Posted January 10th, 2011 by Shastri JC Philip
जनवरी एक को हमारे प्रार्थना समाज में सर्वदेशीय उन्नति एवं प्रगति के लिये हम एकत्रित हुए तो एक सज्जन ने एक दिलचस्प बात कही. वे बोले कि हर नये साल वे कुछ न कुछ निर्णय जरूर लेते हैं, लेकिन कभी भी उन निर्णयों का पालन नहीं कर पाते. इस कारण उन्होंने तय किया है कि इस साल वे किसी भी तरह का निर्णय नहीं लेंगे!
मेरे मन में एकदम से दो बातें कौंध गईं. पहली बात – उन्होंने जो किया वह क्या एक तरह का निर्णय नहीं था? बिल्कुल था. हां उस निर्णय का सार यह था कि वे इस साल आगे बढने के लिये कोई भी सक्रिय कोशिश नहीं करेंगे. दूसरे शब्दों में कहा जाये तो उन्होंने विफलता के लिये निर्णय ले लिया था. एक उदाहरण देकर इसे स्पष्ट किया जा सकता है. मान लीजिये कि दो मित्र ऊंचीकूद की तय्यारी कर रहे हैं. उन में से एक दोस्त बाकायदा धागा बांध कर उसके ऊपर से कूदता है. हर सफलता पर वह धागे को कुछ ऊचा करता जाता है.
दूसरा मित्र बिना निशान आदि लगाये कूदता है. हर बार वह और अधिक उत्साह के साथ कूदने की कोशिश करता है. इस तरह साल भर वे दोनों ऊंचीकूद की तय्यारी करते रहते हैं. साल के अंत में प्रतियोगिता होती है. दोनों कूदते हैं. फल क्या होगा?
जो व्यक्ति बिना किसी लक्ष्य के कूदता है, वह साल भर के परिश्रम के बावजूद कोई खास तरक्की नहीं कर पाता है, लेकिन जो व्यक्ति लक्ष्य के साथ कूदता है वह बहुत अधिक ऊचाई तक चला जाता है. जीवन के हर पहलू में हमारा लक्ष्य बहुत बदलाव लाता है.
आप सब के लिये मेरी कामना है कि सन २०११ आप के लिये बहुत ऊचे पहुंचने का साल निकले!
Posted October 28th, 2010 by Shastri JC Philip
आज एक पत्रिका पढ रहा था तो एक बात बडी खटक गई. लेख प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी के बारे में था. लेखक का कहना था कि प्रधान-मंत्री से बडी उम्मीदें थीं, लेकिन वे यह नहीं कर पाये या वह नहीं कर पाये. पढ कर बडा विचित्र लगा.
आप न वह प्रतियोगिता देखी होगी जिसमें आदमी को कमर तक एक बोरी में डाल कर कमर पर उसे बांध दिया जाता है. अब उस से दौडने को कहा जाता है. कोई भी व्यक्ति दो कदम से आगे नहीं बढ पाता है. दर्शक लोग तमाम तरह की बाते कहते हैं कि ऐसा करो या वैसा करो. कुछ बेवकूफ आप बोरियों में कूद जाते हैं, कमर पर बंधवा लेते हैं और दो कदम के बाद ऐसे गिरते हैं कि आगे कभी किसी को कोई सुझाव न देने की सोच कान पकड लेते हैं.
यह इस देश की विडंबना है कि जिस आदमी को भी जिम्मेदारी के पद पर बैठा दिया जाता है उसे कोई भी निर्णय लेने के लिये सौ लोगों के अनुमति की जरूरत होती है. दायें जाओ तो एक सहयोगी पार्टी नारज होती है, बायें जाओ तो दूसरी, सीधे जाओ तो तीसरी. कहीं न जाओ तो जनता नाराज होती है. अफसोस यह है कि सहयोगी न हों तो सरकार नहीं “बन” सकती, लेकिन सहयोगी हों सरकार नहीं “चल” सकती! हां किनारे खडे लोग एक से एक सुझावे देते जाते हैं क्योंकि वे कभी पाले में नहीं उतरे हैं. सुझाव देने के लिये न तो अकल की जरूरत होती है न समझ की.
