श्रेष्ठ ब्लागरी के सार्वजनिक सूत्र

व्यवसाय में आइडिया को संरक्षित और सुरक्षित रखने की बड़ी गहन परिपाटी है. क्योंकि वहां कहा जाता है कि आईडिया ही पैसा है. बात सही है. जहां पैसा और प्रतिस्पर्धा होगी वहां सर्वाइवल आफ दि फिटेस्ट की अवधारणा ही काम करेगी. लेकिन अपने हिन्दी के ब्लागरों में यह रोग न के बराबर है. मेरा अनुभव है कि यहां प्रतिस्पर्धा की बजाय सह-अस्तित्व का फार्मूला काम करता है. अपने संक्षिप्त अनुभव से कुछ बातें आपके साथ बांटने का मन हो रहा है. यह न मानिएगा कि मैं कोई ज्ञान बघार रहा हूं. कुछ विचार हैं जो काम करते-करते मन में पैदा हुए हैं उनको आपके सामने रखता हूं. काम के हों तो ठीक, न काम के हों नकारने से कौन रोक सकता है?

1. लिखिए कम, सोचिए ज्यादा: बुद्धि का वेग किसी भी सुपर कम्प्यूटर से तेज है. संख्याओं की गणना करने वाले सुपर कम्प्यूटर भी बुद्धि की विराटता के सामने बौने हैं. हम हर समय कुछ न कुछ सोचते रहते हैं. सोचना बंद हो जाए तो दो ही बाते हो सकती हैं. या तो आप समाधि में चले गये या फिर आप महासमाधि को प्राप्त हो गये. इन दो अवस्थाओं को छोड़कर सोचना कभी बंद नहीं हो सकता.

लेकिन एक गड़बड़ यह है कि यह सोचना बहुत बेतरतीब होता है. पल-छिन में हमारे सोचने के विषय और स्थान बदलते रहते हैं. एक क्षण पहले आप किसी और विषय के बारे में सोच रहे होते हैं अगले ही क्षण आपका विषय बदल जाता है. योगी इस अवस्था को विक्षिप्त बुद्धि कहते हैं. यह विक्षिप्त बुद्धि किसी काम की नहीं. यह आगे-आगे चलती है और हम इसके पीछे-पीछे भागते हैं. दिशाहीन बुद्धि तो दिशाहीन भागदौड़.

तकनीकि ने इस भागदौड़ को और बढ़ा दिया है. अब हम जो सोचते हैं उसे सार्वजनिक करने के लिए हमारे पास तुरंत एक औजार होता है. हमें किसी से बात करनी हो तो हमारे पास आधुनिक संचार सुविधाएं हैं. हमें किसी को संदेश भेजना हो तो हमारे पास उपकरण हैं. हमें कुछ लिखना हो तो हमारे पास ब्लाग हैं. लेकिन हम क्यों बात करना चाहते हैं, किसलिए संदेश भेजना चाहते हैं और क्या लिखना चाहते हैं इसपर पर्याप्त सोच-विचार शायद ही करते हैं. और बातों पर लागू हो न हो लिखने पर यह लागू होता है कि लिखने से पहले आप भरपूर विचार करें कि आप क्या लिखना चाहते हैं.

हम जो लिख रहे हैं क्या एक पाठक के तौर पर खुद उसे पढ़कर लाभान्वित होंगे? कुछ भी लिखने से पहले दो-चार बार इस बारे में जरूर सोचना चाहिए. खासकर तब जब आप अपना ब्लाग लिख रहे हैं. आपका ब्लाग आपकी पहचान है. यह आपको ही तय करना होगा कि आपकी पहचान कैसी हो?

