आज सारी दुनियां में पाश्चात्य औषध विज्ञान राज्य कर रहा है. इसमें कोई बुराई नहीं है, क्योंकि पाश्चात्य औषध विज्ञान ने मनुष्य को तमाम तरह के मारक रोगों से छुटकारा दिलाया है. लेकिन जब पश्चिमी औषधशास्त्र के पीछे अंधे दौड में भारतीय औषध परंपराओं को हम भूलने लगते है, नकारते हैं, या हेय दृष्टि से देखने लगते हैं तो वह गलत है.
हर प्रकार के औषधि शास्त्र की अपनी विशेषतायें है. अत: एक के अंधानुकरण के कारण दूसरे को नजरअदाज करने से नुकसान हम को ही है. यदि बिन दवा प्रकृति चिकित्सा से एक बीमारी में काम चल सकता है तो दवा लेना बुद्दिमानी नहीं है. यदि दशमूलारिष्ट से पेट की कोई समस्या हल हो सकती है तो उस समस्या के लिये फिर जबर्दस्ती पश्चिमी दवा खाने में कोई तुक नहीं है.
भारतीय औषध परंपराओं में से आयुर्वेद, प्रकृति चिकित्सा, इलेक्ट्रो होम्योपेथी एवं मसाज चिकित्सा (जिसे केरल में विकसित किया गया है) आदि प्रमुख है. और भी कई देशज पद्दतियां है, जो सही तरीके से ट्रेनिंग प्राप्त चिकित्सक के हाथ बहुत अच्छे परिणाम देते है.
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