1. लिखिए कम, सोचिए ज्यादा: बुद्धि का वेग किसी भी सुपर कम्प्यूटर से तेज है. संख्याओं की गणना करने वाले सुपर कम्प्यूटर भी बुद्धि की विराटता के सामने बौने हैं. हम हर समय कुछ न कुछ सोचते रहते हैं. सोचना बंद हो जाए तो दो ही बाते हो सकती हैं. या तो आप समाधि में चले गये या फिर आप महासमाधि को प्राप्त हो गये. इन दो अवस्थाओं को छोड़कर सोचना कभी बंद नहीं हो सकता. लेकिन एक गड़बड़ यह है कि यह सोचना बहुत बेतरतीब होता है. पल-छिन में हमारे सोचने के विषय और स्थान बदलते रहते हैं. एक क्षण पहले आप किसी और विषय के बारे में सोच रहे होते हैं अगले ही क्षण आपका विषय बदल जाता है. योगी इस अवस्था को विक्षिप्त बुद्धि कहते हैं. यह विक्षिप्त बुद्धि किसी काम की नहीं. यह आगे-आगे चलती है और हम इसके पीछे-पीछे भागते हैं. दिशाहीन बुद्धि तो दिशाहीन भागदौड़. तकनीकि ने इस भागदौड़ को और बढ़ा दिया है. अब हम जो सोचते हैं उसे सार्वजनिक करने के लिए हमारे पास तुरंत एक औजार होता है. हमें किसी से बात करनी हो तो हमारे पास आधुनिक संचार सुविधाएं हैं. हमें किसी को संदेश भेजना हो तो हमारे पास उपकरण हैं. हमें कुछ लिखना हो तो हमारे पास ब्लाग हैं. लेकिन हम क्यों बात करना चाहते हैं, किसलिए संदेश भेजना चाहते हैं और क्या लिखना चाहते हैं इसपर पर्याप्त सोच-विचार शायद ही करते हैं. और बातों पर लागू हो न हो लिखने पर यह लागू होता है कि लिखने से पहले आप भरपूर विचार करें कि आप क्या लिखना चाहते हैं. हम जो लिख रहे हैं क्या एक पाठक के तौर पर खुद उसे पढ़कर लाभान्वित होंगे? कुछ भी लिखने से पहले दो-चार बार इस बारे में जरूर सोचना चाहिए. खासकर तब जब आप अपना ब्लाग लिख रहे हैं. आपका ब्लाग आपकी पहचान है. यह आपको ही तय करना होगा कि आपकी पहचान कैसी हो? 2.समीक्षा या सूचना: ब्लाग बेहद निजी अभिव्यक्ति हैं. हम जो कुछ देखते या सुनते हैं उसकी प्रतिक्रियास्वरूप हमारे मन में जो भाव पैदा होते हैं वही हम लिखते भी हैं. सामान्य नागरिक ऐसा करे तो इसमें कोई हर्ज नहीं है लेकिन एक ब्लागर को इस तरह से व्यवहार शायद नहीं करना चाहिए. ब्लागर को समीक्षक होने की बजाय सूचना प्रदाता के रूप में काम करना चाहिए. आपकी बातों के पीछे तर्क होने चाहिए और जरूरी हो तो आंकड़ें भी होने चाहिए. एक ब्लागर अघोषित रूप से अधिक जिम्मेदार पत्रकार होता है. पत्रकार को क्रासचेक करने के लिए संपादक होता है लेकिन यहां कोई संपादक नहीं है. फिर ऐसे में एक ब्लागर की जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है कि वह अपने लिखे को खुद नियंत्रित करे. अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ आजादी का दुरूपयोग नहीं होता. इसलिए मेरा यह मानना है कि श्रेष्ठ ब्लागर सूचनाओं पर ध्यान देता है न कि समीक्षा पर. अगर सूचनाएं सटीक होती हैं तो आप समीक्षा से जो बात कहना चाहते हैं लोग अपने आप उस निष्कर्ष तक पहुंच जाते हैं. 3. निजी विचार बनाम सार्वजनिक जरूरत: जब आप दूसरी विधि से सोचना शूरू करेंगे तो आपको इस बात का आभास होने लगता है कि मैं किस बात पर जोर दूं. अपने निजी विचारों पर या सार्वजनिक जरूरतों पर. व्यावसायिक पढ़ाई में एक बात सिखाई जाती है कि आप ट्रेन्ड्स अथवा रूझानों की अनदेखी न करें. कोई भी मार्केटिंग की रणनीति बनाते समय बाजार के ट्रेन्ड्स का पूरा ध्यान रखा जाता है. यह बात दूसरी है कि रसूखवाले लोग अपने उत्पादों के हिसाब से ट्रेन्ड्स बनाने में भी माहिर होते हैं. हम ब्लागर अभी इतने रसूखवाले नहीं हुए हैं कि अपने हिसाब से जरूरतों को तय करें. हमें जरूरतों को समझना होगा. कम से कम भाषाई जरूरत की चिंता तो हमें करनी ही होगी. और मुझे लगता है कि जरूरतों पर ध्यान दें तो हमारे निजी विचारों की लोगों को उतनी जरूरत नहीं है. हमें ऐसे विषयों को उठाना चाहिए जो लोगों की जरूरत हों. अगर हम इस पर थोड़ा ध्यान दे सके तो हमारी ब्लागरी कालजयी हो जाएगी. ( यह जानते हुए इसे लिख रहा हूं कि मैं एक श्रेष्ठ ब्लागर नहीं हूं.) श्रेष्ठ ब्लागरी के सार्वजनिक सूत्र
व्यवसाय में आइडिया को संरक्षित और सुरक्षित रखने की बड़ी गहन परिपाटी है. क्योंकि वहां कहा जाता है कि आईडिया ही पैसा है. बात सही है. जहां पैसा और प्रतिस्पर्धा होगी वहां सर्वाइवल आफ दि फिटेस्ट की अवधारणा ही काम करेगी. लेकिन अपने हिन्दी के ब्लागरों में यह रोग न के बराबर है. मेरा अनुभव है कि यहां प्रतिस्पर्धा की बजाय सह-अस्तित्व का फार्मूला काम करता है. अपने संक्षिप्त अनुभव से कुछ बातें आपके साथ बांटने का मन हो रहा है. यह न मानिएगा कि मैं कोई ज्ञान बघार रहा हूं. कुछ विचार हैं जो काम करते-करते मन में पैदा हुए हैं उनको आपके सामने रखता हूं. काम के हों तो ठीक, न काम के हों नकारने से कौन रोक सकता है?
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October 6th, 2007 at 12:47 pm
कोई क्या कहता है इससे हमें कोई मतलब नहीं है, संजय भईया, हमारा मानस कहता है आप हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लागर हैं ।
‘आरंभ’ छत्तीसगढ का स्पंदन