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	<title>सारथी &#187; चुनी हुई प्रविष्ठियां</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>श्रेष्ठ ब्लागरी के सार्वजनिक सूत्र</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/755</link>
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		<pubDate>Sat, 06 Oct 2007 00:42:38 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

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		<description><![CDATA[व्यवसाय में आइडिया को संरक्षित और सुरक्षित रखने की बड़ी गहन परिपाटी है. क्योंकि वहां कहा जाता है कि आईडिया ही पैसा है. बात सही है. जहां पैसा और प्रतिस्पर्धा होगी वहां सर्वाइवल आफ दि फिटेस्ट की अवधारणा ही काम करेगी. लेकिन अपने हिन्दी के ब्लागरों में यह रोग न के बराबर है. मेरा अनुभव [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2">
<p><img id="id" height="100" src="http://bp0.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RmuFexWA18I/AAAAAAAAAHM/6EU6ISqFwgk/s200/IMG_0160.jpg" width="80" /> व्यवसाय में आइडिया को संरक्षित और सुरक्षित रखने की बड़ी गहन परिपाटी है. क्योंकि वहां कहा जाता है कि आईडिया ही पैसा है. बात सही है. जहां पैसा और प्रतिस्पर्धा होगी वहां सर्वाइवल आफ दि फिटेस्ट की अवधारणा ही काम करेगी. लेकिन अपने हिन्दी के ब्लागरों में यह रोग न के बराबर है. मेरा अनुभव है कि यहां प्रतिस्पर्धा की बजाय सह-अस्तित्व का फार्मूला काम करता है. अपने संक्षिप्त अनुभव से कुछ बातें आपके साथ बांटने का मन हो रहा है. यह न मानिएगा कि मैं कोई ज्ञान बघार रहा हूं. कुछ विचार हैं जो काम करते-करते मन में पैदा हुए हैं उनको आपके सामने रखता हूं. काम के हों तो ठीक, न काम के हों नकारने से कौन रोक सकता है?</p>
<p><strong>1. लिखिए कम, सोचिए ज्यादा:</strong> बुद्धि का वेग किसी भी सुपर कम्प्यूटर से तेज है. संख्याओं की गणना करने वाले सुपर कम्प्यूटर भी बुद्धि की विराटता के सामने बौने हैं. हम हर समय कुछ न कुछ सोचते रहते हैं. सोचना बंद हो जाए तो दो ही बाते हो सकती हैं. या तो आप समाधि में चले गये या फिर आप महासमाधि को प्राप्त हो गये. इन दो अवस्थाओं को छोड़कर सोचना कभी बंद नहीं हो सकता.</p>
<p>लेकिन एक गड़बड़ यह है कि यह सोचना बहुत बेतरतीब होता है. पल-छिन में हमारे सोचने के विषय और स्थान बदलते रहते हैं. एक क्षण पहले आप किसी और विषय के बारे में सोच रहे होते हैं अगले ही क्षण आपका विषय बदल जाता है. योगी इस अवस्था को विक्षिप्त बुद्धि कहते हैं. यह विक्षिप्त बुद्धि किसी काम की नहीं. यह आगे-आगे चलती है और हम इसके पीछे-पीछे भागते हैं. दिशाहीन बुद्धि तो दिशाहीन भागदौड़.</p>
<p>तकनीकि ने इस भागदौड़ को और बढ़ा दिया है. अब हम जो सोचते हैं उसे सार्वजनिक करने के लिए हमारे पास तुरंत एक औजार होता है. हमें किसी से बात करनी हो तो हमारे पास आधुनिक संचार सुविधाएं हैं. हमें किसी को संदेश भेजना हो तो हमारे पास उपकरण हैं. हमें कुछ लिखना हो तो हमारे पास ब्लाग हैं. लेकिन हम क्यों बात करना चाहते हैं, किसलिए संदेश भेजना चाहते हैं और क्या लिखना चाहते हैं इसपर पर्याप्त सोच-विचार शायद ही करते हैं. और बातों पर लागू हो न हो लिखने पर यह लागू होता है कि लिखने से पहले आप भरपूर विचार करें कि आप क्या लिखना चाहते हैं.</p>
<p>हम जो लिख रहे हैं क्या एक पाठक के तौर पर खुद उसे पढ़कर लाभान्वित होंगे? कुछ भी लिखने से पहले दो-चार बार इस बारे में जरूर सोचना चाहिए. खासकर तब जब आप अपना ब्लाग लिख रहे हैं. आपका ब्लाग आपकी पहचान है. यह आपको ही तय करना होगा कि आपकी पहचान कैसी हो?</p>
<p><strong>2.समीक्षा या सूचना:</strong> ब्लाग बेहद निजी अभिव्यक्ति हैं. हम जो कुछ देखते या सुनते हैं उसकी प्रतिक्रियास्वरूप हमारे मन में जो भाव पैदा होते हैं वही हम लिखते भी हैं. सामान्य नागरिक ऐसा करे तो इसमें कोई हर्ज नहीं है लेकिन एक ब्लागर को इस तरह से व्यवहार शायद नहीं करना चाहिए. ब्लागर को समीक्षक होने की बजाय सूचना प्रदाता के रूप में काम करना चाहिए. आपकी बातों के पीछे तर्क होने चाहिए और जरूरी हो तो आंकड़ें भी होने चाहिए.</p>
<p>एक ब्लागर अघोषित रूप से अधिक जिम्मेदार पत्रकार होता है. पत्रकार को क्रासचेक करने के लिए संपादक होता है लेकिन यहां कोई संपादक नहीं है. फिर ऐसे में एक ब्लागर की जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है कि वह अपने लिखे को खुद नियंत्रित करे. अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ आजादी का दुरूपयोग नहीं होता. इसलिए मेरा यह मानना है कि श्रेष्ठ ब्लागर सूचनाओं पर ध्यान देता है न कि समीक्षा पर. अगर सूचनाएं सटीक होती हैं तो आप समीक्षा से जो बात कहना चाहते हैं लोग अपने आप उस निष्कर्ष तक पहुंच जाते हैं.</p>
<p><strong>3. निजी विचार बनाम सार्वजनिक जरूरत:</strong> जब आप दूसरी विधि से सोचना शूरू करेंगे तो आपको इस बात का आभास होने लगता है कि मैं किस बात पर जोर दूं. अपने निजी विचारों पर या सार्वजनिक जरूरतों पर. व्यावसायिक पढ़ाई में एक बात सिखाई जाती है कि आप ट्रेन्ड्स अथवा रूझानों की अनदेखी न करें. कोई भी मार्केटिंग की रणनीति बनाते समय बाजार के ट्रेन्ड्स का पूरा ध्यान रखा जाता है. यह बात दूसरी है कि रसूखवाले लोग अपने उत्पादों के हिसाब से ट्रेन्ड्स बनाने में भी माहिर होते हैं.</p>
<p>हम ब्लागर अभी इतने रसूखवाले नहीं हुए हैं कि अपने हिसाब से जरूरतों को तय करें. हमें जरूरतों को समझना होगा. कम से कम भाषाई जरूरत की चिंता तो हमें करनी ही होगी. और मुझे लगता है कि जरूरतों पर ध्यान दें तो हमारे निजी विचारों की लोगों को उतनी जरूरत नहीं है. हमें ऐसे विषयों को उठाना चाहिए जो लोगों की जरूरत हों. अगर हम इस पर थोड़ा ध्यान दे सके तो हमारी ब्लागरी कालजयी हो जाएगी. ( यह जानते हुए इसे लिख रहा हूं कि मैं एक श्रेष्ठ ब्लागर नहीं हूं.) <a href="http://visfot.blogspot.com/2007/10/blog-post_266.html">श्रेष्ठ ब्लागरी के सार्वजनिक सूत्र</a></p>
<p> </font></p>
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		<title>टिप्पणी करते हैं आप अपने लिए</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/726</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/726#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 05 Oct 2007 06:43:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

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		<description><![CDATA[&#xA0; कंजूसी हमेशा नुकसानदेह होती है. दूसरों के लिए और अपने लिए भी. हिन्दी के चिट्ठाकार आमतौर पर टिप्पणी के मामले में कंजूसी बरतते हैं. यह दूसरों के लिए जितना नुकसान हो सकता है उससे ज्यादा नुकसान यह कंजूसी खुद हमारे लिए भी हो सकती है. बात थोड़ी अटपटी है लेकिन आईये इसे समझते हैं. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2">
<p>&#xA0;<img id="id" height="100" src="http://bp0.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RmuFexWA18I/AAAAAAAAAHM/6EU6ISqFwgk/s200/IMG_0160.jpg" width="80" /> कंजूसी हमेशा नुकसानदेह होती है. दूसरों के लिए और अपने लिए भी. हिन्दी के चिट्ठाकार आमतौर पर टिप्पणी के मामले में कंजूसी बरतते हैं. यह दूसरों के लिए जितना नुकसान हो सकता है उससे ज्यादा नुकसान यह कंजूसी खुद हमारे लिए भी हो सकती है. बात थोड़ी अटपटी है लेकिन आईये इसे समझते हैं.</p>
<p>मैं खुद स्वभाव से बहुत टिप्पणियां नहीं करता. पांच-दस टिप्पणियों को मैं कोई उपलब्धि नहीं मानता. चार-पांच सौ सक्रिय ब्लागरों के बीच पांच-दस टिप्पणियों का क्या महत्व हो सकता है भला? लेकिन मैं अपने बारे में ही सोचता हूं तो लगता है कि देना हमारे स्वभाव से निकल गया है. अंदर से हम इतने दीन हो गये हैं कि हमें प्राप्ति की उम्मीद रहती है लेकिन हम भी किसी को कुछ दे सकते हैं इसका भान ही नहीं रहता. यही स्वभाव हमारी ब्लागरी में भी दिख रहा है. लिखनेवाले सैकड़ों और टिप्पणी करने वाले गिने-चुने लोग? इसका मतलब है कि हम सैकड़ों अनुदार लोगों के बीच कुछ उदार लोग हैं. शायद ब्लागरी उनके ही कारण इतनी जीवंत है.</p>
<p>हमें यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि हम ब्रह्मवाक्य रच रहे हैं जिसे अपने-आप पाठक मिलेंगे. और हमारे लिखे को लोग न भी पढ़ें तो उनका दिन आराम से गुजर जाएगा. यह तो उन पाठकों की उदारता है जो यह जानते हुए पढ़ते हैं कि बिना पढ़े भी काम चल सकता है. और फिर उदारता की पराकाष्ठा यह कि वे टिप्पणी करते हैं. यह उदारता हम आप अपने अंदर क्यों विकसित नहीं कर सकते?</p>
<p>यह तो हुई स्वभाव की बात लेकिन एक व्यावसायिक बात भी छिपी है टिप्पणियों के पीछे. आप जिनती अधिक टिप्पणियां करते हैं अपने ब्लाग के लिए उतना अधिक संपर्कसूत्र विकसित करते हैं. ऐसे चिट्ठाकार जो अपने ब्लाग्स का विज्ञापन नहीं कर सकते टिप्पणी उनके ब्लाग प्रमोशन का अच्छा हथियार है. जितने अधिक चिट्ठों के पोस्ट पर आपकी टिप्पणियां होंगी अपने चिट्ठे के लिए आप उतने ही अधिक लिंक तैयार करते हैं. चिट्ठाजगत बता रहा है कि उसके रिकार्ड में 25,791 प्रवृष्टियां दर्ज हैं. इतनी प्रवृष्टियों के जितने पृष्ठों पर हमारी टिप्पणी होगी उतना ही हमारे ब्लाग तक आने के लिए लोगों के लिए रास्ते खुलेंगे. मान लीजिए कोई हिन्दी में खोज करता है और वह ऐसी प्रवृष्टि पर पहुंचता है जहां आपने टिप्पणी की है. तो आप ऐसे अनजान पाठकों के लिए अपने ब्लाग के रास्ते खोलते हैं जो न एग्रीगेटरों को जानते हैं और न ब्लाग की गुटबाजी को.</p>
<p>उम्दा लेखन के अपने-अपने पैमाने हैं. उतार-चढ़ाव तो आते रहेंगे. लेकिन टिप्पणियों के माध्यम से आप अपने चिट्ठों के लिए जो स्थाई लिंक तैयार करेंगे वे सदैव आपके ब्लाग को पाठकों से लबरेज रखेंगे. तय मानिये जिस चिट्ठे पर आप टिप्पणी करके आते हैं उस चिट्ठाकार के साथ आपका एक भावनात्मक रिश्ता जुड़ जाता है, जो शायद हमारी चिट्ठाकारिता का अंतिम उद्येश्य है. [साभार, <a href="http://visfot.blogspot.com/2007/10/blog-post.html">टिप्पणी करते हैं आप अपने लिए</a>]</p>
<p align="center"><font color="#0080ff">आपने चिट्ठे पर विदेशी हिन्दी पाठकों के अनवरत प्रवाह प्राप्त करने के लिये उसे आज ही हिन्दी चिट्ठों की अंग्रेजी दिग्दर्शिका <a href="http://www.chitthalok.com" target="_blank">चिट्ठालोक</a> पर पंजीकृत करें! </font></p>
</p>
<p><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a title="हिन्दी सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80">हिन्दी</a>, <a title="हिन्दी-जगत सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A4">हिन्दी-जगत</a>, <a title="राजभाषा सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE">राजभाषा</a>, <a title="विश्लेषण सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B7%E0%A4%A3">विश्लेषण</a>, <a title="सारथी सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80">सारथी</a>, <a title="शास्त्री-फिलिप सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA">शास्त्री-फिलिप</a>, <a title="hindi सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi">hindi</a>, <a title="hindi-world सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-world">hindi-world</a>, <a title="Hindi-language सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=Hindi-language">Hindi-language</a>, </font></p>
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		<title>हिंदी की पहली कहानी और माधवराव सप्रे</title>
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		<pubDate>Mon, 01 Oct 2007 00:42:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