Posted March 24th, 2010 by Shastri JC Philip
प्रभु की दया से हम सब लगभग सामान्य लोग हैं। किसी तरह की विकलांगता का अनुभव नहीं करते है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि समाज का एक बहुत बडा तबका जो पूर्ण रूप से सामान्य नहीं है उनकी बडी उपेक्षा होती है। मैं ने इस बात को पिछले तीन महीनों में अच्छी तरह महसूस किया है।
तीन महीने पहले डाक्टर बेटे ने पहचान लिया कि मुझ में डायबटीज के लक्षण दिखने लगे हैं। बस आननफानन में जांच करवाई और और तमाम तरह के प्रतिबंध लगा दिये। फिलहाल मैं ने सीमा को हल्के से पार किया है लेकिन उसका कहना है कि अब यहीं बने रहने के लिये फलमिठाई, मीठी चाय, ठंडे पेय आदि को एकदम तिलांजली देना जरूरी है। मैं एक अनुशासित व्यक्ति हूं अत: सब कुछ मान लिया। लेकिन अब परेशानी यह है कि किसी के घर जाओ तो न तो चाय पी सकते हैं न मिठाई खा सकते है। सेवचिवडा खाकर कब तक आदमी जी सकता है।
जीवन की इस विकलांगता के कारण अब मिठाई की दुकान, फलों की दुकान, बिस्कुटटाफी की दुकान आदि को देखते ही डर लगने लगता है। अपनी असहायता पर रोना आता है। लेकिन उसके साथ साथ एक बात और याद आती है – समाज में एक बहुत बडी संख्या में लोग किसी न किसी तरह से विकलांगता का अनुभव करते हैं, लेकिन हम उनको सुविधा मुहैया कराने के नाम पर चुप्पी मार जाते हैं।
अधिकतर रेल्वे स्टेशनों पर अभी भी व्हीलचेयर को प्लेटफार्म पर चढानेउतारने के लिये अलग से सुविधा नहीं है। एकाध जगह है तो उस की जम कर उपेक्षा होती है। पिछले दिनों आलुवा स्टेशन पर गया तो वहां बाकायदा व्हीलचेयर चढाने के लिये घिसलपट्टी नुमा सुविधा बना रखी है, लेकिन उसके सामने इतने सारे मोटरसाईकिलें खडी कर दी जाती हैं के दस मोटरसाईकिलों को हटाने के बदल व्हीलचेयर को उस पर बैठे विकलाग सहित सीढियों पर उठा कर ले जाना आसान होता है।
कुछ साल पहले एक नेत्रहीन मित्र ने, और उस के कुछ समय बाद कमर से नीचे लकवे से पीढित व्हीलचेयर आसीन एक मित्र ने, मुझे टोका था कि “तुम सामान्य लोग यह भूल जाते हो कि हम भी मनुष्य हैं। तुम जरा सी सुविधा दे दो तो हम आसमान छू लें”। आज यह बात साफ समझ में आ रही है। [Pic Credit]
Posted February 14th, 2010 by Shastri JC Philip
आज एक मित्र का ईपत्र आया कि उन्होंने गूगल एडसेंस के लिए अप्लाई किया लेकिन गूगल ने उसे निरस्त कर दिया. गूगल के पत्र में उन्होंने कहा है कि वे हिंदी चिट्ठों के लिए विज्ञापन स्वीकार नहीं करते. मित्र जाना चाहते थे कि ऐसा क्यों हुआ जबकि एक साला पहले गूगल हिंदी चिट्ठों को स्वीकार करता था.
दोस्तों, आदमी का लालच कई बार सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को खत्म कर देती है. गूगल के साथ मामला यही है. किसी ज़माने में गूगल हिन्दीभाषी चिट्ठों को विज्ञापन के लिए स्वीकार करता था, लेकिन चिट्ठाकार भाई लोग जम कर अपने चिट्ठों पर दिख रहे विज्ञापनों परा चटका लगा कर पैसा सूतने लगे. वे भूल गए कि गूगल के हाथ बड़े लम्बे हैं.
आप जिस संगणक से अपने गूगल विज्ञापन की आय को जांचते हैं उसी आई पी नम्बर से जब क्लिक जाने लगे तो गूगल ने पहचान लिया कि आप खुदा ही दुकानदार और खुद ही ग्राहक का काम कर रहे हैं. अंधा बांटे रेवड़ी, आपन आपन को देता जाए अंधे के लिए सही है लेकिन गूगल के लिए नहीं.
चूँकि कुछ हिंदी चिट्ठे जम कर ऐसा कर रहे थे, उसकी सजा सबा को मिल रही है. गेंहू के साथ घुन भी पिस जाता है.