उडिया साहित्य के जनक को भुला दिया गया है

image उन्हें उस आंदोलन का सूत्रपात करने का श्रेय जाता है जिसने भाषायी आधार पर देश में पहली बार किसी राज्य के गठन का रास्ता साफ किया। आधुनिक उडिया साहित्य के जनक कहे जाने वाले इस शख्स की विरासत आज उपेक्षा की मार झेल रही है। आधुनिक उडिया साहित्य के जनक और भाषायी आधार पर देश में प्रथम राज्य के गठन की राह बनाने वाले फकीर मोहन सेनापति का पुश्तैनी घर और बगीचा उपेक्षा की मार झेल रहा है।

शोधकर्ताओं और साहित्य प्रेमियों का मानना है कि फकीर मोहन सेनापति की विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने की गंभीर कोशिश नहीं हो रही है। आधुनिक उडिया समाज में फकीर मोहन को व्यासकवि के नाम से भी जाना जाता है। १८४३ में जन्मे व्यासकवि ने १९१८ में इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। जब फकीर मोहन डेढ वर्ष के थे, उनके पिता का निधन हो गया था। फकीर मोहन ने ‘मो मातृभाषा मोते श्रेष्ठ’ (मेरी मातृभाषा मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ है) का उद्घघोष किया था। उनके इसी इजहार से देश में भाषा के नाम पर पहली बार किसी राज्य के गठन का रास्ता साफ हुआ। १९३६ में उडीसा का भाषायी आधार पर गठन हुआ। व्यासकवि को उडिया पुनर्जागरण का सूत्रपात करने वाले लोगों में से एक माना जाता है।

जिस व्यासकवि ने अपने साहित्यिक अवदान से अपने समाज की इतनी सेवा की, आज उनकी विरासत खतरे में है। राजधानी भुवनेश्वर से २०० किलोमीटर दूर बालासोर जिले के मलिकाशपुर गांव में उनके घर की जिस कदर उपेक्षा हो रही है, वह बेहद दुखद है। उन्होंने लोगों में आत्मसम्मान की भावना फैलाने में कोई कसर नहीं छोडी थी, लेकिन आज उनकी विरासत खतरे में है। उनके जीर्ण-शीर्ण घर को जिस तरीके से पुस्तकालय, म्यूजियम के रूप में तब्दील किया गया है, वह हास्यास्पद है। वर्षों तक उनका यह घर उपेक्षा की मार झेलता रहा और जब उसकी मरम्मत की गयी और उसकी शक्ल बदली गयी तो मौलिकता ही गायब हो गयी। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि यह परिसर उनकी याद में समर्पित नहीं है। इसकी मूल पहचान खत्म हो गयी है और इसमें कुछ देवताओं की प्रतिमाएं लगा दी गयी हैं। कहीं से भी देखने से नहीं लगता कि यह व्यासकवि का घर है।

व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति आधुनिक उड़िया कथा-साहित्य के जनक माने जाते हैं। उनकी कहानी तत्कालीन साहित्यिक पत्रिका ‘बोधदायनी’ में छपी थी। दुर्भाग्यवश वह पत्रिका और ‘लछमनिया’ कहानी भी आज इतिहास के गर्भ में समा गयी हैं।

लोगों का कहना है कि इस घर की जिस हास्यास्पद तरीके से मरम्मत की गयी है, वह अपने आपमें एक मिसाल है कि कैसे देश का सांस्कृतिक विभाग काम कर रहा है। घर के कई स्थानों से पानी का रिसाव दूर से ही देखा जा सकता है। यही हाल उनके गार्डन का है। यहां कई जगह सुंदर नक्काशी की गई थी जो आज गायब हो चुकी है। इस गार्डन की देखभाल के लिए एक माली नियुक्त किया गया था, लेकिन फिलहाल इसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। इससे यह बात साफ तौर पर जाहिर होती है कि राज्य प्रशासन इस साहित्य हस्ती की विरासत के संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं है। [साभार: संजीव कुमार]

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2 Responses to “उडिया साहित्य के जनक को भुला दिया गया है”

  1. ज्ञानदत्त पाण्डेय Says:

    फिक्र न करें – फकीरमोहन सेनापति सरकारी प्रश्रय के मोहताज नहीं हैं.
    जब मुझ एक नॉन-उड़िया के मन में उनकी स्मृति पूर्ण श्रद्धा से युक्त है तो हर उड़िया मानस के मन में उनका स्मारक होगा. सरकारें तो हृदयहीन हुआ ही करती हैं.

  2. हिंदीब्लॉगर Says:

    ‘मो मातृभाषा मोते श्रेष्ठ’ का उदघोष करने वाले महानायक को याद करने के लिए धन्यवाद!

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