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	<title>सारथी &#187; Shastriji</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>इतना तो हर कोई कर सकता है!!</title>
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		<pubDate>Fri, 10 Jul 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastriji</dc:creator>
				<category><![CDATA[मार्गदर्शन]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरे पाठकों में हर कोई चाहे तो एक हफ्ते में आधा घंटा घर बैठे ही&#160; देशसेवा के लिये निकाल सकता है. यदि इसे नियमित रूप से पांच साल करते रहें तो आपके शहर में तमाम तरह की सुविधाये बढ सकती हैं और भ्रष्ट लोगों की नीद हराम हो सकती है. अनुसंधानों द्वारा यह बात बारबार [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/07/image4.png"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="image" border="0" alt="image" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/07/image_thumb4.png" width="320" height="224" /></a> </p>
<p align="justify">मेरे पाठकों में हर कोई चाहे तो एक हफ्ते में आधा घंटा घर बैठे ही&#160; देशसेवा के लिये निकाल सकता है. यदि इसे नियमित रूप से पांच साल करते रहें तो आपके शहर में तमाम तरह की सुविधाये बढ सकती हैं और भ्रष्ट लोगों की नीद हराम हो सकती है. </p>
<p align="justify">अनुसंधानों द्वारा यह बात बारबार स्पष्ट हुई है कि अखबारों एवं पत्रिकाओं में “संपादक के नाम पत्र” सबसे अधिक पढे जाने वाला एक विभाग है. इतना ही नहीं लगभग हर व्यक्ति का हर तरह का पत्र बिना सेंसरिंग के छाप दिया जाता है. </p>
<p align="justify">यदि किसी भ्रष्ट व्यक्ति की कारगुजारी, उसका निकम्मापन, किसी दफ्तर में जिस तरह से मनमाना व्यवहार लोगों से किया जाता है, इस विषय पर महज एक पत्र छप जाये तो उसका असर ऐसा होता है जैसे आप ने शाब्दिक मूठ चला दिया हो.&#160; लेकिन जैसे हाथी को अपनी शक्ति का एहसास न होने के कारण एक पिद्दी महावत उसे अपनी इच्छा के अनुसार नचा लेता है, उसी प्रकार हम लोग अपने अधिकारों को सार्वजनिक रूप से मांगने की शक्ति को&#160; न जानने के कारण अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं.</p>
<p align="justify">अब तो जानकारी के अधिकार (राईट टु इन्फर्मेशन) के जादूई डंडे और पत्र-लेखन के टोटके को जोड दिया जाये तो एक से एक भूत भागते नजर आयेंगे. समस्या सिर्फ पहल करने की है. </p>
<p align="justify">एक छोटी सी घटना सुनाता हूँ. कुछ साल पहले हमारे डाकघर में एक बेहद मक्कार आदमी आया था जो नई और आकर्षक डाकटिकटें सिर्फ अपने जानपहचान वालों को देता था. लाख मिन्नत करो वह कह देता था कि टिकट नहीं है. मेरे एक साथी ने एक दिन स्थानीय अखबार को एक पत्र लिखा जो अगले ही दिन अखबार ने छाप दिया. बस फिर क्या था, हर आतेजाते से वह आदमी अपनी ओर से मिन्नत करने लगा कि नई टिकटें आई हैं, बाबूजी लेना चाहेंगे क्या. </p>
<p align="justify">अखबार सिर्फ इतना चाहते हैं कि आप बदला निकालने के लिये या द्वेष के कारण पत्र न लिखें. बाकी हर तरह के पत्र छाप दिये जाते हैं. कुछ अखबारों में तो बाकायदा “मुझे शिकायत है” नाम के स्तंभ होते हैं. क्यों न हफ्ते में एक अंतर्देशीय उनको भेजने की आदत डाल लें. कुछ तो कीजिये, बदलाव जरूर आयगा. </p>
<p align="center"><font size="1">Picture: </font><a href="indianyoungjournalists.blogspot.com/" target="_blank"><font size="1">Indian Young Journalist</font></a></p>
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		<title>क्या सारा हिन्दुस्तान एक संडास है!!</title>
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		<pubDate>Fri, 10 Jul 2009 05:39:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastriji</dc:creator>
				<category><![CDATA[भारत]]></category>

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		<description><![CDATA[कुछ साल पहले की बात है एक विदेशी पर्यटक से पूछा गया कि हिन्दुस्तान के बारे में आप की क्या राय है. उन्होंने तुरंत जवाब दिया कि हिन्दुस्तान एक बडा संडास है. इस कथन का कारण पूछा तो उनका कहना था कि उनकी सारी भारत-यात्रा रलगाडी से हुई थी और रेलगाडी में सुबह खिडकी खोल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/07/Urinal.jpg"><img title="Urinal" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 60px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="368" alt="Urinal" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/07/Urinal_thumb.jpg" width="243" align="left" border="0" /></a></p>