2.समीक्षा या सूचना: ब्लाग बेहद निजी अभिव्यक्ति हैं. हम जो कुछ देखते या सुनते हैं उसकी प्रतिक्रियास्वरूप हमारे मन में जो भाव पैदा होते हैं वही हम लिखते भी हैं. सामान्य नागरिक ऐसा करे तो इसमें कोई हर्ज नहीं है लेकिन एक ब्लागर को इस तरह से व्यवहार शायद नहीं करना चाहिए. ब्लागर को समीक्षक होने की बजाय सूचना प्रदाता के रूप में काम करना चाहिए. आपकी बातों के पीछे तर्क होने चाहिए और जरूरी हो तो आंकड़ें भी होने चाहिए.

एक ब्लागर अघोषित रूप से अधिक जिम्मेदार पत्रकार होता है. पत्रकार को क्रासचेक करने के लिए संपादक होता है लेकिन यहां कोई संपादक नहीं है. फिर ऐसे में एक ब्लागर की जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है कि वह अपने लिखे को खुद नियंत्रित करे. अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ आजादी का दुरूपयोग नहीं होता. इसलिए मेरा यह मानना है कि श्रेष्ठ ब्लागर सूचनाओं पर ध्यान देता है न कि समीक्षा पर. अगर सूचनाएं सटीक होती हैं तो आप समीक्षा से जो बात कहना चाहते हैं लोग अपने आप उस निष्कर्ष तक पहुंच जाते हैं.

3. निजी विचार बनाम सार्वजनिक जरूरत: जब आप दूसरी विधि से सोचना शूरू करेंगे तो आपको इस बात का आभास होने लगता है कि मैं किस बात पर जोर दूं. अपने निजी विचारों पर या सार्वजनिक जरूरतों पर. व्यावसायिक पढ़ाई में एक बात सिखाई जाती है कि आप ट्रेन्ड्स अथवा रूझानों की अनदेखी न करें. कोई भी मार्केटिंग की रणनीति बनाते समय बाजार के ट्रेन्ड्स का पूरा ध्यान रखा जाता है. यह बात दूसरी है कि रसूखवाले लोग अपने उत्पादों के हिसाब से ट्रेन्ड्स बनाने में भी माहिर होते हैं.

हम ब्लागर अभी इतने रसूखवाले नहीं हुए हैं कि अपने हिसाब से जरूरतों को तय करें. हमें जरूरतों को समझना होगा. कम से कम भाषाई जरूरत की चिंता तो हमें करनी ही होगी. और मुझे लगता है कि जरूरतों पर ध्यान दें तो हमारे निजी विचारों की लोगों को उतनी जरूरत नहीं है. हमें ऐसे विषयों को उठाना चाहिए जो लोगों की जरूरत हों. अगर हम इस पर थोड़ा ध्यान दे सके तो हमारी ब्लागरी कालजयी हो जाएगी. ( यह जानते हुए इसे लिख रहा हूं कि मैं एक श्रेष्ठ ब्लागर नहीं हूं.) श्रेष्ठ ब्लागरी के सार्वजनिक सूत्र

टिप्पणी करते हैं आप अपने लिए

  कंजूसी हमेशा नुकसानदेह होती है. दूसरों के लिए और अपने लिए भी. हिन्दी के चिट्ठाकार आमतौर पर टिप्पणी के मामले में कंजूसी बरतते हैं. यह दूसरों के लिए जितना नुकसान हो सकता है उससे ज्यादा नुकसान यह कंजूसी खुद हमारे लिए भी हो सकती है. बात थोड़ी अटपटी है लेकिन आईये इसे समझते हैं.

मैं खुद स्वभाव से बहुत टिप्पणियां नहीं करता. पांच-दस टिप्पणियों को मैं कोई उपलब्धि नहीं मानता. चार-पांच सौ सक्रिय ब्लागरों के बीच पांच-दस टिप्पणियों का क्या महत्व हो सकता है भला? लेकिन मैं अपने बारे में ही सोचता हूं तो लगता है कि देना हमारे स्वभाव से निकल गया है. अंदर से हम इतने दीन हो गये हैं कि हमें प्राप्ति की उम्मीद रहती है लेकिन हम भी किसी को कुछ दे सकते हैं इसका भान ही नहीं रहता. यही स्वभाव हमारी ब्लागरी में भी दिख रहा है. लिखनेवाले सैकड़ों और टिप्पणी करने वाले गिने-चुने लोग? इसका मतलब है कि हम सैकड़ों अनुदार लोगों के बीच कुछ उदार लोग हैं. शायद ब्लागरी उनके ही कारण इतनी जीवंत है.