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		<description><![CDATA[पंडित माधवराव सप्रे:एक परिचय माधवराव सप्रे जी का जन्म जून 1871 में दमोह जिले के पथरिया ग्राम में हुआ था। बिलासपुर में मिडिल तक की पढ़ाई के बाद मेट्रिक शासकीय विद्यालय रायपुर से उत्तीर्ण किया। 1899 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी ए करने के बाद उन्हें तहसीलदार के रुप में शासकीय नौकरी मिली लेकिन जैसा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p align="center"><font face="Mangal" size="2"><strong><font color="#0000ff">पंडित माधवराव सप्रे:एक परिचय</font></strong></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">माधवराव सप्रे जी का जन्म जून 1871 में दमोह जिले के पथरिया ग्राम में हुआ था। बिलासपुर में मिडिल तक की पढ़ाई के बाद मेट्रिक शासकीय विद्यालय रायपुर से उत्तीर्ण किया। 1899 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी ए करने के बाद उन्हें तहसीलदार के रुप में शासकीय नौकरी मिली लेकिन जैसा कि उस समय के देशभक्त युवाओं में एक परंपरा थी सप्रे जी ने भी शासकीय नौकरी की परवाह न की।सन 1900 में जब समूचे छत्तीसगढ़ में प्रिंटिंग प्रेस नही था तब इन्होंने बिलासपुर जिले के एक छोटे से गांव पेंड्रा से &#8220;छत्तीसगढ़ मित्र&#8221; नामक मासिक पत्रिका निकाली। हालांकि यह पत्रिका सिर्फ़ तीन साल ही चल पाई। सप्रे जी ने लोकमान्य तिलक के मराठी केसरी को यहां हिंद केसरी के रुप में छापना प्रारंभ किया, साथ ही हिंदी साहित्यकारों व लेखकों को एक सूत्र में पिरोने के लिए नागपुर से हिंदी ग्रंथमाला भी प्रकाशित की।आपनें कर्मवीर के प्रकाशन में भी महती भूमिका निभाई।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font color="#0000ff">सप्रे जी की कहानी एक टोकरी मिट्टी (जिसे बहुधा लोग &#8220;टोकनी भर मिट्टी&#8221; भी कहते हैं) को हिंदी की पहली कहानी होने का श्रेय प्राप्त है। </font></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">सप्रे जी ने लेखन के साथ-साथ विख्यात संत समर्थ रामदास के मराठी दासबोध व महाभारत की मीमांसा,दत्त भार्गव,श्री राम चरित्र,एकनाथ चरित्र और आत्म विद्या जैसे मराठी ग्रंथों,पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद भी बखूबी किया।1924 में हिंदी साहित्य सम्मेलन के देहरादून अधिवेशन में सभापति रहे सप्रे जी ने 1921 में रायपुर में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की और साथ ही रायपुर में ही पहले कन्या विद्यालय जानकी देवी महिला पाठशाला की भी स्थापना की। यह दोनो विद्यालय आज भी चल रहे हैं। </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/sanjeettripathi.jpg"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/sanjeettripathi-thumb.jpg" id="id" style="border-width: 0px" alt="SanjeetTripathi" border="0" height="140" width="104" /></a> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">[<font color="#0000ff">सभार, </font><a href="http://sanjeettripathi.blogspot.com" target="_blank"><font color="#408080">Sanjeet Tripathi</font></a><font color="#0000ff">, Raipur, Chhattisgarh, India एक आम भारतीय, जिसकी योग्यता भी सिर्फ़ यही है कि वह एक आम भारतीय है जिसे यह नहीं मालुम कि आम से ख़ास बनने के लिए क्या किया जाए फ़िर भी वह आम से ख़ास बनने की कोशिश करता ही रहता है</font>]</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">हिंदी के इस पहले कहानीकार का निधन 26 अप्रेल 1926 को हो गया।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">सप्रे जी के कुछ स्मरणीय कथन:-</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">1&#8212;&#8221;मैं महाराष्ट्री हूं पर हिंदी के विषय में मु्झे उतना ही अभिमान है जितना कि किसी हिंदीभाषी को हो सकता है।&#8221;<br />
2&#8212;&#8221;जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जागृत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं है&#8221;<br />
3&#8212;&#8221;विदेशी भाषा में शिक्षा होनें के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है।&#8221;</font></p>
<p align="center"><font face="Mangal" size="2"><font color="#0000ff">पाठकों के लिए प्रस्तुत है सप्रे जी द्वारा लिखित हिंदी की पहली कहानी</font></font></p>
<p align="center"><font face="Mangal" size="2"><font color="#0000ff">&#8220;एक टोकरी भर मिट्टी&#8221;</font></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">किसी श्रीमान जमींदार के महल के पास एक गरीब अनाथ विधवा की झोपड़ीं थी। जमींदार साहब को अपने महल का हाता उस झोपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई। विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोपड़ी हटा ले। पर वह तो कई जमाने से वहीं बसी थी। उसका पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोपड़ी में मर गया था। पतोहू भी एक पांच बरस की कन्या को छोड़कर चल बसी थीं। अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी। जब कभी उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दुख के फूट–फूटकर रोने लगती थी। और जबसे उसने अपने श्रीमान पड़ोसी की इच्छा का हाल सुना,तब से वह मृतप्राय हो गयी थी। उस झोपड़ीं में उसका मन ऐसा लग गया था कि बिना मरे वहां से वह निकलना ही नहीं चाहती थी। श्रीमान के सब प्रयत्न निष्फल हुए। तब वे अपनी जमींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर उन्होंने अदालत से झोपड़ी पर अपना कब्जा कर लिया और विधवा को वहां से निकाल दिया। बिचारी अनाथ तो थी ही, पास पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">एक दिन श्रीमान उस झोपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि इतने में वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहां पहुंची। श्रीमान ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि उसे यहां से हटा दो। पर वह गिड़गिड़ाकर बोली कि &#8220;महाराज,अब तो यह झोपड़ी तुम्हारी ही हो गयी है। मैं उसे लेने नहीं आयी  हूं। महाराज क्षमा करें तो एक बिनती है।&#8221; जमींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा कि &#8220;जब से यह झोपड़ी छूटी है तब से मेरी पोती ने खाना–पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत कुछ समझाया पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल¸ वहीं रोटी खाऊंगी। अब मैंने यह सोचा है कि इस झोपड़ी में से एक टोकरी भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊंगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराज¸ कृपा करके आज्ञा दीजिए तोइस टोकरी में मिट्टी ले जाऊं।&#8221; श्रीमान ने आज्ञा दे दी।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">विधवा झोपड़ी के भीतर गयी। वहां जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आंखों से आंसू की धारा बहने लगी। अपने आन्तरिक दुख को किसी तरह सम्हालकर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठाकर बाहर ले आयी। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान से प्रार्थना करने लगी कि &#8220;महाराज¸ कृपा करके इस टोकरी को जरा हाथ लगाइए जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूं।&#8221;</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">जमींदार साहब पहले तो बहुत नाराज हुए,पर जब वह बार–बार हाथ जोड़ने लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके भी मन में कुछ दया आ गयी। किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने आगे बढ़े। ज्योंही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्यों ही देखा कि यह काम उनकी शक्ति के बाहर है। फिर तो उन्होंने अपनी सब ताकत लगाकर टोकरी को उठाना चाहा,पर जिस स्थान पर टोकरी रखी थी वहां से वह एक हाथ–भर ऊंची न हुई। वह लज्जित होकर कहने लगे कि &#8220;नहीं,यह टोकरी हमसे न उठायी जावेगी।&#8221;</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">यह सुनकर विधवा ने कहा, &#8220;महाराज नाराज न हों,आप से तो एक टोकरी भर मिट्टी नहीं उठायी जाती और इस झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियां मिट्टी पड़ी है। उसका भार आप जन्म भर क्यों कर उठा सकेंगे? आप ही इस बात पर विचार कीजिए!&#8221;<br />
जमींदार साहब धन–मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गये थे पर विधवा के उपरोक्त वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गयीं। कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने विधवा से क्षमा मांगी और उसकी झोंपड़ी वापस दे दी।</font></p>
<p align="center"><font face="Mangal" size="2">संदर्भ- 1-डाक्टर मन्नूलाल यदु द्वारा प्रकाशित &#8220;छत्तीसगढ़ की अस्मिता&#8221; 2-&#8221;सर्वज्ञ&#8221;पर उपलब्ध सामग्री</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80" title="हिन्दी सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A4" title="हिन्दी-जगत सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी-जगत</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE" title="राजभाषा सम्बन्धित चिट्ठे">राजभाषा</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B7%E0%A4%A3" title="विश्लेषण सम्बन्धित चिट्ठे">विश्लेषण</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80" title="सारथी सम्बन्धित चिट्ठे">सारथी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA" title="शास्त्री-फिलिप सम्बन्धित चिट्ठे">शास्त्री-फिलिप</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi" title="hindi सम्बन्धित चिट्ठे">hindi</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-world" title="hindi-world सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-world</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=Hindi-language" title="Hindi-language सम्बन्धित चिट्ठे">Hindi-language</a>, </font></p>
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		<title>हास्य व्यंग्य के किंग: समीर लाल</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Sep 2007 00:42:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
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		<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[उड़नतश्तरी के लेखक समीर लाल की सक्रियता देखकर यह विश्वास करना मुश्किल लगता है कि उन्होंने गये साल ही लिखना शुरू किया। हलके-फुल्के अंदाज़ में गहरी बात कह जाने वाले समीरजी अपनी बात कहने के नये-नये दिलकश अंदाज़ खोजते रहते हैं। चाहे वह गीता का सार हो या कबीर के दोहे, आधुनिक परिस्थितियों से जोड़कर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">उड़नतश्तरी के लेखक समीर लाल की सक्रियता देखकर यह विश्वास करना मुश्किल लगता है कि उन्होंने गये साल ही लिखना शुरू किया। हलके-फुल्के अंदाज़ में गहरी बात कह जाने वाले समीरजी अपनी बात कहने के नये-नये दिलकश अंदाज़ खोजते रहते हैं। चाहे वह गीता का सार हो या कबीर के दोहे, आधुनिक परिस्थितियों से जोड़कर वे बेहतरीन लेख लिखते रहते हैं। कुंडलिया किंग समीर ने चिट्ठाजगत को कुंडलिया से परिचित कराया और फिर धीरे से उसका पेटेंट मुंडलिया के नाम से करा लिया। पंकज के लालाजी का ज्ञान का प्रकाश ही था जिससे चकाचौंध होकर गिरिराज जोशी उनका शिष्यत्व ग्रहण करने के लिये बेताब हुये। </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/sameer-lal.jpg" title="Sameer Lal" alt="Sameer Lal" align="left" border="0" height="161" width="139" />मूलत: पूर्वी उत्तरप्रदेश (गोरखपुर) के वासी समीर की पैदाइश रतलाम की और ज्यादातर रिहाइश मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी जबलपुर की है। आज के लोकप्रिय चिट्ठाकार समीरलाल में लेखन के कीटाणु बचपन से ही थे। उन दिनों को याद करते हुये समीरजी बताते हैं, &#8220;एक बार बचपन में कहानी लिखना शुरु किया था जब क्लास पाँचवीं में था शायद। जबलपुर से प्रकाशित &#8220;ज्योतिर्मिलन&#8221; मासिक के बाल विषेशांक में कहानियां प्रकाशित हुई और बाल साहित्यकार का पुरस्कार मिला जिसे घोषणा के तीन वर्ष उपरान्त प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के हाथों प्राप्त किया।&#8221; स्कूल के दिनों में परसाई के हाथों पुरस्कार के रूप में प्राप्त पुस्तक आज भी उनके लिये बहुमूल्य धरोहर है। </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">लेकिन स्कूल के दिनों के बाद शायद जीवन संघर्षों के कारण लिखना स्थगित रहा। इस बारे में समीरजी कहते हैं, &#8220;फिर कभी नहीं लिखा, बस आम युवकों की तरह कॉलेज की कापियों के आखिरी पन्नों पर कुछ शेरो शायरी और कवितायें लिखीं। पिछले एक वर्ष से नियमित लेख कवितायें, व्यंग्य की ओर पुनः रुझान हुआ जो चिट्ठों के माध्यम से गति प्राप्त करता गया और वही ऊड़न तश्तरी, ई-कविता और अनुभूति याहू ग्रुप के माध्यम से सबके सामने है।&#8221; आचार्य रजनीश को सुनने के शौकीन समीर को किताबें पढ़ने, पेंसिल-स्केचिंग करने और शास्त्रीय संगीत सुनने का भी शौक है। अंग्रेजी कवि राबर्ट फ्रॉस्ट इनके पसंदीदा कवि हैं जिनकी कई कविताऒं का आपने भावानुवाद भी किया है। </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">लेखन के अलावा कालेज के दिनों में अपने तमाम इतर अनुभवों की दास्तान बताते हुये समीर कहते हैं, &#8220;सी.ए. करने के दौरान बम्बई की छात्र राजनिति में सक्रिय रहा, हॉस्टल एसोसियेशन और छात्र संघ के महामंत्री, फिर बाद में, काँग्रेस में सक्रिय भूमिका रही। मध्यप्रदेश युवक कांग्रेस के औद्योगिक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष, कमलनाथ जी के संयोजन में म.