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	<title>सारथी &#187; परिचय</title>
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	<description>हिन्दी, हिन्दुस्तान एवं ईसा के चरणसेवक शास्त्री फिलिप का बौद्धिक शास्त्रार्थ चिट्ठा!! (2010 का औसत:  600,000 हिटस प्रति महीने!!)</description>
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		<title>एक बिजली, लाखों का नुक्सान!</title>
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		<pubDate>Tue, 04 May 2010 16:50:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[सुनते हैं कि उत्तर भारत में इन दिनों गर्मी दिन प्रति दिन बढ रही है और कई जगह ४५ के ऊपर पहुंच गई है. प्रभु की दया से केरल में पिछले २ हफ्तों से जम कर पानी बरस रहा है. जम कर से मेरा मतलब है हर शाम एक घंटा बिना रुके. सालों पहले जब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>सुनते हैं कि उत्तर भारत में इन दिनों गर्मी दिन प्रति दिन बढ रही है और कई जगह ४५ के ऊपर पहुंच गई है. प्रभु की दया से केरल में पिछले २ हफ्तों से जम कर पानी बरस रहा है. जम कर से मेरा मतलब है हर शाम एक घंटा बिना रुके.</p>
<p>सालों पहले जब ग्वालियर से कोच्चि आकर बसा तो यहां की साल में १६५ दिन की बारिश मेरे लिये अजूबा थी. झंझट भी था. लेकिन जब धर्मपत्नी ने पहली बारिश के समय टोका कि बरसात के समय दूरभाष का प्रयोग न करूं, संगणक आदि बंद कर दूं, तो लगा कि वे मजाक कर रही हैं. लेकिन उसी हफ्ते जब मेरे पडोसी के पेड पर बिजली गिरी तो कान पकड लिये.</p>
<p>अगली बरसात के मौसम में दौड कर संगणक बंद करते करते मेरे सामने ही मेरा मॉडम जल गया. प्रभु की दया से केबल को हाथ लगाने के पहले ऐसा हो गया, वर्ना ३०,००० वोल्ट बिजली मेरे बदन से होकर गुजरती तो पता नहीं क्या खाक बचता. इसके अगले साल हम लोग खिडकी से बारिश देख रहे थे कि हमारे आंगने में लगे नारियल पर बिजली गिरी और दस मिनिट में उसका सिर्फ ठूंठ बचा रहा.</p>
<p>इसके कुछ सालों बाद इस इलाके में बीएसएनएल वालों का टावर लग गया और बिजली को उसका तडित-चालक खीचने लगा. हम लोगों ने चैन की सांस ली. लेकिन पिछले हफ्ते जो बिजली गिरी तो लगभग १ मिनिट तक आवाज आती रही और धरती कांप गई. पता चला कि केबिल द्वारा इंटरनेट प्रदान करने वाली दोनों कंपनियों का लाखों रुपये की मशीनें जल गईं. हफ्ते भर जालसंपर्क टूटा रहा. अब जुडा तो ५ मिनिट जाल लग जाता है तो अगले ५५ मिनिट मैं निराश बैठा रहता हूं.</p>
<p>एक बिजली, लेकिन क्या क्या गुल खिला गई इस बार.</p>
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		<title>बनारस का बुद्धिजीवी फरिश्ता!</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Apr 2010 03:14:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[मार्च के आखिरी हफ्ते का बडा इंतजार था, एक व्यक्ति से मिलने का जो अभी तक तो सिर्फ एक अमूर्त “नाम” था लेकिन जिसे मूर्त रूप में देखने की बडी कामना थी. इस घटना का एक पहलू &#8230;केरल में हुआ इक ब्लॉगर महामिलन &#8230;&#8230;(केरल यात्रा संस्मरण -८) में आ चुका है, लेकिन दूसरा पहलू विन्डोज [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/DrArvind.jpg"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; margin: 0px 30px 0px 0px; display: inline; border-top: 0px; border-right: 0px" title="Dr Arvind Mishra, Shastri Philip" border="0" alt="Dr Arvind Mishra, Shastri Philip" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/DrArvind_thumb.jpg" width="240" height="160" /></a> मार्च के आखिरी हफ्ते का बडा इंतजार था, एक व्यक्ति से मिलने का जो अभी तक तो सिर्फ एक अमूर्त “नाम” था लेकिन जिसे मूर्त रूप में देखने की बडी कामना थी. इस घटना का एक पहलू <a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">&#8230;केरल में हुआ इक ब्लॉगर महामिलन </a><a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">&#8230;&#8230;(केरल यात्रा संस्मरण </a><a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">-८</a><a href="http://mishraarvind.blogspot.com/2010/04/blog-post_1061.html">)</a> में आ चुका है, लेकिन दूसरा पहलू विन्डोज ७ की तकनीकी समस्या के कारण अभी तक पेश नहीं कर पाया था. आज सुबह हिन्दीटंकण की समस्या हल हुई तो लगा अब इस “महामिलन” के बारे में लिखने का समय आ गया है.</p>
<p align="justify">दर असल डा अरविंद मिश्रा मेरे इष्ट चिट्ठाकारों में से एक हैं. उनका वैज्ञानिक लेख गजब का होता है, और मैं उनको नियमित रूप से पढता हूं. वैचारिक विषयों पर भी उनके आलेख पाठक को चिंतन के लिये प्रेरित करते हैं अत: उनके वैचारिक आलेख भी काफी रुचि से पढता हूँ. चिट्ठाजगत के एकाध चिट्ठा-पिस्सुओं को उनके वैज्ञानिक आलेखों से बढी तकलीफ होती है, और उनके कहे को तोडमरोड कर पेश करने की कोशिश करते हैं, लेकिन अरविंद जी ने आज तक जम कर उनका सामना किया है. इन सब कारणों से मैं उनका बडा भक्त हूँ और उनसे मुलाकात के लिये एक एक पल काटना मुश्किल हो गया था.</p>
<p align="justify">लेकिन वैज्ञानिक ठहरे वैज्ञानिक. वे कहां हम धरतीधारियों के टाईमटेबल से चलते हैं. (सुनते हैं कि बिजली के बल्ब के अविष्कारक थामस एडिसन ने तो शादी के एक हफ्ते के बात अपनी श्रीमती जी को अपने पास देख टोक दिया था कि देवी आप कौन हैं और क्यों मेरे आसापास घूम&#160; रही हैं). खैर डॉ अरविंद ने अंत में चलभाष पर खबर की कि वे शहर के दूसरे कोने में पहुंच चुके हैं और हमारी कुटिया/आश्रम में सशरीर तशरीफ लाना चाहते&#160; हैं. बडा सुखद आश्चर्य हुआ कि उनके व्यस्त कार्यक्रम के बीच १४ किलोमीटर दूर मुझ से मिलने के लिये वे खुद आना चाहते थे.</p>
<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/Temple.jpg"><img style="border-bottom: 0px; border-left: 0px; display: block; float: none; margin-left: auto; border-top: 0px; margin-right: auto; border-right: 0px" title="Temple" border="0" alt="Temple" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2010/04/Temple_thumb.jpg" width="440" height="304" /></a> </p>
<p align="center"><font color="#0000f2">चित्र को बडा करके देखने के लिये मंदिर के चित्र पर चटका लगाईये</font></p>
<p align="justify">शास्त्रीधाम तक पहुंचना बहुत आसान है. वामन अवतार के लिये प्रसिद्ध त्रिक्ककरा मंदिर के बगल में ही है शास्त्रीधाम. (चित्र ऊपर संलग्न है. किलका कर बडा चित्र देख लें). बस उनको बता दिया के आटोवाले को मंदिर का नाम बता दे और उसके सामने उतर लें. यह वही प्रसिद्ध मंदिर है जो ओणम त्योहार का कारण है. (हर ओणम पर त्योहार मनाने के लिये पहला दान मेरे घर से लिया जाता है, लेकिन केरल के नियमों के अंतर्गत मैं इसमें प्रवेश नहीं कर सकता).&#160; ऑटो समय पर आ गया और अलिंगन के साथ स्वागत कर मैं उनको अपने घर ले गया.</p>
<p align="justify">ऐसा लगता था कि हम दशाब्दियों से एक दूसरे को जानते थे. आपस में बातचीत जो शुरू हुई तो चिट्ठाजगत से लेकर प्राचीन-भारत तक और सौन्दर्यशास्त्र से लेकर दर्शन तक की चर्चा बडे ही अनायास हुई. बातचीत के लिये हम दोनों में से किसी ने कोई एजेंडा सोच नही रखा था, लेकिन जब आपसी स्नेह होता है तो कब शब्दों की कमी पडी है और कब पूर्व-योजना की जरूरत पडी है.&#160; खानपान के बीच उन्होंने अपने परिवारजनों द्वारा भेजी गई कुच चीजें मेरी श्रीमतीजी को भेंट कीं तो वे भौचक्की रह गईं. उनके लिये अनजान लोगों के स्नेह की निशानी देख वे एकदम अवाक-मूक रह गईं. </p>
<p align="justify">खानपान के बाद हम लोग ऊपर की मंजिल के मेरे सिंहासन-कक्ष (लाईब्रेरी) में चले गये. मेरे अनुरोध पर डॉ अरविंद ने वाकई में मेरा “सिंहासन” ग्रहण कर लिया. हर ओर किताबें ही किताबें. उन्होंने बहुत पसंद किया. मुझे बताना पडा कि ये सिर्फ २००० ग्रंथ&#160; हैं. मेरा संकलन ३०,००० पुस्तकों का था जिन में से १०,००० के हिसाब से दो संस्थाओं को (जिन में मैं प्राचार्य रहा था) और ८,००० अपने मित्रों को बांट दिये हैं.&#160; फिर मैं ने अपने सिक्कों के कुछ नमूने उनको दिखाये और भारतीय सिक्काशास्त्र के बारें कुछ दिलचस्प बातें बताईं. पुन: विभिन्न विषयों पर चर्चा का दौर चला तो पता न चला कि समय कैसे बीत गया.</p>