हमें यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि हम ब्रह्मवाक्य रच रहे हैं जिसे अपने-आप पाठक मिलेंगे. और हमारे लिखे को लोग न भी पढ़ें तो उनका दिन आराम से गुजर जाएगा. यह तो उन पाठकों की उदारता है जो यह जानते हुए पढ़ते हैं कि बिना पढ़े भी काम चल सकता है. और फिर उदारता की पराकाष्ठा यह कि वे टिप्पणी करते हैं. यह उदारता हम आप अपने अंदर क्यों विकसित नहीं कर सकते?

यह तो हुई स्वभाव की बात लेकिन एक व्यावसायिक बात भी छिपी है टिप्पणियों के पीछे. आप जिनती अधिक टिप्पणियां करते हैं अपने ब्लाग के लिए उतना अधिक संपर्कसूत्र विकसित करते हैं. ऐसे चिट्ठाकार जो अपने ब्लाग्स का विज्ञापन नहीं कर सकते टिप्पणी उनके ब्लाग प्रमोशन का अच्छा हथियार है. जितने अधिक चिट्ठों के पोस्ट पर आपकी टिप्पणियां होंगी अपने चिट्ठे के लिए आप उतने ही अधिक लिंक तैयार करते हैं. चिट्ठाजगत बता रहा है कि उसके रिकार्ड में 25,791 प्रवृष्टियां दर्ज हैं. इतनी प्रवृष्टियों के जितने पृष्ठों पर हमारी टिप्पणी होगी उतना ही हमारे ब्लाग तक आने के लिए लोगों के लिए रास्ते खुलेंगे. मान लीजिए कोई हिन्दी में खोज करता है और वह ऐसी प्रवृष्टि पर पहुंचता है जहां आपने टिप्पणी की है. तो आप ऐसे अनजान पाठकों के लिए अपने ब्लाग के रास्ते खोलते हैं जो न एग्रीगेटरों को जानते हैं और न ब्लाग की गुटबाजी को.

उम्दा लेखन के अपने-अपने पैमाने हैं. उतार-चढ़ाव तो आते रहेंगे. लेकिन टिप्पणियों के माध्यम से आप अपने चिट्ठों के लिए जो स्थाई लिंक तैयार करेंगे वे सदैव आपके ब्लाग को पाठकों से लबरेज रखेंगे. तय मानिये जिस चिट्ठे पर आप टिप्पणी करके आते हैं उस चिट्ठाकार के साथ आपका एक भावनात्मक रिश्ता जुड़ जाता है, जो शायद हमारी चिट्ठाकारिता का अंतिम उद्येश्य है. [साभार, टिप्पणी करते हैं आप अपने लिए]

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हिंदी की पहली कहानी और माधवराव सप्रे

पंडित माधवराव सप्रे:एक परिचय

माधवराव सप्रे जी का जन्म जून 1871 में दमोह जिले के पथरिया ग्राम में हुआ था। बिलासपुर में मिडिल तक की पढ़ाई के बाद मेट्रिक शासकीय विद्यालय रायपुर से उत्तीर्ण किया। 1899 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी ए करने के बाद उन्हें तहसीलदार के रुप में शासकीय नौकरी मिली लेकिन जैसा कि उस समय के देशभक्त युवाओं में एक परंपरा थी सप्रे जी ने भी शासकीय नौकरी की परवाह न की।सन 1900 में जब समूचे छत्तीसगढ़ में प्रिंटिंग प्रेस नही था तब इन्होंने बिलासपुर जिले के एक छोटे से गांव पेंड्रा से “छत्तीसगढ़ मित्र” नामक मासिक पत्रिका निकाली। हालांकि यह पत्रिका सिर्फ़ तीन साल ही चल पाई। सप्रे जी ने लोकमान्य तिलक के मराठी केसरी को यहां हिंद केसरी के रुप में छापना प्रारंभ किया, साथ ही हिंदी साहित्यकारों व लेखकों को एक सूत्र में पिरोने के लिए नागपुर से हिंदी ग्रंथमाला भी प्रकाशित की।आपनें कर्मवीर के प्रकाशन में भी महती भूमिका निभाई।

