पिछले दिनोँ सुरेश चिपलूनकर ने इशारा किया था कि केरल मेँ एक नये प्रकार का जिहाद चल रहा है. समयाभाव के कारण अभी तक इस विषय पर लिख नहीँ पाया था.
जैसा मैँ ने अपने आलेखोँ (केरल में धार्मिक संघर्ष !!, केरल में मुस्लिम-ईसाई संघर्ष??) में कहा था, धार्मिक मामलों में केरल हिन्दुस्तान का सबसे सहिष्णू प्रदेश है. इस सहिष्णुता का फायदा उठा कर ईसाई और हिन्दू लडकियों को मुस्लिम बनाने के एक नये तरीके को सामान्यतया “लव-जिहाद” कहा जाता है. तरीका यह है कि मुस्लिम लडके हिन्दू और ईसाई लडकियों को जान बूझ कर प्रेम-पाश में फंसाते हैं और विवाह के पहले उन लडकियों का धर्म बदल दिया जाता है.
यह बीमारी केरल में इतनी अधिक हो गई है कि मेरे जानपहचान की कई ईसाई लडकियां इस पाश में फंस चुकी हैं. अनौपचारिक अनुमान है कि इस तरीके को अपनाने के कारण कम से कम 5000 ईसाई लडकियां और 5000 हिन्दू लडकियां मुस्लिम बन चुकी हैं. मेरे करीबी परिवारों की कम से कम दो लडकियों को उनके परिवार खो चुका है. अफसोस की बात है कि दोनों लडकियां अपने से बहुत कम शिक्षित एवं अपने बौद्धिक स्तर पर अपने से काफी नीचे स्तर के लडकों के साथ अपना घर छोड कर गई हैं. धर्म बदला तो बदला, शादी की तो की, लेकिन ऐसे बेमेल लडकों के साथ की सारा जीवन मानसिक नरक बना रहेगा. परिवार को छोड देने के कारण अपने लोगों से मिलनाजुलना भी नहीं हो पायगा.
धार्मिक-सामाजिक सहिष्णुता अच्छी बात है, लेकिन जिस तरह से अच्छी से अच्छी दवा का भी पार्श्वफल बुरा होता है उसी तरह सहिष्णुता का एक बुरा फल है यह. कई मित्र कहेंगे कि इसका हल है कि जम कर इन जिहादियों के साथ मारपीट की जाये. लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि यदि कोई व्यक्ति कानूनन तरीके से अवांछित कार्य करता है तो उसे न तो कानून की सहायता से सीधा किया जा सकता है, न बलप्रयोग के द्वारा. बलप्रयोग करने जायेंगे तो कानून आपकी खबर ले लेगा और जिसने जिहाद चलाया है उसे सुरक्षा मिल जायगी. इतना ही नहीं प्रेमपाश फैलाने वाले कुछ मुस्लिम युवाओं के साथ हिंसा की जाये तो इसके कारण ईसाई या हिन्दू लडकियों की आंख नहीं खुल जायगी. आंखें ज्ञान के द्वारा खोली जाती हैं, न कि हिंसा के द्वारा.
सभ्य समाज में शिक्षादीक्षा, जानकारी का प्रसार अदि ऐसे अस्त्रशस्त्र हैं जिनकी मदद से यह कार्य होना चाहिये. केरल में यह कार्य कुछ साल पहले शुरू हो चुका है. इसके लिये अलग अलग लोगों ने अलग अलग प्रकार के ज्ञान-आधारित हथियार चुने हैं. मैं जब इस कार्य लिये मैदान में कूदा तो मैं नें (जैसा होना था) शास्त्रार्थ का सहारा लिया.
पहले और दूसरे चित्र में आप मुझे देख सकते हैं जहां मैं मलयालम भाषा में शास्त्रार्थ करते हुए दिख रहा हूँ. बगल के तीसरे चित्र में आप मेरा विरोध करने वाले मुस्लिम वक्ता को देख सकते हैं. इस शास्त्रार्थ के बाद मैं ने कई बार उनको पुन: सबके समक्ष इसी तरह शास्त्रार्थ करने के लिये निमंत्रण दिया लेकिन उन्होंने कभी भी उसे स्वीकार नहीं किया.
सभ्य समाज की मांग सभ्य तरीकों की है, मारपीट की नहीं. कर्नाटका के अंग्रेजी-शाराबखाने में लडकियों के साथ मारपीट के बाद लडकियों द्वारा शराब-पान बंद नहीं हुआ. हिसा से कुछ नहीं होताजाता है.
लेकिन आप कहेंगे कि सभ्य तरीकों से समस्या पूरी तरह हल नहीं होती. सही है. लेकिन यह तरीके का दोष नहीं है. कोई भी ऐसा तरीका नहीं है जिसके द्वारा ऐसी समस्याओं का पूर्ण हल निकल सके. ऐसा होता तो आज दुनियां अपराध से एकदम मुक्त होती.
लव-जिहाद एक वास्तविकता है. यह केरल से आरंभ हुई है क्योंकि केरल हर तरह से सहिष्णु है. इसका हल यह है कि जिस तरह अपने बच्चों को सुरक्षित तरीके से सडक पर चलना सिखाते हैं उसी तरह हम अपने बच्चों को लव-जिहाद के यथार्थ से परिचित करवायें.
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