<p align="justify">डॉ अरविंद एक सुलझे हुए चिंतक हैं को कई विषयों में दखल रखते हैं. हर विषय पर उनकी एक निश्चित सोचीसमझी राय है. ऐसे व्यक्ति से घंटों बात की जा सकती है और हर पल ऐसा लगता है जैसे आप किसी विश्वविद्यालय के अनुभवी अध्यापक की ऐसी कक्षा में बैठे हों जहां ज्ञान अनवरत बांटा जा रहा है लेकिन जहां परीक्षा का कोई डर नहीं है. एक जिज्ञासु विद्यार्थी के समान मैं बैठकर ज्ञानपान करता रहा. एकाध बार विपरीत विचार रखे तो शहद के छत्ते से और अधिक सोमवर्षा हुई. कुल मिला कर यह ऐसी एक अनुभूति थी जिस में डूब कर मुझे पता ही न चला कि समय जैसी भी कोई बला हम दोनों के सर पर आसीन है. </p>
<p align="justify">अचानक डॉ अरविंद चौंके जैसे कि एक अच्छा प्यारा सा सपना एकदम उसके चरमोत्कर्ष पर टूट गया हो. जैसे ही उन्हों ने घोषणा की कि खेल खतम पैसा हजम, वापस जाने का समय तो कभी का निकल चुका है तो मेरी हालत उस बच्चे के समान थी जिस का प्यारा सा खिलौना दुकानदार ने वापस खीच लिया हो. अरविंद जी को क्या दोष देता. भलामानुस ३००० किलोमीटर दूर से आया, घर आया, समय बिताया, इससे अधिक मैं उन से क्या मांग सकता था.</p>
<p align="justify">लाइब्रेरी से निकल हम दोनों निचली मंजिल पहुंचे तो मेरी पत्नी एक लिफाफा लिये खडी थीं, ३००० किलोमीटर दूर एक अन्य नारी एवं उनके बच्चों को अपना प्यार जताने के लिये. यह है नैसर्गिक प्यार जहां स्नेह दिखाने के लिये कोई दबाव नहीं है, बल्कि जो स्नेह एक बिनदेखी नारी से मिला उसे उसी तरह वापस अभिव्यक्त किया गया. जब जब किसी को लगता है कि दोचार चिट्ठापिस्सू चिट्ठाजगत को कलुषित कर रहे हैं तब तब जरा सोच कर देखें कि चिट्ठाजगत के इस तरह के सकारात्मक पहलू कितने कितने हैं. </p>
<p align="justify">आखिर विदा कह कर अरविद जी हम को दुखी मन के साथ छोड गये कि आपस में बिताये गये थोडे से घंटे जितने थे उससे भी बहुत कम लगे! ईश्वर करे के वे जल्द ही केरल पुन: तशरीफ लायें.</p>
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		<title>जालियांवाला बाग हत्याकांड!!</title>
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		<pubDate>Wed, 14 Apr 2010 11:24:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
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		<description><![CDATA[पिछले तीन हफ्तों से रोज सुबह ५ को दौड शुरू होती है और रात को ९ बजे खतम होती है. इस चक्कर में चिट्ठाकारी और अन्य सब कुछ पीछे रह जाता है. लेकिन कल जब बेटे के चिट्ठे पर पढ़ा कि कल जालियांवाला हत्याकांड का दिवस था तो मन एक दम से दर्द से भर [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>पिछले तीन हफ्तों से रोज सुबह ५ को दौड शुरू होती है और रात को ९ बजे खतम होती है. इस चक्कर में चिट्ठाकारी और अन्य सब कुछ पीछे रह जाता है. लेकिन कल जब बेटे के चिट्ठे पर पढ़ा कि कल जालियांवाला हत्याकांड का दिवस था तो मन एक दम से दर्द से भर गया.</p>
<p>यह हत्याकांड ब्रिटिश बर्बरता का एक नंगा उदाहरण है. ब्रिटिश लुटेरे इस देश का कल्याण करने नहीं आये थे, बल्कि सोने कि चिड़िया हिंदुस्तान को लूटने के लिए आये थे. उन में से एक न्यून पक्ष हिन्दुस्तानियों का हितैषी था, लेकिन अधिकतर लोग सिर्फ पैसा बनाने के लिए आते थे. लेकिन जब देश में आजादी की मांग होने लगी तो वे बेचैन हो गए. सोने की चिडिया हाथ से निकली जा रही थी. इस बीच प्रथम विश्व युद्ध आया तो उनको लगा कि अब हिनुस्तानी लोग उनके हाथ से निकल जायेंगे. लेकिन भारतीयों ने प्रथम विश्वयुद्ध में अंग्रेजों हर तरह से मदद कि क्योंकि इसके बदले उन्होंने हिंदुस्तान को आजाद करने का वाचन दिया था. </p>
<p>प्रथम विश्वयुद्ध में लगभग ४३,००० हिन्दुस्तानी लोग अंग्रेजों के लिये शहीद हो गए. लेकिन सोने कि चिड़िया को कौन आजाद करता है. अंग्रेज अपने वादे से मुकर गए. देश में इस कारण हर और असंतोष फैल गया. आजादी के लिए हर और कोशिश होने लगी. अप्रेल १३, १९१९ को अमृतसर के जालियांवाला बाग में काफी सारे लोग एक शांत सभा के लिए एकत्रित हुए. सभा के आरम्भ होने के लगभग एक घंटे बाद जनरल डायर लगभग ९० सैनिकों के साथ वहां पहुंचा. ५० के पास रायफल थे. बिना सूचना के गोली चलने का आदेश दिया गया. 1,650 गोले दागे गए और गोली दागना सिर्फ तब रोका गया जब लगभग सारी गोलियां खत्म हो गईं.&#160; </p>
<p>कम से कम १००० लोग वहीं पर तडप तडप कर खतम हो गए. कम से कम ५०० लोग बुरी तरह घायल हो गए. उन लोगों ने मेरीआपकी खातिर अपना जीवन दान किया. लेकिन हम लोग ऐसे जीते हैं जैसे आजादी खैरात में मिली हो. </p>
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		<title>केरल में धार्मिक संघर्ष !!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2568</link>
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		<pubDate>Thu, 22 Oct 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरे चिट्ठामित्र सुरेश चिपलूनकर ने अपने आलेख भारत में ईसाई-मुस्लिम संघर्ष की शुरुआत केरल से होगी… Christian Muslim Ratio and Dominance in Kerala में केरल में भयानक संघर्ष का भय जताया है. मैं टिप्पणी द्वारा उस आलेख की गलती बताने लगा तो मुझे लगा कि एक छोटी सी टिप्पणी से काम नहीं चलेगा बल्कि एकदो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img style="display: block; float: none; margin-left: auto; margin-right: auto" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/10/Suresh_thumb.jpg" /> </p>
<p align="justify">मेरे चिट्ठामित्र सुरेश चिपलूनकर ने अपने आलेख <a href="http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/10/christian-muslim-ratio-and-dominance-in.html" target="_blank">भारत में ईसाई-मुस्लिम संघर्ष की शुरुआत केरल से होगी… Christian Muslim Ratio and Dominance in Kerala</a> में केरल में भयानक संघर्ष का भय जताया है. मैं टिप्पणी द्वारा उस आलेख की गलती बताने लगा तो मुझे लगा कि एक छोटी सी टिप्पणी से काम नहीं चलेगा बल्कि एकदो पूरा आलेख ही चाहिये. अत: सुरेश को दिये गये अपने वचन के अनुसार मेरा आलेख प्रस्तुत है!!</p>
<p align="justify">सुरेश केरल में जिस भयानक संघर्ष का जो अनुमान लगा रहे&#160; हैं वह दोतीन गलतफहमियों पर आधारित है. पहली गलतफहमी यह है कि केरल में सिर्फ 10% हिन्दू हैं और यह भी कि वे 10% लोग स्वाभिमान के साथ कह नहीं पाते के वे हिन्दू हैं. ये दोनों बातें गलत है. केरल में लगभग 60% जनता हिन्दू हैं, और केरल का औसत हिन्दू काफी स्वाभिमानी होता&#160; है. </p>
<p align="justify">उनकी दूसरी गलतफमी यह है कि केरल का धार्मिक वातावरण उत्तर के वैमनस्य भरे सांप्रदायिक वातावरण के समान है. दर असल केरल के धार्मिक वातावरण और उत्तर के वातावारण में जमीन आसमान का फरक है क्योंकि केरल हिन्दुस्तान के सबसे अधिक सहिष्णू प्रदेशों में से एक है. सहअस्तित्व लोगों की नस नस में है. इसके कुछ उदाहरण दूँ:</p>
<p align="justify">दक्षिण केरल में सैकडों साल तक कई हिन्दू मंदिरों के “भंडारी” अनिवार्यतया ईसाई लोग होते थी. (इसका एतिहासिक कारण शायद पी एन सुब्रमनियन जी या बालसुब्रमण्यम लक्ष्मीनारायण जी&#160; बता सकें क्योंकि केरल के इतिहास पर उनकी पकड मेरी पकड से अधिक है). इसका सबसे अच्छा उदाहरण है मेरे परदादा जी.&#160; हमारा परिवार 2000 साल से ईसाई हैं और मेरे परदादा जी घोर ईसाई थे लेकिन एक हिन्दू मंदिर के भंडारी भी थे. मंदिर के उपयोग में लाई जाने वाली कई वस्तुएं, खासकर तेल, पहले उन से स्पर्श करवाया जाता था और फिर उसे उपयोग में लाया जाता था. उनकी अगली पीढी से हम सब के नाम के साथ इस मंदिर का नाम भी जुड गया और मेरे नाम में जो “सी” आपको दिखता है वह उस मंदिर के नाम पर पडा है और पूरा नाम है “चेरुवेल्लेत्तु”. </p>
<p align="justify">केरल की धार्मिक सहिष्णुता का सबसे अर्वाचीन उदाहरण जरा ले लें. मैं त्रिक्काक्करा मंदिर से 1500 फीट दूर रहता हूँ. वामन अवतार को समर्पित इस मंदिर में एक प्लेटफार्म है जहां कहा जाता है कि वामन अवतार ने महाबली को पाताल भेजा था. केरलवालों का महाउत्सव ओणम इसी अवतार और इसी मंदिर से जुडा हुआ है और हर ओणम के समय यहां हर दिन लाखों रुपया खर्च करके भंडारा किया जाता है. इस कार्य के लिये ओणम से दो&#160; हफ्ते पहले दान एकत्रित किया जाता है. मंदिर के आसापास के निवासी (जिन में ईसाई और मुस्लिम परिवार बहुत अधिक हैं)&#160; उत्साह से दान देते हैं और दानराशि काफी बडी होती है.</p>