सप्रे जी की कहानी एक टोकरी मिट्टी (जिसे बहुधा लोग “टोकनी भर मिट्टी” भी कहते हैं) को हिंदी की पहली कहानी होने का श्रेय प्राप्त है।

सप्रे जी ने लेखन के साथ-साथ विख्यात संत समर्थ रामदास के मराठी दासबोध व महाभारत की मीमांसा,दत्त भार्गव,श्री राम चरित्र,एकनाथ चरित्र और आत्म विद्या जैसे मराठी ग्रंथों,पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद भी बखूबी किया।1924 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के देहरादून अधिवेशन में सभापति रहे सप्रे जी ने 1921 में रायपुर में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की और साथ ही रायपुर में ही पहले कन्या विद्यालय जानकी देवी महिला पाठशाला की भी स्थापना की। यह दोनो विद्यालय आज भी चल रहे हैं।

SanjeetTripathi

 

[सभार, Sanjeet Tripathi, Raipur, Chhattisgarh, India एक आम भारतीय, जिसकी योग्यता भी सिर्फ़ यही है कि वह एक आम भारतीय है जिसे यह नहीं मालुम कि आम से ख़ास बनने के लिए क्या किया जाए फ़िर भी वह आम से ख़ास बनने की कोशिश करता ही रहता है]

 

हिंदी के इस पहले कहानीकार का निधन 26 अप्रेल 1926 को हो गया।

सप्रे जी के कुछ स्मरणीय कथन:-

1—”मैं महाराष्ट्री हूं पर हिंदी के विषय में मु्झे उतना ही अभिमान है जितना कि किसी हिंदीभाषी को हो सकता है।”
2—”जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जागृत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं है”
3—”विदेशी भाषा में शिक्षा होनें के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है।”

पाठकों के लिए प्रस्तुत है सप्रे जी द्वारा लिखित हिंदी की पहली कहानी

“एक टोकरी भर मिट्टी”

किसी श्रीमान जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोपड़ीं थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता उस झोपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई। विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोपड़ी हटा ले। पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थी। उसका पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोपड़ी में मर गया था। पतोहू भी एक पांच बरस की कन्या को छोड़कर चल बसी थीं। अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी। जब कभी उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दुख के फूट–फूटकर रोने लगती थी। और जबसे उसने अपने श्रीमान पड़ोसी की इच्छा का हाल सुना,तब से वह मृतप्राय हो गयी थी। उस झोपड़ीं में उसका मन ऐसा लग गया था कि बिना मरे वहां से वह निकलना ही नहीं चाहती थी। श्रीमान के सब प्रयत्न निष्फल हुए। तब वे अपनी जमींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर उन्होंने अदालत से झोपड़ी पर अपना कब्जा कर लिया और विधवा को वहां से निकाल दिया। बिचारी अनाथ तो थी ही, पास पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी।

एक दिन श्रीमान उस झोपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहां पहुंची। श्रीमान ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहां से हटा दो। पर वह गिड़गिड़ाकर बोली कि “महाराज,अब तो यह झोपड़ी तुम्हारी ही हो गयी है। मैं उसे लेने नहीं आयी हूं। महाराज क्षमा करें तो एक बिनती है।” जमींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा कि “जब से यह झोपड़ी छूटी है तब से मेरी पोती ने खाना–पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत कुछ समझाया पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल¸ वहीं रोटी खाऊंगी। अब मैंने यह सोचा है कि इस झोपड़ी में से एक टोकरी भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊंगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराज¸ कृपा करके आज्ञा दीजिए तोइस टोकरी में मिट्टी ले जाऊं।” श्रीमान ने आज्ञा दे दी।

