प्रकृति

सावन का महीना, प्रकृति की सुंदरता, बरसात.. इस मौसम में एक कविता प्रस्तुत है॥

प्रकृति
सतरंगी परिधान पहन कर,
आच्छादित है मेघ गगन,
प्रकृति छटा बिखरी रुपहली,
चहक रहे द्विज हो मगन ।

कन – कन बरखा की बूंदे,
वसुधा आँचल भिगो रहीं,
किरनें छन – छन कर आतीं,
धरा चुनर है सजो रहीं ।

सरसिज दल तलैया में,
झूम – झूम बल खा रहे,
किसलय कोंपल कुसुम कुंज के,
समीर सुगंधित कर रहे ।

हर लता हर डाली बहकी,
मलयानिल संग ताल मिलाये,
मधुरिम कोकिल की बोली,
सरगम सरिता सुर सजाए ।

कल – कल करती तरंगिणी,
उज्जवल तरल धार संवरते,
जल-कण बिंदु अंशु बिखरते,
माणिक, मोती, हीरक लगते।

मृग शावक कुलाँचे भरता,
गुंजन मधुप मंजरी भाता,
अनुपम सौंदर्य समेटे दृष्य,
लोचन बसता, हृदय लुभाता ।
कवि कुलवंत

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6 Responses to “प्रकृति”

  1. रवीन्द्र प्रभात Says:

    प्रकृति की सुंदरता पर कवि कुलवंत की यह कविता अत्यंत सुंदर है.

  2. समीर लाल Says:

    कुलवंत जी की रचना बहुत पसंद आई. आभार.

  3. कवि कुलवंत Says:

    आप प्रिय मित्रों का बहुत धन्यवाद.. कवि कुलवंत

  4. rachna gupta Says:

    paragraph on prakriti ke mehatav

  5. pankaj Says:

    bahut hi aachi poem hai ye…………prakriti ka mahatav……….

  6. Siddharth Says:

    This is very good poem of nature.

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