उस आधी रात को

सजीव ने सारथी, आजादी नाम से एक कविता की रचना स्वतंत्रता दिवस 2007 के लिये की थी. कविता का विषय हिन्दुस्तानियों के लिये कालजयी है अत: उस कविता को हम प्रस्तुत कर रहे हैं सारथी के प्रबुद्ध पाठकों के लिये:

उस आधी रात को,
एक जगी हुई कॉम ने,
उतार फेंकी गुलामी की घंटियाँ,
अपने गले से,
और काट डाली,
जंजीरें अपने पैरों से,
मिला, सालों की तपस्या का वरदान – आजादी ।

उम्मीद थी कि जल्दी ही उतर जायेगी,
रात की चादर,
और जागेगी एक नयी सुबह-
सपनो की , उम्मीदों की, उजालों की ।

मगर रात…..
रात कटी नही अबतक,
अँधेरा तारी है, सन्नाटा भारी है,
नज़र आते हैं इन अंधेरों में भी मगर,
किसानो के बच्चे जो भूखे सो गए,
गरीब बेघर कितने
वहाँ पडे फुटपाथों पे , चीथड़ों में,
सुनायी पड़ती है इन सन्नाटों में भी,
आहें उन नौजवानों की,
जिनके कन्धों पर भार हैं , मगर “बेकार”हैं,
चीखें उन औरतों की,
जो घरों में हैं, घर के बाहर हैं,
वासना भरी नज़रों का झेलती रोज बलात्कार हैं,
चकलों में, चौराहों में शोर है।

ज़ोर है- ज़ोर का राज है,
हैवान सडकों पर उतर आये,
सिम्हासनों पर विराज गए,
अवाम सो गयी,
नपुंसक हो गयी कॉम,
हिंदुवों ने कहीँ तोड़ डाली मस्जिदें,
तो मुसलमानो ने जला डाले मंदिर कहीँ,
किसी बेबस माँ ने बेच दी अपनी कोख कहीँ तो,
किसी दरिन्दे बाप ने नोच डाला,
अपने ही लक्ते-जिगर को।

उफ़ ये अँधेरा कितना कारी है
अँधेरा तारी है, सन्नाटा भारी है,
इन अंधेरों की धुंध में भी कहीँ मगर,
चमक जाते हैं कुछ जुगनू रहत बन कर,
और कुछ मुट्टी भर सितारे,
चमक रहे हैं यूं तो ,
मेरे भी मुल्क के आसमान पर,
मगर फिर भी,
अँधेरा तारी है, सन्नाटा भारी है,
जुगनू नही, तारे नही,
आफताब चाहिऐ,
जिसकी रौशनी में चमक उठे,
जर्रा जर्रा, चप्पा चप्पा,
जिसकी पुकार से नींद टूटे,
सोयी रूहों की,
पंछियों को गीत मिले,
बच्चों को खुला आसमान दिखे।

उस सुबह के आने तक,
उस सूरज के उगने तक,
आओ जलाए रखे,
उम्मीदों के दिए,
जुगनू बने, सितारे बने,
हम सब एक रौशनी बन कर,
मुकाबला करें,
इस अँधेरी रात का,
नींद से जागो, अभी जंग जारी है,
अँधेरा तारी है, सन्नाटा भारी है।

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अरे दोस्तों

अरे दोस्तों,
यह क्या कह दिया
जिनकी, की हमने तारीफें,
आपको भी वो पसन्द आये,
वो तो तारीफे काबिल हैं
पर मेरी क्यों तारीफें हैं,
क्यों मुझसे उम्मीदें हैं,
मुझको अनजान ही रहने दो.