प्र. जनजागरण मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री, जबलपुर चार्टड एकाउन्टेन्ट एसोसियेशन के उपाध्यक्ष, जबलपुर चेम्बर ऑफ कामर्स के ट्रेज़रार और उपाध्यक्ष भी रहा। इस दौरान कई अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय रोजगार मेलों का जबलपुर में आयोजन किया। राजनेताओं से संपर्क रखने का तब बहुत शौक था और साथ ही आचार्य रजनीश, महेश योगी, शंकराचार्य स्वरुपानन्द जी और स्वामी प्रज्ञानन्द जी आदि से व्यक्तिगत परिचय और उनकी विभिन्न संस्थाओं का ऑडिटर और सलाहकारी भी रहा।&#8221; </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">समीरलाल चिट्ठाचर्चा में नियमित लिखते हैं, और जिस दिन ये लिखें उस दिन इस चिट्ठे के हिट्स की संख्या हनुमान की पूँछ बन जाती है। टिप्पणी करने के मामले में समीर बेहद उदार हैं, लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि अक्सर नोटिस बोर्ड के नीचे भी जगह खाली होने पर समीरजी लिख देते हैं, &#8220;अच्छा लिखा है। लिखते रहें।&#8221; आजकल कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करने वाले समीरलाल जी अपनी जमाऊ कविताऒं से अपना रंग जमाने लगे हैं और श्रोताऒं के बीच वे लोकप्रिय कवि हो गये हैं। पिछ्ले एक वर्ष में ही बफैलो, वाशिंगटन में कवि सम्मेलन और जबलपुर में कुछ काव्य गोष्ठियां और एकल काव्य पाठ का उन्हें मौका मिला। </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">समीरलालजी बम्बई से सी.ए. कर वापस गृहनगर जबलपुर में प्रैक्टिस करने लगे। 1999 में वे कनाडा आ गये, दोनों बेटों को १२वीं तक भारत में ही पढ़ाया ताकि वो अपनी संस्कृति को समझ सकें और उससे जुड़ सकें, दोनों अब कम्प्यूटर इंजीनियर हैं। खुद कनाडा आकर शेयर बजार के कोर्स कर पहले स्टाक एक्सचेंज पर यहां की एक बड़ी बैंक के लिये ट्रेडर रहे। न जाने कब तकनीक की तरफ रुझान हो गया। सब कुछ इन्टरनेट से ही सीखा, फिर माईक्रोसॉफ्ट एक्सेल एक्सपर्ट, एक्सेस एक्सपर्ट आदि के रास्ते चलते हुये आऊटलुक प्रोग्रामिंग में महारत हासिल की। अब विज़ुअल बेसिक डॉटनेट में सिद्धता के दम पर उसी बैंक में बतौर तकनीकी सलाहकार कार्यरत हैं। इसी बीच अमेरिका से ही अकाउंटिंग से संबंधित सी.एम.ए और प्रोजेक्ट मेनेंजमेंट में पीएमपी पूरण किया। संप्रति बैंक की विभिन्न मेन्यूल कार्यप्रणाली को आटोमेट करने के कार्य में सलाहकार हैं। स्पष्टतः समीर में लगातर नया ज्ञान, नया विज्ञान सीखने की ललक हैं। </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/sy3.jpg"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/sy3-thumb.jpg" id="id" style="border-width: 0px" alt="sy3" border="0" height="365" width="204" /></a> मार्च 2006 में समीरलाल ने ब्लॉग लेखन की शुरुआत की और देखते ही देखते लोकप्रिय हो गये हैं। कविता, कुंडलियाँ, त्रिवेणी और मुंडलिया, सबमें इनकी सहज गति है। सहज, मनलुभावन गद्य इनके लेखन का प्राणतत्व हैं। मजाक करो तो मजाक सहने का माद्दा भी रखो का सिद्धांत मानने वाले समीर हास्य व्यंग्य के महारथी हैं लेकिन किसी का भी दिल दुखाना इनकी फितरत में नहीं है। एकाध बार तो अपनी पोस्ट तक यह सोचकर हटा ली कि किसी का दिल न दुखे। लेखन से मजाकिया और बिंदास से लगने वाले समीर को &#8220;लेखन शैली के विपरीत और व्यवसायिक मजबूरियों के अलावा स्वाभाव से शांत और गंभीर रहना पसंद है।&#8221; अपने स्वभाव के एक और पहलू का खुलासा करते हुये कहते है: &#8220;गुस्सा बहुत मुश्किल से ही आता है।&#8221; हिंदी चिट्ठाकारी को संभावनाशील मानने वाले समीरजी का विचार आगे चलकर भारत में ही बसने का है। फिलहाल भारत में कुछ ट्रस्टों से जुडे़ हैं। </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">ब्लॉग लेखन में पत्नी के सहयोग का जिक्र करते हुये समीरजी खुलासा करते हैं, &#8220;पत्नी का योगदान ही है कि पूर्ण खाली समय ब्लॉग और लेखन को देने का बिल्कुल बुरा नहीं मानना, तभी इतना समय देना संभव हो पाता है। बाज़ार से लेकर घर के सारे खुद ही कर लेती है। गायन में उनकी काफी रुचि है जो रियाज़ के अभाव में लगभग छूटा हुआ है। किताबें पढ़ने का शौक है मगर एम.ए. हिन्दी में होने के बावजूद भी लेखन में रुझान नहीं। उनका मानना है कि अगर दोनों ही यह करने लगे, तो घर चल चुका। बात तो पते की है, इसलिये हम इसे तुरंत मान लेते हैं।&#8221; </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">चार पांच घंटे से ज्यादा सोने को समय की बरबादी मानने वाले समीर ब्लॉग लेखन के अलावा तरकश की कोर टीम के सदस्य भी हैं। इसके अलावा अनुभूति, अभिव्यक्ति, हिन्दी नेस्ट, साहित्यकुंज, मुक्तक सागर पर रचनायें प्रकाशित हुई हैं। एक्सेल पर अंग्रेजी में ब्लॉग टेक नोट एक्सचेन्ज और वीबी डॉट नेट पर कई ऑनलाईन पत्रिकाओं में अनेकों लेख भी प्रकाशित। समीर टाईम्स के नाम से सन 2000 में एक वेबसाईट शुरु की जो कि आज भी सुचारु रुप से चल रही है। बस मौज मजे के लिये मगर हिट्स ठीक ठाक मिल जाती हैं। [निरंतर में अनूप शुक्ला का लेख  <a href="http://www.nirantar.org/1206/kachha-chittha/sameer-lal" target="_blank">हास्य व्यंग्य के किंग: समीर लाल</a>]</font></p>
<p align="center"><font face="Mangal" size="2"><font color="#0080ff">आपने चिट्ठे पर विदेशी हिन्दी पाठकों के अनवरत प्रवाह प्राप्त करने के लिये उसे आज ही हिन्दी चिट्ठों की अंग्रेजी दिग्दर्शिका <a href="http://www.chitthalok.com" target="_blank">चिट्ठालोक</a> पर पंजीकृत करें! </font></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80" title="हिन्दी सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A4" title="हिन्दी-जगत सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी-जगत</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE" title="राजभाषा सम्बन्धित चिट्ठे">राजभाषा</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B7%E0%A4%A3" title="विश्लेषण सम्बन्धित चिट्ठे">विश्लेषण</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80" title="सारथी सम्बन्धित चिट्ठे">सारथी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA" title="शास्त्री-फिलिप सम्बन्धित चिट्ठे">शास्त्री-फिलिप</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi" title="hindi सम्बन्धित चिट्ठे">hindi</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-world" title="hindi-world सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-world</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=Hindi-language" title="Hindi-language सम्बन्धित चिट्ठे">Hindi-language</a>, </font></font></p>
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		<title>ब्लाग ही वैकल्पिक मीडिया है</title>
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		<pubDate>Wed, 26 Sep 2007 07:42:23 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>
		<category><![CDATA[मार्गदर्शन]]></category>

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		<description><![CDATA[देश में लगभग 6 करोड़ लोग हैं जो नियमित इंटरनेट का उपयोग करते हैं. देश की कुल जनसंख्या के लिहाज से यह संख्या कुछ खास नहीं है लेकिन संसाधनों की उपलब्धता को देखें तो यह संख्या कम भी नहीं है. छह करोड़ लोगों की इस संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोत्तरी भी हो रही [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><img src="http://bp0.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RnTVPhWA2DI/AAAAAAAAAIA/Wbh2Q0iw37A/s200/homepage.jpg" id="id" /> देश में लगभग 6 करोड़ लोग हैं जो नियमित इंटरनेट का उपयोग करते हैं. देश की कुल जनसंख्या के लिहाज से यह संख्या कुछ खास नहीं है लेकिन संसाधनों की उपलब्धता को देखें तो यह संख्या कम भी नहीं है. छह करोड़ लोगों की इस संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोत्तरी भी हो रही है. ऐसे समय में ब्लॉग का जन्म और प्रसार वैकल्पिक मीडिया की तलाश में लगे लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है.कुछ लोगों की मेहनत, समझ और सूझबूझ का परिणाम है कि यह तकनीकि रूप से लगातार और अधिक सक्षम और कारगर होता जा रहा है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">एक बात पक्की है कि जिस वैकल्पिक मीडिया की बात हम लोग करते आ रहे थे वह यही है. जहां अभिव्यक्ति की इतनी अधिक स्वतंत्रता है कि आप गाली-गलौज भी कर सकते हैं. लेकिन क्या हमें इस स्वतंत्रता का दुरूपयोग करना चाहिए या फिर सचमुच हमारे पास हिन्दी में लिखने के लिए कुछ ऐसा है ही नहीं जो समूह के हित के लिए हम लिख सकें? आमतौर पर हम इस माध्यम को अपनी कला, हुनर, बुद्धि, भड़ास आदि निकालने के लिए कर रहे हैं. पितामह ब्लागरों से लेकर नये-नवेले ब्लागरों तक एक बात साफ तौर पर दिखती है कि शुरूआत जहां से होती है वहां से सीढ़ी उत्थान की ओर नहीं पतन की ओर घूम जाती है. यह छीजन अनर्थकारी है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><img src="http://bp0.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RmuFexWA18I/AAAAAAAAAHM/6EU6ISqFwgk/s200/IMG_0160.jpg" id="id" height="96" width="80" /> ब्लाग की दुनिया में कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अव्वल तो हम सूचना के बारे में जानते ही नहीं है. जिन सूचनाओं से हम अपनी विद्वता का सबूत देते हैं वे मूलतः टीवी, अखबार और इंटरनेट की जूठन होती है. यानी हम भी उसी खेल के हिस्से होकर रह जाते हैं जिनके आतंक से बाहर आने के लिए हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे भारी-भरकम शब्दों की माला जपते हैं. देश के कुछ अखबार और टीवी चैनल खबरों की परिभाषा बदलने में लगे हुए हैं. यह उनकी समझ और मजबूरी हो सकती है, हमारे सामने क्या मजबूरी है? कोई मजबूरी नहीं दिखती. यह तो शुद्धरूप से हमारी समझ है कि हम इस वैकल्पिक मीडिया का क्या उपयोग कर रहे हैं.</font><span id="more-685"></span></p>
<p><font face="Mangal" size="2">हिंदी ब्लाग दुनिया खंगालने के बाद कुछ ब्लाग ऐसे दिखते हैं जिनमें काम की जानकारी होती है. ज्यादातर अपनी भड़ास निकालते हैं. गुस्सा है तो जरूर निकालिए. लेकिन उसको कोई तार्किक रूप दीजिए. उसका कोई आधार बनाईये. आप गुस्सा हैं इसमें दो राय नहीं लेकिन आपके गुस्से से मैं भला क्यों गुस्सा हो जाऊं? लिखनेवाले वाले का धर्म है कि वह अपने गुस्से को पी जाए. वह गुस्सा उसके लिखने में ऐसे उतर आये कि पढ़ने वाले की भौंहे तन जाए. इसके साथ ही एक काम और करना चाहिए. अपने आस-पास ऐसे बहुत से लोग होते हैं जिन्हें ब्लाग का रास्ता दिखाया जा सकता है. मैं इस दुनिया में कुल तीन महीने पुराना हूं. मैंने अब तक चार लोगों को ब्लाग बनाने और चलाने के लिए प्रेरित किया है और वे चारों आज ब्लाग की दुनिया में शामिल हो चुके हैं. मुझे लगता है कि अगर हम ऐसे दो-चार लोगों को जोड़ सकें जो आगे भी दो-चार लोगों को जोड़ने की क्षमता रखते हैं तो परिणाम आशातीत आयेंगे. आप बताईये अपने-आप को कौन अभिव्यक्त नहीं करना चाहेगा. शुरूआत में कुछ ब्लागर मित्रों ने मुझे प्रोत्साहित न किया होता, मेरी तकनीकि तौर पर मदद न की होती तो मैं भी जैसे घूमते-फिरते यहां पहुंचा था वैसे ही टहलते-घूमते बाहर चला जाता. उन्हीं मित्रों के सहयोग का परिणाम है कि मैं यहां टिक गया और ब्लाग में मुझे वैकल्पिक मीडिया नजर आने लगा है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">टीवी ने खबरों के साथ जैसा मजाक किया है उससे खबर की परिभाषा पर ही सवाल खड़ा हो गया है. मैं कहीं से यह मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि टीवी और पत्रकारिता का कोई संबंध है. हमें किसी से ज्यादा गहराई की उम्मीद नहीं करनी चाहिए लेकिन यह भी नहीं हो सकता कि कोई इतना हल्का हो जाए कि उसके होने-न-होने का मतलब ही समाप्त हो जाए. टीवी चौनल खेलते हैं टीआरपी के लिए. यह टीआरपी जो संस्थाएं तय करती हैं वे उन्हीं व्यावसायिक घरानों के दिमाग की उपज हैं जो प्रत्यक्ष तौर पर मनुष्य का शोषण करती हैं. इस लिहाज से टीवी चैनल भी परोक्ष रूप से जनता के शोषण के हथियार हैं, वैसे ही जैसे ज्यादातर बड़े अखबार. ये प्रसार माध्यम हैं जो विकृत होकर कंपनियों और रसूखवाले लोगों की गतिविधियों को समाचार बनाकर परोस रहे हैं.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">ब्लागर इसमें हस्तक्षेप कर सकते हैं. खबर की परिभाषा ठीक बनाए रखना है तो हमें यह करना भी चाहिए. नहीं तो कल जब ब्लागरों की दुनिया इतनी बड़ी हो जाएगी कि इसका ओर-छोर नहीं होगा तब यह कमी दंश के रूप में चुभेगी कि काश उस समय सोच लिया होता, दुर्भाग्य से तब हम समय के बहुत आगे निकल चुके होंगे. हमारी समझ ब्लागजगत का सीमांकन कर चुका होगा और हम खुद को ही छला हुआ महसूस करेंगे. (फोटो-साभार)[<a href="http://visfot.blogspot.com/">Sanjay Tiwari</a>]</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80" title="हिन्दी सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%97%E0%A4%A4" title="हिन्दी-जगत सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी-जगत</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE" title="राजभाषा सम्बन्धित चिट्ठे">राजभाषा</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B7%E0%A4%A3" title="विश्लेषण सम्बन्धित चिट्ठे">विश्लेषण</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80" title="सारथी सम्बन्धित चिट्ठे">सारथी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA" title="शास्त्री-फिलिप सम्बन्धित चिट्ठे">शास्त्री-फिलिप</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi" title="hindi सम्बन्धित चिट्ठे">hindi</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-world" title="hindi-world सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-world</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=Hindi-language" title="Hindi-language सम्बन्धित चिट्ठे">Hindi-language</a>, </font></p>