<p align="justify">दिलचस्प बात यह है कि पिछले एक दशक से अधिक समय से पहली राशि के लिये मंदिर के अधिकारी&#160; लोग मेरे घर आते हैं. उनका कहना है कि यदि पहला दान मेरे हाथ से मंदिर पहुँचे तो उस साल काफी दान मिल जाता है. केरल की धार्मिक स्नेह और सहिष्णुता की एक मिसाल है यह.</p>
<p align="justify">आप शायद कहेंगे के केरल के हिन्दू और केरल के मंदिर शायद ढीलेढाले होंगे. बात बिल्कुल उल्टी है. केरल के अधिकतर&#160; मंदिर अभी भी हिन्दू धर्म और कर्मकांड को उसके मूल रूप में बनाये हुए हैं. किसी भी बात में ढीलढाल नहीं है. कडाई इतनी है कि अभी भी (जी हां, 21वीं शताब्दी में भी) गैर हिन्दू इन मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते. हमारे घर के बगल के इस मंदिर के लिये उत्सव के समय हम रात को रास्ते की रो़शनी के लिये मुफ्त बिजली देते हैं, ओणम के समय पहला दान मुझ जैसे गैर हिन्दू का होता है, मंदिर आनेजाने वालों के साथ भोर से रात तक दुआ सलाम होती है,&#160; घरों में आपस में&#160; आनाजाना और खानापीना चलता है, लेकिन इन सब बातों के बावजूद मेरे&#160; घर से 1500 फुट दूर इस मंदिर में मेरा प्रवेश वर्जित है. एक ओर धार्मिक कट्टरता है, लेकिन दूसरी ओर सहिष्णुता है, जिसके कारण वे मेरा सहयोग खुले तौर पर वे मांगते हैं और उनको मिलता है.</p>
<p align="justify">मैं क्या कहना चाहता हूँ &#8212; यह कि हिन्दू धर्म को उसके शुद्ध स्वरूप में बनाये रखने के लिये केरल के हिन्दूओं ने बहुत अधिक योगदान दिया है. लेकिन अन्य प्रदेशों में हिन्दुओं और मुस्लीमों/ईसाईयों में जो खटपट दिखती है वह यहां नगण्य है. यहँ धर्म धर्म है, संबंध संबंध है, और वे एक दूसरे को प्रभावित नहीं करते हैं.&#160;&#160; </p>
<p align="justify">केरल के प्रसिद्ध अय्यप्पन तीर्थ के लिये जाते समय भक्तगण पहले एक मुस्लिम अवतार को प्रणाम करते हैं और फिर अय्यप्पन के दर्शन को जाते हैं. ऐसे प्रदेश के लिये सुरेश जैसे देशप्रेमी&#160; का आलेख अतिशयोक्ति से भरा हुआ है. उन्हें अभी कुछ और घूमफिर कर देशदर्शन की जरूरत है.&#160; शायद कभी वे केरल पधारेंगे और मेरे साथ रहेंगे तो इस बात को समझ जायेंगे कि यहां हिन्दू, ईसाई, मुल्लिम सभी धर्म के मामले में कट्टर हैं, लेकिन आपसी संबंधों के मामले में उदार और सहिष्णु हैं. अत: उन्होंने केरल में जिस सांप्रदायिक घमासान की संभावना बताई है उसमे थोडी सी अतिशयोक्ति आ गई है. [क्रमश:]</p>
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		<title>उन्मुक्त, सुरेश चिपलूनकर: अनुमोदन तथा कुछ और बातें!!</title>
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		<pubDate>Thu, 22 Oct 2009 05:04:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[सुरेश चिपलूनकर के चिट्ठे को हर कोई जानता है. इनके हिन्दूवादी विचारों से कई चिट्ठाकार इनका विरोध करते हैं, लेकिन मैं इस चिट्ठे के स्नेहियों में से एक हूँ क्योंकि मैं भी सुरेश के समान ही राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिये समर्पित हूँ. पिछले दिनों उन्होंने घोषणा की कि उनके सारे लेख क्रियेटिव कामन्स में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/10/Suresh.jpg"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px auto; display: block; float: none; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="Suresh" border="0" alt="Suresh" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/10/Suresh_thumb.jpg" width="436" height="104" /></a></p>
<p align="justify">सुरेश चिपलूनकर के चिट्ठे को हर कोई जानता है. इनके हिन्दूवादी विचारों से कई चिट्ठाकार इनका विरोध करते हैं, लेकिन मैं इस चिट्ठे के स्नेहियों में से एक हूँ क्योंकि मैं भी सुरेश के समान ही राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिये समर्पित हूँ. पिछले दिनों उन्होंने घोषणा की कि उनके सारे लेख क्रियेटिव कामन्स में दिये जा रहे हैं.</p>
<p align="justify">क्रियेटिव कामन्स का मतलब है कि बिना किसी अतिरिक्त&#160; अनुमति के उनके लेखों को कोई भी चिट्ठाकार अपने चिट्ठे पर छाप सकता है. सिर्फ उनके चिट्ठे पर दी शर्तों का पालन करना पर्याप्त होगा. मैं उनके इस कदम का अनुमोदन एवं हार्दिक स्वागत करता हूँ. उम्मीद है कि कई चिट्ठाकार इसी तरह अपने चिट्ठे की सामग्री उदारता से उपलब्ध करवायेंगे.</p>
<p align="justify">इस मामले में मैं उन्मुक्त जी का नाम हरेक को याद दिलाना चाहता हूँ. उनके चिट्ठे की हर सामग्री किसी के द्वारा भी पुन: छापी जा सकती है और उनकी शर्तें एकदम उदार हैं. उनका तर्क यह है कि अपनी रचना को इस तरह से खुले में छोड देने से “विचार आगे बढते हैं”. मैं उनकी इस सोच का कायल हूँ, एवं हिन्दी चिट्ठाकारों के समक्ष इस तरह का एक नमूना और आदर्श रखने के लिये उनका भी अनुमोदन करता हूँ.&#160; उनसे एवं मेरे बेटे से प्रेरणा लेकर “सारथी” के मेरे सारे आलेख क्रियेटिव कामन्स में रखे गये हैं. रवि रतलामी भी प्रशंसा के पात्र हैं जिनका चिट्ठा इसी तरह क्रियेटिव कामन्स में है.</p>
<p align="justify">इस बीच सुरेश के निम्न आलेख <a href="http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/10/christian-muslim-ratio-and-dominance-in.html" target="_blank">भारत में ईसाई-मुस्लिम संघर्ष की शुरुआत केरल से होगी… Christian Muslim Ratio and Dominance in Kerala</a> को देखा तो लगा कि यह आलेख एवं इसमें दिये गये निष्कर्ष गलत आंकडों पर आधारित है. उन से मैं ने वादा किया है कि चित्र का दूसरा पहलू सारथी पर पेश करूंगा. यह आलेख सारथी पर कल आयगा. इस बीच उपर दी गई कडी को चटका कर आप यह आलेख और सुरेश का चिट्ठा दोनों जरा देख लें. </p>
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		<title>पुलीस स्टेशन का एक और चक्कर!!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2519</link>
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		<pubDate>Fri, 02 Oct 2009 17:57:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>
		<category><![CDATA[भारत]]></category>

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		<description><![CDATA[केरल में अकसर पुलीस से मुलाकात होती रहती है: कभी हाईवे पर (जहां सघन जांच होती है) या पुलीस स्टेशन पर. आज पिताजी को खाना देकर अस्पताल से वापस आ रहा था कि पांच पुलीस वालों ने हाथ दिखाया. मैं समझ गया कि बेचारे बिन वाहन परेशान हो रहे हैं . वे लोग सुबह से [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/10/shastri1_100.jpg"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="shastri1_100" border="0" alt="shastri1_100" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/10/shastri1_100_thumb.jpg" width="100" height="171" /></a> केरल में अकसर पुलीस से मुलाकात होती रहती है: कभी हाईवे पर (जहां सघन जांच होती है) या पुलीस स्टेशन पर.</p>
<p align="justify">आज पिताजी को खाना देकर अस्पताल से वापस आ रहा था कि पांच पुलीस वालों ने हाथ दिखाया. मैं समझ गया कि बेचारे बिन वाहन परेशान हो रहे हैं . वे लोग सुबह से सडक किनारे भीड-नियंत्रण कर रहे थे और अब खाना खाने का समय हो गया था और बडे ही शिष्टाचार के साथ मुझ से&#160; अनुरोध कर रहे थे कि उनको लिफ्ट देने की कृपा करूँ. अत: तुरंत मारुति वेन को रोक कर उनका स्वागत किया. </p>
<p align="justify">दो किलोमीटर के फासले में उन से काफी अच्छी बातचीत हुई. (केरल पुलीस काफी साक्षर है, और उनके बीच स्नातक या स्नातकोत्तर की डिग्री काफी आम बात है). पुलीस स्टेशन पहुँचते पहुँचते उन सब ने अनुरोध किया कि मैं पुलीस स्टेशन पर कुछ समय बिता कर उनके वरिष्ठ अधिकारियों से मिलने के बाद ही आगे बढूँ. उनका कहना था कि मुझ जैसे लेखक से मिल कर उन सब को बडी खुशी होगी.</p>
<p align="justify">गाडी से उतर कर विशालकाय पुलीस स्टेशन पहुंचा तो वहां सब ने एक हीरो के समान मेरा स्वागत किया. मुझे लगा कि न्याय और कानून के रक्षक लोग जरूरत से अधिक मेरा आदर कर रहे हैं. </p>
<p align="justify">ड्यूटी पर उपस्थित उच्चतम अफसर के कमरे में पहुंचा कर मेरा स्वागत किया गया. लगभग एक घंटे तक इंस्पेक्टर ने मुझ से बातचीत की, कई विषयों की चर्चा की. इस बीच मैं ने देखा कि हथकडी में बंद एक आदमी को एक पुलीस वाला खोल कर संडास आदि ले गया. उसके बाद उसे खाने का पेकेट ले जाकर दिया. कोई गाली नहीं, कोई अपमान नहीं. सिर्फ उतनी कडाई जितना जरूरी. पुलीस हो तो ऐसी हो!!</p>
