आदमी भी ख़त्म हो गया और आदमीयत भी…..!

मैं काफी नियमित रूप से चिट्ठों पर छपी कविताएं पढता हू. भला हो उन हिन्दी मास्टरों का जिन्होंने डंडे मार मार कर हमारे मन में भाषा के प्रति समर्पण कूट कूट कर भर दिया. आज मैं अपने भाषा अध्यापिकाओं महादेवी गुप्ता, शकुंतला दुग्गल, एवं जया मिश्रा को बहुत याद करता हूं. मेरे जीवन में काव्य के प्रति झुकाव इनकी विरासत है.

RavindraPrabhat काव्य आस्वादन के दौरान दसपचास कविताओं के पाठ के बाद अचानक एक कविता नजर आ जाती है जिसका एक एक वाक्य दिल को छू लेता है, चुनौती देता है, एवं बार बार कानों मे सुनाई देता है. ये जीवन के शाश्वत मूल्यों पर, कालजई विषयों पर, या जीवन की गहनतम भावनाओं पर आधारित होती हैं.

पिछले दिनों रवींद्र प्रभात की इस कविता ने एक दम मुझे आकर्षित किया. उनकी अनुमति से प्रस्तुत है: आदमी भी ख़त्म हो गया और आदमीयत भी…..! यह कविता हम सब को एक बेहतर मानव बनने का प्रोत्साहन प्रदान करे.

बहुत पहले-
लिखे जाते थे मौसमो के गीत जब
रची जाती थी प्रणय कीकथाऔर –
कविगण करते थे
देश-काल की घटनाओं पर चर्चा

तब कविताओं मेंढका होता था युवतियों का ज़िस्म….!
सुंदर दिखती थी लड़कियाँ
करते थे लोग
सच्चे मन से प्रेम
और जानते थे प्रेम की परिभाषा….!

बहुत पहले-
सामाजिक सरांध फैलाने वाले ख़ाटमलों की
नहीं उतारी जाती थी आरती
अपने कुकर्मों पर बहाने के लिए
शेष थे कुछ आँसू
तब ज़िंदा थी नैतिकता
और हाशिए पर कुछ गिने – चुने रक़्तपात….!

तब साधुओं के भेष में
नहीं घूमते थे चोर-उचक्के
सड़कों पर रक़्त बहाकर
नहीं किया जाता था धमनियों का अपमान
तब कोई सम्वन्ध भी नहीं था
बेहयाई का वेशर्मी के साथ….!

बहुत पहले-
शाम होत
सुनसान नहीं हो जाती थी सड़कें
गली-मोहल्ले/ गाँव- गिरांव आदि
असमय बंद नहीं हो जाती थी खिड़कियाँ
माँगने पर भी नहीं मिलता था
आगज़ला सौगात
तब दर्द उठने पर
सिसकने की पूरी छूट तीब
और सन्नाटे में भी
प्रसारित होते थे वक़्तव्य
खुलेयाम दर्ज़ा दिया जाता था कश्मीर को
धरती के स्वर्ग का…..!

अब तो टूटने लगा हैं मिथक
चटखने लगी है आस्थाएं
और दरकने लगी हैं
हमारी बची- खुची तहजीव……!

दरअसल आदमी
नहीं रह गया है आदमी अब
उसीप्रकार जैसे-
ख़त्म हो गयी समाज से सादगी
आदमी भी ख़त्म हो गया
और आदमीअत भी…..!
() रवीन्द्र प्रभात

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5 Responses to “आदमी भी ख़त्म हो गया और आदमीयत भी…..!”

  1. rachna Says:

    achcha likha hae aap nae ravindre
    एक समय था
    जब माँ के घर से जो आता था
    मौसी मामा नानी नाना
    कहलाता था
    पूरा पडोस मायेका होता था
    पिता के दोस्त चाचा ताऊ होते थे
    जिनके कंधे पर चढ़ता था बचपन
    आस पड़ोस मे लडकिया नहीं
    बुआ , मौसी , मामी , चाची रहती थी
    जिनकी गोदीयों मे सुरक्षित
    रहता था बचपन
    हमे तो मिले है संस्कार बहुत
    क्या हम दे रहे है अगली पीढ़ी को
    एक डर एक सहमा हुआ बचपन
    क्यो खो रहे है रिश्ते
    ज़िन्दगी की भीढ़ मे

  2. बसन्त आर्य Says:

    आपने अच्छा खन्गाला और मोती निकाल कर लाये. आपका काम वाकई महत्वपूर्ण है सार्थक है. धन्यवाद

  3. Sanjeet Tripathi Says:

    बहुत सही लि्खा है!!

  4. mayank mishra Says:

    पढ़कर अच्छा लगा,

  5. अविनाश वाचस्पति Says:

    अच्छा तो अच्छा ही लगेगा.

    सारथी जी के चयन में ऐसे तो नहीं आ गये
    बात में है दम इसीलिये तो मित्र मेरे छा गये

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