मैं खुद स्वभाव से बहुत टिप्पणियां नहीं करता. पांच-दस टिप्पणियों को मैं कोई उपलब्धि नहीं मानता. चार-पांच सौ सक्रिय ब्लागरों के बीच पांच-दस टिप्पणियों का क्या महत्व हो सकता है भला? लेकिन मैं अपने बारे में ही सोचता हूं तो लगता है कि देना हमारे स्वभाव से निकल गया है. अंदर से हम इतने दीन हो गये हैं कि हमें प्राप्ति की उम्मीद रहती है लेकिन हम भी किसी को कुछ दे सकते हैं इसका भान ही नहीं रहता. यही स्वभाव हमारी ब्लागरी में भी दिख रहा है. लिखनेवाले सैकड़ों और टिप्पणी करने वाले गिने-चुने लोग? इसका मतलब है कि हम सैकड़ों अनुदार लोगों के बीच कुछ उदार लोग हैं. शायद ब्लागरी उनके ही कारण इतनी जीवंत है. हमें यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि हम ब्रह्मवाक्य रच रहे हैं जिसे अपने-आप पाठक मिलेंगे. और हमारे लिखे को लोग न भी पढ़ें तो उनका दिन आराम से गुजर जाएगा. यह तो उन पाठकों की उदारता है जो यह जानते हुए पढ़ते हैं कि बिना पढ़े भी काम चल सकता है. और फिर उदारता की पराकाष्ठा यह कि वे टिप्पणी करते हैं. यह उदारता हम आप अपने अंदर क्यों विकसित नहीं कर सकते? यह तो हुई स्वभाव की बात लेकिन एक व्यावसायिक बात भी छिपी है टिप्पणियों के पीछे. आप जिनती अधिक टिप्पणियां करते हैं अपने ब्लाग के लिए उतना अधिक संपर्कसूत्र विकसित करते हैं. ऐसे चिट्ठाकार जो अपने ब्लाग्स का विज्ञापन नहीं कर सकते टिप्पणी उनके ब्लाग प्रमोशन का अच्छा हथियार है. जितने अधिक चिट्ठों के पोस्ट पर आपकी टिप्पणियां होंगी अपने चिट्ठे के लिए आप उतने ही अधिक लिंक तैयार करते हैं. चिट्ठाजगत बता रहा है कि उसके रिकार्ड में 25,791 प्रवृष्टियां दर्ज हैं. इतनी प्रवृष्टियों के जितने पृष्ठों पर हमारी टिप्पणी होगी उतना ही हमारे ब्लाग तक आने के लिए लोगों के लिए रास्ते खुलेंगे. मान लीजिए कोई हिन्दी में खोज करता है और वह ऐसी प्रवृष्टि पर पहुंचता है जहां आपने टिप्पणी की है. तो आप ऐसे अनजान पाठकों के लिए अपने ब्लाग के रास्ते खोलते हैं जो न एग्रीगेटरों को जानते हैं और न ब्लाग की गुटबाजी को. उम्दा लेखन के अपने-अपने पैमाने हैं. उतार-चढ़ाव तो आते रहेंगे. लेकिन टिप्पणियों के माध्यम से आप अपने चिट्ठों के लिए जो स्थाई लिंक तैयार करेंगे वे सदैव आपके ब्लाग को पाठकों से लबरेज रखेंगे. तय मानिये जिस चिट्ठे पर आप टिप्पणी करके आते हैं उस चिट्ठाकार के साथ आपका एक भावनात्मक रिश्ता जुड़ जाता है, जो शायद हमारी चिट्ठाकारिता का अंतिम उद्येश्य है. [साभार, टिप्पणी करते हैं आप अपने लिए] आपने चिट्ठे पर विदेशी हिन्दी पाठकों के अनवरत प्रवाह प्राप्त करने के लिये उसे आज ही हिन्दी चिट्ठों की अंग्रेजी दिग्दर्शिका चिट्ठालोक पर पंजीकृत करें!
कंजूसी हमेशा नुकसानदेह होती है. दूसरों के लिए और अपने लिए भी. हिन्दी के चिट्ठाकार आमतौर पर टिप्पणी के मामले में कंजूसी बरतते हैं. यह दूसरों के लिए जितना नुकसान हो सकता है उससे ज्यादा नुकसान यह कंजूसी खुद हमारे लिए भी हो सकती है. बात थोड़ी अटपटी है लेकिन आईये इसे समझते हैं.
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इस विभाग के पिछले 10 पोस्ट




October 5th, 2007 at 2:59 pm
आपकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं.. सारथी जी, ज्ञानदत्त जी, उड़न तस्तरी जी, प्रदीप जी, और भी ना जाने हिंदी ब्लौग की दुनिया के कितने ही जाने-पहचाने लोग मेरे ब्लौग पर आने लगे हैं जब से मैंने टिप्पणीयों का सिलसिला शुरू किया था।
October 5th, 2007 at 6:33 pm
संजय भाई का गहन शोध जारी है. परिणाम अच्छे आयेंगे, यह तय है. शुभकामनायें.
October 5th, 2007 at 10:40 pm
शास्त्री जी, ये मेरा सौभाग्य है कि आप जैसे दिग्ग्ज चिट्ठाकार की नजर मेरे चिट्ठे पर पड़ी। आप को मेरी लिखी कविता पंसद आयी पढ़ कर मैं खुशी से फ़ूली नहीं समा रही, आपने उसे तीन बार पढ़ा, मैं नतमस्तक हूँ, काश, मैं चिट्ठाजगत से पहले परिचित होती तो इस कविता को 12 साल की डायरी कोठरी न भोगनी पड़ती। मैं चिट्ठाजगत में भी नयी हूँ और इस जाल की दुनिया से भी, आप के ब्लोग में ढ़ूढ़ने पर भी मुझे इ-मेल का पता नहीं मिला, इस लिए जवाब यहाँ लिखने की गुस्ताखी कर रही हूँ, आशा है आप बुरा नहीं मानेगे और मुझे अपना इ-मेल आय डी देने की कृपा करेगें
आप एक दम सही कह रहे हैं, कमेंट्स करने में कंजूसी नही करनी चाहिए, अपना ही नुकसान है। आशा करती हूँ आप और मेरी और कविताएं पढ़ने का वक्त निकाल पायेगें। शास्त्री जी धन्यवाद, वो कहते हैं ना इंग्लिश में ‘यू मेड माई डे’