Posted November 11th, 2007 by Shastri JC Philip
पिछले दिनों ओरछा (झांसी से 29 किलोमीटर) के 500 साल पुराने महल के अनुसंधान एवं भित्तिचित्रों के छायाचित्र लेते समय एक विरल चित्र दिखाई दिया. इसमें 11 स्त्रियों के शरीरों को जोड कर एक हाथी बनाया गया है एवं उस पर एक महावत विराजमान है.

हाथी की दुम एक स्त्री की चोटी है, सींगे हाथ हैं, एवं सूंड एक स्त्री का कमर और पैर है. मेरे अनुसंधान-साथी जिजो के घंटों की मेहनत से ही यह चित्र इस तरह पहचान लायक हुआ है. कारण ?? दर्शकों मे से बहुतों ने इस चित्र की एतिहासिकता एवं विरलता को न समझ कर उनकी जहां मर्जी वहां इसे नाखूनों से कुरेद दिया है. वनस्पति मूल से बने 400 साल या उससे अधिक पुराने ये चित्र दिन की रोशनी में उपस्थित अल्ट्रा वायलेट किरणों के कारण पहले ही हल्के पड चुके हैं. ऊपर से लौंडे लपाडों के नाखूनों ने बचीखुची कसर भी निकाल दी है.
पुरावस्तु विभाग अल्ट्रा वायलेट किरणों से बचाने के लिये अब इस कमरे को बंद रखता है एवं छायाचित्र के लिये फ्लेश के उपयोग की अनुमति किसी भी हालत में नहीं देता है. अत: एक धुंधले पडे, खुरचे गये चित्र को अंधेरे में हम ने छायाचित्र लेकर काफी मेहनत करके, परिष्कृत करके, इसे आपके लिये यहां प्रस्तुत किया है. जो लोग हिन्दुस्तान के एतिहासिक विरासत के विनाश में आनंद पाते हैं वे इन चीजों की कीमत क्या समझें.
(कुछ विशेष कारणों से एतिहासिक धरोहरों के इन छायाचित्रों का प्रतिलिपि अधिकार सुरक्षित है. लेकिन webmaster@sarathi.info पर संपर्क करने पर तुरंत ही लिखित रूप में इनके उपयोग के लिये अनुमति प्रदान कर दी जायगी)
Posted November 10th, 2007 by Shastri JC Philip
हिन्दी चिट्ठाजगत में ऐसे कई लोग हैं जो देर सबेर चिट्ठाकारी को एक अनावश्यक भार समझने लगते हैं एवं धीरे धीरे इस विधा से दूर हो जाते हैं. कोई पूछे कि आजकल आप के लेख नहीं दिखते तो पट से जवाब आ जाता है कि नौकरी, परिवार, एवं सैकडों झंझटों के रहते चिट्ठा चलाना असंभव है. यह गलत उत्तर है, एवं चिट्ठा बंद होने के पीछे गलती अकसर उन्ही की है.
कोई भी व्यक्ति असीमित शक्ति का मालिक नहीं है जो पृथ्वी का सारा भार उठा सके. हम में से हरेक की सीमायें हैं. जो व्यक्ति इन सीमाओं को पह्चान कर अपनी सक्षमता के अंदर योजना बनाता है वह सफल होता है, या अपने अभियान में उसके सफलता की संभावना दूसरों की तुलना में अधिक होती है.
जैसा मैं कई बार लिख चुका हूँ, रोज एक 1500 शब्द का लेख लिखना किसी भी चिट्ठाकर के वश की बात नहीं है. हफ्ते में इस तरह के तीन लेख भी लिखना मुश्किल है. अत: हवा में न उडें. अपनी सीमा पहचानें. 1500 शब्द के एक लेख के बदले 150 शब्द के 5 लेख आपको अधिक दूर ले जायेंगे.
इसी तरह यदि आप चाहें कि आप का हर लेख अनुसंधान के ऊपर आधारित हो तो आप तब तक हफ्ते में सात लेख नहीं लिख सकते, जब तक आप ने कम से कम बीसतीस साल किसी एक विधा में अनुसंधान न किया हो. पूर्वाग्रह छोडिये क्योंकि ये आपको परेशान कर देंगे. हिन्दी के सबसे अधिक पढे जाने वाले चिट्ठों को देखिये, वे सब बहुत ही व्यावहारिक तरीके से सोचसमझ कर लिखे जाते हैं. अपनी अपनी विधा में आधिकारिक भी हैं.