विधवा झोपड़ी के भीतर गयी। वहां जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आंखों से आंसू की धारा बहने लगी। अपने आन्तरिक दुख को किसी तरह सम्हालकर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठाकर बाहर ले आयी। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान से प्रार्थना करने लगी कि “महाराज¸ कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगाइए जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूं।”

जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज हुए,पर जब वह बार–बार हाथ जोड़ने लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके भी मन में कुछ दया आ गयी। किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने आगे बढ़े। ज्योंही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्यों ही देखा कि यह काम उनकी शक्ति के बाहर है। फिर तो उन्होंने अपनी सब ताकत लगाकर टोकरी को उठाना चाहा,पर जिस स्थान पर टोकरी रखी थी वहां से वह एक हाथ–भर ऊंची न हुई। वह लज्जित होकर कहने लगे कि “नहीं,यह टोकरी हमसे न उठायी जावेगी।”

यह सुनकर विधवा ने कहा, “महाराज नाराज न हों,आप से तो एक टोकरी भर मिट्टी नहीं उठायी जाती और इस झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियां मिट्टी पड़ी है। उसका भार आप जन्म भर क्यों कर उठा सकेंगे? आप ही इस बात पर विचार कीजिए!”
जमींदार साहब धन–मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गये थे पर विधवा के उपरोक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गयीं। कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा मांगी और उसकी झोंपड़ी वापस दे दी।

संदर्भ- 1-डाक्टर मन्नूलाल यदु द्वारा प्रकाशित “छत्तीसगढ़ की अस्मिता” 2-”सर्वज्ञ”पर उपलब्ध सामग्री

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हास्य व्यंग्य के किंग: समीर लाल

उड़नतश्तरी के लेखक समीर लाल की सक्रियता देखकर यह विश्वास करना मुश्किल लगता है कि उन्होंने गये साल ही लिखना शुरू किया। हलके-फुल्के अंदाज़ में गहरी बात कह जाने वाले समीरजी अपनी बात कहने के नये-नये दिलकश अंदाज़ खोजते रहते हैं। चाहे वह गीता का सार हो या कबीर के दोहे, आधुनिक परिस्थितियों से जोड़कर वे बेहतरीन लेख लिखते रहते हैं। कुंडलिया किंग समीर ने चिट्ठाजगत को कुंडलिया से परिचित कराया और फिर धीरे से उसका पेटेंट मुंडलिया के नाम से करा लिया। पंकज के लालाजी का ज्ञान का प्रकाश ही था जिससे चकाचौंध होकर गिरिराज जोशी उनका शिष्यत्व ग्रहण करने के लिये बेताब हुये।

Sameer Lalमूलत: पूर्वी उत्तरप्रदेश (गोरखपुर) के वासी समीर की पैदाइश रतलाम की और ज्यादातर रिहाइश मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी जबलपुर की है। आज के लोकप्रिय चिट्ठाकार समीरलाल में लेखन के कीटाणु बचपन से ही थे। उन दिनों को याद करते हुये समीरजी बताते हैं, “एक बार बचपन में कहानी लिखना शुरु किया था जब क्लास पाँचवीं में था शायद। जबलपुर से प्रकाशित “ज्योतिर्मिलन” मासिक के बाल विषेशांक में कहानियां प्रकाशित हुई और बाल साहित्यकार का पुरस्कार मिला जिसे घोषणा के तीन वर्ष उपरान्त प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के हाथों प्राप्त किया।” स्कूल के दिनों में परसाई के हाथों पुरस्कार के रूप में प्राप्त पुस्तक आज भी उनके लिये बहुमूल्य धरोहर है।

