Posted July 20th, 2007 by Shastri JC Philip
अगर हमारे रचित काव्य से, तुमको कुछ आराम मिलेगा
यकीं जानिये इस लेखन को, तब ही कुछ आयाम मिलेगा.
भटकों को जो राह दिखाये, ऐसी इक जब डगर बनेगी
दुर्गति की इस तेज गति को, तब जाकर विराम मिलेगा.
इसी पाठ की अलख जगाने, हमने यह लिख डाला है
पूर्ण सुरक्षित हो हर इक जन, सपना एक निराला है.
भूख, गरीबी और बीमारी, कैसे सबको पकड़ रही है
हाथ पकड़ कर बेईमानी का, चोर-बजारी अकड़ रही है.
इन सब से जो मुक्त कराये, ऐसी जब कुछ हवा बहेगी
छुड़ा सकेगी भुजपाशों से, जिसमें जनता जकड़ रही है.
इसी आस के भाव जगा कर, गीत नया लिख डाला है
पूर्ण प्रफुल्लित हो हर इक जन, सपना एक निराला है.
शिक्षित और साक्षर होने में, जो है भेद बता जाती हो
नैतिकता का सबक सिखा कर, जो इंसान बना पाती हो
भेदभाव मिट जाये जिससे, ऐसी एक किताब बनेगी
मानवता की क्या परिभाषा, ये सबको सिखला जाती हो.
ऐसी सुन्दर कृति सजाने, यह छंद नया लिख डाला है
पूर्ण सुशिक्षित हो हर इक जन, सपना एक निराला है.
मेहनत करने से जो भागे, उनका बिल्कुल नाम नहीं है
डर कर जिनको जनता पूजे , वो कोई भगवान नहीं है
कर्म धर्म है सिखला दे जो, ऐसी अब कुछ बात बनेगी
जात पात में भेद कराना, इन्सानों का काम नहीं है.
धर्म के अंतर्भाव दिखाता, इक मुक्तक लिख डाला है
पूर्ण सु्संस्कृत हो हर इक जन, सपना एक निराला है.
[समीर लाल 'समीर' http://udantashtari.blogspot.com/]
हिन्दी चिट्ठाजगत में समीर जी का परिचय देने की आवश्यक्ता नहीं है. हां उनका कहना है कि काव्य विधा में वे पहली बार पैर रख रहें है. ईश्वर करे कि यह कदम कभी भी पीछे न हटें. इस कविता की दो पंक्तियों की तरफ मैं हर शब्दसारथी का ध्यान आकर्षत करना चाहता हूं:
यकीं जानिये इस लेखन को, तब ही कुछ आयाम मिलेगा.
भटकों को जो राह दिखाये, ऐसी इक जब डगर बनेगी
मै उसके साथ अपने चिट्ठाकार मित्रों को याद दिलाना चाहता हूं कि बाजार की ताकतें जब काम करने लगेंगी — हो हिन्दी चिट्ठजगत में चालू हो गया है — तब सिर्फे वे ही चिट्ठे राज करेंगे जहा लोगों को कुछ ठोस मिलेगा – शास्त्री जे सी फिलिप
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Posted July 12th, 2007 by Shastri JC Philip
प्रस्तुत है आपको चिंतनमनन के लिये प्रेरित करने के लिये पांच चुने हुए फूल. इन रचनाकरों के चिट्ठों पर जाकर पूरी माला को देखना न भूलें. टिप्पना न भूलें कि सारथी ने आपको वहां तक पहुंचाया !!
वैलेंटाइन डे का, सेलीब्रेशन था इक होटल में,
बाहर श्यामू रोटी ढूँढ़े, अपनी रधिया की खातिर ! [पूरी कविता पढें ...]
यकायक तब वस्तुस्थिति का भान हुआ
जब स्वयं को एक निर्जन से स्थान में पाया
सोचा, अरे मैं ये कहां चला आया?
शायद घर से बहुत दूर निकल अया… [पूरी कविता पढें ...] Read the rest of this entry »
Posted July 8th, 2007 by Shastri JC Philip
लीजिये, चर्चा के बाद अब कविता का सन्दर्भ सहित विश्लेषण प्रस्तुत है:
तुमने कहा
“नहीं छोडूंगा मै उसे
ये मेरा फैसला है
क्योकि
शायद मै उसे तुम से
ज्यादा प्यार करता हूँ “ Read the rest of this entry »
Posted July 4th, 2007 by Shastri JC Philip
त्रासदी का समर है…ऐ “परमात्मा” !!!
कौन है जो अकाल मृत्यु, बाढ, आकाल, भूकंप, एवं इस तरह की प्राकृतिक विपदाओं को देख कर चुप रह सकता है. हां, इतना जरूर है कि अलग अलग लोग भिन्न तरीके से प्रभावित होते हैं. कुछ के लिये ये सिर्फ कुछ और आंकडे मात्र हैं जिन पर आज वे कुछ घडियाली आंसू बहा देंगे — हो सके तो वह भी “प्रतीकात्मक” तरीके से. शायद कुछा चंदा, किसी राहत-संस्था की झोली में डाल देंगे. लेकिन सूर्य अस्त होने एवं टीवी पर पिक्चर चालू होते ही ये घटनायें उनके लिये अस्तित्व विहीन हो जाती हैं. ऐसा लगता है कि दिन में कुछ घटा ही नहीं था. अधिकतर लोग ऐसे नहीं हैं. वे दूसरों के दु:ख में दुखी होते हैं एवं यह दु:ख उनके मन में काफी समय तक रहता है. वे इसके लिये बहुत कुछ करने की कोशिश भी करते हैं. हां एक छोटा सा समूह है जो इन बातों से बहुत अधिक दुखी होता है एवं समझ नहीं पाता कि यह सब क्या है. यह काव्य उनके हृदय की वेदना से भरा चीत्कार है.
एक छोटा समूह ऐसा भी है जो सर्वशक्तिमान ईश्वर के प्रेमरूप को देखता है एवं समझ नहीं पाता कि वे संसार में इस तरह की विपदाओं को क्यों होने देते हैं. यह प्रश्न कवि के मन से एक टूटे बांध के जल के समान इस कविता में बहता है. वह जवाब देने की कोशिश नहीं करता. उसकी जरूरत भी नहीं है. पहले हम प्रश्न की गंभीरता एवं गहराई को समझे तो लें. प्रस्तुत है: त्रासदी का समर है…ऐ “परमात्मा” !!!
सुंदर जगत ये सुंदर आवरण
अद्भुत प्रकृति पर दिवस का आगमन
किस ओर नहीं …हर ओर मौज है
चातुर्दिक प्रेम दिव्य संगीत की लय है…
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विपदा का एक ऐसा मंजर भी आता है
तराशी हुई दुनियाँ में भी एक ज्वाला फूट पड़ती है
नभ धू-धू करता हुआ उपवन हीं सारा जलता है,
सुंदर मानव मूर्ति इतिहास बनता जाता है…
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