Posted March 11th, 2010 by Shastri JC Philip
पिछले दिनों महिलाओं के लिये आरक्षण के मुद्दे पर जिस तरह हमारे कई राजनीतिज्ञों ने हिंसा का प्रदर्शन किया उसे देख हम सब को समझ लेना चाहिये कि फिलहाल हम सुधरने वाले नहीं हैं। कारण यह है कि जब जनता-की-सरकार बनती है तब यदि आदर्शों से प्रेरित लोग सत्ता की कुर्सी नहीं सभालते तो फिर उनका हर निर्णय, हर चुनाव, स्वार्थ से प्रेरित होगा।
आजादी के शुरू के सालों में ऐसे लोग राजनीति में आये और सत्ता की कुर्सी पर बैठे जो आदर्शों से प्रेरित थे, आदर्शों के आधार पर सहीगलत का निर्णय करते थे, एवं उन बातों का समर्थन करते थे जो जनहित एवं देशहित मैं है। उनका अजेंडा ‘अगले’ चुनाव में जीतना नहीं, बल्कि ‘आज’ देश के लिये कुछ करना था। लेकिन 1960 आदि में ऐसे काफी सारे लोग राजनीति में ‘भरती’ हो गये हैं जिनका लक्ष्य देश की भलाई नहीं बल्कि सत्तासुख भोगना एवं मलाई को अपने लिये निकाल लेना है। बाकी सेपरेटा जनता के लिये छोड दिया जाता है। जनता नंगे भूखे रहे उनकी बला से।
इन लोगों ने बहुत जल्दी ही समझ लिया कि इसका एकमात्र तरीका है फूट डालो, राज करो। इस नीति का प्रयोग अंग्रेज लुटेरों ने 200 साल किया था, अब काले अंग्रेज इसी नीति का पालन कर रहे हैं। इस कारण भाषा, प्रदेश, धर्म, एवं इस तरह के नये नये आधार बना कर फूट डाली जा रही है। वर्ना इतिहास में किस ने कब सुना है कि देश की राजभाषा में शपथ लेने के कारण सत्ताधारियों ने साथी सत्ताधारियों को पीटा।
जब तक देश में एक नैतिक-धार्मिक नवीकरण नहीं आयगा तब तक फूट बढता रहेगा, मारकाट होती रहेगी, और जिस की लाठी उसका राज वाला हिसाब चलेगा। जो थोडे से आदर्शवादी सत्ता में है वे चाहें तो भी कुछ नहीं कर पायेंगे क्योंकि वे हमेशा अल्प संख्या में होंगे जब कि लुटेरे बहुमत में होंगे। बहुमत न हो तो भी वे ऐसा ऊधम और दंगाफसाद करेंगे कि जो लोग कुछ सकारात्मक करना चाहते हैं वे कान पकड कर अलग हो जायें कि कौन पडे इस पचडे में।
आज हिन्दी चिट्ठाजगत में जो हो रहा है वह भी सिर्फ इन राष्ट्रीय स्तर की घट्नाओं का एक छोटा सा चित्र मात्र है।
Posted March 6th, 2010 by Shastri JC Philip
आज एक इष्ट मित्र ने चलभाष पर बुला कर उलाहना दिया कि कैसे सारथी हो कि कु्छ लिखतेपढते नहीं हो। आभार उस मित्र का जिन्होंने मुझे सोते से जगा दिया। दर असल एक महीने पहले संगणक और आपरेटिंग सिस्टम बदला और विन्डोज 7 का उपयोग करने लगा तो मेरा इष्ट “केफे हिन्दी” गडबड करने लगा था। अनुमान है कि कुछ दिनों में केफे का नया संस्करण आ जायगा।
आज देखा कि काफी सारे लोग मिथिलेश दुबे के पीछे पडे हैं। एक चिट्ठाचर्चा के बाद सब कोई अब उस पर पिल पडा है। जहां तक चिट्ठाचर्चा की बात है, चर्चा करना तो हरेक का मौलिक अधिकार है। दर असल समस्या चर्चा की नहीं है बल्कि यह है कि अनजाने मिथिलेश ने कुछ लोगों की दुखती रगों को छू लिया है। उन लोगों ने अपने "पैदल" तुम्हारे विरुद्ध चला दिये। बस यह है इस गुरिल्ला युद्ध का मर्म।
इसका तरीका भी बहुत सीधा सादा है – एकाध हैं जिनको कोई आलेख पसंद न आये तो तुरंत अपने गुर्गों के दूरभाष खनखना देते हैं। बस अपने “उस्ताद” को खुश करने के लिये वे सब (बिना मूल आलेख को पढे ही) उस बेचारे चिट्ठाकार पर पिल पडते हैं। मुझे एक दिलचस्प घटना याद आ रही है जब मैं ने “नारी” विषय पर एक आलेख छापा था। अचानक दोचार महिला चिट्ठाकारों ने (जिन से मेरे काफी पत्र आदान प्रदान होते रहते थे) सारथी पर आकर दनादन अपशब्द लिखना शुरू कर दिया। जब पलट कर मैं ने उन से पूछा कि आप मेरे जिस “कथन” का खंडन कर रही हैं वह मैं ने क सारथी पर कहां लिखा है तो उनकी झक्की खुली। बडी माफी मांगी। बोलीं कि फलां चिट्ठाकारी (चिट्ठाकार का स्त्रीलिंग) ने दूरभाष पर बुला के कहा कि आप ने ऐसा लिखा है अत: उस पर यकीन करके आपका आलेख बिन पढे ही आप के विरुद्ध टिप्पणी कर दी। इसके बाद तो कई चिट्ठामित्रों के दूरभाष मिले उन को भी मेरे विरुद्ध लिखने को कहा गया, लेकिन मेरा आलेख पढने पर उनको वह कथित कथन न मिला। मैं ने उन सब से कहा कि जिस ने आप को दूरभाष पर बुला कर भडकाया उसी से पूछें।
