मैं सभी सजग हिन्दी चिट्ठाकारों का आह्वान करता हूं कि वे अपने अपने चिट्ठे पर इस गुलामी का विरोध करें. विरोध का कम से कम एक लेख जरूर अपने चिट्ठे पर दे!
यह लेख रोमन लिपि परिषद के सदस्य बनिये अभी अभी मेरी नजर में पडा है, एवं मेरी नजर में हिन्दीप्रेमी एवं देशप्रेमियों को नखशिखांत इसका विरोध करना चाहिये.
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October 1st, 2007 at 12:02 pm
इस बेवकुफी को ज्यादा भाव देने की आवश्यक्ता कहाँ है सरकार. हम इस चिट्ठे पर पहले ही अपनी बात कह आये है. बाकि चिट्ठाकार भी अपना मत दे आये.
अपनी बात कहने का सबको अधिकार है मगर जो बात खराब लगी वह है, भारतीय लिपियों को उलजलूल कहना.
October 1st, 2007 at 1:43 pm
26 जनवरी 1984 को भारतीय भाषाओं को इधर उधर फैली ऊट पंटाग लिपियों से मुक्ति दिलाने के लिये रोमन लिपि परिषद की स्थापना की गई है।
this detrogaotery language is of the blog author जगत चन्द्र पटराकर ‘महारथी’ the original web site is http://www.mngogate.com
October 1st, 2007 at 2:21 pm
भारतीय लिपियों को किस आधार पर यह साहब उलजलूल कह सकते हैं।
इनके चिट्ठे पर विरोध दर्ज करवा दिया गया है।
October 1st, 2007 at 5:56 pm
शास्त्री जी, सब इनके विरोध में भी लिखेंगे तो भी विज्ञापन तो इन्हीं का होगा. इस पर सीधे विरोध दर्ज कर नजर अंदाज कर देना चाहिये.
October 1st, 2007 at 7:39 pm
इस बंदे के बारे में लेख लिखकर इनका प्रचार ही होगा। अतः चिट्ठे पर ही विरोध जताना उचित है।
इन महोदयों की बुद्धि पर तरस आता है। लिपि किसी भी भाषा की आत्मा होती है। उसके बिना भाषा की सुन्दरता ही नष्ट हो जाती है।
देवनागरी जो कि संसार की सबसे वैज्ञानिक लिपि है, उसको छोड़ ये लोग रोमन का पक्ष ले रहे हैं जो कि अत्यंत हास्यास्पद है।
फिलहाल आप चिंतित न हों, ऐसे अक्लमंदों के प्रयासों से लोग देवनागरी छोड़ रोमनागरी नहीं अपनाने वाले।
October 2nd, 2007 at 11:31 am
हिंदी या किसी भी दूसरी भाषा को उसकी लिपि से दूर करने की कोशिश गलत है। हम कड़े शब्दों में इसकी मुखालफत करते हैं।
October 5th, 2007 at 2:48 pm
मेरे ख्याल से तो इसे यहीं इसके ही हाल पर छोड़ देना चाहिये.. जब 1984 से अभी तक ये हमारे देवनागरी का कुछ नहीं बिगाड़ पाया है तो अब क्या बिगाड़ेगा…