<p align="justify">
<p align="justify">कुछ साल पहले की बात है एक विदेशी पर्यटक से पूछा गया कि हिन्दुस्तान के बारे में आप की क्या राय है. उन्होंने तुरंत जवाब दिया कि हिन्दुस्तान एक बडा संडास है. इस कथन का कारण पूछा तो उनका कहना था कि उनकी सारी भारत-यात्रा रलगाडी से हुई थी और रेलगाडी में सुबह खिडकी खोल कर बैठना एक मुश्किल कार्य था. हर ओर मैदानों में बडेबच्चे, स्त्रीपुरुष हगते हुए नजर आते थे.</p>
<p align="justify">उस विदेशी ने सुबह के रेल-अनुभव के बारे में जो कहा उसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है.&#160; मैं ने पहली रेलयात्रा 1957 में की थी, और उस समय तो स्थिति और भी खराब थी. सारे दिन भर नितंब-दर्शन एक आम बात थी.&#160; मम्मीपापा तब तक रेलगाडी की खिडकी खोलने की अनुमति नहीं देते थे जब तक सुबह का नाश्ता खतम नहीं हो जाता था.</p>
<p align="justify">1957 में सारे देश में गरीबी का आलम था, लेकिन सन 2009 आते आते स्थिति में काफी बदलाव आया है. लेकिन इसके बावजूद स्थिति पूरी तरह नहीं बदली है. लेकिन आज के आलेख में इससे भी अधिक गंभीर एक बात की चर्चा करना चाहता हूँ, और वह है हमारे एतिहासिक स्थानों, दर्शनीय स्थानों एवं टूरिज्म केंद्रों में शौच की व्यवस्था.</p>
<p align="justify">इस आलेख में जो चित्र आप देख रहे हैं वह एक किले का है जो कई वर्गमील में फैला हुआ है. इसके हर दर्शनीय स्थान को देखने के लिये कम से कम एक पूरा दिन चाहिये. लेकिन जनता के लिये एक भी संडास या मूत्रालय कहीं भी नहीं है. सवाल यह है कि कौन व्यक्ति दिन भर चलनेफिरने और खानेपीने के बावजूद अपने शरीर पर काबू रख सकता है.</p>
<p align="justify">मैं&#160; सैकडों एतिहासिक स्थानों एवं टूरिज्म केंद्रों पर जा चुका हूँ, लेकिन दो तीन को छोड कर एक जगह भी न तो एक संडास दिखा न मूत्रालय दिखा. इन जगहों पर सरकार साल भर में करोडों रुपये की उगाही करती है लेकिन एक सुलभ शौचालय की व्यवस्था भी नहीं करती है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण है ग्वालियर का किला जो कई वर्गमील फैला हुआ है, लेकिन शौचलय नहीं है.</p>
<p align="justify">यह इसलिये हो रहा है कि जनता बेवकूफ है. वह पैसे देती है, लेकिन अपना हक नहीं मांगती है. कम से कम संपादक के नाम पत्र लिख कर अपने हक की मांग लोगों की नजर में लाना शुरू कर दें!!</p>
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		<title>मार दिया जाये या छोड दिया जाये!!</title>
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		<pubDate>Wed, 08 Jul 2009 07:17:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastriji</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[सारी दुनियाँ भारत को सपेरों के देश के रूप में जानती है. इतना ही नहीं मुझे लगता है कि सर्प कथाओं और सर्प-आराधाना में हम से बढ कर और कोई देश नहीं है. इन सब के बावजूद सांपों के बारें में लोगों ने इतनी गलतफहमियां पाल रखी है कि हिन्दुस्तान सांपों के लिए एकदम खतरनाक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" align="left" src="http://english.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/07/image-thumb.png" /> सारी दुनियाँ भारत को सपेरों के देश के रूप में जानती है. इतना ही नहीं मुझे लगता है कि सर्प कथाओं और सर्प-आराधाना में हम से बढ कर और कोई देश नहीं है. </p>
<p align="justify">इन सब के बावजूद सांपों के बारें में लोगों ने इतनी गलतफहमियां पाल रखी है कि हिन्दुस्तान सांपों के लिए एकदम खतरनाक देश बन गया है. यहां हर दिन इतने सांप मारे जा रहे हैं कि इन की कई आम प्रजातियां लगभग लुप्त हो चुकी हैं.</p>
<p align="justify">सांप दर असल प्रकृति के रखवालों में से एक है. जब तक जान को खतरा न हो तब तक इनको किसी भी तरह से नुक्सान नहीं पहुँचाना चाहिये बल्कि दक्ष लोगों के द्वारा पकडवा कर इनको आबादी से दूर छुडवा देना चाहिये.&#160; सांप से पीछा भी छूट जायगा, प्रकृति के साथ अत्याचार भी नहीं होगा.</p>
<p align="justify">सांपों के बारें में तमाम प्रकार की भ्रांतियां प्रचलित हैं और इस कारण भी लोगो सांपों का अनावश्यक संहार करते हैं. दर असल भारत में सांपों की जो सैकडों प्रजातियां हैं उन में से सिर्फ पांच हैं जो जहरीले हैं. इसका मतलब कि कोई सांप आप को दिखे तो सौ बार दिखने पर उन में से सिर्फ 5 के जहरीला होने की संभावना है, लेकिन इनके चक्कर में बाकी 95 काल के गर्त में चले जाते हैं.</p>
