टिप्पणी एवं टिप्पणीशास्त्र

कई चिट्ठाकारों का कहना है कि चिट्ठाटिप्पणी का कोई अधिक महत्व नहीं है. लेकिन अन्य लोगों को प्रोत्साहन देने की कोशिश में मेरा निरीक्षण है कि यह एक बहुत सीमित नजरिया है. टिप्पणी सिर्फ एक टिप्पणी है, लेकिन टिप्पणी करना एक सीमित प्रक्रिया न हो कर एक बहु आयामी प्रक्रिया है. इन आयामों को न पहचानने के कारण ही कई चिट्ठाकर इसे एक छोटी सी बात समझ रहे है. असल में जो लोग टिप्पणी के महत्व को कम करने की कोशिश कर रहे है, उन्होंने शायद इन आयामों की तरफ कभी नजर नहीं डाली है.

मेरे अगले लेख में टिप्पणी के बहु आयामों पर प्रकाश डालूंगा, लेकिन इस लेख में सिर्फ एक बात याद दिलाना चाहता हूं: यदि टिप्पणी महज एक अनावश्यक या लघु कार्य है तो प्रबुद्द हिन्दी चिट्ठाकर इस विषय पर इतना अधिक समय न देते. पिछले दो हफ्ते टिप्पणी पर छपे लेखों में दी गई सूचियों से मैं ने कम से कम निम्न लेख ढूढ निकाले है. अभी कम से कम इतने और बचे हैं, एवं टिप्पणीकार उनको भी यहा सूचित कर देंगे तो उन सब को जोड कर एक एतिहासिक दस्तावेज बना कर कालजई पर स्थापित कर दिया जायगा.

यदि अभी भी आप टिप्पणी के महत्व को कम करके आंक रहे हैं तो मै सिर्फ एक बात याद दिलाना चाहता हूं कि इस विषय पर निम्नलिखित सारे लेख, एवं कम से कम इतने ही और लेख स्थापित चिट्ठाकारों ने लिखा है, नवागंतुकों ने नहीं. सिर्फ महत्वपूर्ण विषयों को ही स्थापित चिट्ठाकारों की ओर से इतना समय एवं ध्यान मिल पाता है.

इस विषय पर मेरे मुख्य लेख:
टिप्पणी क्यों करें
चिट्ठों पर टिप्पणी न करें!
क्या टिप्पणी दें ?
चिट्ठों का टिप्पणीशास्त्र परिचय
टिप्पणीकारों को पहचाने !!
टिप्पणीकार मित्रों से निवेदन !

 

जिन लेखों ने इस चर्चा को जीवंत बनाया:
किस्सा-ए-टिप्पणी बटोर : देबाशीष उवाच
टिपें न तो पता कैसे चले कि हम आये थे
प्रोत्साहन ही लिखने वाले का ईधन होता है
ऎसा है हिंदी ब्लॉगित जाति का लिंकित मन
“वाह वाह” या “लिखते रहें” से बेहतर है चुप्‍पी
जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला
हाय टिप्पणी!! काहे टिप्पणी!!
टिप्पणियां जीवन रक्षक दवाएं हैं !!

पृष्ठभूमि समझने में सहायक:
ऎसा है हिंदी ब्लॉगित जाति लिंकित मन
विरही ब्लॉगर, नाहक दुंद मचाय रे….

 

पहली दौर के कुछ लेख:
ब्लाग पर टिप्पणी का महत्व
किलकाती टिप्पणियाँ…
अपना ब्लॉग बेचो रे भाई
अपने ब्लाग की टी आर पी कैसे बढ़ायें
सुभाषित वचन-ब्लाग, ब्लागर, ब्लागिंग
पुनि पुनि बोले संत समीरा
तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊँ
टिप्पणी-निपटान की जल्दी
चिठ्ठे का टी आर पी
रेडीमेड टिप्पणियाँ
हिंदी में चिट्ठाकारी के कारण पर विचार
पीठ खुजाना: पारस्परिक टिप्पणी
टिप्पणियों के जुगाड़
कभी कभी अनहिट, निर्लिंक व टिप्‍पणीशून्‍य भी लिखें

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8 Responses to “टिप्पणी एवं टिप्पणीशास्त्र”

  1. ज्ञानदत्त पाण्डेय Says:

    वाह, इतने सारे लोग इतना सारा लिखते हैं टिप्पणी पर. वास्तव में टिप्पणी की बहुत महिमा है! :)

  2. mamta Says:

    सच है टिप्पणी का अपना ही महत्त्व है जिसे नकारा नही जा सकता है।
    वैसे टिप्पणी के महत्त्व पर हमने भी एक पोस्ट लिखी थी।

  3. Sanjeet Tripathi Says:

    यह सही है कि आपने सभी कड़ियां एक ही जगह पर उपलब्ध कर दी!!

  4. श्रीश शर्मा Says:

    अधिक क्या कहें, टिप्पणी महिमा अनन्त है।

  5. समीर लाल Says:

    इसे भी पहली दौर के कुछ लेख: में जोड़ लें:

    कवि: क्यूँ, कैसे और आप
    http://udantashtari.blogspot.com/2007/02/blog-post_22.html

    :)

  6. हरिराम Says:

    अक्सर विभिन्न चिट्ठों को खोलने और टिप्पणी करने के बॉक्स को खोलने और टिप्पणी भेजने में बहुत समय लग जाता है। कभी कभी टिप्पणी भेजते वक्त कनेक्शन कट जाने या ब्लॉगर की किसी समस्या के कारण सारा परिश्रम व्यर्थ हो जाता है।

    अतः ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि ईमेल के चिट्ठों के लेखों की फीड मिलने पर ई-मेल के उत्तर से टिप्पणी पोस्ट की जा सके। यदि कोई ऐसी व्यवस्था है तो जानकार तकनीकी विशेषज्ञ इस पर एक तकनीकी लेख लिखकर अपने चिट्ठे पर जारी कर सकते हैं।

  7. Sanjeev Kumar Says:

    वास्तव में टिप्पणी की बहुत महिमा है, लेकिन कइयों के लिये हिन्दी टाइप करना अभी भी मुश्किल बना हआ है.

  8. सागर चन्द नाहर Says:

    हरिरामजी का सुझाव वाकई बहुत बढ़िया है, क्यों कि कई बार वर्ड वेरीफिकेशन की वजह से भी लिखी हुई टिप्प्णी मिट जाती है, ऐसा मेरे साथ कई बार हो चुका , इसीलिये वर्ड वेरीफिलेशन वाले चिट्ठों पर टिप्पणी करने में हिचक होती है।

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