<p align="justify">केरल में किसी पुलीस स्टेशन के भीतर जाकर अधिकारियों के साथ समय बिताने का यह मेरा तीसरा अवसर था. पुलीस का जो चित्र लोगों के मन में है उस से एकदम भिन्न थे ये तीनों अनुभव. स्पष्ट है कि जब किसी प्रदेश में साक्षरता बढती है तो उसका असर हरेक व्यक्ति पर होता है. केरल पुलीस इसका एक अच्छा उदाहरण है.</p>
<p align="justify">आगे उन लोगों के साथ कुछ समय बिता कर कुछ चित्र खीच कर कुछ और लिखने का इरादा बन रहा है. आज तो उसके लिये निमंत्रण भी मिल गया है.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>ईसाईयों का &#8220;भाईचारा-संप्रदाय&#8221;</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2512</link>
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		<pubDate>Tue, 22 Sep 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरे आलेख सारथी अब वापस लीक पर!!&#160; और अन्तर सोहिल का प्रश्न!! में मैं ने इशारा किया था कि केरल के 2000 साल पुराने ईसाई समाज में एक से अधिक संप्रदाय हैं. मैं इन में से भाईचारा-संप्रदाय या सहोदर-सभा (Brethren) का सदस्य हूँ जो लगभग 120 साल पुराने एक नवीकरण का फल है. इसके बारें [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">मेरे आलेख <a href="http://sarathi.info/archives/2504">सारथी अब वापस लीक पर!!</a>&#160; और <a href="http://sarathi.info/archives/2508">अन्तर सोहिल का प्रश्न!!</a> में मैं ने इशारा किया था कि केरल के 2000 साल पुराने ईसाई समाज में एक से अधिक संप्रदाय हैं. मैं इन में से भाईचारा-संप्रदाय या सहोदर-सभा (Brethren) का सदस्य हूँ जो लगभग 120 साल पुराने एक नवीकरण का फल है. इसके बारें में दिनेश जी ने कल टिपियाया:</p>
<blockquote><p align="justify">हम जानना चाहेंगे आप के इस खास समुदाय की व्युत्पत्ति और उस के इतिहास के बारे में। आप ने जिज्ञासा बहुत बढ़ा दी है। जो एक सफल लेखक होने की निशानी है। (<cite><a href="http://anvarat.blogspot.com/">दिनेशराय द्विवेदी</a></cite>)</p>
</blockquote>
<p align="justify">लीजिये उत्तर हाजिर है. प्रभु ईसा के 12 शिष्यों में से संत थोमा नाम व्यक्ति ईसा के संदेश के साथ केरल के कोडुंगल्लूर में ईस्वी 40 के आसपास पहुंचे थे. तब से केरल में ईसा के अनुयाई रहते आये हैं. कालांतर में यह समाज दो भागों में बंट गया. एक शत प्रतिशत भारतीयता का पक्षधर था तो एक देश के बाहर के ईसाईयों के अनुरूप जीने का पक्षधर था. पहले समूह की आराधना-प्रार्थना-प्रवचन स्थानीय भाषा में होती है. दूसरे समूह के प्रार्थना-मंत्रोच्चारण सामान्यतया अरामिक भाषा में होती है जो ईसा और उनके 12 शिष्यों की भाषा थी.</p>
<p align="justify">1700 से 1800 ईस्वी के बीच केरल का ईसाई समुदाय इतना फल फूल गया था कि उनके बीच हर तरह की कुरीतियां और कर्मकांडों की गुलामी बुरी तरह से फैल गई थी. पुरोहित-पादरियों के बिना सांस लेना भी मुश्किल हो गया था, जबकि बाईबिल में इन बातों की कडी मनाही है. 1850 के आसपास केरल के ईसाई समूह के कई प्रभावशाली लोगों, चिंतकों आदि को लगा कि वापस बाईबिल की सादगी की ओर लौटना जरूरी है. उनके सतत प्रयत्न के कारण चार या पांच नवीकरण हुए, जिन में से एक है भाईचारा-संप्रदाय (ब्रदर्स, ब्रद्रन). इस संप्रदाय के लोगों के आपसी भाईचारे को देख कर लोगों ने उनको यह नाम दिया था जो अब एक औपचारिक नाम बन चुका है.</p>
<p align="justify">इन लोगों ने विशिष्ट शैली के गिर्जाघरों को तिलांजली देकर सामान्य हाल या आडिटोरियमों में प्रार्थनासमाज के लिये एकत्रित होना शुरू कर दिया. साकार के बदले&#160; सगुण एवं निराकार ईश्वर की आराधना पर जोर दिया. हर तरह की मूर्तिपूजा का निषेध कर दिया और लोगों से साकार ईश्वर से सीधे प्रार्थना करने को कहा गया. यहां तक कि इनके प्रार्थनालयों में सूली का प्रदर्शन भी मना कर दिया गया जिससे कहीं निराकार ईश्वर के बदले लोग सूली की ही आराधना न शुरू कर दें.&#160; विशिष्ट वस्त्रधारी पुजारी-पादरियों को भी निषेधित कर दिया और हर तरह के धार्मिक कार्य को समाज के वरिष्ट या आत्मिक समझे जाने वाले लोगों को सौंप दिया गया. </p>
<p align="justify">समाज की आत्मिक नैतिक सुरक्षा के लिये उनकी समझ के अनुसार कई बातों को वर्जित कर दिया गया. </p>
<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/09/Earring.jpg"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="Earring" border="0" alt="Earring" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/09/Earring_thumb.jpg" width="200" height="226" /></a> धूम्रपान, मद्यपान, विवाह विच्छेद, आडंबर आदि पर कडी पाबंदी लगा दी गई. आडंबर पर पाबंदी के एक घटक के रूप में स्त्रियों के लिये आभूषण वर्जित कर दिया गया. इसके पीछे एक खास कारण था: केरल के ईसाई समाज में स्त्रियों का सारा शरीर सोने से भरा रहता था.</p>
<p align="justify">चित्र में इस ईसाई महिला के कानों में&#160; असली सोने के कुंडल हैं एवं&#160; चित्र दो साल पहले लिया गया था. नवीकरण के जमाने में (1850 ईस्वी में)&#160; इस तरह के कम से कम चार से छ: कुंडल एक कान में होना जरूरी था. इनके वजन से कान खिच कर कंधे तक पहुंच जाते थे और उसे सौंदर्य की निशानी समझा जाता था. उच्चमध्यमवर्गीय ईसाई औरतें एक से दो किलो शुद्ध सोने के आभूषण सारे देह पर पहनती थी. (केरल अभी भी इस मामले में&#160; सुरक्षित है और हर और सोने के आभूषण पहनी हर धर्म की स्त्रियां दिख जायेंगी). संयुक्त परिवार हर ओर थे, और इन आभूषणों के पीछे झिकझिक हर जगह होती थी, अत: झगडे को जड से हटाने के लिये यह किया गया.</p>
<p align="justify">इन एकसौबीस सालों में यह समाज काफी बदल चुका है, लेकिन पुरोहित-पादरियों से मुक्ति, सामान्य हाल/आडिटोरियम में प्रार्थना, मूर्तिपूजा की वर्जना, आदि अभी भी जारी है. धूम्रपान, मद्यपान, विवाह विच्छेद, आदि किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कडी सामाजिक कार्यवाही के लिये पर्याप्त अपराध हैं, एवं ऐसा करने वालों के परिवारों के साथ विवाहसंबंध के लिये लोग आसानी से नहीं मिल पाते.</p>
<p align="justify">कुल मिलाकार सगुण और निराकार ईश्वर की आराधना करने वाला, रूढियों एवं कर्मकांडों से काफी हद तक मुक्त, एक समाज है सहोदर-सभा या ब्रेदरेन सभा. आज इसके लगभग 3000 हजार गिर्जे हिन्दुस्तान में हैं. इससे मिलतेजुलते नवीकरण आंदोलनों के गिर्जों की संख्या 100,000 से ऊपर है. </p>
<blockquote><li><cite><a href="http://sanjayvyasjod.blogspot.com">sanjay vyas</a></cite> आपने पिछली पोस्ट में अपने समुदाय को 2000 साल से भी पुराना बताया था, इस तरह ये विश्व के कुछ चुनिन्दा प्राचीनतम ईसाई समुदायों में शुमार होता होगा.केथलिक्स से भी पुराना. तो क्या हम सीरियन क्रिश्चियन के बारे में पढ़ रहें हैं? सच में जानने की जिज्ञासा है. साभार. </li>
</blockquote>
<p align="justify">प्रिय संजय, यदि मैं ने 2000 से भी पुराना बताया हो तो वह गलत था. केरल का ईसाई समाज 2000 साल के “करीब”&#160; पुराना है.&#160; इस कारण केरल का ईसाई समाज दुनियां के प्राचीनतम ईसाई समाजों में से एक है. सिरिया देश से कुछ ईसाई इस दौरान आकर केरल बस गये थे इस कारण सिरियन क्रिस्टियन नाम भी प्रचलित है. ऊपर के चित्र में एक सिरियन क्रिस्टियन दादीमां का चित्र है.</p>
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		<title>अन्तर सोहिल का प्रश्न!!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2508</link>
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		<pubDate>Mon, 21 Sep 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[मेरे कल के आलेख सारथी अब वापस लीक पर!!&#160; में मैं ने बताया था कि मैं जिस संप्रदाय का सदस्य हूँ उसमें हरेक को कितनी कडाई का पालन करना पडता है. इसके बारे में मेरे मित्र अन्तर सोहिल&#160; ने कल टिपियाया: मैं आपके पिछले लेख लगातार पढ रहा हूं। बहुत-बहुत बातें सीखने को मिल रही [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">मेरे कल के आलेख <a href="http://sarathi.info/archives/2504">सारथी अब वापस लीक पर!!</a>&#160; में मैं ने बताया था कि मैं जिस संप्रदाय का सदस्य हूँ उसमें हरेक को कितनी कडाई का पालन करना पडता है. इसके बारे में मेरे मित्र <cite>अन्तर सोहिल</cite>&#160; ने कल टिपियाया:</p>
