ्रेंच, अरबी, रशियन, जर्मन एवं कई अन्य विदेशी भाषायें ऐच्छिक विषय के रूप में पढाई जाती हैं उसी तरह अब हिन्दी एक एच्छिक विषय के रूप में आज अमरीका, कनाडा, एवं यूरोप के कई देशों में पढाई जाती है. सितंबर 2007 में अमरीकी सरकार ने अमरीकी शालेय शिक्षा में हिन्दी के लिये करोडों रुपये स्वीकृत किया है एवं यह आदेश निकाला है कि हिन्दी को अमरीकी शालेय शिक्षा का एक स्थाई हिस्सा बनाया जा रहा है. ये विदेशी विद्यार्थी जैसे ही हिन्दी सीखना शुरू करते हैं वैसे ही वे भारतीय हिन्दी चिट्ठों को तलाशना शुरू कर देते हैं. ये लोग हर चिट्ठे पर आगंतुकों की संख्या मे आज की तुलना में चार गुना वृद्धि कर सकते हैं बशर्ते उनकी खोज में आपका चिट्ठा उनकी नजर में पड जाये. सन 2010 तक विदेशी हिन्दी विद्यार्थीयों की संख्या लाखों मे पहुंचने की संभावना है. इन सुअवसर का अधिकतम लाभ उठाने के लिये, एवं विदेशी हिन्दी विद्यार्थीयों को हिन्दी चिट्ठों की तरफ आकर्षित करने के लिये सारथी नई पेशकश है: चिट्ठालोक (www.Chitthalok.com) चिट्ठालोक हिन्दी चिट्ठों की एक अंग्रेजी डायरेक्टरी है, एवं इसका लक्ष्य विदेशी हिन्दी विद्यार्थी हैं. चिट्ठालोक पर आपके चिट्ठे को पंजीकृत करवाना बहुत ही आसान है. सिर्फ निम्न दो काम करने होंगे: 1. चिट्ठालोक (http://www.ChitthaLok.Com ) पर पधार कर "Add Your Link " को चटका कर अपने चिट्ठे की जानकारी भर दें. जानकारी प्रदान करने के कुछ ही घंटों में जानकारी की जांच करके आप को आपका कूट शब्द भेज दिया जायगा. 2. जैसे ही आप इस कूट शब्द को अपने चिट्ठे पर जोड कर हमें सूचित करेंगे, वैसे ही आपका चिट्ठा चिट्ठालोक पर जोड दिया जायगा. 3. कृपया सारी जानकारी अंग्रेजी में भरें. व्याकरण आदि को सुधारने की जरूरत पडी तो हमारी ओर से संपादन कर के सुधार दिया जायगा. आप हर चिट्ठे को 2 अलग अलग केटगरी में जोड सकते हैं. चिट्ठालोक अंग्रेजी राज्यों के हिन्दीविद्यार्थीयों के बीच प्रचार एवं प्रसिद्धि पा सके उसके लिये सारथी ने कई अमरीकी एवं यूरोपीय हिन्दीविद्यार्थीयों की मदद ली है जो दिसंबर 2007 के पहले चिट्ठालोक की कडियां लगभग 5000 अमरीकी एवं यूरोपीय चिट्ठो, जालस्थलों, खोज यंत्रों, एवं डायरेक्टरियों में जोड देंगे. अत: चिट्ठालोक से संभावित चिट्ठा-ट्रेफिक का फायदा प्राप्त करने के लिये आज ही चिट्ठालोक पर अपने हिन्दी चिट्ठे को पंजीकृत करवा लें. हमारी चिट्ठा जोडने की नीति पूरी तरह से उदार है एवं यदि आपका चिट्ठा सरकार द्वारा प्रतिबंधित नहीं है एवं भारतीय संविधान के विरुद्ध नहीं है तो चिट्ठालोक पर आपका हार्दिक स्वागत है.
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September 19th, 2007 at 7:29 am
हिन्दी ब्लॉग और अन्ग्रेजी जगत के बीच यह interface बहुत जरूरी था. आपका ध्यान गया और आपने पहल की – धन्यवाद.
September 19th, 2007 at 8:30 am
सारथी जी, बेहद सार्थक कदम है। बहुत-बहुत शुक्रिया
September 19th, 2007 at 9:08 am
this what i always said ” hindi ko aagae lane kae liyae agrazee ka bahishkar na karkae uska upyog karae ” http://masijeevi.blogspot.com/2007/08/blog-post_04.html
is the post where masjeev made fun of people like me and gyandutt for using hindi-english simultaneously
आज अच्छे हिन्दी चिट्ठों को हिन्दीजगत से जितने पाठक
मिलते हैं, उससे तिगुने या चौगुने पाठक गैरहिन्दी जगत
से मिल सकते हैं.
i also firmly believe that to promote hindi we need to read more english blogs by teen agers , school goer indian , young netizeins and then bring them gradually to hindi
today i feel my point has been validated
September 19th, 2007 at 9:16 am
अच्छा प्रयास
September 19th, 2007 at 9:28 am
सारथी का अपने नाम को चरितार्थ करता सार्थक, सराहनीय प्रयास.
बहुत बहुत शुभकामनाये
http://www.yatishjain.com
September 19th, 2007 at 11:14 am
हमी लोग है जो कहते है “आज हिन्दी अपने देश में पराई हो गई”! किसी ने मगर सोचा नही क्यों! हिन्दी ब्लोग्स पर ख़ूब कमेंट कर ने वालो में कितने हैं जिनके बच्चे हिन्दी स्कूल में जाते है, कितने है जिस ने अपने बच्चे को “राम-राम” या “नमस्ते” बोलना सिखाया है! और रही इंग्लिश , सभी जानते है इतनी मेहनत है उसके इस मुकाम तक आने में और क्या हम एक कदम भी चलते है हिन्दी के साथ! मैं पिछले १० महीनो से मैसूर में हूँ और दिन भर दक्षिण भारतीय लोगो में ही रहता हूँ! ९०% उनमे ऐसे है जो हिन्दी बोलना नही चाहते और ना उनको आती है और बहुत सुंदर तर्क है कि हमे इस की जरुरत नही! जब अपने लोग ही इस को सम्मान नही दे सकते हो ये तो होना ही है!आप यकीन जानिये बहुत तर्क -वितर्क होता है मेरा इनसे और मैं जहाँ तक हो सके हिन्दी ही ब्लोता हूँ! मैं कभी इंग्लिश को बुरा नही मानता, कारन है की यह विश्व स्तर पेर बोली जाती है और तकनिकी ज्ञान के लीये जरुरी है ! मगर हिन्दी के विकास को करने लिए हमे बहुत मेहनत की जरुरत है ! और इस के लिए किसी भी भाषा या मध्यम का प्रयोग किया जा सकता है! वैसे भी किसी ने सत्य कहा है,” भाषा तोड़ती नही, जोड़ती है!”.
बहुत ही अच्छा प्रयास है आप का, सुभकाम्नाये !
September 19th, 2007 at 1:50 pm
शास्त्री जी बहुत ही अच्छा प्रयास,,मुबारक
September 19th, 2007 at 2:07 pm
एक सराहनीय प्रयास.
नये पाठक भी मिलेंगे और नये लिंक्स भी बनेंगे.
बधाई
September 19th, 2007 at 6:42 pm
बहुत बढ़िया कदम!! सराहनीय!!
September 19th, 2007 at 8:11 pm
बहुत सार्थक प्रयास शास्त्री जी, ईश्वर आपकी सहायता करे।