<p align="justify">इस मामले में हम सब के इष्ट चिट्ठाकार डा अरविंद मिश्रा और लवली कुमारी का चिट्ठा <a href="http://bhujang.blogspot.com/">भारतीय भुजंग</a> एक स्तुत्य प्रयास है जहां सांपो से जुड़ी मिथ्या बातों और भ्रमजाल से लोगों को मुक्त कराने की कोशिश चल रही है. इस चिट्ठे को बुकमार्क करना न भूलें.</p>
<p align="justify">पुनश्च: पिछले हफ्ते मेरे घर के सामने सडक पर लगबग 18 इंच लम्बा और पेंसिल के समान पतला एक सांप मैं ने और मेरी बिटिया ने देखा. हम दोनों तब तक उसकी सुरक्षा करते रहे जब तक वह झाडियों तक पहुंच नहीं गया. लोगों को लगा कि बापबेटी पागल हैं, लेकिन उनकी मूढता का हम पर कोई असर न हुआ.</p>
<p align="center"><font size="1">[Creative Commons Picture <small>by <b><a href="http://www.flickr.com/photos/benimoto/">Benimoto</a>]</b></small></font></p>
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		<title>नई किताब की तय्यारी!!</title>
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		<pubDate>Tue, 07 Jul 2009 06:26:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastriji</dc:creator>
				<category><![CDATA[General]]></category>

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		<description><![CDATA[दोस्तों, कुछ दिनों पहल कोच्चि छोड कर मैं एकदम गांवनुमा एक जगह रह रहा हूँ. यहां 14 दिन के प्रवास के बाद घर वापस आ जाऊंगा. यहां 24 घंटे में लगभग 12 घंटे बिजली मिल जाती है, वह भी तब जब उसका कोई उपयोग नहीं है (रात 12 से सुबह 6 तक, आदि). जालसंपर्क 4 [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>दोस्तों, कुछ दिनों पहल कोच्चि छोड कर मैं एकदम गांवनुमा एक जगह रह रहा हूँ. यहां 14 दिन के प्रवास के बाद घर वापस आ जाऊंगा.</p>
</p>
<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/07/image3.png"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: block; float: none; margin-left: auto; border-top: 0px; margin-right: auto; border-right: 0px" title="Shastri JC Philip, Dr. Johnson C. Philip" border="0" alt="Shastri JC Philip, Dr. Johnson C. Philip" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/07/image_thumb3.png" width="450" height="706" /></a> </p>
<p align="justify">यहां 24 घंटे में लगभग 12 घंटे बिजली मिल जाती है, वह भी तब जब उसका कोई उपयोग नहीं है (रात 12 से सुबह 6 तक, आदि). जालसंपर्क 4 घंटे मिल जाता है, लेकिन जालसंपर्क एवं बिजली एक साथ मिले इसकी गारंटी नहीं है. </p>
<p align="justify">घर से भाग यहां जो दो हफ्ते बिता रहा हूँ इसका एक उद्देश्य अपनी एकाध किताब को तेजी से आगे बढाना है. पुस्तक आजकल की बदलती हुई नैतिकता के बारे में है एवं इसका अंग्रेजी संस्करण जल्दी ही मुफ्त ईपुस्तक के रूप में उप्लब्ध हो जायगा. मेरे लिए कामना कीजिये के यह लेखनकार्य जल्दी ही पूर्ण हो सके.</p>
<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/07/image1.png"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="image" border="0" alt="image" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/07/image_thumb1.png" width="235" height="240" /></a> कल घूमने गये तो वहां बेटे ने एक चित्र लिया जिसे आप ऊपर देख सकते हैं. इस बीच खाने बैठे तो मेरे एक चिट्ठामित्र की आत्मा मुझ से मिलने चली आई. बडा अच्छा लगा. मैं अपने बगल में चपाती रखता गया और मेरे मित्र मेरे साथसाथ खाते रहे. </p>
<p align="justify">खाने के बाद काफी देर तक बेफिक्री से वे मेरे चारों तरफ चहलकदमी करते रहे. मेरे साथियों को बडा ताज्जुब हुआ कि यह क्या हो रहा है. लेकिन मुझे कोई ताज्जुब नहीं हुआ. स्नेह ऐसी चीज है कि आप एक बार स्नेह करेंगे तो आप को दस बार मिलेगा.</p>
<p align="justify">प्रकृति से प्रेम हम सब की जिम्मेदारी है. हमारी लापरवाही के कारण गिद्ध, घरेलू गौरैया, मोर, जुगनू, और तमाम प्रकार के प्राणी लुप्त होते जा रहे हैं. इसका भयानक प्रभाव जनजीवन पर पड रहा है, लेकिन हम आंख मीच कर बैठे हैं. आईये प्रकृति के संरक्षण के लिये जो कुछ हो सकता है उसे करने का संकल्प करें!!</p>
<p align="center"><font size="1">(Picture Copyright Dr. Anand Philip, The pictures are released into Creative Commons, no profit, share alike)</font></p>
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