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		<title>कोई शराब क्यों पीता है</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/683</link>
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		<pubDate>Tue, 25 Sep 2007 07:42:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

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		<description><![CDATA[हमने कुछ समय पहले डी-एडिक्शन के बारे मे लिखा था की हम किस तरह से इस डी-एडिक्शन कैंप से जुडे थे।जिस तरह हर संस्था का कोई नाम होता है ठीक उसी तरह इस संस्था का नाम साथी रक्खा गया था । और अंडमान मे पोर्ट ब्लेयर के जी.बी.पंत हॉस्पिटल के कमरा नम्बर ४७ मे ओ.पी.डी.शुरू [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/mamtatv.jpg"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/mamtatv-thumb.jpg" id="id" style="border: 0px none " alt="MamtaTV" border="0" height="87" width="127" /></a> हमने कुछ समय पहले <a href="http://mamtatv.blogspot.com/2007/05/blog-post_24.html#comments">डी-एडिक्शन</a> के बारे मे लिखा था की हम किस तरह से इस डी-एडिक्शन कैंप से जुडे थे।जिस तरह हर संस्था का कोई नाम होता है ठीक उसी तरह इस संस्था का नाम साथी रक्खा गया था । और अंडमान मे पोर्ट ब्लेयर के जी.बी.पंत हॉस्पिटल के कमरा नम्बर ४७ मे ओ.पी.डी.शुरू की गयी थी ।</p>
<p>जिस तरह किसी भी काम को शुरू करने के लिए सबसे पहले उसकी तह तक पहुँचना बहुत जरुरी होता है ठीक उसी तरह डी-एडिक्शन मे सबसे पहले ये जानना होता है की आख़िर व्यक्ति को शराब के नशे की आदत कैसे पड़ी। यूं तो शराब पीने के लिए कोई बहाने के जरुरत नही होती है पर फिर भी कुछ ऐसे कारण होते है जिन्हे लोग समझते है कि उन कारणों की वजह से ही उन लोगों ने शराब पीना शुरू किया ।यूं तो पीने के लिए कोई भी कारण नही होता है पर फिर भी लोग ढेरों कारण ढूँढ लेते है। और ऐसे ही कुछ कारण यहां पर हम लिख रहे है जो हमे ओ.पी.डी.मे आये हुए लोगों ने बताये थे।</p>
<p>१ )ख़ुशी मनाने के लिए।<br />
२ )दोस्तो का साथ देने के लिए।<br />
३)दुःख भुलाने के लिए।<br />
४)बाप शराबी है।<br />
५)बीबी से पटती नही है।<br />
६)पारिवारिक कलह के कारण।<br />
७)ऑफिस मे अधिक काम होना।<br />
८ )थकान मिटाने के लिए। (ये अक्सर लेबर क्लास कहता है )<br />
९ )मजे के लिए।<br />
१० )शराब के बिना रह नही सकते है। (हर नशा करने वाला ऐसा ही कहता है )<br />
११)और तो और सुनामी के बाद तो लोगों ने डर की वजह से भी पीना शुरू कर दिया था।</p>
<p>ऐसे ही और ना जाने कितने कारण लोग ढूँढ लेते है शराब पीने के लिए। वो एक गाना भी है ना कि<br />
पीने वालों को पीने का बहाना चाहिऐ। बिल्कुल सही है।</p>
<p>किसी भी नशे की शुरुआत वो चाहे सिगरेट का हो या शराब का हो उसका जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ उसका सेवन करने वाला या पीने वाला ही होता है। और इसके लिए किसी भी हालात या व्यक्ति को दोष देना बिल्कुल गलत है।क्यूंकि अगर व्यक्ति नशे का आदी होता है तो उसका कारण वो खुद ही होता है।और नशा करना किसी भी समस्या का हल नही है बल्कि नशा करने से समस्याएं बढ़ती है। जब तक व्यक्ति इस बात को नही समझता है तब तक ना तो वो नशे की आदत छोड़ सकता है और ना ही उसे कुछ समझाने का कोई फायदा होता है।</p>
<p>शराब पीने वालों को कुछ इस तरह से इन श्रेणियों मे बाँट कर रख सकते है।<br />
१ ) वो लोग जो कभी-कभार किसी अवसर या किसी पार्टी मे पीते है।<br />
२) पहले से ही पीने के लिए दिन सोच कर रखते है। (जैसे वो लोग जो हर शनिवार या रविवार को पीते है या इसी तरह कोई भी दिन )<br />
३)रोज का कोटा निश्चित रखते है।<br />
४)जिनका कुछ निश्चित नही है ।<br />
५)लगातार पीने वाले।</p>
<p>पहले से पाँचवे नम्बर तक पहुँचना व्यक्ति पर निर्भर करता है क्यूंकि बहुत से लोग सिर्फ पहली श्रेणी मे ही रहते है जबकि बहुत से लोग पहली श्रेणी से पांचवी श्रेणी तक पहुँच जाते है। अक्सर देखा गया है कि लोग शुरुआत तो पहली श्रेणी से ही करते है मतलब कभी किसी पार्टी मे या कभी किसी दोस्त के कहने पर पीते है पर फिर धीरे-धीरे वो अपने लिए अपनी सहूलियत से दिन निश्चित करते है और फिर निश्चित दिन से आगे बढ़कर अपने लिए पीने का कोटा निर्धारित करते है।और इस तरह फिर वो कभी पीना छोड़ देते है तो कभी पीने लगते है।अर्थात चौथी श्रेणी मे आ जाते है जहाँ कुछ भी निश्चित नही है। और फिर शराब के इतने आधीन हो जाते है कि लगातार ही पीना शुरू कर देते है।क्यूंकि दोस्तो और मजे के लिए पी गयी शराब कब आदत बन जाती है ये पीने वाले को पता ही नही चलता है।</p>
<p>यूं तो पहली और दूसरी श्रेणी मे आने वाले लोगों को इलाज से ज्यादा समझने की जरुरत होती है पर फिर भी ये खतरा हमेशा रहता है कि वो पांचवी श्रेणी तक कभी भी पहुँच सकते है। तीसरी श्रेणी को counselling की जरुरत होती है तो चौथी और पांचवी श्रेणी को counselling के साथ-साथ इलाज की जरुरत होती है। क्यूंकि नशा करना दूसरी बीमारियों की तरह ही एक बीमारी है। [सभार: <a href="http://mamtatv.blogspot.com/2007/07/blog-post_18.html" target="_blank">ममता टी वी</a>]</p>
]]></content:encoded>
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		<title>&#8230;.मुझे मुखौटा आजाद करता है</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/676</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/676#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 24 Sep 2007 07:42:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

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		<description><![CDATA[चिट्ठाकारी में कविताएं खूब चलती हैं, कई बार तो चिट्ठाचर्चा तक कविताई में हो जाती है&#8230;.कारण कोई बहुत गंभीर नहीं सिर्फ इतना है कि उसमें टाईप कम करना पड़ता है। खैर हम आज आपको कहानी सुनाएंगे। ये कहानी एक अलग दुनिया की है। ये दुनिया रीयल तो नहीं है लेकिन विश्‍वास करें रीयली यह दुनिया [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">चिट्ठाकारी में कविताएं खूब चलती हैं, कई बार तो चिट्ठाचर्चा तक कविताई में हो जाती है&#8230;.कारण कोई बहुत गंभीर नहीं सिर्फ इतना है कि उसमें टाईप कम करना पड़ता है। खैर हम आज आपको कहानी सुनाएंगे।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/masijeevi.gif"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/masijeevi-thumb.gif" id="id" style="border: 0px none " alt="masijeevi" border="0" height="98" width="84" /></a> ये कहानी एक अलग दुनिया की है। ये दुनिया रीयल तो नहीं है लेकिन विश्‍वास करें रीयली यह दुनिया है। इस दुनिया के बहुत से दरवाजे हैं और हर दरवाजे का एक अंधकारमय रास्‍ता है, वह इसलिए कि जब आप इस अंधकारमय रास्‍ते से गुजरें तो आप कोई एक मुखौटा पहन लें। ये आप अपनी मर्जी से चुन सकते हैं और पसंद न आए तो बदल भी सकते हैं, मुखौटों के चेहरे पर लगते ही आप बस एक मुखौटा हो जाते हैं। लोग इस दुनिया में इसलिए जाते हैं कि ये मुखौटे इस दुनिया के वासियों को आजाद करते हैं। आप इन मुखौटों को पहनकर वह सब कर सकते हैं जो करना चाहते थे पर कर नहीं पाते थे और अक्‍सर दिखाते थे कि आप ऐसी कोई चाहत नहीं रखते, मसलन चलते चलते आपका अक्‍सर मन करता था कि चीख कर कहें कि आप खुश नहीं हैं, आपका पति आपको पीटता है&#8230;या आप अपनी पत्‍नी को पीटते है&#8230;लेकिन जाहिर है ऐसा नहीं कर पाते थे। यह नई दुनिया खूब पसंद की गई, लोग इसमें आते घंटों घूमते मन भर की बातें हरकतें करते&#8230;बाद में मुखौटा उतारकर घर चले जाते। वे खुश थे&#8230;.दुनिया खुश थी।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">फिर कुछ ऐसा हुआ कि एक दिन एक मुखौटाधारी को इस दुनिया के, मतलब मुखौटों की दुनिया के ब्रह्मा के खिलाफ कुछ कहते सुना गया। पता नहीं किसने कहा था, मुखौटे के कारण पहचाना नहीं जा सका, क्‍या किया जाए। ब्रह्माजी गुस्‍सा पीकर रह गए। पर उन्‍होंने एक बड़े लाउडस्‍पीकर पर चिल्‍ला चिल्‍लाकर कहा कि खबरदार किसी ने यह सब कहा तो&#8230;नहीं चलेगा। आखिर हमने इतनी मेहनत से ये दुनिया बनाई है..ऐसा नही कहो। दुनिया के कई पुराने बाशिंदे जो हमेशा एक ही मुखौटा लगाते थे तुरंत मान गए। पर अब ऐसी घटनाएं बढ़नी लगीं&#8230;..ब्रह्मा और कई उनके चेले चपाटे इस बात से दुखी हो गए कि कोई उनकी खड़ी की गई दुनिया में आए और जो मन में आए वह बोले ये तो ठीक नहीं&#8230;. </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">इलाज पहले तो ये निकाला गया कि ये लोग जिस तिस के पास जाते और मुखौटे को उठाकर चेहरा देखते ताकीद करते, धमकाते।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">लेकिन इसका उलटा असर हुआ&#8230;जिनके चेहरे से मुखैटा हटाया जाते उन्‍हें बुरा लगता&#8230;.वे या तो इस दुनिया में आना बंद कर देते। या अगली बार मुखौटा बदल देते। </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">दुनिया के उजाड़ होने का भी खतरा था पर यहॉं तो कुछ नया ही हुआ कि&#8230;.दुनिया के सभी दरवाजों पर एक बोर्ड लगाया गया कि अब से &#8216;इस दुनिया में मुखौटा लगाकर प्रवेश वर्जित है&#8217;।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">मित्रो, कहानी यहीं समाप्‍त हो जाती है। पर दुनिया जारी रहती है। मैं चिट्ठाशास्‍त्र की बात इतनी शिद्दत से इसीलिए कर रहा था इतने दिनों से। कृपया इस बात का सम्‍मान कीजिए कि यहाँ इस चिट्ठाकारी की दुनिया का दस्‍तूर ही है कि यहाँ मुखौटा लगाकर रहा जाता है&#8230;मुखौटा यहाँ का अजूबा नहीं है। <a href="http://aalochak.blogspot.com/2007/03/blog-post_14.html">इसलिए</a> <a href="http://aalochak.blogspot.com/2007/03/blog-post_14.html">इस पोस्‍ट को</a> अवश्‍य पढ़ें</font></p>
<blockquote><p><font face="Mangal" size="2">‘भाया, अगर नकाब पहनकर कुछ भी कहना है तो बहुत आसान है। पर्दे के पीछे अगर आप किसी को गाली भी दोगे तो कोई भी आपका कुछ नही बिगाड़ सकेगा। इसलिए जो कहना है, सामने आकर कहो। ये परिवार सबकी सुनता है, सारे निर्णय सामूहिक होते है।‘</font></p></blockquote>
<p><font face="Mangal" size="2">इन अभिव्‍यक्तियों में दिक्‍कत है। जिसे नोटपैड (&#8230;..मुझे लगता है परिवार वाली अवधारणा मे ही दिक्कत है. पहले हम परिवार बनाएगे फिर सास-ससुर,जेठ-जेठानी,ननद-बहनोई भी पैदा होगे ही.तब तो हमारा यह परिवार बन जाएगा&#8221; कहानी घर घर की&#8221;&#8230;.!! ) व अनुपम ने दर्ज किया है और ठीक किया है।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">ध्‍यान दें कि खतरा यह है कि यदि आप इसे वाकई मुखौटों से मुक्‍त दुनिया बना देंगें तो ये दुनिया बाहर की ‘रीयल’ दुनिया जैसी ही बन जाएगी – नकली और पाखंड से भरी। आलोचक, धुरविरोधी, मसिजीवी ही नहीं वे भी जो अपने नामों से चिट्ठाकारी करते हैं एक झीना मुखौटा पहनते हैं जो चिट्ठाकारी की जान है। उसे मत नोचो&#8212;ये हमें मुक्‍त करता है।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">और हाँ मेरी बेटी की एक्टिविटी बुक में कई सारे मुखौटे बने हैं, जिन्‍हें रंग करना, पहनना उसे बेहद पसंद है। देखिए मेरा फैमिली फोटो<br />
<a href="http://bp0.blogger.com/_jH1kuiAAnmo/RfkvxpKbmvI/AAAAAAAAAGU/wBQQjmkT76Y/s1600-h/mukhauta.jpg"><img src="http://bp0.blogger.com/_jH1kuiAAnmo/RfkvxpKbmvI/AAAAAAAAAGU/wBQQjmkT76Y/s400/mukhauta.jpg" border="0" /></a><br />
(ये समुद्री डाकू मैं हूँ, शेरनी स्‍वाभाविक है श्रीमतीजी हैं, सुदर राजकुमारी हमारी बिटिया श्रे&#8230; है और डोनाल्‍ड हमारा बेटा प्र&#8230; रास्‍ते में मिले तो पुचकार देना&#8230;कहना आप उसके पापा के दोस्‍त हैं।) [<a href="http://masijeevi.blogspot.com/2007/03/blog-post_15.html" target="_blank">साभार: मसिजीवी</a>]       </font></p>