<blockquote><p align="justify">मैं आपके पिछले लेख लगातार पढ रहा हूं। बहुत-बहुत बातें सीखने को मिल रही हैं। आपके समाज के बारे में भी आपके पिछले लेखों में पढा। समाज में कुरीतियां आने पर जब नवीकरण होता है तो नियम और वर्जनायें बनाई जाती हैं। लेकिन क्या (जैसे कि लगभग हर समाज या सम्प्रदाय में होता है) समय बदलने के साथ-साथ यह नहीं महसूस होता कि ये नियम व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हावी हो रहे हैं। क्या कुछ जबरदस्ती थोपी गयी वर्जनाओं में समय के साथ फेरबदल की आवश्यकता महसूस नहीं होने लगती है? जैसे आभूषण पहनना और सिनेमा थियेटर व्यैक्तिक रूचि पर अंकुश तो नही है? मैं अपना विचार आपके सम्मुख सही ढंग से नही रख पाया हूं या आपको कोई कष्ट हुआ है तो क्षमाप्रार्थी हूं।</p>
</blockquote>
<p align="justify">सारथी चिट्ठे का लक्ष्य ही हर बात पर चर्चा और शास्त्रार्थ करना है अत: इस प्रश्न से कोई कष्ट नहीं हुआ. इस तरह की बातें पूछने के लिये आप सब का स्वागत है. निम्न बिंदुओं पर ध्यान दें तो कई बाते स्पष्ट हो जायेगी:</p>
<ol>
<li>
<div align="justify">यह सच है कि हमारे संप्रदाय की कई वर्जनायें व्यक्तिगत आजादी पर हावी हो रही हैं. </div>
</li>
<li>
<div align="justify">लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि इन वर्जनाओं के कारण कई आम और नुक्सानदेह आदतें इस समाज से अभी कोसों दूर है. धूम्रपान, मद्यपान एवं विवाहविच्छेद इसके कुछ अच्छे उदाहरण हैं.</div>
</li>
<li>
<div align="justify">इन वर्जनाओं के कारण जो सामाजिक माहौल पैदा हुआ है उसने इस समाज को चिंतकों एवं लेखकों से भर दिया है.&#160; इसका सबसे अच्छा उदाहरण मैं हूँ. मेरी 70 से अधिक पुस्तकें (मलयालम भाषा में) और 7,000 से अधिक आलेख छप चुके हैं. कई पुस्तकें 1000 से 3000 पन्नों की हैं.</div>
</li>
<li>
<div align="justify">एक एक करके परिवर्तन आ रहे हैं. श्वेत वस्त्रों के बदले अब रंगबिरंगे कपडों ने स्थान ले लिया है. </div>
</li>
<li>
<div align="justify">बाकी बातें भी बदलेंगी, लेकिन बेहतर होगा कि वे धीरे धीरे बदलें जिससे समाज का कम से कम नुक्सान हो.</div>
</li>
</ol>
<p align="justify">हम एक ऐसी पीढी में रह रहे हैं जहां हर तरह की वर्जना को बुरा माना जाता है. स्वैरिता (मनमर्जी जीवन) को सही माना जाता है. लेकिन इतिहास इस बात का साक्षी है कि थोडीबहुत वर्जनायें समाज के हित के लिये जरूरी हैं. इस का परिमाण कितना हो वह हर समाज को अपनी पृष्ठभूमि के आधार पर तय करना होगा.</p>
]]></content:encoded>
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		<title>एक व्यक्तिगत बात !!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2460</link>
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		<pubDate>Sat, 08 Aug 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2460</guid>
		<description><![CDATA[प्रभु ने चाहा तो सितंबर 2009&#160; में&#160; मेरी बिटिया ‘आशा’&#160; की शादी है. चिट्ठाजगत के सारे मित्रों का स्वागत है कि वे कोचिन पधारें और वर वधू को अपना आशीर्वाद प्रदान करें! कल तक जो बच्ची मेरे लिये सिर्फ “गुडिया” थी वह आने वाले&#160; कल एक जिम्मेदार पत्नी बनने जा रही है. हम दोनों कल [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">प्रभु ने चाहा तो सितंबर 2009&#160; में&#160; मेरी बिटिया ‘आशा’&#160; की शादी है. चिट्ठाजगत के सारे मित्रों का स्वागत है कि वे कोचिन पधारें और वर वधू को अपना आशीर्वाद प्रदान करें!</p>
<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/08/Asha.jpg"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="Asha" border="0" alt="Asha" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/08/Asha_thumb.jpg" width="300" height="246" /></a> </p>
<p align="justify">कल तक जो बच्ची मेरे लिये सिर्फ “गुडिया” थी वह आने वाले&#160; कल एक जिम्मेदार पत्नी बनने जा रही है. </p>
<p align="justify">हम दोनों कल अपने बगीचे में खडे एक नई चिडिया को देख रहे थे कि उसके एक सहोदर ने एकदम एक अनौपचारिक चित्र लिया जो संलग्न है.</p>
<p align="justify">आशा बिटिया ने इसी साल एमबीए पास किया है और कोचिन के एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी में मेनेजर-ट्रेनी थी, लेकिन विवाह से पहले अंतिम एक माह नौकरी छोड मांबाप की गुडिया के रूप में एक बार और घर बैठी है.</p>
<p align="justify">उसके शादी की एक विशेष बात है. लडका लडकी दोनों ही एमबीए हैं और दोनों ही पढेलिखे परिवारों के हैं. बुद्धिजीवी हैं, जम कर किताबें पढते हैं. लेकिन&#160; विवाह-प्रस्ताव आने पर दोनों ने एक बार छायचित्र देखे, एक बार आपस में बातचीत की और उसके बाद तय किया कि वे शादी के लिये तय्यार हैं. उन्होंने यह भी कहा कि आपस में मिलनेदेखने ऐसे किसी कार्य की जरूरत नहीं है. इस निर्णय के लिए परिवारों की ओर से किसी तरह का दबाव या सुझाव नहीं दिया गया, बल्कि यह उन आधुनिक युवा युवती का निजी निर्णय है.</p>
<p align="justify">यदि आप को लगता है कि इक्कीसवी शताब्दी में युवा लोग अपने मांबाप की इच्छा को नहीं मान सकते तो उसका एक अपवाद है उन दोनों का यह निर्णय. </p>
<p align="justify">यह कोई जरूरी नहीं कि ऐसा हर परिवार में हो, लेकिन यह इस बात का एक उदाहरण है कि चाहे हम कितने भी पढेलिखे हों, उसके बावजूद यह जरूरी नहीं है कि पश्चिम का अंधानुकरण करें. बिटिया आशा के लिये आप सबके आशीर्वाद की कामना करता हूँ.</p>
<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/08/Anand.jpg"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" title="Anand" border="0" alt="Anand" align="left" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/08/Anand_thumb.jpg" width="300" height="122" /></a> </p>
<p align="justify">बेटा ‘आनंद’&#160; MBBS कर चुका है, कर्नाटका में&#160; एक अस्पताल का मेडिकल अफसर है, और आगे की पढाई कर रहा है. डाक्टरों का जीवन विचित्र है. वे हरेक को जीवनदान देते हैं लेकिन उनका अपना जीवन बडा कठिन होता है, खास कर ऐसे डाक्टरों का जीवन जो सेवा के लिये समर्पित हैं.&#160; (बेटे के साथ यह अनौपचारिक चित्र हम दोनों की&#160; एक सडक-यात्रा के दौरान लिया गया था)</p>
<p align="justify">मेरे चाचा, मेरे छोटे भाई की पत्नी, मेरी सबसे छोटी बहन और उसका पति, मेरा बेटा सभी पांचों लोग&#160; इसी पेशे में हैं. निकट के कजिन लोगों में भी लगभग दस इसी पेशे में हैं.&#160; सभी अपने पेशे के नामी डाक्टर हैं और&#160; सेवा के लिये समर्पित हैं और इन में से किसी ने भी करोडों नहीं कमाया, बल्कि लोन ले लेकर मकान बनवा रहे हैं और परेशान हो रहे हैं कि कितने साल में चुका पायेंगे.&#160; समर्पण का आनंद इन सब के जीवन में है, लेकिन उसके साथ जो “कठिन” जीवन मिलता है वह “आसान” नहीं होता है. जूलाई में मैं उसके साथ 2 हफ्ते रहा तो एक रात वह 1 बजे से 5 तक एक 70 या 80 साल के रोगी साथ बैठा रहा था जिसके लिये हरेक ने आशा छोड दी थी. सुबह उठे तो नाश्ते पर वह ऊंघ रहा था. मन को बडा दर्द हुआ, लेकिन यह है एक समर्पित डाक्टर का जीवन.</p>
<p align="justify">मेरे बच्चों के लिये आप सब के आशीर्वाद की कामना एक बार और करता हूँ. (हम दोनों &#8212; पति पत्नि &#8212; के बारे में किसी और अवसर पर लिखेंगे. हमारा घोसला खाली होने जा रहा है. अब आप लोगों के बच्चे कोचिन आयेंगे तो इस घोसले में उनकी सेवा करेंगे!!).</p>
<p align="justify">
</p>
<p align="justify">
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		<title>मार दिया जाये या छोड दिया जाये!!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2369</link>
