दुनिया के असली अजूबे

KaviKulwant हाल फिलहाल एक हुआ तमाशा,
दुनिया वालों दो ध्यान जरा सा।
विश्व में नए अजूबे चुने गए,
एस एम एस से वोटिंग किए गए।
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करोड़ों का हुआ वारा – न्यारा,
देकर वास्ता इज्जत का यारा।
भोली जनता को बनाया गया,
ताज के नाम पर फंसाया गया।
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मीडिया भी बेफकूफ बन गई,
वह भी ताज के पीछे पड़ गई।
जनता से सबने गुहार लगाई,
जितने चाहो वोट दो भाई।
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वोट के नाम पर खूब कमाया,
भीख मांगने का नया तरीका पाया।
अरे भाई! ताज कहाँ अजूबा है ?
वहाँ तो सोई बस एक महबूबा है!
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आज के युग में कितनी तरक्की है,
ट्रेनें, हवाई-जहाज, सड़क पक्की है।
राकेट, मिसाईल, कारें, सितारा होटल हैं,
खुलती दिन रात जहाँ शैंपेन बोटल हैं।
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आओ दिखाता हूँ मै आपको सच्ची अजूबे,
प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।
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विश्व का प्रथम अजूबा – ध्यान दें !
मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर कर दिखला दें!
कोई माई का लाल साबित कर दे,
इससे बड़ा अजूबा दुनिया में दिखा दे।
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आओ दिखाता हूँ मैं आपको सच्ची अजूबे,
प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।
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दूसरा अजूबा भी हमारे देश में,
नजरें उठा कर देख लो किसी भी शहर गली में।
कचरे के डब्बों से खाना ढ़ूंढ़ता आदमी,
उसी को खा कर अपनी भूख मिटाता आदमी।
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आओ दिखाता हूँ मै आपको सच्ची अजूबे,
प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।
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तीसरा अजूबा – कीड़ों सा रेंगता आदमी,
स्लम, फुटपाथ, ट्रैक पर जीवन बिताता आदमी।
सड़कों पर सुबह, लोटा लेकर बैठा आदमी,
देखिए अजूबा, मजबूर कितना आदमी।
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और भी कितने अजूबे हैं हमारे देश में,
एक एक कर गिनाना है न मेरे बस में।
एक एक कर गिनाना है न मेरे बस में॥
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कवि कुलवंत सिंह

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4 Responses to “दुनिया के असली अजूबे”

  1. brijesh Says:

    Dhnyabad aapki is dilchasp kavita ki liye.

  2. नीरज दीवान Says:

    ग़ज़ब की कविता है. आम आदमी की व्यथा को चित्रित किया है. सही है.. आम नागरिक हर दिन अपना युद्ध लड़ता है.. यह अजूबा है. विसंगितों से जूझता इंसान…

    और भी कितने अजूबे हैं हमारे देश में,
    एक एक कर गिनाना है न मेरे बस में।

  3. rachna Says:

    true depiction of todays conditions

  4. Dr.Bhawna Kunwar Says:

    कुलवंत जी आपकी रचना से आँखों के आगे चित्र उभर आये हैं बहुत अच्छा चित्रित किया है आपने जमाने की हकीकत को बहुत-बहुत बधाई…

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