कल्पनालोक में विचर कर अपने चिट्ठे को बर्बाद करने में कोई होशियारी नहीं है. जगहसाई अलग से होती है. अनियमित चिट्ठों को पाठक भी कम मिलते हैं. अत: जल्दबाजी में चिट्ठाकारी को एक लफडा घोषित करने से पहले जांच लीजिये कि आप से गलती कहां हुई है.
Posted November 9th, 2007 by Shastri JC Philip
देशज संगीत एवं वाद्य यंत्र उस देश की आत्मा को प्रदर्शित करते हैं. अत: देशज संगीत एवं वाद्य यंत्रों का लुप्त होना देशीय भाषाओं के लुप्त होने के समान है.

अक्टूबर में ओरछा (झांसी के पास, बुन्देलखंड इलाका) अनुसंधान यात्रा के दौरान दोतीन देशज वाद्य यंत्र दिखे जो अब लुप्तप्राय हैं — खास कर उस नई पीढी के लिये जो गिटार की उल्टीसीधी धुनों पर पर कूल्हे मटकाने को संगीत एवं संगीत का असली आस्वादन समझता है.
जैसे ही हम ओरछा के प्राचीन राजमहल की ओर बढे कि हमें एकतारा लिये एक बाबाजी मिल गये. हमारे अनुरोध पर उन्होंने एकतारे पर तन्मयता के साथ एक बहुत ही मीठा गाना सुनाया. उनकी एक उंगली में आप लोहे की एक रिंग देख सकते हैं. इसे एकतारे पर बजा कर वे तार की मधुर आवाज के साथ साथ बहुत ही अच्छा प्रभाव उत्पन्न कर रहे थे.
भारतीय जनमानस को स्पर्श करने वाले हजारों देशज वाद्य यंत्र हैं, लेकिन कद्रदानों के अभाव में वे लुप्त होते जा रहे हैं. इनको जीवित रखना मेराआपका काम है. हिन्दी जालजगत में इस विषय पर दोचार जालस्थलों या चिट्ठों के द्वारा इस मामले में एक बहुत बडी पहल हो सकती है. (इस चित्र का उपयोग सारथी के जालपते के साथ आप कहीं भी कर सकते हैं. उच्च क्वालिटी के मूल चित्र के लिये आप हमसे संपर्क कर सकते हैं जो तुरंत भेज दिया जायगा)
Posted November 8th, 2007 by Shastri JC Philip
अक्टूबर 15 से नवम्बर 8 तक मैं अपने कोच्चि घर-दफ्तर से दूर था. यात्रा के दौरान जाल एवं संगणक के मामले में मैं अधिकतर अपाहिज रहा. लेकिन इसके बावजूद रोज सुबह 6 बजे एक नया लेख छपता रहा. इसके पीछे दोतीन रहस्य हैं.
पहला रहस्य है मेरे “छोटे लेख” फिलासफी का जिसके कारण मैं ऐसे विषयों को चुन सका जिन पर बिना अपूर्णता महसूस हुए 200 शब्द से कम के लेख लिख सका. 200 शब्द से कम में लिखने के लिये अपने आपको ट्रेन करने में एक महीना लगा लेकिन आज उसका फायदा मिल रहा है. स्व-ट्रेनिंग के बाद छोटे लेख लिखना एवं संपादित करना 1500 शब्द के लेख लिखने की तुलना में 10 गुना आसान हो जाता है.
दूसरा रहस्य है कि स्व-ट्रेनिंग के बाद छोटे लेख कम समय में लिखे जा सकते हैं. अत: कोच्चि छोडने के पहले उपलब्ध समय में करीब 20 लेख पहले से लिख कर समय/तारीख तय करके पोस्ट कर दिया. (यह सुविधा “वर्डप्रेस” तंत्र से संचालित हर चिट्ठे पर उपलब्ध है. ब्लॉगर का मुझे अनुमान नहीं है. हो तो जानकार उसे टिप्पणी में जोड दें तो बडा आभार होगा.) लंबे लेख लिखने जाता तो इस समय में कुछ न कर पाता.
इस तरह पिछले 20 दिन मेरे लेख तंत्रांश की मदद से अपने आप चिट्ठे पर आते जा गये. मैं इन 20 दिनों में आपकी सारी टिप्पणियां पढता रहा पर जालआदि कि सुविधा कम होने के कारण जवाब न दे सका. आभारी हूं आप सबका.
जब भी आपके पास आधा घंटा हो तो क्यों न एक लेख लिख कर भविष्य के उपयोग के लिये पोस्ट कर दें या अपने संगणक पर ही सुरक्षित रख लें ? आपका चिट्ठा कुछ और नियमित हो जायगा!