<p align="center"><font face="Mangal" size="2"><font color="#0080ff">आपने चिट्ठे पर विदेशी हिन्दी पाठकों के अनवरत प्रवाह प्राप्त करने के लिये उसे आज ही हिन्दी चिट्ठों की अंग्रेजी दिग्दर्शिका <a href="http://www.chitthalok.com" target="_blank">चिट्ठालोक</a> पर पंजीकृत करें! </font></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%82%E0%A4%97" title="व्यंग सम्बन्धित चिट्ठे">व्यंग</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE" title="काविता सम्बन्धित चिट्ठे">काविता</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF" title="काव्य सम्बन्धित चिट्ठे">काव्य</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE" title="व्यंग-विधा सम्बन्धित चिट्ठे">व्यंग-विधा</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80" title="सारथी सम्बन्धित चिट्ठे">सारथी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA" title="शास्त्री-फिलिप सम्बन्धित चिट्ठे">शास्त्री-फिलिप</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=humour" title="humour सम्बन्धित चिट्ठे">humour</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=satire" title="satire सम्बन्धित चिट्ठे">satire</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi" title="hindi सम्बन्धित चिट्ठे">hindi</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=poem" title="poem सम्बन्धित चिट्ठे">poem</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi" title="hindi सम्बन्धित चिट्ठे">hindi</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=humor" title="humor सम्बन्धित चिट्ठे">humor</a>, </font></font></p>
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		</item>
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		<title>प्रकृति</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/670</link>
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		<pubDate>Sun, 23 Sep 2007 11:42:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

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		<description><![CDATA[सावन का महीना, प्रकृति की सुंदरता, बरसात.. इस मौसम में एक कविता प्रस्तुत है॥ प्रकृति सतरंगी परिधान पहन कर, आच्छादित है मेघ गगन, प्रकृति छटा बिखरी रुपहली, चहक रहे द्विज हो मगन । कन &#8211; कन बरखा की बूंदे, वसुधा आँचल भिगो रहीं, किरनें छन &#8211; छन कर आतीं, धरा चुनर है सजो रहीं । [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/kavikulwant.jpg" id="id" height="122" width="100" /> सावन का महीना, प्रकृति की सुंदरता, बरसात.. इस मौसम में एक कविता प्रस्तुत है॥</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">प्रकृति<br />
सतरंगी परिधान पहन कर,<br />
आच्छादित है मेघ गगन,<br />
प्रकृति छटा बिखरी रुपहली,<br />
चहक रहे द्विज हो मगन ।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">कन &#8211; कन बरखा की बूंदे,<br />
वसुधा आँचल भिगो रहीं,<br />
किरनें छन &#8211; छन कर आतीं,<br />
धरा चुनर है सजो रहीं ।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">सरसिज दल तलैया में,<br />
झूम &#8211; झूम बल खा रहे,<br />
किसलय कोंपल कुसुम कुंज के,<br />
समीर सुगंधित कर रहे ।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">हर लता हर डाली बहकी,<br />
मलयानिल संग ताल मिलाये,<br />
मधुरिम कोकिल की बोली,<br />
सरगम सरिता सुर सजाए ।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">कल &#8211; कल करती तरंगिणी,<br />
उज्जवल तरल धार संवरते,<br />
जल-कण बिंदु अंशु बिखरते,<br />
माणिक, मोती, हीरक लगते।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">मृग शावक कुलाँचे भरता,<br />
गुंजन मधुप मंजरी भाता,<br />
अनुपम सौंदर्य समेटे दृष्य,<br />
लोचन बसता, हृदय लुभाता ।<br />
कवि कुलवंत</font></p>
<p align="center"><font face="Mangal" size="2"><font color="#0080ff"><font color="#800040">आपने चिट्ठे पर विदेशी हिन्दी पाठकों के अनवरत प्रवाह प्राप्त करने के लिये उसे आज ही हिन्दी चिट्ठों की अंग्रेजी दिग्दर्शिका </font><a href="http://www.chitthalok.com" target="_blank">चिट्ठालोक</a> <font color="#800040">पर आज ही  पंजीकृत करें! </font></font></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE" title="काविता सम्बन्धित चिट्ठे">काविता</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE" title="काव्य-विधा सम्बन्धित चिट्ठे">काव्य-विधा</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%85%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A8" title="काव्य-अवलोकन सम्बन्धित चिट्ठे">काव्य-अवलोकन</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80" title="सारथी सम्बन्धित चिट्ठे">सारथी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA" title="शास्त्री-फिलिप सम्बन्धित चिट्ठे">शास्त्री-फिलिप</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-poem" title="hindi-poem सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-poem</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-poem-analysis" title="hindi-poem-analysis सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-poem-analysis</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hind-context" title="hind-context सम्बन्धित चिट्ठे">hind-context</a>, </font></font></p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>उडिया साहित्य के जनक को भुला दिया गया है</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/673</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/673#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 23 Sep 2007 06:42:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/673</guid>
		<description><![CDATA[उन्हें उस आंदोलन का सूत्रपात करने का श्रेय जाता है जिसने भाषायी आधार पर देश में पहली बार किसी राज्य के गठन का रास्ता साफ किया। आधुनिक उडिया साहित्य के जनक कहे जाने वाले इस शख्स की विरासत आज उपेक्षा की मार झेल रही है। आधुनिक उडिया साहित्य के जनक और भाषायी आधार पर देश [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/image2.png"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/image-thumb3.png" style="border-width: 0px; margin: 0px 25px 0px 0px" alt="image" border="0" height="165" width="144" /></a> उन्हें उस आंदोलन का सूत्रपात करने का श्रेय जाता है जिसने भाषायी आधार पर देश में पहली बार किसी राज्य के गठन का रास्ता साफ किया। आधुनिक उडिया साहित्य के जनक कहे जाने वाले इस शख्स की विरासत आज उपेक्षा की मार झेल रही है। आधुनिक उडिया साहित्य के जनक और भाषायी आधार पर देश में प्रथम राज्य के गठन की राह बनाने वाले फकीर मोहन सेनापति का पुश्तैनी घर और बगीचा उपेक्षा की मार झेल रहा है।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">शोधकर्ताओं और साहित्य प्रेमियों का मानना है कि फकीर मोहन सेनापति की विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने की गंभीर कोशिश नहीं हो रही है। आधुनिक उडिया समाज में फकीर मोहन को व्यासकवि के नाम से भी जाना जाता है। १८४३ में जन्मे व्यासकवि ने १९१८ में इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। जब फकीर मोहन डेढ वर्ष के थे, उनके पिता का निधन हो गया था। फकीर मोहन ने &#8216;मो मातृभाषा मोते श्रेष्ठ&#8217; (मेरी मातृभाषा मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ है) का उद्घघोष किया था। उनके इसी इजहार से देश में भाषा के नाम पर पहली बार किसी राज्य के गठन का रास्ता साफ हुआ। १९३६ में उडीसा का भाषायी आधार पर गठन हुआ। व्यासकवि को उडिया पुनर्जागरण का सूत्रपात करने वाले लोगों में से एक माना जाता है।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">जिस व्यासकवि ने अपने साहित्यिक अवदान से अपने समाज की इतनी सेवा की, आज उनकी विरासत खतरे में है। राजधानी भुवनेश्वर से २०० किलोमीटर दूर बालासोर जिले के मलिकाशपुर गांव में उनके घर की जिस कदर उपेक्षा हो रही है, वह बेहद दुखद है। उन्होंने लोगों में आत्मसम्मान की भावना फैलाने में कोई कसर नहीं छोडी थी, लेकिन आज उनकी विरासत खतरे में है। उनके जीर्ण-शीर्ण घर को जिस तरीके से पुस्तकालय, म्यूजियम के रूप में तब्दील किया गया है, वह हास्यास्पद है। वर्षों तक उनका यह घर उपेक्षा की मार झेलता रहा और जब उसकी मरम्मत की गयी और उसकी शक्ल बदली गयी तो मौलिकता ही गायब हो गयी। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि यह परिसर उनकी याद में समर्पित नहीं है। इसकी मूल पहचान खत्म हो गयी है और इसमें कुछ देवताओं की प्रतिमाएं लगा दी गयी हैं। कहीं से भी देखने से नहीं लगता कि यह व्यासकवि का घर है।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति आधुनिक उड़िया कथा-साहित्य के जनक माने जाते हैं। उनकी कहानी तत्कालीन साहित्यिक पत्रिका ‘बोधदायनी’ में छपी थी। दुर्भाग्यवश वह पत्रिका और ‘लछमनिया’ कहानी भी आज इतिहास के गर्भ में समा गयी हैं।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">लोगों का कहना है कि इस घर की जिस हास्यास्पद तरीके से मरम्मत की गयी है, वह अपने आपमें एक मिसाल है कि कैसे देश का सांस्कृतिक विभाग काम कर रहा है। घर के कई स्थानों से पानी का रिसाव दूर से ही देखा जा सकता है। यही हाल उनके गार्डन का है। यहां कई जगह सुंदर नक्काशी की गई थी जो आज गायब हो चुकी है। इस गार्डन की देखभाल के लिए एक माली नियुक्त किया गया था, लेकिन फिलहाल इसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। इससे यह बात साफ तौर पर जाहिर होती है कि राज्य प्रशासन इस साहित्य हस्ती की विरासत के संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं है। [साभार: <a href="http://aawaj.blogspot.com/" target="_blank">संजीव कुमार</a>]</font></p>
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		<title>&#8230;.आखिर ये मर्दानगी का मामला है</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/669</link>
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		<pubDate>Sat, 22 Sep 2007 10:42:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

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		<description><![CDATA[एक संवेदनशील मित्र ने फोन करके आज के अखबारों में छपे एक विज्ञापन पर हमारी राय मॉंगी। एक बस स्‍टाप का दृश्‍य है और एक लड़की को कुछ मनचले छेड़ रहे हैं बाकी चुपचाप हैं। कैप्‍शन कहता है कि इस चित्र में कोई मर्द नहीं है वरना ऐसा न होता। (तस्‍वीर का गुणवत्‍ता के लिए [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">एक संवेदनशील मित्र ने फोन करके आज के अखबारों में छपे एक विज्ञापन पर हमारी राय मॉंगी। एक बस स्‍टाप का दृश्‍य है और एक लड़की को कुछ मनचले छेड़ रहे हैं बाकी चुपचाप हैं। कैप्‍शन कहता है कि इस चित्र में कोई मर्द नहीं है वरना ऐसा न होता।<br />
<a href="http://bp2.blogger.com/_jH1kuiAAnmo/Rdna9128Q5I/AAAAAAAAADE/on-oiKVsKqg/s1600-h/no+men1.JPG"><img src="http://bp2.blogger.com/_jH1kuiAAnmo/Rdna9128Q5I/AAAAAAAAADE/on-oiKVsKqg/s400/no+men1.JPG" border="0" /></a></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">(तस्‍वीर का गुणवत्‍ता के लिए क्षमा बेवकैम से ली है, वैसे इसका अंग्रेजी संस्‍करण दिल्‍ली पुलिस की साईट से लेकर नीचे चेपा गया है)</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">हमारी मर्द पुलिस द्वारा मर्दवाद का ऐसा औदात्‍तीकरण &#8230;&#8230;क्‍या बात है। वाह लुच्‍चई करने वाले ऐसा करते है क्‍योंकि वे मानते हैं ऐसा करना मर्दानगी है और लीजिए देवत्‍व ओड़कर हमारा राज्‍य भी अपनी पुलिस के माध्‍यम से कहता है कि मर्दानगी दिखाना तो बिल्‍कुल ठीक है बस यह समझ लीजिए कि उसे ऐसे नहीं वैसे दिखाएं। भलेमानसों कोई तो इन्‍हें बताए कि जब तक आप मर्दानगी को ग्राहय पूज्‍य महानता से पूर्ण बताते रहेंगे तब तक आप एक लुच्‍चे समाज को बढ़ावा दे रहे हैं।<br />
<a href="http://bp3.blogger.com/_jH1kuiAAnmo/RdnbYF28Q6I/AAAAAAAAADM/QIME7KX-t6k/s1600-h/nomen.jpg"><img src="http://bp3.blogger.com/_jH1kuiAAnmo/RdnbYF28Q6I/AAAAAAAAADM/QIME7KX-t6k/s400/nomen.jpg" border="0" /></a><br />
आज के अखबारों में यह विज्ञापन था और फिर याद करने पर याद आया कि पहले भी <a href="http://www.delhipolice.nic.in/home/pressrel.htm#advt">दिल्‍ली पुलिस के विज्ञापन अभियानों </a>में इसका इस्‍तेमाल हुआ है। जरा ध्‍यान दें कि चित्र में छेड़खानी की शिकार के अतिरिक्‍त एक और महिला भी है, शायद पुलिस कहना चाहती है कि उसकी चुप्‍पी तो ठीक है क्‍योंकि आखिर इसे रोकने का मामला तो मर्दानगी का मामला है&#8230; [साभार: <a href="http://masijeevi.blogspot.com/2007/02/blog-post_19.html" target="_blank">मसिजीवि</a>]</font></p>