लेकिन स्कूल के दिनों के बाद शायद जीवन संघर्षों के कारण लिखना स्थगित रहा। इस बारे में समीरजी कहते हैं, “फिर कभी नहीं लिखा, बस आम युवकों की तरह कॉलेज की कापियों के आखिरी पन्नों पर कुछ शेरो शायरी और कवितायें लिखीं। पिछले एक वर्ष से नियमित लेख कवितायें, व्यंग्य की ओर पुनः रुझान हुआ जो चिट्ठों के माध्यम से गति प्राप्त करता गया और वही ऊड़न तश्तरी, ई-कविता और अनुभूति याहू ग्रुप के माध्यम से सबके सामने है।” आचार्य रजनीश को सुनने के शौकीन समीर को किताबें पढ़ने, पेंसिल-स्केचिंग करने और शास्त्रीय संगीत सुनने का भी शौक है। अंग्रेजी कवि राबर्ट फ्रॉस्ट इनके पसंदीदा कवि हैं जिनकी कई कविताऒं का आपने भावानुवाद भी किया है।

लेखन के अलावा कालेज के दिनों में अपने तमाम इतर अनुभवों की दास्तान बताते हुये समीर कहते हैं, “सी.ए. करने के दौरान बम्बई की छात्र राजनिति में सक्रिय रहा, हॉस्टल एसोसियेशन और छात्र संघ के महामंत्री, फिर बाद में, काँग्रेस में सक्रिय भूमिका रही। मध्यप्रदेश युवक कांग्रेस के औद्योगिक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष, कमलनाथ जी के संयोजन में म.प्र. जनजागरण मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री, जबलपुर चार्टड एकाउन्टेन्ट एसोसियेशन के उपाध्यक्ष, जबलपुर चेम्बर ऑफ कामर्स के ट्रेज़रार और उपाध्यक्ष भी रहा। इस दौरान कई अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय रोजगार मेलों का जबलपुर में आयोजन किया। राजनेताओं से संपर्क रखने का तब बहुत शौक था और साथ ही आचार्य रजनीश, महेश योगी, शंकराचार्य स्वरुपानन्द जी और स्वामी प्रज्ञानन्द जी आदि से व्यक्तिगत परिचय और उनकी विभिन्न संस्थाओं का ऑडिटर और सलाहकारी भी रहा।”

समीरलाल चिट्ठाचर्चा में नियमित लिखते हैं, और जिस दिन ये लिखें उस दिन इस चिट्ठे के हिट्स की संख्या हनुमान की पूँछ बन जाती है। टिप्पणी करने के मामले में समीर बेहद उदार हैं, लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि अक्सर नोटिस बोर्ड के नीचे भी जगह खाली होने पर समीरजी लिख देते हैं, “अच्छा लिखा है। लिखते रहें।” आजकल कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करने वाले समीरलाल जी अपनी जमाऊ कविताऒं से अपना रंग जमाने लगे हैं और श्रोताऒं के बीच वे लोकप्रिय कवि हो गये हैं। पिछ्ले एक वर्ष में ही बफैलो, वाशिंगटन में कवि सम्मेलन और जबलपुर में कुछ काव्य गोष्ठियां और एकल काव्य पाठ का उन्हें मौका मिला।

