सावन का महीना, प्रकृति की सुंदरता, बरसात.. इस मौसम में एक कविता प्रस्तुत है॥
प्रकृति
सतरंगी परिधान पहन कर,
आच्छादित है मेघ गगन,
प्रकृति छटा बिखरी रुपहली,
चहक रहे द्विज हो मगन ।
कन – कन बरखा की बूंदे,
वसुधा आँचल भिगो रहीं,
किरनें छन – छन कर आतीं,
धरा चुनर है सजो रहीं ।
सरसिज दल तलैया में,
झूम – झूम बल खा रहे,
किसलय कोंपल कुसुम कुंज के,
समीर सुगंधित कर रहे ।
हर लता हर डाली बहकी,
मलयानिल संग ताल मिलाये,
मधुरिम कोकिल की बोली,
सरगम सरिता सुर सजाए ।
कल – कल करती तरंगिणी,
उज्जवल तरल धार संवरते,
जल-कण बिंदु अंशु बिखरते,
माणिक, मोती, हीरक लगते।
मृग शावक कुलाँचे भरता,
गुंजन मधुप मंजरी भाता,
अनुपम सौंदर्य समेटे दृष्य,
लोचन बसता, हृदय लुभाता ।
कवि कुलवंत
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इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




September 23rd, 2007 at 6:56 pm
प्रकृति की सुंदरता पर कवि कुलवंत की यह कविता अत्यंत सुंदर है.
September 24th, 2007 at 5:48 am
कुलवंत जी की रचना बहुत पसंद आई. आभार.
March 17th, 2008 at 1:40 pm
आप प्रिय मित्रों का बहुत धन्यवाद.. कवि कुलवंत
November 20th, 2008 at 12:27 pm
paragraph on prakriti ke mehatav
October 21st, 2010 at 9:58 am
bahut hi aachi poem hai ye…………prakriti ka mahatav……….
May 11th, 2011 at 7:43 pm
This is very good poem of nature.