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	<title>Comments on: सहमत या असहमत ??</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>By: मिहिरभोज</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/974/comment-page-1#comment-2289</link>
		<dc:creator>मिहिरभोज</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Dec 2007 18:01:45 +0000</pubDate>
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		<description>पपूर्णतया सहमत</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>पपूर्णतया सहमत</p>
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		<title>By: Sanjay Gulati Musafir</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/974/comment-page-1#comment-2207</link>
		<dc:creator>Sanjay Gulati Musafir</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 11 Dec 2007 11:28:55 +0000</pubDate>
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		<description>क्या मैं आपके पत्र और यातिश को माध्यम बनाकर एक प्रश्न कर सकता हूँ - उन सभी से जो यह कहते हैं कि अपनी भाषा में व्यापार करना बहुत मुश्किल है!

सवाल है - चीन देश में व्यापार करना हो तो कौन सी भाषा का उपयोग करेंगे और क्यों? दोस्तो मुश्किल ही तो है नामुमकिन तो नहीं। 

जब आप और मैं - Internet, Email आदि नए शब्द अपने शब्दकोष में अभ्यास से जोड सकते हैं तो संजाल, पत्राचार क्यों नहीं। अभ्यास ही तो पैदा करना है, शुरूआत ही तो करनी है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>क्या मैं आपके पत्र और यातिश को माध्यम बनाकर एक प्रश्न कर सकता हूँ &#8211; उन सभी से जो यह कहते हैं कि अपनी भाषा में व्यापार करना बहुत मुश्किल है!</p>
<p>सवाल है &#8211; चीन देश में व्यापार करना हो तो कौन सी भाषा का उपयोग करेंगे और क्यों? दोस्तो मुश्किल ही तो है नामुमकिन तो नहीं। </p>
<p>जब आप और मैं &#8211; Internet, Email आदि नए शब्द अपने शब्दकोष में अभ्यास से जोड सकते हैं तो संजाल, पत्राचार क्यों नहीं। अभ्यास ही तो पैदा करना है, शुरूआत ही तो करनी है।</p>
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		<title>By: Gyan Dutt Pandey</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/974/comment-page-1#comment-2197</link>
		<dc:creator>Gyan Dutt Pandey</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 16:03:12 +0000</pubDate>
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		<description>असहमति का कोई कारण नजर नहीं आता।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>असहमति का कोई कारण नजर नहीं आता।</p>
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		<title>By: Yatish</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/974/comment-page-1#comment-2195</link>
		<dc:creator>Yatish</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 11:58:45 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;तमाम अंग्रेजीदां लोगों के बीच हिन्दी में अपनी बात रखने में कभी हीन भावना महसूस नहीं हुई।&quot; 
आपका यह विचार सही है लेकिन आज कल कुछ महानगरों मे अपनी भाषा को व्यवसाय में प्रयोग करना बहुत दिक्कत देता है यह भी सही है . मेरा मानना यह है की जो अपनी संस्कृती की इज्जत नही करता वह कभी भी किसी और की दिल से इज्जत नही कर सकता, वह हमेशा एक बनावटीपं से घिरा</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;तमाम अंग्रेजीदां लोगों के बीच हिन्दी में अपनी बात रखने में कभी हीन भावना महसूस नहीं हुई।&#8221;<br />
आपका यह विचार सही है लेकिन आज कल कुछ महानगरों मे अपनी भाषा को व्यवसाय में प्रयोग करना बहुत दिक्कत देता है यह भी सही है . मेरा मानना यह है की जो अपनी संस्कृती की इज्जत नही करता वह कभी भी किसी और की दिल से इज्जत नही कर सकता, वह हमेशा एक बनावटीपं से घिरा</p>
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		<title>By: Yatish</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/974/comment-page-1#comment-2196</link>
		<dc:creator>Yatish</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 11:58:45 +0000</pubDate>
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		<description>&quot;तमाम अंग्रेजीदां लोगों के बीच हिन्दी में अपनी बात रखने में कभी हीन भावना महसूस नहीं हुई।&quot; 
आपका यह विचार सही है लेकिन आज कल कुछ महानगरों मे अपनी भाषा को व्यवसाय में प्रयोग करना बहुत दिक्कत देता है यह भी सही है . मेरा मानना यह है की जो अपनी संस्कृती की इज्जत नही करता वह कभी भी किसी और की दिल से इज्जत नही कर सकता, वह हमेशा एक बनावटीपं से घिरा</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;तमाम अंग्रेजीदां लोगों के बीच हिन्दी में अपनी बात रखने में कभी हीन भावना महसूस नहीं हुई।&#8221;<br />
आपका यह विचार सही है लेकिन आज कल कुछ महानगरों मे अपनी भाषा को व्यवसाय में प्रयोग करना बहुत दिक्कत देता है यह भी सही है . मेरा मानना यह है की जो अपनी संस्कृती की इज्जत नही करता वह कभी भी किसी और की दिल से इज्जत नही कर सकता, वह हमेशा एक बनावटीपं से घिरा</p>
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		<title>By: Sanjay Gulati Musafir</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/974/comment-page-1#comment-2194</link>
		<dc:creator>Sanjay Gulati Musafir</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 08:09:42 +0000</pubDate>
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		<description>मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि जब मुझे कुछ अच्छा बदलाव करना हो तो मैं दाएँ-बाएँ न देखकर सीधा खुद की तरफ देखता हूँ। मैं बदलूँगा तो समाज बदलेगा। 