समीरलालजी बम्बई से सी.ए. कर वापस गृहनगर जबलपुर में प्रैक्टिस करने लगे। 1999 में वे कनाडा आ गये, दोनों बेटों को १२वीं तक भारत में ही पढ़ाया ताकि वो अपनी संस्कृति को समझ सकें और उससे जुड़ सकें, दोनों अब कम्प्यूटर इंजीनियर हैं। खुद कनाडा आकर शेयर बजार के कोर्स कर पहले स्टाक एक्सचेंज पर यहां की एक बड़ी बैंक के लिये ट्रेडर रहे। न जाने कब तकनीक की तरफ रुझान हो गया। सब कुछ इन्टरनेट से ही सीखा, फिर माईक्रोसॉफ्ट एक्सेल एक्सपर्ट, एक्सेस एक्सपर्ट आदि के रास्ते चलते हुये आऊटलुक प्रोग्रामिंग में महारत हासिल की। अब विज़ुअल बेसिक डॉटनेट में सिद्धता के दम पर उसी बैंक में बतौर तकनीकी सलाहकार कार्यरत हैं। इसी बीच अमेरिका से ही अकाउंटिंग से संबंधित सी.एम.ए और प्रोजेक्ट मेनेंजमेंट में पीएमपी पूरण किया। संप्रति बैंक की विभिन्न मेन्यूल कार्यप्रणाली को आटोमेट करने के कार्य में सलाहकार हैं। स्पष्टतः समीर में लगातर नया ज्ञान, नया विज्ञान सीखने की ललक हैं।

sy3 मार्च 2006 में समीरलाल ने ब्लॉग लेखन की शुरुआत की और देखते ही देखते लोकप्रिय हो गये हैं। कविता, कुंडलियाँ, त्रिवेणी और मुंडलिया, सबमें इनकी सहज गति है। सहज, मनलुभावन गद्य इनके लेखन का प्राणतत्व हैं। मजाक करो तो मजाक सहने का माद्दा भी रखो का सिद्धांत मानने वाले समीर हास्य व्यंग्य के महारथी हैं लेकिन किसी का भी दिल दुखाना इनकी फितरत में नहीं है। एकाध बार तो अपनी पोस्ट तक यह सोचकर हटा ली कि किसी का दिल न दुखे। लेखन से मजाकिया और बिंदास से लगने वाले समीर को “लेखन शैली के विपरीत और व्यवसायिक मजबूरियों के अलावा स्वाभाव से शांत और गंभीर रहना पसंद है।” अपने स्वभाव के एक और पहलू का खुलासा करते हुये कहते है: “गुस्सा बहुत मुश्किल से ही आता है।” हिंदी चिट्ठाकारी को संभावनाशील मानने वाले समीरजी का विचार आगे चलकर भारत में ही बसने का है। फिलहाल भारत में कुछ ट्रस्टों से जुडे़ हैं।

ब्लॉग लेखन में पत्नी के सहयोग का जिक्र करते हुये समीरजी खुलासा करते हैं, “पत्नी का योगदान ही है कि पूर्ण खाली समय ब्लॉग और लेखन को देने का बिल्कुल बुरा नहीं मानना, तभी इतना समय देना संभव हो पाता है। बाज़ार से लेकर घर के सारे खुद ही कर लेती है। गायन में उनकी काफी रुचि है जो रियाज़ के अभाव में लगभग छूटा हुआ है। किताबें पढ़ने का शौक है मगर एम.ए. हिन्दी में होने के बावजूद भी लेखन में रुझान नहीं। उनका मानना है कि अगर दोनों ही यह करने लगे, तो घर चल चुका। बात तो पते की है, इसलिये हम इसे तुरंत मान लेते हैं।”

चार पांच घंटे से ज्यादा सोने को समय की बरबादी मानने वाले समीर ब्लॉग लेखन के अलावा तरकश की कोर टीम के सदस्य भी हैं। इसके अलावा अनुभूति, अभिव्यक्ति, हिन्दी नेस्ट, साहित्यकुंज, मुक्तक सागर पर रचनायें प्रकाशित हुई हैं। एक्सेल पर अंग्रेजी में ब्लॉग टेक नोट एक्सचेन्ज और वीबी डॉट नेट पर कई ऑनलाईन पत्रिकाओं में अनेकों लेख भी प्रकाशित। समीर टाईम्स के नाम से सन 2000 में एक वेबसाईट शुरु की जो कि आज भी सुचारु रुप से चल रही है। बस मौज मजे के लिये मगर हिट्स ठीक ठाक मिल जाती हैं। [निरंतर में अनूप शुक्ला का लेख हास्य व्यंग्य के किंग: समीर लाल]

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