Posted July 1st, 2007 by Shastri JC Philip
मेरे गुरुजन हमेशा कहा करते थे कि शब्दों मे जादू है. जिसका शब्द-भण्डार समर्थ है, वह गंभीर से गंभीर विषय गवांरों में गंवार को भी उसकी भाषा में समझा सकता है. लेकिन जिसके पास शब्द भण्डार नहीं है, वह विद्वानों मे विद्वान को भी एक छोटी सी बात नहीं मनवा सकता है. डांटडपट एवं सजा देकर उन्होंने हमे शब्द सिखाये. हम उनके डंडे से बहुत डरते थे. लेकिन पांच दशाब्दी शब्द-सारथी के रूप में पाच से अधिक भाषाओं का उपयोग करने के बाद मैं सिर्फ एक बात कह सकता हूं: मेरे अध्यापकों ने शब्दभण्डार के द्वारा मुझे जीवनदान दिया. मैं उनका यह ऋण कभी नहीं उतार पाऊंगा. Read the rest of this entry »
Posted June 30th, 2007 by Shastri JC Philip
1960 आदि में हमारे हिन्दी अध्यापक हमें डंडा (स्केल) मार मार कर सिखाते थे. हिन्दी उनका प्रेम था, सखि थी, साधना थी. वे हमको स्टूल पर खडा करते थे, हाथ ऊपर करके खडा करते थे, विकट परिस्थितियों में मुर्गा भी बना देते थे. उनसे हमारा सम्बन्ध स्नेह-नफरत का था. कौन अपने मुर्गा-चालक से स्नेह ही स्नेह कर सकता है. लेकिन इन अध्यापकों ने हमारी जिंदगी बना दी, हमें जीवनदान दिया. यदि हिम्मत के साथ हिन्दी के चार वाक्य बोल पाते हैं तो यह उनकी देन है, वरदान है.
शब्दों के सही प्रयोग पर वे लोग बहुत जोर देते थे. शब्द में जीवन है, यदि वे आपके नियंत्रण में है तो. नहीं तो अनजाने ही वे कातिल बन जाते हैं. इस शृंखला में प्रस्तुत है कुछ आम शब्द एव उनके सहीगलत प्रयोग के बारे में जानकारी. इनमें से अधिकतर को मैं ने हिन्दी चिट्ठों से लिया है.
| गलत उच्चारण/रचना |
सही शब्द |
| अधीन |
आधीन |
| अजमाइश |
आजमाइश |
| अवश्यक्ता |
आवश्यक्ता |
| अहार |
आहार |
| तत्कालिक |
तात्कालिक |
| नदान |
नादान |
| बजार |
बाजार |
| सप्ताहिक |
साप्ताहिक |
पद्य विधा में लेखकों को काफी आजादी रहती है, एवं यह जानकारी सिर्फ गद्य से सम्बन्ध रखती है. यदि इन लेखों में कोई गलती हो जाती है (संगणक पर मात्रायें अकसर गडबडा जाती हैं) तो स्नेही पाठकगण टिप्पणी द्वारा उसे सुधार दें. मैं आभारी हूंगा – शास्त्री जे सी फिलिप
Posted June 9th, 2007 by Shastri JC Philip
नाचिकेत हिन्दी-खोज-यंत्र 50 और सम्पादकों को अपनी टीम में जोडना चाहता है. इस समय नाचिकेत हिन्दी का सबसे वृहद सर्च-इंजन है, एवं सहयोगी सम्पादक इसे और भी वृहद बनाने में मदद कर सकते हैं. हर सम्पादक के पास अपने खुद का स्वतंत्र गूगल नियंत्रण-पेनल/बटन होगा जहां बिना किसी और के दखल के वे अपनी पसन्द के हिन्दी चिट्ठों एवं जाल-स्थलों को जोड सकेंगे.
नाचिकेत के सम्पादक बन कर हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये आप एक बहुत बडा सहयोग कर सकते हैं. इसके सम्पादक बनने के लिये सिर्फ एक शर्त है — आपको राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार मे रुचि होनी चाहिए. पूर्ण विवरण के लिये मुझ से Shastriji@sarathi.info पर सम्पर्क करें
Posted June 5th, 2007 by Shastri JC Philip
पेश है हिन्दी चिट्ठों एवं जालस्थलों में उप्लब्ध सामग्री की खोज हिन्दी में करने के लिये सारथी का खोज-यंत्र “नाचिकेत”. हिन्दी के 2500 से अधिक जाल-स्थल इसमें शामिल कर दिये गये हैं, एवं हर नया हिन्दी जालस्थल इसमें जोड दिया जाता है जो हमारी जानकारी में आता है. जाल-स्थल सारथी/नाचिकेत के सम्पादकों के द्वारा चुने/जोडे जाते हैं एवं इन चुने हुवे जाल-स्थलों की खोज गूगल द्वारा होती है. अत: खोजियों को सही जानकारी तुरंत उपलब्ध हो जाती है. हिन्दी खोज एवं अनुसंधान के लिये अब कहीं और जाने की आवश्यक्ता नहीं है.
नाचिकेत की ओर से: “शुभ खोज” !
– शास्त्री जे सी फिलिप