<p align="center"><font face="Mangal" size="2"><font color="#0080ff">आपने चिट्ठे पर विदेशी हिन्दी पाठकों के अनवरत प्रवाह प्राप्त करने के लिये उसे आज ही हिन्दी चिट्ठों की अंग्रेजी दिग्दर्शिका <a href="http://www.chitthalok.com" target="_blank">चिट्ठालोक</a> पर पंजीकृत करें! </font></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font color="#0080ff"> </font></font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित:  <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B7%E0%A4%A3" title="विश्लेषण सम्बन्धित चिट्ठे">विश्लेषण</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%86%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE" title="आलोचना सम्बन्धित चिट्ठे">आलोचना</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%A4" title="सहीगलत सम्बन्धित चिट्ठे">सहीगलत</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3" title="निरीक्षण सम्बन्धित चिट्ठे">निरीक्षण</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3" title="परीक्षण सम्बन्धित चिट्ठे">परीक्षण</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF" title="सत्य-असत्य सम्बन्धित चिट्ठे">सत्य-असत्य</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6" title="विमर्श सम्बन्धित चिट्ठे">विमर्श</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80" title="हिन्दी सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8" title="हिन्दुस्तान सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दुस्तान</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4" title="भारत सम्बन्धित चिट्ठे">भारत</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80" title="शास्त्री सम्बन्धित चिट्ठे">शास्त्री</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA" title="शास्त्री-फिलिप सम्बन्धित चिट्ठे">शास्त्री-फिलिप</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80" title="सारथी सम्बन्धित चिट्ठे">सारथी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B" title="वीडियो सम्बन्धित चिट्ठे">वीडियो</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%AB%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B" title="मुफ्त-वीडियो सम्बन्धित चिट्ठे">मुफ्त-वीडियो</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%91%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B" title="ऑडियो सम्बन्धित चिट्ठे">ऑडियो</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%AB%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%86%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B" title="मुफ्त-आडियो सम्बन्धित चिट्ठे">मुफ्त-आडियो</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A5%89%E0%A4%A1%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F" title="हिन्दी-पॉडकास्ट सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी-पॉडकास्ट</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F" title="पाडकास्ट सम्बन्धित चिट्ठे">पाडकास्ट</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=analysis" title="analysis सम्बन्धित चिट्ठे">analysis</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=critique" title="critique सम्बन्धित चिट्ठे">critique</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=assessment" title="assessment सम्बन्धित चिट्ठे">assessment</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=evaluation" title="evaluation सम्बन्धित चिट्ठे">evaluation</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=morality" title="morality सम्बन्धित चिट्ठे">morality</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=right-wrong" title="right-wrong सम्बन्धित चिट्ठे">right-wrong</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=ethics" title="ethics सम्बन्धित चिट्ठे">ethics</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi" title="hindi सम्बन्धित चिट्ठे">hindi</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=india" title="india सम्बन्धित चिट्ठे">india</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=free" title="free सम्बन्धित चिट्ठे">free</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-video" title="hindi-video सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-video</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-audio" title="hindi-audio सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-audio</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-podcast" title="hindi-podcast सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-podcast</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=podcast" title="podcast सम्बन्धित चिट्ठे">podcast</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=Shastri" title="Shastri सम्बन्धित चिट्ठे">Shastri</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=Shastri-Philip" title="Shastri-Philip सम्बन्धित चिट्ठे">Shastri-Philip</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=JC-Philip" title="JC-Philip सम्बन्धित चिट्ठे">JC-Philip</a>, </font></font></p>
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		<title>आदमी भी ख़त्म हो गया और आदमीयत भी&#8230;..!</title>
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		<pubDate>Fri, 21 Sep 2007 11:25:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

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		<description><![CDATA[मैं काफी नियमित रूप से चिट्ठों पर छपी कविताएं पढता हू. भला हो उन हिन्दी मास्टरों का जिन्होंने डंडे मार मार कर हमारे मन में भाषा के प्रति समर्पण कूट कूट कर भर दिया. आज मैं अपने भाषा अध्यापिकाओं महादेवी गुप्ता, शकुंतला दुग्गल, एवं जया मिश्रा को बहुत याद करता हूं. मेरे जीवन में काव्य [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2">
<p>मैं काफी नियमित रूप से चिट्ठों पर छपी कविताएं पढता हू. भला हो उन हिन्दी मास्टरों का जिन्होंने डंडे मार मार कर हमारे मन में भाषा के प्रति समर्पण कूट कूट कर भर दिया. आज मैं अपने भाषा अध्यापिकाओं महादेवी गुप्ता, शकुंतला दुग्गल, एवं जया मिश्रा को बहुत याद करता हूं. मेरे जीवन में काव्य के प्रति झुकाव इनकी विरासत है. </p>
<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/ravindraprabhat.jpg"><img id="id" style="border-top-width: 0px; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-right-width: 0px" height="175" alt="RavindraPrabhat" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/ravindraprabhat-thumb.jpg" width="154" border="0" /></a> काव्य आस्वादन के दौरान दसपचास कविताओं के पाठ के बाद अचानक एक कविता नजर आ जाती है जिसका एक एक वाक्य दिल को छू लेता है, चुनौती देता है, एवं बार बार कानों मे सुनाई देता है. ये जीवन के शाश्वत मूल्यों पर, कालजई विषयों पर, या जीवन की गहनतम भावनाओं पर आधारित होती हैं. </p>
<p>पिछले दिनों रवींद्र प्रभात की इस कविता ने एक दम मुझे आकर्षित किया. उनकी अनुमति से प्रस्तुत है: आदमी भी ख़त्म हो गया और आदमीयत भी&#8230;..! यह कविता हम सब को एक बेहतर मानव बनने का प्रोत्साहन प्रदान करे.</p>
<p>बहुत पहले-      <br />लिखे जाते थे मौसमो के गीत जब       <br />रची जाती थी प्रणय कीकथाऔर &#8211;       <br />कविगण करते थे       <br />देश-काल की घटनाओं पर चर्चा </p>
<p>तब कविताओं मेंढका होता था युवतियों का ज़िस्म&#8230;.!      <br />सुंदर दिखती थी लड़कियाँ       <br />करते थे लोग       <br />सच्चे मन से प्रेम       <br />और जानते थे प्रेम की परिभाषा&#8230;.!</p>
<p>बहुत पहले-      <br />सामाजिक सरांध फैलाने वाले ख़ाटमलों की       <br />नहीं उतारी जाती थी आरती       <br />अपने कुकर्मों पर बहाने के लिए       <br />शेष थे कुछ आँसू       <br />तब ज़िंदा थी नैतिकता       <br />और हाशिए पर कुछ गिने &#8211; चुने रक़्तपात&#8230;.!</p>
<p>तब साधुओं के भेष में      <br />नहीं घूमते थे चोर-उचक्के       <br />सड़कों पर रक़्त बहाकर       <br />नहीं किया जाता था धमनियों का अपमान       <br />तब कोई सम्वन्ध भी नहीं था       <br />बेहयाई का वेशर्मी के साथ&#8230;.!</p>
<p>बहुत पहले-      <br />शाम होत       <br />सुनसान नहीं हो जाती थी सड़कें       <br />गली-मोहल्ले/ गाँव- गिरांव आदि       <br />असमय बंद नहीं हो जाती थी खिड़कियाँ       <br />माँगने पर भी नहीं मिलता था       <br />आगज़ला सौगात       <br />तब दर्द उठने पर       <br />सिसकने की पूरी छूट तीब       <br />और सन्नाटे में भी       <br />प्रसारित होते थे वक़्तव्य       <br />खुलेयाम दर्ज़ा दिया जाता था कश्मीर को       <br />धरती के स्वर्ग का&#8230;..!</p>
<p>अब तो टूटने लगा हैं मिथक      <br />चटखने लगी है आस्थाएं       <br />और दरकने लगी हैं       <br />हमारी बची- खुची तहजीव&#8230;&#8230;!</p>
<p>दरअसल आदमी      <br />नहीं रह गया है आदमी अब       <br />उसीप्रकार जैसे-       <br />ख़त्म हो गयी समाज से सादगी       <br />आदमी भी ख़त्म हो गया       <br />और आदमीअत भी&#8230;..!       <br />() <a href="http://parikalpnaa.blogspot.com/2007/09/blog-post_88.html" target="_blank">रवीन्द्र प्रभात</a></p>
<table cellspacing="0" cellpadding="0" width="400" border="1">
<tbody>
<tr>
<td valign="top" width="398">
<p align="center"><font color="#0080ff">आपने चिट्ठे पर विदेशी हिन्दी पाठकों के अनवरत प्रवाह प्राप्त करने के लिये उसे आज ही हिन्दी चिट्ठों की अंग्रेजी दिग्दर्शिका <a href="http://www.chitthalok.com" target="_blank">चिट्ठालोक</a> पर पंजीकृत करें!</font> </p>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<p> </font>
<p><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a title="काविता सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE">काविता</a>, <a title="काव्य-विधा सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE">काव्य-विधा</a>, <a title="काव्य-अवलोकन सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%85%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A8">काव्य-अवलोकन</a>, <a title="सारथी सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80">सारथी</a>, <a title="शास्त्री-फिलिप सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA">शास्त्री-फिलिप</a>, <a title="hindi-poem सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-poem">hindi-poem</a>, <a title="hindi-poem-analysis सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-poem-analysis">hindi-poem-analysis</a>, <a title="hind-context सम्बन्धित चिट्ठे" href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hind-context">hind-context</a>, </font></p>
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		<title>दुनिया के असली अजूबे</title>
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		<pubDate>Thu, 20 Sep 2007 11:42:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