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		<pubDate>Wed, 08 Jul 2009 07:17:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastriji</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[सारी दुनियाँ भारत को सपेरों के देश के रूप में जानती है. इतना ही नहीं मुझे लगता है कि सर्प कथाओं और सर्प-आराधाना में हम से बढ कर और कोई देश नहीं है. इन सब के बावजूद सांपों के बारें में लोगों ने इतनी गलतफहमियां पाल रखी है कि हिन्दुस्तान सांपों के लिए एकदम खतरनाक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><img style="border-right-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; display: inline; border-top-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px" border="0" align="left" src="http://english.sarathi.info/wp-content/uploads/2009/07/image-thumb.png" /> सारी दुनियाँ भारत को सपेरों के देश के रूप में जानती है. इतना ही नहीं मुझे लगता है कि सर्प कथाओं और सर्प-आराधाना में हम से बढ कर और कोई देश नहीं है. </p>
<p align="justify">इन सब के बावजूद सांपों के बारें में लोगों ने इतनी गलतफहमियां पाल रखी है कि हिन्दुस्तान सांपों के लिए एकदम खतरनाक देश बन गया है. यहां हर दिन इतने सांप मारे जा रहे हैं कि इन की कई आम प्रजातियां लगभग लुप्त हो चुकी हैं.</p>
<p align="justify">सांप दर असल प्रकृति के रखवालों में से एक है. जब तक जान को खतरा न हो तब तक इनको किसी भी तरह से नुक्सान नहीं पहुँचाना चाहिये बल्कि दक्ष लोगों के द्वारा पकडवा कर इनको आबादी से दूर छुडवा देना चाहिये.&#160; सांप से पीछा भी छूट जायगा, प्रकृति के साथ अत्याचार भी नहीं होगा.</p>
<p align="justify">सांपों के बारें में तमाम प्रकार की भ्रांतियां प्रचलित हैं और इस कारण भी लोगो सांपों का अनावश्यक संहार करते हैं. दर असल भारत में सांपों की जो सैकडों प्रजातियां हैं उन में से सिर्फ पांच हैं जो जहरीले हैं. इसका मतलब कि कोई सांप आप को दिखे तो सौ बार दिखने पर उन में से सिर्फ 5 के जहरीला होने की संभावना है, लेकिन इनके चक्कर में बाकी 95 काल के गर्त में चले जाते हैं.</p>
<p align="justify">इस मामले में हम सब के इष्ट चिट्ठाकार डा अरविंद मिश्रा और लवली कुमारी का चिट्ठा <a href="http://bhujang.blogspot.com/">भारतीय भुजंग</a> एक स्तुत्य प्रयास है जहां सांपो से जुड़ी मिथ्या बातों और भ्रमजाल से लोगों को मुक्त कराने की कोशिश चल रही है. इस चिट्ठे को बुकमार्क करना न भूलें.</p>
<p align="justify">पुनश्च: पिछले हफ्ते मेरे घर के सामने सडक पर लगबग 18 इंच लम्बा और पेंसिल के समान पतला एक सांप मैं ने और मेरी बिटिया ने देखा. हम दोनों तब तक उसकी सुरक्षा करते रहे जब तक वह झाडियों तक पहुंच नहीं गया. लोगों को लगा कि बापबेटी पागल हैं, लेकिन उनकी मूढता का हम पर कोई असर न हुआ.</p>
<p align="center"><font size="1">[Creative Commons Picture <small>by <b><a href="http://www.flickr.com/photos/benimoto/">Benimoto</a>]</b></small></font></p>
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		<title>टेलिफोन द्वारा मृत्यु??</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2243</link>
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		<pubDate>Sat, 30 May 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[लगभग 15 साल पहले ग्वालियर से कोच्चि पहुंचा तो साल भर में औसत 170 दिन बरसात के लिये अपने आप को तय्यार करना आसान नहीं था. (जी हां, यहां साल में 200 से अधिक सूखे दिन नहीं मिल पाते हैं).&#160; पानी बरसना चालू हो जाता है तो कई बार 12 घंटे लगातार बरसता है. हमारे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/05/image20.png"><img title="image" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="180" alt="image" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/05/image-thumb20.png" width="240" align="left" border="0" /></a> लगभग 15 साल पहले ग्वालियर से कोच्चि पहुंचा तो साल भर में औसत 170 दिन बरसात के लिये अपने आप को तय्यार करना आसान नहीं था. (जी हां, यहां साल में 200 से अधिक सूखे दिन नहीं मिल पाते हैं).&#160; पानी बरसना चालू हो जाता है तो कई बार 12 घंटे लगातार बरसता है.</p>
<p align="justify">हमारे घर के आसपास इतना पानी हो जाता है कि कई बार मछलियां और छोटे से कछुए हमारे आंगन में आ जाते हैं. प्रकृतिप्रेम के कारण इन सब चीजों में मुझे बहुत आनंद आता है. लेकिन एक चीज है जिस के लिये मैं तय्यार नहीं था, और वह है यहां की बिजली.</p>
<p align="justify">पश्चिमी मानसून के आरंभ में (जून), और पूर्वी मानसून (अक्टूबर के आसपास) के आरंभ में बिजली कडकती है तो ऐसा लगता है जैसे बम गिराये जा रहे हैं. बिजली गिरने से हर साल केरल में कई मौतें होती हैं. टेलिफोन एक्सचेंजों की तो खैर नहीं है और हर तरह की सुरक्षा के बावजूद हर साल सैकडों सर्किटकार्ड जल जाते हैं. </p>
<p align="justify">बरसात के समय और बिजली कडकने के दौरान टेलिफोन का उपयोग एकदम वर्जित होता है. इसके बावजूद कई लोग लापरवाही से दूरभाष का उपयोग करते हैं और बिजली गिरने के कारण बुरी तरह जल जाते है, और कई बार जिंदा नहीं बचते हैं. आज से 10 साल पहले हमारे सामने बिजली हमारे नारियल के पेड पर कडकी और मेरी आखों के सामने उसका ऊपरी हिस्सा जल गया. प्रकृति वाकई में शक्तिशाली है.</p>
<p align="justify">बिजली कुछ इलाकों में अधिक गिरती है और उन इलाकों में अधिक सावधानी रखी जाती है. ऐसे इलाकों में मकानों-ढांचों के ऊपर तडित-चालक अकसर दिख जाते हैं. सौभाग्य से दो साल पहले मेरे घर के पास बीएसएनएल का टावर आ गया है जिसकी उंचाई इतनी अधिक है कि अधिकतर बिजली सीधे उसके तडितचालक पर गिरती है. इसे देखना एक रोमांचक अनुभव होता है. हर बार लगता है, जान बची तो लाखों पाये!!</p>
<p align="justify"><a title="indian coins, ancient indian coins, numismatics" href="http://www.CoinsEncyclopedia.org" target="_blank"><font size="1">Indian Coins</font></a><font size="1"> | </font><a title="work at home, free income guide, net income guide, ad words courses, blogging for income, money for blogging, online courses, free course money making" href="http://www.Guide4Income.com"><font size="1">Guide For Income</font></a><font size="1"> | </font><a title="abc of, physics made simple, ABC of physics, simplified, guide, made simple, explained, easy articles" href="http://www.Physics4u.info"><font size="1">Physics For You</font></a><font size="1"> | </font><a title="articles for your website, free reusable articles, free content, web content, reuse web content, article bank, huge article collection" href="http://www.articlepedia.us"><font size="1">Article Bank</font></a><font size="1">&#160; | </font><a title="free india tourist guide, india tour, Indian tourism, travel guide, free travel information, visit india, taj mahal, indian history, archeology" href="http://www.indiantouristplaces.info"><font size="1">India Tourism</font></a><font size="1"> | </font><a title="comprehensive information india, indian history, customs, culture, encyclopedia, festivals, informtion, guide, free articles, free information" href="http://www.india.sarathi.info"><font size="1">All About India</font></a><font size="1"> | </font><a title="india, hindi, weblog,  Hindi blog, shastri, hindi articles, creative commons" href="http://www.sarathi.info"><font size="1">Sarathi</font></a><font size="1"> | </font><a title="english sarathi hindi blog, sarathi Shastri english" href="http://english.sarathi.info" target="_blank"><font size="1">Sarathi English</font></a><font size="1"> |</font><a title="hindi, india, indian coins in Hindi, ancient indian coins, numismatics" href="http://indiancoins.sarathi.info" target="_blank"><font size="1">Sarathi Coins</font></a>&#160; <font size="1">Picture: <small>by </small><small><b><a href="http://www.flickr.com/photos/evdaimon/">Axel Rouvin</a></b></small></font></p>
