हिन्दुस्तानी हो, हिन्दुस्तानी बनो!

कई दशाब्दियों से रेलगाडी यात्रा मेरे लिये जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है. इन यात्राओं के दौरान कई खट्टेमीठे अनुभव हुए हैं, जिनमें मीठे अनुभव बहुत अधिक हैं. इसके साथ साथ कई विचित्र बाते देखने मिलती हैं जिनको देखकर अफसोस होता है कि लोग किस तरह से विरोधाभासों को पहचान नहीं पाते हैं.

उदाहरण के लिये निम्न प्रस्ताव को ले लीजिये: बी इंडियन, बाई इंडियन. यह प्रस्ताव अंग्रेजी में या हिन्दी में अकसर दिख जाता है. अब सवाल यह है कि इसे सीधे सीधे भारतीय अनुवाद में क्यों नहीं दे दिया जाता है. “हिन्दुस्तानी हो, हिन्दुस्तानी बनो” (जो इस अंग्रेजी वाक्य का भावार्थ  है)  हिन्दी में कहने में हमें तकलीफ क्यों होती है. हिन्दुस्तानियों को हिन्दुस्तानी बनाने के लिये एक विलायती भाषा की जरूरत क्यों पडती हैं?

दूसरी ओर, जब “बी इंडियन, बाई इंडियन” लिखा दिखता है तो कोफ्त होती है कि यह किसके लिये लिखा गया है? अंग्रेजीदां लोग तो इसे पढने से रहे क्योंकि उनकी नजर में तो हिन्दी केवल नौकरोंगुलामों की भाषा है. आम हिन्दीभाषी जब इसे पढता है तो उसके लिये इसका भावार्थ समझना आसान नहीं है. उसे लगता है कि यहां खरीदफरोख्त की बात (बाई Buy) हो रही है.

जरा अपने आसापास नजर डालें. कितने विरोधाभास हैं इस तरह के. कम से कम दोचार को सही करने की कोशिश करें!

चिट्ठा एग्रीगेटर की कमी!

काफी अर्से पापी पेट की जरूरतों के पीछे  भाग, चिट्ठाकारी को हटा कर रखने  के बाद चिट्ठाकारी में लौटा तो एक बात बहुत खल गई कि कोई भी एग्रीगेटर काम नहीं कर रहा है. ऐसा लगा कि मैं अनाथ हो गया हूं.

दर असल कुछ साल से यह नियम बन गया था कि रोज सुबह चिट्ठाजगत पर एक नजर डालने के बाद ही बाकी कुछ किया जाये. संगणक पर काम करने के बीच दिन भर में कम से कम दसबीस बार नजर चली जाती थी. जैसे ही किसी प्रिय चिट्ठाकार का आलेख दिखा, या किसी और का कोई दिलचस्प आलेख नजर आया, या कोई नया-नवेला सशक्त लेखक नजर आया तो उस आलेख को पढना एवं टिप्पणी करना जीवन का एक अंग बन गया था.

कोई भी कार्य कितना भी खुशी दे, कितना भी सहज हो, वह करना और भी सहज हो जाता है जब उसके लिये सही औजार उपलब्ध हो. दीवार में कील ठोकने के लिए पत्थर काफी है, लेकिन वह हथौडे का आनंद या सुविधा नहीं देता है. चिट्ठाजगत में हम अपने मित्रों के चिट्ठों पर जा जाकर देख सकते हैं, लेकिन एग्रीगेटर में सबकुछ (शीर्षक, टिप्पणी, आंकडे आदि) देखने का मजा कुछ और ही है.

इस हफ्ते चिठाजगत के जालसाज से बात हुई तो पहली बार पता चला कि एग्रीगेटर की प्रोग्रमिंग कितनी जटिल है, जिसके चलते उनका यंत्र रुक गया है. उम्मीद है कि जल्दी ही उनका नवीन तंत्र सही हो जायगा जिससे कि हम सब पुन: एक दूसरे को देख सुन सकें.

नया साल, नये सपने??

जनवरी एक को हमारे प्रार्थना समाज में सर्वदेशीय उन्नति एवं प्रगति के लिये हम एकत्रित हुए तो एक सज्जन ने एक दिलचस्प बात कही. वे बोले कि हर नये साल वे कुछ न कुछ निर्णय जरूर लेते हैं, लेकिन कभी भी उन निर्णयों का पालन नहीं कर पाते. इस कारण उन्होंने तय किया है कि इस साल वे किसी भी तरह का निर्णय नहीं लेंगे!