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		<description><![CDATA[हाल फिलहाल एक हुआ तमाशा, दुनिया वालों दो ध्यान जरा सा। विश्व में नए अजूबे चुने गए, एस एम एस से वोटिंग किए गए। . करोड़ों का हुआ वारा &#8211; न्यारा, देकर वास्ता इज्जत का यारा। भोली जनता को बनाया गया, ताज के नाम पर फंसाया गया। . मीडिया भी बेफकूफ बन गई, वह भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/kavikulwant.jpg"><img src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2007/09/kavikulwant-thumb.jpg" id="id" style="border-width: 0px" alt="KaviKulwant" border="0" height="126" width="104" /></a> हाल फिलहाल एक हुआ तमाशा,<br /> दुनिया वालों दो ध्यान जरा सा।<br /> विश्व में नए अजूबे चुने गए,<br /> एस एम एस से वोटिंग किए गए।<br /> .<br /> करोड़ों का हुआ वारा &#8211; न्यारा,<br /> देकर वास्ता इज्जत का यारा।<br /> भोली जनता को बनाया गया,<br /> ताज के नाम पर फंसाया गया।<br /> .<br /> मीडिया भी बेफकूफ बन गई,<br /> वह भी ताज के पीछे पड़ गई।<br /> जनता से सबने गुहार लगाई,<br /> जितने चाहो वोट दो भाई।<br /> .<br /> वोट के नाम पर खूब कमाया,<br /> भीख मांगने का नया तरीका पाया।<br /> अरे भाई! ताज कहाँ अजूबा है ?<br /> वहाँ तो सोई बस एक महबूबा है!<br /> .<br /> आज के युग में कितनी तरक्की है,<br /> ट्रेनें, हवाई-जहाज, सड़क पक्की है।<br /> राकेट, मिसाईल, कारें, सितारा होटल हैं,<br /> खुलती दिन रात जहाँ शैंपेन बोटल हैं।<br /> .<br /> आओ दिखाता हूँ मै आपको सच्ची अजूबे,<br /> प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।<br /> .<br /> विश्व का प्रथम अजूबा &#8211; ध्यान दें !<br /> मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर कर दिखला दें!<br /> कोई माई का लाल साबित कर दे,<br /> इससे बड़ा अजूबा दुनिया में दिखा दे।<br /> .<br /> आओ दिखाता हूँ मैं आपको सच्ची अजूबे,<br /> प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।<br /> .<br /> दूसरा अजूबा भी हमारे देश में,<br /> नजरें उठा कर देख लो किसी भी शहर गली में।<br /> कचरे के डब्बों से खाना ढ़ूंढ़ता आदमी,<br /> उसी को खा कर अपनी भूख मिटाता आदमी।<br /> .<br /> आओ दिखाता हूँ मै आपको सच्ची अजूबे,<br /> प्रगति के दौर के ये हैं असली अजूबे।<br /> .<br /> तीसरा अजूबा &#8211; कीड़ों सा रेंगता आदमी,<br /> स्लम, फुटपाथ, ट्रैक पर जीवन बिताता आदमी।<br /> सड़कों पर सुबह, लोटा लेकर बैठा आदमी,<br /> देखिए अजूबा, मजबूर कितना आदमी।<br /> .<br /> और भी कितने अजूबे हैं हमारे देश में,<br /> एक एक कर गिनाना है न मेरे बस में।<br /> एक एक कर गिनाना है न मेरे बस में॥<br /> .<br /> <a href="http://www.kavikulwant.blogspot.com/" target="_blank">कवि कुलवंत सिंह</a>  <br /> 
<p align="center"><font color="#0080ff">आपने चिट्ठे पर विदेशी हिन्दी पाठकों के अनवरत प्रवाह प्राप्त करने के लिये उसे आज ही हिन्दी चिट्ठों की अंग्रेजी दिग्दर्शिका <a href="http://www.chitthalok.com" target="_blank">चिट्ठालोक</a> पर पंजीकृत करें! </p>
<p> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE" title="काविता सम्बन्धित चिट्ठे">काविता</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE" title="काव्य-विधा सम्बन्धित चिट्ठे">काव्य-विधा</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%85%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A8" title="काव्य-अवलोकन सम्बन्धित चिट्ठे">काव्य-अवलोकन</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80" title="सारथी सम्बन्धित चिट्ठे">सारथी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA" title="शास्त्री-फिलिप सम्बन्धित चिट्ठे">शास्त्री-फिलिप</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-poem" title="hindi-poem सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-poem</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-poem-analysis" title="hindi-poem-analysis सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-poem-analysis</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hind-context" title="hind-context सम्बन्धित चिट्ठे">hind-context</a>, </font></p>
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		<title>बैठने की प्रिय जगह</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/638</link>
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		<pubDate>Thu, 20 Sep 2007 07:42:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>
		<category><![CDATA[व्यंग]]></category>

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		<description><![CDATA[मुन्ने के बापू यदि कमप्यूटर के सामने न बैठें हों तो उनका प्रिय जगह है: टीवी के सामने, सोफे पर, और पैर टीवी तथा सोफे के बीच मे रखी मेज के उपर&#124; वह वहां पर क्या कर रहे होते हैं यह इस पर निर्भर करता है कि टीवी में क्या आ रहा है&#124; यदि हौकी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">मुन्ने के बापू यदि कमप्यूटर के सामने न बैठें हों तो उनका प्रिय जगह है: टीवी के सामने, सोफे पर, और पैर टीवी तथा सोफे के बीच मे रखी मेज के उपर| वह वहां पर क्या कर रहे होते हैं यह इस पर निर्भर करता है कि टीवी में क्या आ रहा है|</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">यदि हौकी या क्रिकेट का मैच है और हिन्दुस्तान खेल रही है तो उनकी गोद में टौमी, वही अपना कुत्ता, होगा| जिसे वे प्यार से दहिने हांथ से सहला रहे होंगे और वह अपनी लम्बी जीभ निकाल कर उनके मुंह को बड़े प्रेम से चाट रहा होगा उंह&#8230;.हूं &#8230; | कभी कभी उनका और टौमी का बैलेन्स गड़बड़ा जाता है क्योंकि वे हिन्दुस्तान की टीम को बक-अप करने लगते हैं जैसे हिन्दुस्तान की टीम के पास टेलीपैथी हो और केवल उनकी बात ही सुन रही हो| अरे चुपचाप मैच देखो|</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">यदि हौकी या क्रिकेट का मैच नहीं आ रहा है तो और मुशकिल| टौमी बांयी तरफ बगल मे नीचे, जिसे वे बांये हाथ से सहला रहे होते हैं तथा दांये हांथ मे रिमोट रहता है जिस पर उनकी उंगलियां ऐसे थिरक रही होती हैं जैसे कोई नृत्यांगना भारत-नाटय्म कर रही हो| क्या मजाल है कि कोई चैनल पर २ या ३ सेकंड से ज्यादा रुकती हों| कहो कि २-३ मिनट तो देखो, प्रोग्राम तो समझने दो, फिर चैनल बदलो| कहेंगे, </font></p>
<blockquote><p><font face="Mangal" size="2">&#8216;क्या देखना सब में एक ही बात रहती है, सब मालुम है|&#8217; </font></p></blockquote>
<p><font face="Mangal" size="2"> कभी खबरें आ रहीं हों, सुनने का मन करे: तो उनका सधा सधाया जवाब है<br />
</font></p>
<blockquote><p><font face="Mangal" size="2">क्या करना है कहीं चोरी कहीं डकैती तो कहीं खून| क्या इसके अलावा कोई और खबर रहती है क्या?</font></p></blockquote>
<p><font face="Mangal" size="2">क्या आपको ऐसे रिमोट के बारे मे मालुम है जिसमे कम से कम ३ से लेकर ५ मिनट तक चैनल नहीं बदले जा सकते हों: बस वही लगा देना है| [अनुमति से: <a href="http://munnekimaa.blogspot.com/2006/05/blog-post.html">बैठने की प्रिय जगह</a>]</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%82%E0%A4%97" title="व्यंग सम्बन्धित चिट्ठे">व्यंग</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE" title="काविता सम्बन्धित चिट्ठे">काविता</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF" title="काव्य सम्बन्धित चिट्ठे">काव्य</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE" title="व्यंग-विधा सम्बन्धित चिट्ठे">व्यंग-विधा</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80" title="सारथी सम्बन्धित चिट्ठे">सारथी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA" title="शास्त्री-फिलिप सम्बन्धित चिट्ठे">शास्त्री-फिलिप</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=humour" title="humour सम्बन्धित चिट्ठे">humour</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=satire" title="satire सम्बन्धित चिट्ठे">satire</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi" title="hindi सम्बन्धित चिट्ठे">hindi</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=poem" title="poem सम्बन्धित चिट्ठे">poem</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi" title="hindi सम्बन्धित चिट्ठे">hindi</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=humor" title="humor सम्बन्धित चिट्ठे">humor</a>, </font></p>
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		<title>हिन्दी में ब्लाग कैसे बनाएं</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/642</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/642#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 19 Sep 2007 07:42:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

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		<description><![CDATA[क्या मैं हिन्दी में अपनी वेबसाईट या ब्लाग बना सकता हूं? बिल्कुल. अब हिन्दी में वेबसाईट बनाना और चलाना बहुत आसान है. मैं वेबसाईट बनाऊं या ब्लाग? अगर अभी तक आप वेबसाईट या ब्लाग्स की दुनिया से अनजान थे तो बेहतर होगा कि आप पहले अपना एक ब्लाग बनाएं. हालांकि हिन्दी में वेबसाईट बनाना और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font color="#008080">क्या मैं हिन्दी में अपनी वेबसाईट या ब्लाग बना सकता हूं?</font><br />
बिल्कुल. अब हिन्दी में वेबसाईट बनाना और चलाना बहुत आसान है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font color="#008080">मैं वेबसाईट बनाऊं या ब्लाग?</font><br />
अगर अभी तक आप वेबसाईट या ब्लाग्स की दुनिया से अनजान थे तो बेहतर होगा कि आप पहले अपना एक ब्लाग बनाएं. हालांकि हिन्दी में वेबसाईट बनाना और चलाना भी बहुत आसान और कम खर्चीला है फिर भी आपको सलाह है कि आप पहले अपना ब्लाग बनाएं.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font color="#008080">अगर वेबसाईट बनाना आसान है तो मैं शुरू से ही अपनी वेबसाईट क्यों न बनाऊं?<br />
</font><img src="http://bp0.blogger.com/_ae352Y7bWYQ/RmuFexWA18I/AAAAAAAAAHM/6EU6ISqFwgk/s200/IMG_0160.jpg" id="id" height="69" width="55" /> अगर आप कोई व्यवसाय चलाते हैं या फिर देवनागरी भाषा में कोई समाचार-प्रचार माध्यम खड़ा करना चाहते हैं तो आप निश्चित ही अपनी वेबसाईट से शुरूआत करिए. लेकिन आप व्यक्तिगत विचारों की अभिव्यक्ति या फिर एक निश्चित पाठकवर्ग के बीच तुरंत अपनी बात पहुंचाना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि आप अपना ब्लाग बनाएं. इससे कई फायदे हैं.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">1. अपने वेबपेज के लिए आपको कहीं जगह (होस्टिंग) नहीं खरीदनी पड़ती.<br />
2. आपको बनी-बनाई डिजाईन मिल जाती है जिसको आप अपनी रूचि के मुताबिक ढाल सकते हैं.<br />
3. अगर आप अपने ब्लाग पर पर्याप्त सक्रिय हैं और लोगों के सामने वेबसाईट की तरह प्रस्तुत करना चाहते हैं तो हिन्दी ब्लागिंग का मौका देनेवाली दो बड़ी संस्थाएं वर्डप्रेस और ब्लागर आपको अपने डोमेन नेम पर जाने की सुविधा देती हैं.<br />
4. क्योंकि आपको अलग से कोई वेबस्पेस नहीं खरीदना है इसलिए आपको यह चिंता नहीं करनी है कि हर साल उसके लिए आप पैसा जमा करें और उसका नवीनीकरण करवाएं. ब्लाग पर एक बार आप जो कार्य कर देते हैं वह तब तक वहां मौजूद रहेगा जब तब वह वेबहोस्टिंग कंपनी रहेगी.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font color="#008080">फिर भी अगर मैं अपनी स्वयं की वेबसाईट हिन्दी में बनाना चाहूं तो?<br />
</font>आप जरूर यह कार्य कर सकते हैं. सबसे पहले आपको एक डोमेन नेम रजिस्टर्ड कराना होगा. डोमेन नेम रजिस्ट्रेशन से पहले कुछ सावधानियों पर ध्यान दें. जैसे जहां से आप नाम बुक करवा रहे हैं वह आपके डोमेन नेम का कन्ट्रोल पैनल आपको दे दे. इसके साथ ही आप होस्टिंग (यानी वह जगह जिसका उपयोग आप अपने वेबपेज को चलाने और सामग्री को सुरक्षित रखने के लिए करते हैं) खरीदते समय यह ध्यान रखें कि सर्वर की परफार्मेंस कैसी है. आपके वेबपेज पर बहुत अच्छी सामग्री हो और आपने उसका डिजाईन भी बहुत अच्छा करवा रखा हो फिर भी अगर सर्वर धीमा है तो आपके सब किये पर पानी फिर जाता है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"><font color="#008080">और ब्लाग बनाने की शुरूआत कैसे करें?<br />