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		<title>दिनेशराय द्विवेदी (वेताल उनके चिट्ठे लिखता है)!!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2264</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2264#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 28 May 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[दिनेशराय द्विवेदी को हिन्दी चिट्ठाजगत में कौन नहीं पहचानता है!! उनके आलेख तो लोगों को ऐसे आकर्षित करते हैं जैसे शहद का प्रवाह हो रहा हो! उन्होंने जो अलख जगा रखी है उस से हर कोई कमोबेश लाभान्वित हुआ है. “तीसरा खंबा” में उनके आलेख क्या आप अपने लिए एक काम करेंगे? को पढते ही [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/05/image24.png"><img title="image" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="220" alt="image" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/05/image-thumb24.png" width="180" align="left" border="0" /></a> दिनेशराय द्विवेदी को हिन्दी चिट्ठाजगत में कौन नहीं पहचानता है!! उनके आलेख तो लोगों को ऐसे आकर्षित करते हैं जैसे शहद का प्रवाह हो रहा हो! उन्होंने जो अलख जगा रखी है उस से हर कोई कमोबेश लाभान्वित हुआ है.</p>
<p align="justify">“तीसरा खंबा” में उनके आलेख <a href="http://teesarakhamba.blogspot.com/2009/05/blog-post_27.html" target="_blank">क्या आप अपने लिए एक काम करेंगे?</a> को पढते ही मुझे लगा कि सारथी के वे पाठक जिन्होंने उनका कानून-संबंधी चिट्ठा “तीसरा खंबा” अभी तक नही देखा है वे एक बहुत उपयोगी ज्ञानस्रोत से वंचित हैं. हां, यदि कुछ हल्कीफुल्की शैली में गंभीर विषय पढना हो तो दिनेश जी के पिटारे में <a href="http://anvarat.blogspot.com/" target="_blank">अनवरत</a> नामक एक और बिलाग है जिस पर बडे ही तंतरभरे शब्दों में उन्होंने जनतंतर की कथा बांची है. (एक वेताल मुझे भी मिल जाता तो मेरी भी मेहनत खतम हो गई होती. अनुमान है कि अनवरत का सहाई-वेताल आजकल उनके सारे काम कर देता है और वे आराम फर्मा रहे हैं).</p>
<p align="justify">तीसरा खंभा चिट्ठे के द्वारा दिनेश जी भारत के न्यायकानूनों एवं न्यायालयों से संबंधित जरूरी जानकारियां देते हैं. इसके द्वारा वे लोगों को जागृत करने, उनको उनके अधिकार समझाने, और इन सब के फलस्वरूप भारतीय न्यायकानून व्यवस्था में आमूल परिवर्तन लाने के लिये एक और योगदान करने का कार्य करते हैं. दिनेश जी जटिल विषयों को ऐसी शैली में प्रस्तुत करते हैं कि पढने वाले को लगता है कि वह कोई कहानी सुन रहा हो. आलेख के खतम होने के बाद एकदम याद आता है कि यह एक कठिन विषय की एकदम सरल प्रस्तुति है. </p>
<p align="justify">किसी भी देश की जनता को सशक्त बनाने के लिये यह जरूरी है कि उनको उनके हक बताये जायें और उनको सोचने के लिये प्रेरित किया जाये. दिनेश जी ये दोनों कार्य अपने चिट्ठे के द्वारा कर रहे हैं, और उसके साथ साथ पाठकों की शंकाओं का समाधान कर कई लोगों की मदद कर रहे हैं. इस निस्वार्थ देश-सेवा के लिये&#160; समर्पित इस सच्चे भारतपुत्र को मेरा अनुमोदन और अभिवादन!!</p>
<p align="justify">उनके चिट्ठे को आज ही बुकमार्क करना न भूले. प्रस्तुत है <a href="http://teesarakhamba.blogspot.com" target="_blank">तीसरा खंबा</a> !!</p>
<p align="justify">&#160;</p>
<p align="justify">
</p>
<p align="justify">
<p align="center"><a title="indian coins, ancient indian coins, numismatics" href="http://www.CoinsEncyclopedia.org" target="_blank"><font size="1">Indian Coins</font></a><font size="1"> | </font><a title="work at home, free income guide, net income guide, ad words courses, blogging for income, money for blogging, online courses, free course money making" href="http://www.Guide4Income.com"><font size="1">Guide For Income</font></a><font size="1"> | </font><a title="abc of, physics made simple, ABC of physics, simplified, guide, made simple, explained, easy articles" href="http://www.Physics4u.info"><font size="1">Physics For You</font></a><font size="1"> | </font><a title="articles for your website, free reusable articles, free content, web content, reuse web content, article bank, huge article collection" href="http://www.articlepedia.us"><font size="1">Article Bank</font></a><font size="1">&#160; | </font><a title="free india tourist guide, india tour, Indian tourism, travel guide, free travel information, visit india, taj mahal, indian history, archeology" href="http://www.indiantouristplaces.info"><font size="1">India Tourism</font></a><font size="1"> | </font><a title="comprehensive information india, indian history, customs, culture, encyclopedia, festivals, informtion, guide, free articles, free information" href="http://www.india.sarathi.info"><font size="1">All About India</font></a><font size="1"> | </font><a title="india, hindi, weblog,  Hindi blog, shastri, hindi articles, creative commons" href="http://www.sarathi.info"><font size="1">Sarathi</font></a><font size="1"> | </font><a title="english sarathi hindi blog, sarathi Shastri english" href="http://english.sarathi.info" target="_blank"><font size="1">Sarathi English</font></a><font size="1"> |</font><a title="hindi, india, indian coins in Hindi, ancient indian coins, numismatics" href="http://indiancoins.sarathi.info" target="_blank"><font size="1">Sarathi Coins</font></a></p>
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		</item>
		<item>
		<title>भाटिया जी की कमी अखर रही है!!</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2259</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2259#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 27 May 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[लगभग सभी चिट्ठाप्रेमी कुछ चिट्ठों को नियमित रूप से पढते हैं. मेरे लिये राज भाटिया&#160; जी के चिट्ठे जरूरी चिट्ठों में से एक है क्योंकि उन के लिये मेरे दिल में जगह एकदम विशेष&#160; है. कल सारथी चिट्ठे पर उनकी टिप्पणी आई तो मैं बहुत उत्साहित हो गया, लेकिन दौडा दौडा उनके चिट्ठों पर गया [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify"><a href="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/05/image23.png"><img title="image" style="border-top-width: 0px; display: inline; border-left-width: 0px; border-bottom-width: 0px; margin: 0px 40px 0px 0px; border-right-width: 0px" height="165" alt="image" src="http://sarathi.info/wp-content/uploads/2009/05/image-thumb23.png" width="220" align="left" border="0" /></a> लगभग सभी चिट्ठाप्रेमी कुछ चिट्ठों को नियमित रूप से पढते हैं. मेरे लिये <cite><a href="http://parayadesh.blogspot.com/">राज भाटिया</a></cite>&#160; जी के चिट्ठे जरूरी चिट्ठों में से एक है क्योंकि उन के लिये मेरे दिल में जगह एकदम विशेष&#160; है.</p>
<p align="justify">कल सारथी चिट्ठे पर उनकी टिप्पणी आई तो मैं बहुत उत्साहित हो गया, लेकिन दौडा दौडा उनके चिट्ठों पर गया तो पता चला कि चिट्ठों पर वही पुराने आलेख पडे हैं, और इसका मतलब है कि वे वापस नहीं पहुँचे हैं.</p>
<p align="justify">पिछले कुछ महीनों में टिप्पणियों एवं पत्रव्यवहार दारा भाटिया जी से काफी सारे विषयों पर बडी बौद्धिक चर्चा हुई. हर बार कुछ न कुछ सीखने को मिला. एक बार तो एक प्रश्न जिसका जवाब हफ्तों से नहीं मिल रहा था वह उनके एक पत्र में मिल गया. हर चिट्ठाकार को प्रोत्साहित करने के लिये, दिशा देने के लिये, परामर्श देने के लिये, यहां तक कि आवश्यक हास्य के लिये भी उनका समर्पण तारीफे काबिल है.</p>
<p>भाटिया जी का हर रोम भारत-प्रेम से ओतप्रोत है एवं जर्मनी में हर क्षण वे देश की याद और देश की उन्नति की कामना के साथ बिताते हैं. भारती आदर्श एवं भारतीय मूल्यों को वे कस कर पकडे हुए हैं एवं हर मौके पर वे इन चीजों का समर्थन और अनुमोदन करते हैं. लगभग हर गंभीर चिट्ठे पर उनकी विश्लेषणात्मक टिप्पणी हर दिन दिख जाती है.</p>
<p>मुझे शिकायत है चिट्ठे पर उन्होंने बूझो तो जानें के द्वारा चिट्ठाकरों को एक साथ बांध दिया था, कि अचानक उनको हिन्दुस्तान आना पडा. तब से उनकी चिट्ठाकारी बंद है. उम्मीद है कि वे जल्दी ही वापस पहुंच कर अपनी कलम चलाने लगेंगे.</p>