संजय गुलाटी मुसाफिर</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि जब मुझे कुछ अच्छा बदलाव करना हो तो मैं दाएँ-बाएँ न देखकर सीधा खुद की तरफ देखता हूँ। मैं बदलूँगा तो समाज बदलेगा। </p>
<p>संजय गुलाटी मुसाफिर</p>
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		<title>By: balkishan</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/974/comment-page-1#comment-2193</link>
		<dc:creator>balkishan</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 06:00:19 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/974#comment-2193</guid>
		<description>किसी भी भाषा या संस्कृति का विरोध हर हाल मे ग़लत है. जंहा तक हिन्दी भाषी या भारतीय होने की बात है इसमे हिन् भावना या शर्म-संकोच की कोई जगह नही है इसके उलट ये तो गर्व करने की बात है.
और मुझे लगता है कि इस मानसिकता के लोगों की संख्या बहुत ज्यादा नही है और अगर कुछ है भी तो ये शायद पहले से ठीक ही हो रही है.
ये तस्वीरें मेरे पास पहले से है. मैं तो इनका उपयोग कर ही सकता हूँ?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>किसी भी भाषा या संस्कृति का विरोध हर हाल मे ग़लत है. जंहा तक हिन्दी भाषी या भारतीय होने की बात है इसमे हिन् भावना या शर्म-संकोच की कोई जगह नही है इसके उलट ये तो गर्व करने की बात है.<br />
और मुझे लगता है कि इस मानसिकता के लोगों की संख्या बहुत ज्यादा नही है और अगर कुछ है भी तो ये शायद पहले से ठीक ही हो रही है.<br />
ये तस्वीरें मेरे पास पहले से है. मैं तो इनका उपयोग कर ही सकता हूँ?</p>
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		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/974/comment-page-1#comment-2191</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 05:44:34 +0000</pubDate>
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		<description>शास्त्रीजी, आज चिट्ठे की टेम्पलेट में बहुत सी चीज़ें कम हैं?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शास्त्रीजी, आज चिट्ठे की टेम्पलेट में बहुत सी चीज़ें कम हैं?</p>
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		<title>By: अतुल शर्मा</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/974/comment-page-1#comment-2190</link>
		<dc:creator>अतुल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 05:41:01 +0000</pubDate>
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		<description>सहमत, पूर्णत: सहमत। आपसे भी, उल्लिखित टिप्पणीकारों से भी और दिनेशरायजी से भी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सहमत, पूर्णत: सहमत। आपसे भी, उल्लिखित टिप्पणीकारों से भी और दिनेशरायजी से भी।</p>
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		<title>By: दिनेशराय द्विवेदी</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/974/comment-page-1#comment-2189</link>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 10 Dec 2007 02:23:55 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/974#comment-2189</guid>
		<description>किसी भी भाषा या संस्कृति से किस को विरोध हो सकता है। विरोध करने वाले या तो स्वयं राजनीति कर रहे होते हैं या फिर वे किसी न किसी राजनीति का शिकार हो चुके होते हैं। हमारी अपनी संस्कृति के अनेक तत्व ऐसे हैं जिन्हें हम फैशन का शिकार हो कर त्याग चुके हैं। जब कि वास्तविकता यह है कि वे उपयोगी होते हैं और हम उन के लाभ से वंचित हो जाते हैं। मसलन पगड़ी और साफा हम ने लगभग त्याग दिया है, जब कि ये न केवल सिर को अनेक मुसीबतों से बचाते हैं और शरीर की सुन्दरता में भी वृद्धि करते हैं। इसी प्रकार मांग में सिन्दूर, माथे पर बिन्दी या तिलक, गले में दानों की माला आदि जो श्रंगार हैं पिछड़ेपन के प्रतीक अथवा धार्मिक चिन्ह मान कर त्याग दिया गया है। हम अपनी संस्कृति की धुलाई करते जा रहे हैं। नतीजा सामने है। हम हमारे भारतीय होने की पहचान ही खोते जा रहे हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>किसी भी भाषा या संस्कृति से किस को विरोध हो सकता है। विरोध करने वाले या तो स्वयं राजनीति कर रहे होते हैं या फिर वे किसी न किसी राजनीति का शिकार हो चुके होते हैं। हमारी अपनी संस्कृति के अनेक तत्व ऐसे हैं जिन्हें हम फैशन का शिकार हो कर त्याग चुके हैं। जब कि वास्तविकता यह है कि वे उपयोगी होते हैं और हम उन के लाभ से वंचित हो जाते हैं। मसलन पगड़ी और साफा हम ने लगभग त्याग दिया है, जब कि ये न केवल सिर को अनेक मुसीबतों से बचाते हैं और शरीर की सुन्दरता में भी वृद्धि करते हैं। इसी प्रकार मांग में सिन्दूर, माथे पर बिन्दी या तिलक, गले में दानों की माला आदि जो श्रंगार हैं पिछड़ेपन के प्रतीक अथवा धार्मिक चिन्ह मान कर त्याग दिया गया है। हम अपनी संस्कृति की धुलाई करते जा रहे हैं। नतीजा सामने है। हम हमारे भारतीय होने की पहचान ही खोते जा रहे हैं।</p>
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