</font>वैसे तो आजकल हर बड़े वेब पोर्टल ब्लाग्स की सुविधा दे रहे हैं. आप कहीं मिनटों में ब्लाग बना सकते हैं. लेकिन हिन्दी में काम करनेवालों के लिहाज से ब्लागर(<a href="http://blogger.com/">http://blogger.com/</a>) और वर्डप्रेस (<a href="http://wordpress.com/">http://wordpress.com/</a>) ही श्रेष्ठ विकल्प हैं. एक और स्थान है जहां आप अपना हिन्दी ब्लाग बना सकते हैं वह है लाईव जर्नल (<a href="http://livejournal.com/">http://livejournal.com/</a>) . यही मुख्य तीन स्थान हैं जो आपको मुफ्त हिन्दी ब्लाग बनाने की सुविधा देते हैं. वर्डप्रेस और लाईव जर्नल स्वतंत्र प्रयास हैं इसलिए ये आपको एक सीमित मात्रा में जगह उपलब्ध करवाते हैं. अगर उससे अधिक जगह का उपयोग आप करते हैं तो आपको अतिरिक्त पैसा अदा करना होता है. वर्डप्रेस जहां आपसे 50 एमबी जगह उपयोग करने के बाद पैसे मांगता है वहीं लाईव जर्नल तीन तरह से आपको सेवाएं आफर करता है. पहला मुफ्त है लेकिन आप उसके तहत फोटो, आडियो आदि नहीं रख सकते. दूसरी सेवा भी मुफ्त है जिसमें आपको फोटो आदि रखने की कई सुविधाएं मिलती है लेकिन जर्नल इस मुफ्त सेवा के बदले अपने विज्ञापन आपके ब्लाग पर चलाता है. तीसरी सेवा के लिए लाईव जर्नल आपसे सीधे पैसे लेता है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">वर्डप्रेस पहले पचास एमबी जगह के उपयोग तक आपसे कोई पैसा नहीं लेता. और आपके ब्लाग पर अपना कोई विज्ञापन भी नहीं चलाता. इस सेवा के उपयोग के लिए आप अपना कोई भी ई-मेल आईडी उपयोग कर सकते हैं. ध्यान रहे वर्डप्रेस पर एकबार आप जिस नाम से ब्लाग बना लेते हैं उसको कदापि नष्ट न करें. अगर आपने ऐसा किया तो उस नाम या ई-मेल आईडी से आप दोबारा वर्डप्रेस पर कभी ब्लाग नहीं बना पायेंगे.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">ब्लागर पर अपना ब्लाग बनाने के लिए आपके पास गूगल का ईमेल होना जरूरी है. यह आपको 1000 एमबी की जगह मुहैया कराता है और इसके लिए किसी भी प्रकार का कोई पैसा नहीं लेता. उलटे ब्लागर आपको एडसेंस की सुविधा भी देता है जिससे आप अपने ब्लाग पर गूगल द्वारा दिये जा रहे विज्ञापनों को लगा सकते हैं और अगर लोग उन विज्ञापनों पर स्पर्श करते हैं तो गूगल आपको पैसे देता है.</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">उपर्युक्त तीनों सेवा प्रदाताओं का अध्ययन करने के बाद आप अपनी सुविधा के अनुसार जहां चाहें अपना ब्लाग बना सकते हैं. [<a href="http://devbhasha.blogspot.com/" target="_blank">संजय तिवारी</a>]</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE" title="सारथी-हिन्दी-कार्यशाला सम्बन्धित चिट्ठे">सारथी-हिन्दी-कार्यशाला</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-" title="हिन्दी- सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी-</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%BE" title="कार्यशाला सम्बन्धित चिट्ठे">कार्यशाला</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A5%89%E0%A4%AB%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%AF%E0%A4%B0" title="हिन्दी-सक्षम-सॉफ्टवेयर सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी-सक्षम-सॉफ्टवेयर</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=Sarathi-hindi-workshop" title="Sarathi-hindi-workshop सम्बन्धित चिट्ठे">Sarathi-hindi-workshop</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-workshop" title="hindi-workshop सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-workshop</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hind-enabled-software" title="hind-enabled-software सम्बन्धित चिट्ठे">hind-enabled-software</a>, </font></p>
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		<title>मां तुझे सलाम &#8211; इतिहास</title>
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		<pubDate>Tue, 18 Sep 2007 11:42:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[चुनी हुई प्रविष्ठियां]]></category>

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		<description><![CDATA[आधुनिक युग में बंगला साहित्य का उत्थान उन्नीसवीं सदी के मध्य से शुरु हुआ। इसमें राजा राम मोहन राय, ईशवर चन्द्र विद्यासागर, परिचन्द्र मित्रा, माईकल मदसूदन दत्त, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्र नाथ टेगोर ने अग्रणी भूमिका निभायी। इसके पहले बंगाल के साहित्यकार बंगला की जगह संस्कृत या अंग्रेजी में लिखना पसन्द करते थे। बंगला साहित्य [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font face="Mangal" size="2"> </font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">आधुनिक युग में बंगला साहित्य का उत्थान उन्नीसवीं सदी के मध्य से शुरु हुआ। इसमें राजा राम मोहन राय, ईशवर चन्द्र विद्यासागर, परिचन्द्र मित्रा, माईकल मदसूदन दत्त, बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय, रवीन्द्र नाथ टेगोर ने अग्रणी भूमिका निभायी। इसके पहले बंगाल के साहित्यकार बंगला की जगह संस्कृत या अंग्रेजी में लिखना पसन्द करते थे। बंगला साहित्य में जनमानस तक पैंठ बनाने वालों मे शायद बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय पहले साहित्यकार थे।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्म १८३८ में एक परंपरागत और समृद्ध बंगाली परिवार में हुआ था उनकी पहली प्रकाशित बांग्ला कृति &#8216;दुर्गेशनंदिनी&#8217; मार्च १८६५ में छपी थी। उनकी शिक्षा हुगली कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज में हुई। १८५७ में उन्होंने बीए पास किया और १८६९ में क़ानून की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होने सरकारी नौकरी कर ली और १८९१ में सरकारी सेवा से रिटायर हुए। उनका निधन अप्रैल १८९४ में हुआ।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय सरकारी सेवा में थे और १८७० में जब अंग्रेजी हूकमत ने God save the King/Queen गाना अनिवार्य कर दिया तो इसके विरोध में वन्दे मातरम् गीत के पहले दो पैराग्राफ १८७६ में संस्कृत में लिखे। इन दोनो पैराग्राफ में केवल मातृ-भूमि की वन्दना है। बंकिम चन्द्र ने १८८२ में आनन्द मठ नाम का उपन्यास बंगला में लिखा और इस गीत को उसका हिस्सा बनाया। उस समय इस उपन्यास की जरूरत समझते हुये इसके बाद के पैराग्राफ बंगला भाषा में जोड़े गये। इन बाद के पैराग्राफ में दुर्गा की स्तुति है।</font></p>
<p><font face="Mangal" size="2">कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (१८९६) में, रवींद्र नाथ टैगौर ने इसे लय और संगीत के साथ गाया। श्री अरविन्दो ने इस गीत का अंग्रेजी में, और हाल में सांसद आरिफ मौहम्मद खान ने उर्दू में अनुवाद किया है। १९३७ में इस गीत के बारे में कांग्रेस में बहस हुई और जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता वाली समिति ने इसके पहले दो पैराग्राफ को ही मान्यता दी। इस समिति में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद भी थे। पहले दो पैराग्राफ को मान्याता देने का कारण यही था कि इन दो पैराग्राफ में किसी देवी देवता की स्तुति नहीं थी और यह देश के सम्मान में थे। डा. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में एक बयान २४ जनवरी १९५० में दिया जो कि सवीकार कर लिया गया। इस ब्यान में वन्दे मातरम् के केवल पहले दो पैराग्राफ को मान्यता दी गयी है। यह ही दो पैराग्राफ प्रसांगिग हैं और इन्हीं को राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया गया है। डा. राजेन्द्र प्रसाद का संविधान सभा को दिया गया ब्यान यह है,</font></p>
<blockquote><p><font face="Mangal" size="2">The composition consisting of words and music known as Jana Gana Mana is the National Anthem of India, subject to such alterations as the Government may authorise as occasion arises, and the song Vande Mataram, which has played a historic part in the struggle for Indian freedom, shall be honored equally with Jana Gana Mana and shall have equal status with it. (Applause) I hope this will satisfy members. (Constituent Assembly of India, Vol. XII, 24-1-1950)</font></p></blockquote>
<p><font face="Mangal" size="2"> यह गीत सबसे पहले १८८२ में प्रकाशित हुआ था और तब से १२५ साल हो गये हैं। इस गीत को पहले पहल ७ सितम्बर १९०५ में कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। २००५ में इसके सौ साल पूरे होने के उपलक्ष में १ साल के समारोह का आयोजन किया गया। यह ७ सितम्बर को समाप्त हुआ। इस समापन का अभिनन्दन करने के लिये मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को ७ सितम्बर २००६ में स्कूलों में गाने की बात की। हालांकि बाद में अर्जुन सिंह ने संसद में कह दिया कि गीत गाना किसी के लिए आवश्यक नहीं किया गया है, जिसे गाना हो गाए, न गाना हो, न गाए। [उन्मुक्त, <a href="http://unmukt-hindi.blogspot.com/2006/09/blog-post_17.html">मां तुझे सलाम - इतिहास</a>] </font></p>
<p><font size="1">चिट्ठाजगत पर सम्बन्धित: <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B7%E0%A4%A3" title="विश्लेषण सम्बन्धित चिट्ठे">विश्लेषण</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%86%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE" title="आलोचना सम्बन्धित चिट्ठे">आलोचना</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%A4" title="सहीगलत सम्बन्धित चिट्ठे">सहीगलत</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3" title="निरीक्षण सम्बन्धित चिट्ठे">निरीक्षण</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3" title="परीक्षण सम्बन्धित चिट्ठे">परीक्षण</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF-%E0%A4%85%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF" title="सत्य-असत्य सम्बन्धित चिट्ठे">सत्य-असत्य</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6" title="विमर्श सम्बन्धित चिट्ठे">विमर्श</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80" title="हिन्दी सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%A8" title="हिन्दुस्तान सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दुस्तान</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4" title="भारत सम्बन्धित चिट्ठे">भारत</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80" title="शास्त्री सम्बन्धित चिट्ठे">शास्त्री</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AB%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AA" title="शास्त्री-फिलिप सम्बन्धित चिट्ठे">शास्त्री-फिलिप</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A5%E0%A5%80" title="सारथी सम्बन्धित चिट्ठे">सारथी</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B" title="वीडियो सम्बन्धित चिट्ठे">वीडियो</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%AB%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B" title="मुफ्त-वीडियो सम्बन्धित चिट्ठे">मुफ्त-वीडियो</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%91%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B" title="ऑडियो सम्बन्धित चिट्ठे">ऑडियो</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%AB%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%86%E0%A4%A1%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B" title="मुफ्त-आडियो सम्बन्धित चिट्ठे">मुफ्त-आडियो</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A5%89%E0%A4%A1%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F" title="हिन्दी-पॉडकास्ट सम्बन्धित चिट्ठे">हिन्दी-पॉडकास्ट</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F" title="पाडकास्ट सम्बन्धित चिट्ठे">पाडकास्ट</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=analysis" title="analysis सम्बन्धित चिट्ठे">analysis</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=critique" title="critique सम्बन्धित चिट्ठे">critique</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=assessment" title="assessment सम्बन्धित चिट्ठे">assessment</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=evaluation" title="evaluation सम्बन्धित चिट्ठे">evaluation</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=morality" title="morality सम्बन्धित चिट्ठे">morality</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=right-wrong" title="right-wrong सम्बन्धित चिट्ठे">right-wrong</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=ethics" title="ethics सम्बन्धित चिट्ठे">ethics</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi" title="hindi सम्बन्धित चिट्ठे">hindi</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=india" title="india सम्बन्धित चिट्ठे">india</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=free" title="free सम्बन्धित चिट्ठे">free</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-video" title="hindi-video सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-video</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-audio" title="hindi-audio सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-audio</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=hindi-podcast" title="hindi-podcast सम्बन्धित चिट्ठे">hindi-podcast</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=podcast" title="podcast सम्बन्धित चिट्ठे">podcast</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=Shastri" title="Shastri सम्बन्धित चिट्ठे">Shastri</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=Shastri-Philip" title="Shastri-Philip सम्बन्धित चिट्ठे">Shastri-Philip</a>, <a href="http://www.chitthajagat.in/?shabd=JC-Philip" title="JC-Philip सम्बन्धित चिट्ठे">JC-Philip</a>, </font></p>
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