<p align="justify">
</p>
<p align="justify">
<p align="center"><a title="indian coins, ancient indian coins, numismatics" href="http://www.CoinsEncyclopedia.org" target="_blank"><font size="1">Indian Coins</font></a><font size="1"> | </font><a title="work at home, free income guide, net income guide, ad words courses, blogging for income, money for blogging, online courses, free course money making" href="http://www.Guide4Income.com"><font size="1">Guide For Income</font></a><font size="1"> | </font><a title="abc of, physics made simple, ABC of physics, simplified, guide, made simple, explained, easy articles" href="http://www.Physics4u.info"><font size="1">Physics For You</font></a><font size="1"> | </font><a title="articles for your website, free reusable articles, free content, web content, reuse web content, article bank, huge article collection" href="http://www.articlepedia.us"><font size="1">Article Bank</font></a><font size="1">&#160; | </font><a title="free india tourist guide, india tour, Indian tourism, travel guide, free travel information, visit india, taj mahal, indian history, archeology" href="http://www.indiantouristplaces.info"><font size="1">India Tourism</font></a><font size="1"> | </font><a title="comprehensive information india, indian history, customs, culture, encyclopedia, festivals, informtion, guide, free articles, free information" href="http://www.india.sarathi.info"><font size="1">All About India</font></a><font size="1"> | </font><a title="india, hindi, weblog,  Hindi blog, shastri, hindi articles, creative commons" href="http://www.sarathi.info"><font size="1">Sarathi</font></a><font size="1"> | </font><a title="english sarathi hindi blog, sarathi Shastri english" href="http://english.sarathi.info" target="_blank"><font size="1">Sarathi English</font></a><font size="1"> |</font><a title="hindi, india, indian coins in Hindi, ancient indian coins, numismatics" href="http://indiancoins.sarathi.info" target="_blank"><font size="1">Sarathi Coins</font></a></p>
]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>खस: किसी ने सुना है क्या?</title>
		<link>http://sarathi.info/archives/2231</link>
		<comments>http://sarathi.info/archives/2231#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 26 May 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://sarathi.info/archives/2231</guid>
		<description><![CDATA[इसी तरह लुप्त होती एक चीज है खस का अत्तर. इसका एक तोला आप 25 रुपये से 1000 रुपये तक का खरीद सकते हैं. इसे भी शरीर पर सुबह लगाने पर शाम तक लोग पूछते रहते हैं कि यह भीनी भीनी सुगंध कहां से आ रही है. दो तोला खस साल भर काम आ जाता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">इसी तरह लुप्त होती एक चीज है खस का अत्तर. इसका एक तोला आप 25 रुपये से 1000 रुपये तक का खरीद सकते हैं. इसे भी शरीर पर सुबह लगाने पर शाम तक लोग पूछते रहते हैं कि यह भीनी भीनी सुगंध कहां से आ रही है. दो तोला खस साल भर काम आ जाता है.</p>
<p align="justify">खस का अत्तर लगाने वालो को सकून देता है, मानसिक तौर पर ठंडाई की अनुभूति देता है, और मन को स्वस्थ रहता है. इसके मनोवैज्ञानिक कारण हैं, लेकिन शायद औषधि स्तर पर भी कई कारक हैं. अफसोस यह है कि कद्रदानों के अभाव में खास का अच्छा अच्छा अत्तर लगभग लुप्त सा हो गया है. </p>
<p align="justify">अच्छे किस्म का अत्तर खस के अच्छे गुणों वाले जडों से बनाया जाता है और उसको हलके चंदन या गुलाब के अत्तर का पुट दिया जाता है. इससे अत्तर का तीखापन कम होकर भीना भीना सा गंध देने लगता है. अत्तर अच्छी किस्म का हो तो आप के आसपास के लोगों को यह महक दिन भर मिलती रहेगी जबको आप को अगले स्नान के समय तक यह महक मिलती रहेगी.</p>
<p align="justify">मेरा सुझाव है कि मेरे पाठकों में से जो लोग भारतीय चीजों के कद्रदान हैं वे कम से कम एक बार अपने शहर के किसी अच्छे अत्तार से एक तोला खस की उम्दा किस्म का अत्तर खरीदें और प्रयोग करें. बस स्नान करने के बाद बहुत ही हल्के से अपने छाती, गर्दन, और हाथों पर लगा लें. अत्तर की कम से कम मात्रा का प्रयोग पर्याप्त रहता है.</p>
<p align="justify">अधुनिक तकनीकी ने एक से एक उत्तर सुंगंधद्रव्य बनाये हैं. उनसे मेरा न तो कोई विरोध है, न ही परहेज. लेकिन उनकी सुंगंध में हमें उन देशी अत्तरों को नजरअंदाज नहीं कर देना चाहिये जिनके गंध को कोई भी अभी तक खतम नहीं कर सका है. इनका उपयोग स्वास्थ्य के लिये अच्छा होगा, और देशी उद्योगों को बल भी मिलेगा.</p>
<p align="justify">&#160;</p>
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		<title>चंदन का तेल: नाम सुना है क्या?</title>
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		<pubDate>Mon, 25 May 2009 23:30:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>Shastri JC Philip</dc:creator>
				<category><![CDATA[परिचय]]></category>

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		<description><![CDATA[ग्वालियर शहर का “महाराज बाडा” शहर का जानामान बाजार है. राजेमहाराजाओं के समय से महाराज-बाडा बाजार का केंद्रबिंदु रहा है.&#160; बीचोंबीच एक बगिया है जिसका अच्छा रखरखाव नगरपालिका करती है.&#160; कई एकड में फैले इस गोलाकार बाजार में छ: सडकें आकर मिलती हैं और हर सडक के दोनों ओर बाजार हैं. कुल मिला कर कहा [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="justify">ग्वालियर शहर का “महाराज बाडा” शहर का जानामान बाजार है. राजेमहाराजाओं के समय से महाराज-बाडा बाजार का केंद्रबिंदु रहा है.&#160; बीचोंबीच एक बगिया है जिसका अच्छा रखरखाव नगरपालिका करती है.&#160; कई एकड में फैले इस गोलाकार बाजार में छ: सडकें आकर मिलती हैं और हर सडक के दोनों ओर बाजार हैं. कुल मिला कर कहा जाये तो महाराज बाडे पर हर चीज उपलब्ध है.</p>
<p align="justify">मैं जब भी ग्वालियर जाता हूँ तो यहां काफी समय बिताता हूँ.&#160; यहां पुराने जमाने के अत्तारों की लगभग पांच दुकानें हैं जहां जाना मैं अपने लिये जरूरी समझता हूँ. आज से 20 साल पहले तक इन अत्तारों के पास चंदन का तेल मिलता था जो इत्रसुंगंधियों का राजा है.&#160; बस सुबह अपने बदन पर हलके से लगा लीजिये, शाम तक लोग पूछते रहेंगे कि चंदन किसने लगाया है. एक तोला चंदन का तेल साल भर चल जाता था.</p>
<p align="justify">अब चंदन का तेल 100,000 रुपया लिटर हो गया है, और चंदन के नाम पर जो बेचा जाता है वह 999 भाग गुलाब का इत्र और एक भाग चंदन का तेल होत है. कीमत गुलाब के इत्र से दस गुना होती है और इस “चंदन”&#160; की “खुशबू” सिर्फ अत्तार के पर्स में जाती है. असली चंदन का तेल आजकल देश में शायद ही कहीं बिकता हो. </p>
<p align="justify">चंदन की लकडी को भाप देकर यह तेल निकाला जाता है. अनुमान है कि एक किलो पकी लकडी 200 ग्राम से अधिक तेल प्रदान करती है. यह लकडी सिर्फ केरल और कर्नाटका के जंगलों में पाई जाती है जहां ठेकेदार लोग और माफिया मिलकर काफी लकडी चोरी करते हैं.&#160; सरकार नियमित रूप से इन जंगलों से चंदन की लकडी काट कर तेल-कारखानों को नीलाम करती रहती है, लेकिन समानांतर जंगल से चोरीचपाटी भी चलती रहती है. वीरप्पन चंदन का एक बहुत बडा स्मगलर था.</p>
<p align="justify">चंदन के जंगल खतम होते जा रहे हैं. आज चंदन का सिर्फ नाम चल रहा है, तेल किसी ने नहीं देखा, कल नाम से भी कोई इनको नहीं जानेगा. अफसोस की बात यह है कि चंदन को बडे आराम से दक्षिणभारत के घरों में उगाया जा सकता है लेकिन लोग ऐसा नहीं करते क्योंकि आप अपने खुद के उगाये पेड को आप काटबेच नहीं सकते. सरकारी कर्मचारी पके पेड को औनेपौने दामों पर काट ले जाते हैं. </p>
<p align="justify">इस देश मे हर जगह हर प्रकार की नीतियों में एक बदलाव जरूरी है.</p>
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<p align="center"><font size="1"><small></small></font></p>
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