कह दो उनसे,
यह सब धोखा है,
तारीफों से अगर,
यूँ शायर बनते,
पैदाइशी सब शायर होते,
शायरी को कौन पूछता,
सब तरफ सब शायर होते,
मुझसे तुम उम्मीद ना रखना,
अनजाने मे कुछ लिख दिया है,
अनजान मुझको रहने दो
[अनुमति: एक अज्ञात चिट्ठाकार की कलम से]

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प्रोत्साहन ही लिखने वाले का ईधन होता है

come-ant कम-आन्ट शीर्षक कविता में यतीश जैन ने चिट्ठाजगत की एक सच्चाई को प्रस्तुत किया है जिसे कई लोग नकारने की कोशिश करते हैं. सवाल यह है कि क्या टिप्पणी-प्रोत्साहन के बिना चिट्ठाकार पूरे उत्साह के साथ आगे जा सकता है? मेरा उत्तर है कि अधिकतर चिट्ठाकार आगे नहीं जा सकते हैं. अत: यह कविता बांचिये, दो चार शब्द में टिप्पणी यहां टिका दें (इस बात के लिये कि हम भी क्या क्या गजब की रचनायें ढूढ कर लाते हैं), लेकिन कल से यतीश के चिट्ठे पर भी पधारने का कष्ट करें. (वे भी आईंदा आपके चिट्ठे पर पधारेंगे, जहां तक मैं समझता हूं!!)

प्रोत्साहन ही
लिखने वाले का
ईधन होता है.
कुछ लोग कहते है
हम अपनी खुशी के लिए
लिखते है,
कोई पढे या न पढे
मैं नही मानता.

यहाँ
इन चिट्ठों पे
कुछ भी तो अपना नही है,
कुछ लोगो से लिया
कुछ अपना मिलाया
कुछ ज़िंदगी ने सिखाया
जो बिखर गया यही पे
कही लेख बनके
सिमट गयी कही पे
कविता बनके.

फिर क्यों न हम
ज्यादा में बटे
एक होके
क्यों न एक हो जाए
सब मिलके
फिर हमारी भी तुम्हारी
तुम्हारी भी हमारी
बस एक कोना अधिकार का ज़रुर हो
जिससे अपनी सी खुशबू आती रहे
फिर सब इकठ्ठा होंगे चीटियों की तरह
रोज़ होगी दावत विचारों की
और मैं
हटा दूंगा
comments की तख्ती
लिख दूंगा
come-ant
इंतजार नही करुंगा
क़तरा-क़तरा

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होता है जिस समाज में आदर खलनायक का

रचना सिंह ने कल अपने चिट्ठे सामाजिक अपराधों पर एक मार्मिक कविता आज के ताज़ा समाचार, नापुंसको की बस्ती से पोस्ट की जिसकी आखिरी पंक्तियां है:

“आज के लिये इतना ही
और सुनने की ताकत नहीं”

सवाल यह है कि क्यों समाज के बाकी लोग नपुंसक हैं. इसका उत्तर उन्होंने नहीं दिया है, लेकिन मै उत्तर काव्य रूप में दे रहा हूं:

टिकता है समाज कई खम्बों पर,
सत्य, धर्म, न्याय, सहिष्णुता
आदि जिन में से हैं कुछ.

जब होते हैं सारे स्तंभ
स्थान पर अपने अपने,
तो होता है समाज में
अमन और चैन.

गिरते जाते हैं जब वे
एक एक करके, तो
मिटता जाता है समाज से
अमन, चैन, एवं सुरक्षा.

कहीं और जाने की नहीं है
जरूरत,
कारण इसका जानने के लिये.

जब चुप रहते हैं समाज में,
अधर्म के विरुद्ध,
धर्मप्रिय लोग;
जब मूंह बंद कर लेते हैं
अन्याय के विरुद्ध,
न्यायप्रिय लोग;
जब बोलते नहीं है सामाजिक
बुराईयों के विरुद्ध,
समाज के सज्जन लोग;
तो निमंत्रण है यह
अपराधी तत्वों को,
समाज पर राज करने को.

होता है जिस समाज में
आदर खलनायक का,
नायक के समान,
दैवी विधि है उस समाज की कि
कोई न रोक सकेगा
खलनायकों को उनकी
विकृतियों से.

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