समस्या यह है कि नंगे से खुदा भी डरता है। चिट्ठाजगत में लिखी कोई बात इनको पसंद न आये तो ये अपने पैदलों के साथ आप के विरोध में उतर आते हैं। ये पैदल खुद भी इन लोगों से डरते हैं अत: बिन सोचे समझे इन नंगों के कहे के अनुसार चिट्ठाकारों के विरुद्ध टिप्पणी करने लगते हैं। मिथिलेश जैसे लोगों को लगे रहना चाहिये, लिखते रहना चाहिये। अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई भी लगाम नही लगा सकता।
डा अरविंद मिश्रा की एक टिप्पणी एक और बात सोचने को मजबूर करती है:
मिथिलेश की चिंता और आक्रोश इस मामले में जायज है की इसके पहले तो चिट्ठाचर्चा ने इनकी किसी पोस्ट का जिक्र नहीं किया — अब क्या केवल चिट्ठाचर्चा मात्र एकल पोस्टों की चर्चा का भंडास निकालने का मंच बन रहा है? जिसे जो भी खुन्नस हो और जिससे भी हो चिट्ठाचर्चा खुला मंच बनता जा रहा है उनके लिए -पहुँचो और भोंपू बजा दो !बढ़िया हैं -लगता है जल्दी ही यहाँ नारियों और नारीवादियों का ही वर्चस्व होगा — मिथिलेश आदि हवा हवाई हो रहेगें!
Posted February 14th, 2010 by Shastri JC Philip
आज एक मित्र का ईपत्र आया कि उन्होंने गूगल एडसेंस के लिए अप्लाई किया लेकिन गूगल ने उसे निरस्त कर दिया. गूगल के पत्र में उन्होंने कहा है कि वे हिंदी चिट्ठों के लिए विज्ञापन स्वीकार नहीं करते. मित्र जाना चाहते थे कि ऐसा क्यों हुआ जबकि एक साला पहले गूगल हिंदी चिट्ठों को स्वीकार करता था.
दोस्तों, आदमी का लालच कई बार सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को खत्म कर देती है. गूगल के साथ मामला यही है. किसी ज़माने में गूगल हिन्दीभाषी चिट्ठों को विज्ञापन के लिए स्वीकार करता था, लेकिन चिट्ठाकार भाई लोग जम कर अपने चिट्ठों पर दिख रहे विज्ञापनों परा चटका लगा कर पैसा सूतने लगे. वे भूल गए कि गूगल के हाथ बड़े लम्बे हैं.
आप जिस संगणक से अपने गूगल विज्ञापन की आय को जांचते हैं उसी आई पी नम्बर से जब क्लिक जाने लगे तो गूगल ने पहचान लिया कि आप खुदा ही दुकानदार और खुद ही ग्राहक का काम कर रहे हैं. अंधा बांटे रेवड़ी, आपन आपन को देता जाए अंधे के लिए सही है लेकिन गूगल के लिए नहीं.
चूँकि कुछ हिंदी चिट्ठे जम कर ऐसा कर रहे थे, उसकी सजा सबा को मिल रही है. गेंहू के साथ घुन भी पिस जाता है.
Posted February 11th, 2010 by Shastri JC Philip
मेरे घर के पास ही है राजमार्ग 47, जिस पर हर महीने मैं 1000 से 3000 किलोमीटर की सफारी करता हूँ. अधिकतर अपनी कार में, लेकिन कई बार गैरों की गाडी में. एक औसत यात्रा 100 से 400 किलोमीटर की होती है. 4-लेन के इस राजमार्ग पर यात्रा सामान्यतया सुखद होती है, लेकिन एक चीज मन को दुखी करती है और वह है दुर्घटनायें.
एक बार की यात्रा में औसतन एक दुर्घटना नजर आ जाती है. यहां अधिकतर गाडियां 80 किमी रफ्तार से चलती हैं अत: दुर्घटनाओं में मौत बहुत अधिक होती है, और छोटी गाडियों के सिर्फ अंजरपंजर बच पाते हैं. अनुसंधानों से पता चलता है कि इन में 80% से 90% मानुषिक लापरवाही और घमंड के कारण जबर्दस्ती होती हैं, और सिर्फ 10% से कम दुर्घटनायें आकस्मिक होती हैं.
मद्यापन करके गाडी चलाना, आधी अधूरी नींद के बाद गाडी चलाना, बिन सही ब्रेक के गाडी चलाना, दूसरे से सडक पर प्रतियोगिता करना, सडक किनाने की चेतावनियों (खतरनाक घाटी, तंग रास्ता, बिन-फाटक रेलवे क्रासिंग, खतरनाक/अंधा मोड) की उपेक्षा आदि के कारण अधिकतर दुर्घटनायें होती हैं.
अफसोस यह है कि एक सेकेंड के दसवें भाग में जो दुर्घटना होती है उसका दर्द, विकलांगपन, बच्चों का, अनाथपन, स्त्रियों का वैधव्य आजीवन दर्द देता है. आश्रितों की जिंदगियां बर्बाद हो जाती हैं. बुद्धिमान बच्चे पढाई छोड मजूरी के लिये निकल पडने पर विवश हो जाते हैं. उससे भी अफसोस की बात है है कि जरा सी सावधानी से इन आजीवन के दुखों से बचा जा सकता था.
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