ईसा-जयंती के इस पावन पर्व पर
आप सब को ईश्वर की असीम आशिष प्राप्त हो!
राजमहलों में जन्म लेने के बदले जिस तरह से
प्रभु ईसा ने एक गरीब के घर में
और वह भी अपने मांबाप की यात्रा के
दौरान एक गौशाले में जन्म लिया, उस घटना
के द्वारा प्रभु हम सब को यह समझने की
बुद्धि प्रदान करें कि ईश्वर आम आदमी
के दिलों में वास करना चाहते हैं.
प्रभु करे कि नया साल आप सब के जीवन
और मनों में ईश-निवास का एक साल हो!
सस्नेह — शास्त्री
मेरे एक मित्र हमेशा कहा करते थे कि मकान बनवा कर देखो या बिटिया की शादी करवा के देखो कि आदमी की क्या दुर्गति होती है. प्रभु की दया से जीवन में दोनों काम कर लिये. दुर्गति तो नहीं हुई लेकिन हां आटेदाल का भाव पता चल गया.
प्रभु की दया से और आप सब की प्रार्थना के कारण सितंबर 10 को बिटिया आशा की शादी कुशल मंगल से संपन्न हो गई. आजकल आशा और मनु हमारे साथ हैं क्योंकि 23 तारीख को आशा का एक पेपर है. नवदंपत्ति खुश हैं एवं दोनों का विषय एक ही है अत: मनु का काफी समय आशा को पढानेलिखाने में लग रहा है.
ऊपर हम सब का एक अनौपचारिक चित्र देख सकते हैं (शास्त्री, सौ. आशा, मनु, सौ. शांता). चित्र बेटे आनंद ने लिया अत: वह इस में नहीं है. हमारे संप्रदाय में हर प्रकार के आभूषण की वर्जना है अत: आप को दोनों स्त्रियों के शरीर पर आभूषण के रूप में एक धागा भी नहीं दिखाई देगा. रंगबिरंगे वस्त्रों का चलन भी अभी हाल ही में हुआ है, लेकिन विवाह के दिन वधु सिर्फ श्वेत वस्त्र ही पहन सकती है.
जैसा मैं ने इसके पहले याद दिलाया था, केरल का ईसाई समाज 2000 साल पुराना है. यहां जब कई तरह की कुरीतियां आ गईं तब यह नवीकरण हुआ था (लगभग आर्यसमाज के समान). 150 साल पुराने इस नवीनीकृत संप्रदाय में कुछ बातों की इतनी कडी वर्जनायें है कि धूम्रपान, मद्यपान, सिनेमा थियेटर जाने पर, व्यभिचार में पकडे जाए पर, या विवाहविच्छेद होने पर लोगों का हुक्कापानी बंद कर दिया जाता है. इस संप्रदाय में पादरी नहीं होते हैं बल्कि चुने लोगों को समाज के “अगुवे” की पदवी दी जाती है. इन अगुवों को काफी कठोर नियमों का पालन करना पडता है.
धार्मिक कर्मकांडों को तिलांजली देने के कारण इस संप्रदाय में धार्मिक कार्य काफी सहज हो गया है. आशा-मनु का विवाह सिर्फ डेढ घंटे में निबट गया और अतिथियों को खानेपीने एवं आपस में मिलने जुलने के लिये काफी समय मिल गया. विवाह भी हमारे समाज के एकदो अगुओं ने की जिनको पुरोहित का कार्य करने का अनुभव है. सब कुछ केरल की मलयालम भाषा में हुआ, लेकिन मेरे जो उत्तरभारतीय मित्र (ग्वालियर के) वहां मौजूद थे उनको मूल बातें समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई.
किसी भी समाज में दूरदर्शी लोगो हों तो समाज में बदलाव आ सकता है. हमारे इस संप्रदाय में लगभग 500,000 लोग हैं जिनके बीच धूम्रपान, मद्यपान, सिनेमा थियेटर जाना, व्यभिचार, या विवाहविच्छेद लगभग अनुसुनी बात है. इससे निकला एक और संप्रदाय है जिसमें आज लगभग 5,000,000 लोग हैं जो इससे भी कडे अनुशासन का पालन करते हैं. ये लोग भी आभूषण का प्रयोग नहीं करते हैं.
प्रभु की दया हुई तो कल से चिट्ठाजगत में सक्रिय हो जाऊँगा. मेरे सारे मित्रों को मेरा दिली आभार — शास्त्री
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