मेरे मन में एकदम से दो बातें कौंध गईं. पहली बात –  उन्होंने जो किया वह क्या एक तरह का निर्णय नहीं था? बिल्कुल था. हां उस निर्णय का सार यह था कि वे इस साल आगे बढने के लिये कोई भी सक्रिय कोशिश नहीं करेंगे. दूसरे शब्दों में कहा जाये तो उन्होंने विफलता के लिये निर्णय ले लिया था.   एक उदाहरण देकर इसे स्पष्ट किया जा सकता है.  मान लीजिये कि दो मित्र ऊंचीकूद की तय्यारी कर रहे हैं. उन में से एक दोस्त बाकायदा धागा बांध कर उसके ऊपर से कूदता है. हर सफलता पर वह धागे को कुछ ऊचा करता जाता है.

दूसरा मित्र बिना निशान आदि लगाये कूदता है. हर बार वह और अधिक उत्साह के साथ कूदने की कोशिश करता है. इस तरह साल भर वे दोनों ऊंचीकूद की तय्यारी करते रहते हैं. साल के अंत में प्रतियोगिता होती है. दोनों कूदते हैं. फल क्या होगा?

जो व्यक्ति बिना किसी लक्ष्य के कूदता है, वह साल भर के परिश्रम के बावजूद कोई खास तरक्की नहीं कर पाता है, लेकिन जो व्यक्ति लक्ष्य के साथ कूदता है वह बहुत अधिक ऊचाई तक चला जाता है. जीवन के हर पहलू में हमारा लक्ष्य बहुत बदलाव लाता है.

आप सब के लिये मेरी कामना है कि सन २०११ आप के लिये बहुत ऊचे पहुंचने का साल निकले!

सरकार हमारी है या हम सरकार के खरीदे हैं??

जनतंत्र का मतलब यह है कि सरकार जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिये बनाई गई है.  लेकिन पूर्ण जनतंत्र तभी स्थापित हो सकता है जब किसी भी जनतंत्र के सारे  नियमकानून उस देश की जनता के द्वारा और जनता के लिये बनाये गये हों.

विडंबना यह है कि १९४७ में तकनीकी तौर पर हम आजाद हो गये, लेकिन आज भी अंग्रेजों के द्वारा हिन्दुस्तानियों के दमन एवं शोषण के लिये बनाये गये कई कानून इस देश में चल रहे हैं. फल यह है कि आजाद होते हुए भी, कानून हमारी आजादी की सुरक्षा नहीं कर पा रहा है. न ही हम अपनी आजादी की मांग कर पा रहे हैं क्योंकि कई क्षेत्रों में वही अंग्रेजों के बनाये नियमकानूनों के आधार पर काम चलता है.  इसका एक अच्छा उदाहरण है हमारा पुरातत्व विभाग. इसकी स्थापना अंग्रेजों ने की थी, एवं पिछली एक शताब्दी से अधिक समय में सारे हिन्दुस्तान भर में हो पुरातत्व संग्रहालय हैं उन के पास लाखों वस्तुओं का संग्रह हो गया है.

मेरी रुचि प्राचीन भारत के सिक्कों में है, और पुरातत्व विभाग के पास लाखों दुर्लभ सिक्के पडे हैं. कुछ को जनता देख सकती है लेकिन अधिकांश उनकी कालकोठरियों में पडे है. जो दिखाने के लिये रखे है आप उनका छायाचित्र नहीं उतार सकते. कुल मिलाकर कहा जाये तो हमारे पैसे का उपयोग कर हमारे ही देश की संपत्ति की सुरक्षा में लगे लोग हम को उस असीमित जानकारी का उपयोग करने नहीं देते. न ही वे लोग इस जानकारी को सही रीति से लोगों तक पहुंचा पा रहे हैं.

लगभग हर जनतंत्र में जनता की संपत्ति बडे आराम से जनता को उपलब्ध है. बस अपने ही देश में आप के पैसे से आप को अभी भी गुलाम रखा जा रह है. इसके विरुद्ध जनमत तय्यार करना जरूरी है, और इस आलेख को इसकी पहली कडी मान लीजिये.